Friday, August 19, 2022

स्पेशल रिपोर्ट: कलेजा चीर देने वाली है बोकारो के विस्थापितों की दास्तान, जमीन जाने के साथ ही पड़ गए रोटी के लाले

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बोकारो। झारखंड (तत्कालीन बिहार) में आजादी के बाद 26 जनवरी 1964 को सार्वजनिक क्षेत्र में एक लिमिटेड कंपनी के तौर पर बोकारो इस्पात कारखाना का आधारशिला रखा गया था, जो बोकारो इस्पात लिमिटेड के रूप में जाना गया। बाद में सेल के साथ इसका विलय किया गया और यह बोकारो इस्पात संयंत्र हो गया। मगर आज भी इसे बीएसएल के नाम से ही जाना जाता है। उद्देश्य था क्षेत्र का आर्थिक रूप से विकास एवं रोजगार विकसित करने के साथ-साथ देश को इस्पात उत्पादन में आत्मनिर्भर बनाना।

बताना जरूरी होगा कि सेल को बोकारो स्टील प्लांट के लिए 31287 एकड़ भूमि तत्कालीन बिहार सरकार ने भूमि अधिग्रहण अधिनियम के तहत विस्थापितों से अधिग्रहीत कर दिया था। यह भूमि सेल को भूमि प्लांट, अनुषांगिक इकाई व प्रासंगिक इकाई लगाने के लिए दी गयी थी।

अब जब विस्थापित खाली पड़ी 10344 एकड़ भूमि की वापसी की मांग कर रहे हैं तो सेल कहता है कि वो भूमि का इस्तेमाल जिस कार्य के लिए भूमि अधिग्रहण किया गया था, उसी कार्य के लिए कर रहा है। वहीं सेल के अनुसार ही बोकारो स्टील प्लांट के लिए अधिग्रहीत भूमि में से 10344 एकड़ भूमि का 50 साल से इस्तेमाल नहीं हो रहा है।

बड़ी अजीब बात है कि एक तरफ सेल खुद कहता है कि बीएसएल के लिए अधिग्रहीत भूमि में से 10344 एकड़ भूमि का 50 साल से अब तक इस्तेमाल नहीं हुआ है, वहीं दूसरी तरफ यह भी दावा कर रहा है कि वो भूमि का इस्तेमाल जिस कार्य के लिए भूमि अधिग्रहण किया गया था, उसी कार्य के लिए कर रहा है। बता दें कि बोकारो स्टील प्लांट निर्माण का प्रस्ताव 10 मिलियन टन का था, लेकिन 4.6 मिलियन टन के निर्माण के बाद बाकी का 5.4 मिलियन टन ठंडे बस्ते में पड़ा रह गया।

जिस कारण बोकारो स्टील प्लांट के निर्माण की अवधारणा भी पूरी नहीं हो पायी है। कारखाने के निर्माण काल में विस्थापितों सहित आसपास के स्थानीय लोगों का भी कोई उत्थान नहीं हो पाया। बोकारो स्टील कारखाना में इस्तेमाल होने वाले कल—पुर्जों के निर्माण के लिए स्थापित अनुषंगिक इकाइयों के पास भी उपयुक्त काम नहीं मिलने की वजह से वे इकाइयां भी मृत प्राय हो चुकी हैं। जिसके कारण विस्थापितों सहित आसपास के स्थानीय लोगों की बेरोजगारी तीन पीढ़ियां बीत जाने के बाद भी जस की तस बनी रह गई है।

बता दें कि जहां बोकारो स्टील कारखाना है, वह क्षेत्र माराफारी के नाम से जाना जाता था। माराफारी एक पंचायत था, जिससे सटा एक गांव था विशनपुर, जहां के जमींदार हुआ करते थे ठाकुर गंगा प्रसाद सिंह, जिनके बेटे थे ठाकुर सरजू प्रसाद सिंह। उनके काल में ही बोकारो इस्पात कारखाना का निर्माण हुआ। कारखाने निर्माण के वक्त में ही विशनपुर बोकारो इस्पात कारखाना के पेट में समा गया। 

उस वक्त बोकारो इस्पात कारखाने के लिए हजारीबाग जिला की पांच पंचायत माराफारी, गोड़ाबाली, डुमरो, जरीडीह तथा कुंडोरी और धनबाद जिले की चार पंचायत राउतडीह, धनडबरा, पिंडरगड़िया और हरला के 64 गांवों को अधिग्रहीत किया गया था। 70 के दशक में जब हजारीबाग जिले के कुछ भाग को काटकर 4 दिसंबर 1972 को गिरिडीह जिला बनाया गया, तब माराफारी गिरिडीह जिले के अंतर्गत आ गया। 1 अप्रैल 1991 में बोकारो जिला बना, जिसमें गिरिडीह और धनबाद जिले के कई क्षेत्रों को शामिल किया गया।

बोकारो इस्पात कारखाने की स्थापना के समय प्रथम प्रबंध निदेशक के.एम.जॉर्ज ने स्थानीय विस्थापितों के नाम पर एक हैंडबिल जारी कर वादा किया था प्लांट निर्माण में अपनी जमीन दान कीजिए, चतुर्थ श्रेणी की नौकरी आपके लिए सुरक्षित व आरक्षित रहेगी। स्थानीय लोगों ने अपना घर-बारी, खेत-खलिहान, जो उनके तथा उनके पूर्वजों के जीवन यापन का एकमात्र साधन था, उसे बोकारो इस्पात कारखाने के निर्माण हेतु न्योछावर कर दिया, यह सोचकर कि उनके बच्चों का भविष्य उज्ज्वल होगा। उन्होंने जीविकोपार्जन का एकमात्र साधन जमीन को बोकारो इस्पात कारखाने के निर्माण हेतु दे दिया। डीपीएलआर (डायरेक्टर, प्रोजेक्ट लैंड एण्ड रिहैबिलिटेशन) निदेशक, परियोजना भूमि एवं पुनर्वास के माध्यम से मात्र कुछ विस्थापितों को सीधे नियोजन देने के बाद बीएसएल प्रबंधन ने इस प्रावधान को खत्म कर दिया।

तत्कालीन प्रधानमंत्री स्वo इन्दिरा गांधी के बोकारो आगमन के दौरान संज्ञान में मामला आने पर विस्थापितों का नियोजन पुनः शुरू हुआ था। फिर बीच में सेना से सेवानिवृत्त हो चुके लोगों के लिए चतुर्थ श्रेणी की बहाली बीएसएल प्रबंधन ने निकाली। तत्कालीन बिहार सरकार ने इस पर रोक लगाने का आदेश जारी करते हुए कहा था कि, चतुर्थ श्रेणी की नौकरी सिर्फ विस्थापितों के लिए आरक्षित है। इसमें किसी और को नहीं ले सकते। विस्थापितों को नियोजन से वंचित रखने के लिए बीएसएल प्रबंधन की तरफ से काफी प्रयास होते रहे और वह इसमें सफल भी रहा है। बेरोजगार विस्थापित अपने हक व अधिकार के लिए वर्षों से बीएसएल प्रबंधन की विस्थापित विरोधी नीतियों के विरूद्ध आंदोलन करते रहे हैं। दूसरी तरफ बीएसएल के कुछ विस्थापित विरोधी मानसिकता वाले अधिकारियों ने विस्थापितों को हमेशा बरगलाने का काम किया है। 

बताते चलें कि कारखाना निर्माण के क्रम में एक-एक अवार्डी से रैयती जमीन जो अर्जित की गई, वे कई एकड़ में थी और मुआवजा कौड़ी के भाव में दिया गया। पुनर्वास के नाम पर उन्हें मात्र पांच या दस डिसमिल गैरमजरूआ जमीन रहने के लिए आवंटित हुआ था। इतनी सी जमीन में विस्थापित घर बना कर रहे या खेती, किसानी करें? यह सवाल आज भी मुंह बाए खड़ा है। करीब पांच दशक बीत चुका है, विस्थापितों के हर परिवार के सदस्य की संख्या कई गुना बढ़ गयी है, और आज वे उसी 5 से 10 डिसमिल भूखंड में किसी तरह रहने को मजबूर हैं। वहीं बोकारो इस्पात संयंत्र में इनके नियोजन क़ा रास्ता पूरी तरह से बंद है, ऐसे में इनका गुजारा कैसे हो? ये एक यक्ष प्रश्न मुंह बाए खड़ा है? इसका जवाब कौन देगा?

उल्लेखनीय है कि 2012 के मुख्यमंत्री अर्जुन मुंडा के कार्यकाल में विस्थापित मामले की पड़ताल करने के लिए विधानसभा की एक विशेष जांच समिति गठित की गई थी, जिसमें विधानसभा सदस्यों में माधवलाल सिंह, उमाकांत रजक, जगरनाथ महतो, अमित कुमार यादव, ढुल्लू महतो ने एक रिपोर्ट दिनांक 30.11.2012 को झारखंड विधानसभा में प्रस्तुत किया था, जिसमें स्पष्ट दर्शाया गया कि निदेशक, परियोजना भूमि एवं पुनर्वास ने कुल 23,947 विस्थापित परिवार चिन्हित किये हैं, जिसमें 15,890 व्यक्तियों को बोकारो प्लांट में नियोजित किया गया है, जिसमें 12,600 परिवार अच्छादित होते हैं। अभी भी कुल 11,357 विस्थापितों को नियोजन देना बाकी है।

बताते चलें कि बीएसएल के आधुनिकीकरण के क्रम में प्रभावित गांव कनारी व कुंडोरी से वर्ष 2014 में 132 विस्थापितों को एवं वर्ष 2015 में 124 लोगों को 2 साल आईटीआई एवं 1वर्ष अप्रेंटिस करवा कर बीएसएल में नियोजित किया गया है। इसमें सामान्य श्रेणी के 35 वर्ष तक के विस्थापितों को लिया गया।

चूंकि डीपीएलआर के माध्यम से ही सीधी नियुक्ति की मांग को लेकर विस्थापित लगातार कई दशक तक आंदोलनरत रहे। चरणबद्ध व जोरदार आन्दोलन के बाद प्रबंधन ने कहा कि नियोजन मिलेगा, पर सीधे नियोजन नहीं दे सकते हैं, बल्कि ट्रेनिंग करा कर लेंगे।

बीएसएल प्रबंधन ने विस्थापितों को 2साल आईटीआई करवाने के बाद 1साल अप्रेंटिस करा कर नियोजित करने का आश्वासन दिया था और इसके साथ ही आईटीआई करवाने की कवायद प्रबंधन ने शुरू कर दी थी। अत: इस प्रक्रिया में 3साल का समय लगता, इसीलिए विस्थापितों ने प्रबंधन को सुझाव दिया कि जिस तरह से मृत कर्मचारियों के आश्रितों को 2साल का अप्रेंटिस करवा कर नियोजन में लिया जाता हैं, उसी तरह से विस्थापितों को भी सीधे 2साल का अप्रेंटिस करा कर लिया जाय। प्रबंधन इसके लिए तैयार हो गया। परीक्षा लेने की कोई बात नहीं हुई थी। बावजूद इसके वर्ष 2016 में अप्रेंटिस ट्रेनिंग कराने के लिए विस्थापितों से ऑनलाइन आवेदन मांगा गया। लगभग 13 हज़ार प्राप्त आवेदन की प्रति (Hard Copy) बीएसएल प्रबंधन ने डीपीएलआर को सत्यापित करने के लिए भेजा था।

डीपीएलआर के तत्कालीन निदेशक एस.एन. उपाध्याय ने प्रबंधन से पूछा था कि, क्या इन सभी को प्रशिक्षण करा कर लेंगे? इसके साथ ही डीपीएलआर ने सुझाव दिया था, कि यदि सबको नहीं लेना है, तो फिर जितना लेना है, उतनों की ही सूची दीजिये। तब प्रबंधन ने वैसे आवेदकों की छटनी कर दिया, जो विस्थापित अवार्डी के परपौत्र (Great Grand Son) थे। छटनी के बाद बचे लगभग 7200 विस्थापितों को लिखित परीक्षा से गुजरना पड़ा। फिर इनकी सूची बनाकर डीपीएलआर को भेज कर सत्यापित कराया गया तथा एक परिवार से एक आदमी, जो उम्र में सबसे बड़ा हो, का चयन हुआ। अर्थात योग्यता के आधार पर नहीं, बल्कि उम्र के आधार पर लगभग 4200 विस्थापितों की सूची प्रबंधन ने तैयार की। इसमें से फिर तीन सूची बनाकर कुल 1500 विस्थापितों को ट्रेनिंग कराने की बात त्रिपक्षीय वार्ता में तय हुई।

अप्रेंटिस ट्रेनिंग वर्ष 2018 में दो साल विलंब से शुरू हुई। प्रथम सूची के 500 विस्थापितों की ट्रेनिंग 20 अगस्त 2020 को पूरी हो चुकी है, पर नियोजन की दिशा में अभी तक कुछ नहीं हुआ है। काफी प्रयास के बाद दूसरी सूची के 400 विस्थापितों का प्रशिक्षण अक्टूबर 2020 में शुरू हुआ। तीसरी सूची के 600 विस्थापितों का प्रशिक्षण कब शुरू होगा पता नहीं। विलंब से ट्रेनिंग शुरु होने की वजह से नियोजन के लिए आवश्यक अधिकतम उम्र सीमा समाप्ति के कगार पर है। आंदोलन करने पर आश्वासन के सिवा कुछ नहीं मिलता है।

जबकि बहाली के लिए जो विज्ञापन पूर्व में प्रकाशित होता था, उसमें विस्थापितों को अधिकतम उम्र सीमा 45 वर्ष तक की छूट मिलने की बात थी। लेकिन इसे घटा कर 28 वर्ष कर दिया गया और विस्थापितों और एसटी—एससी को 5 वर्ष की छूट दी गई। विस्थापित इस पर भी राजी हो गए, मगर वर्तमान समय में अधिकतम उम्र सीमा की छूट को पूरे विस्थापितों के लिए समाप्त कर दिया गया है। ऐसे में अप्रेंटिश की ट्रेनिंग पूरी कर चुके 35 ऐसे लड़के हैं जिनकी उम्र खत्म हो चुकी है और कई ऐसे लड़के हैं जिनकी उम्र खत्म होने के कगार पर है।

उदाहरण के तौर पर तापस कुमार मिश्रा 24 की उम्र में अप्रेंटिश की ट्रेनिंग पूरी की अब वे 29 के हो गए।  

शोमनाथ मुखर्जी 23 की उम्र में अप्रेंटिश की ट्रेनिंग पूरी की अब वे 28 के हो गए। विजय कुमार सिंह 24 की उम्र में अप्रेंटिश की ट्रेनिंग पूरी की अब वे 29 के हो गए। निलेश कुमार पांडेय 23 की उम्र में अप्रेंटिश की ट्रेनिंग पूरी की अब वे 28 के हो गए। शाहिद अंसारी 23 की उम्र में अप्रेंटिश की ट्रेनिंग पूरी की अब वे 28 के हो गए। इसी तरह से बाकी कई लोगों की भी उम्र ज्यादा हो गयी है।

अभी तक प्रशिक्षण पूरा कर चुके 500 लोगों की एआईटीटी की परीक्षा नहीं हो पाई है। एक ओर जहां विलंब से ट्रेनिंग शुरु होने की वजह से इनकी अधिकतम उम्र सीमा समाप्ति के कगार पर है। वहीं दूसरी और एआईटीटी परीक्षा में हो रहा विलंब से इनका भविष्य बर्बाद हो रहा है। बोकारो इस्पात संयंत्र में जो बहाली होती है, उसके लिए आवश्यक अधिकतम उम्र सीमा भी समाप्त होती जा रही है। बोकारो इस्पात प्रबंधन का कहना है कि अप्रेंटिसशिप की परीक्षा हमारे हाथ में नहीं है।

विस्थापितों की स्थिति दिनोंदिन बद से बदतर होती जा रही है। नौबत भूखे मरने की हो गयी है। एक ओर बोकारो इस्पात प्रबंधन की गलत नीतियां हैं, तो दूसरी ओर अप्रेंटिस की परीक्षा में विलंब के कारण विस्थापित डिप्रेसन का शिकार हो कर आत्महत्या कर रहे हैं। कोरोना संकट परीक्षा में विलंब का एक कारण हो सकता है। ऐसे में उम्र सीमा समाप्त हो जाने के बाद अप्रेंटिस प्रशिक्षण का प्रमाण पत्र इनके लिए किसी काम की नहीं रह जाएगा।

अपनी मांगों को लेकर अप्रेंटिस प्रशिक्षित विस्थापितों ने कई बार आंदोलन किए, लेकिन बीएसएल प्रबंधन द्वारा उन्हें आश्वासन के सिवाय कुछ भी नहीं मिला है।

आंदोलन की इसी कड़ी में विस्थापित अप्रेंटिस संघ द्वारा 13 जुलाई 2021 से अनिश्चितकालीन धरना के कार्यक्रम की शुरुआत की गयी थी, जो 18 जुलाई को समाप्त हुई। इस कार्यक्रम को विफल करने के लिए बोकारो प्रबंधन द्वारा 13 जुलाई 2021 को ही होमगार्ड के जवानों सहित जिला प्रशासन को लगाकर रखा था। लेकिन उनकी एक न चली। संघ ने रैली की शक्ल में आकर बीएसएल के प्रशासनिक भवन के दोनों गेट को जाम कर दिया। जाम करने के कुछ ही देर के बाद सिटी थाना प्रभारी, नियुक्त मजिस्ट्रेट आकर जाम को हटाने कि बात करने लगे लेकिन कमेटी के सदस्यों ने कहा कि जाम नहीं हटायेंगे। चिलचिलाती धूप में भी लोग जमे रहे।

आंदोलन के पहले दिन की शाम को सिटी थाना प्रभारी, मजिस्ट्रेट, सीआईएसएफ और बोकारो इस्पात संयंत्र के आईआर विभाग के द्वारा संघ की मांगों को उनके समक्ष रखने को कहा गया। जिसमें 4 आंदोलनकारी गये और उन्होंने अपनी मांगें रखी। तब कहा गया कि आपकी मांग उच्च पदाधिकारियों के समक्ष रखी जायेगी। आप धरना को समाप्त कर दें। लेकिन आंदोलनकारी नहीं माने।

दूसरे दिन धरना को समाप्त कराने के लिए प्रशासन द्वारा लगातार दबाव बनाया जाने लगा। आंदोलन के दौरान कई विस्थापित संगठनों का भी समर्थन मिलने लगा। तीसरे दिन भी प्रशासनिक स्तर से दबाव बनाने क्रम जारी रहा।

चौथे दिन 4-5 बजे शाम को मजिस्ट्रेट द्वारा कमेटी के लोगों को बुलाया गया और कहा गया आपकी त्रिपक्षीय वार्ता 23 जुलाई को करायी जायेगी। जब कमेटी के द्वारा त्रिपक्षीय वार्ता का पत्र और प्रबंधक की ओर से कौन—कौन रहेंगे? पूछा गया, तो इस संबंध में कोई स्पष्ट जवाब नहीं दिया गया।

पांचवें दिन फिर स्थानीय प्रशासन द्वारा कहा गया कि 19 जुलाई 2021 को त्रिपक्षीय वार्ता का पत्र मिलेगा। लेकिन आंदोलनकारियों द्वारा त्रिपक्षीय वार्ता का त्वरित पत्र की मांग की गई और पत्र नहीं मिलने पर धरने को समाप्त नहीं करने का निर्णय लिया गया। उसी रात जमकर वर्षा होने लगी लेकिन सभी प्रशिक्षु जमे रहे।

छठे दिन सुबह लगभग 10 बजे मजिस्ट्रेट आये और कहा कि धरना समाप्त करो नहीं तो सबको अरेस्ट करेंगे। लेकिन कमेटी के लोगों ने कहा जब तक त्रिपक्षीय वार्ता का पत्र नहीं मिलता है, हम लोग धरना समाप्त नहीं करेंगे। कुछ देर में धरना स्थल को पुलिस छावनी में तब्दील कर दिया गया। इधर प्रशिक्षुओं की संख्या बढती गयी, जिसे भी इस तरह की बात की जानकारी हुई, वह धरना स्थल पर पहुंचता गया। कुछ देर में कांग्रेस युवा केन्द्रीय सचिव श्वेता सिंह ने धरना स्थल पर पहुंचकर आंदालनकारियों के हौसले को बढ़ाया और जिला प्रशासन को फोन पर पूरे मामले की जानकारी दी। तब जाकर बोकारो एसडीएम ने धरना स्थल पर पहुंचकर 28 जुलाई 2021 को त्रिपक्षीय वार्ता करवाने का लिखित पत्र दिया और धरना को समाप्त किया गया।

वार्ता प्रशासनिक भवन, बोकारो इस्पात संयंत्र में एसडीएम की अध्यक्षता में कराई गयी, जिसमें समिति की ओर से 4 सदस्य उपस्थित हुये, वहीं बीएसएल प्रबंधन की ओर से अधिशासी निदेशक पीएण्डए, सीजीएम पर्सन, सीजीएम एचआरडी, आईआर के अधिकारी उपस्थित रहे। वार्ता की कारवाई शुरु करवाते एसडीएम ने मांगों को रखने को कहा जो कुछ इस प्रकार है:-

1. प्लांट ट्रेनिंग पूरी कर चुके सभी विस्थापित अप्रेंटिस को बीएसएल में अविलंब सीधे बहाली किया जाए।

2. सभी विस्थापित अप्रेंटिस की प्लांट ट्रेनिंग के बाद बीएसएल में नियोजन सुनिश्चित की जाए।

3. सभी तरह के बहालियों में विस्थापितों के लिए अधिकतम उम्र सीमा को पूर्व की भांति 45 वर्ष किया जाए।

4. तीसरी सूची तथा बाकी अन्य विस्थापितों की ट्रेनिंग अविलंब प्रारंभ करवायी जाए।

विस्थापित अप्रेंटिस संघ की मांगों को सुनने के बाद एसडीएम ने प्रबंधन को अपना पक्ष रखने को कहा तो बीएसएल प्रबंधन की ओर से सुप्रीम कोर्ट के 2008 के एक आदेश का हवाला देते हुए कहा गया कि अब केवल और केवल विस्थापितों को नियोजन देना संभव नहीं है। जितनी नौकरी देनी थी, उससे ज्यादा नौकरी दी जा चुकी है। अब नौकरी देना संभंव नहीं है। इस पर संगठन की ओर से अमजद हुसैन ने कहा कि अभी भी पूर्ण रुप से बोकारो इस्पात संयत्र के कारण हुए विस्थापितों को न नियोजन दिया गया है न ही पूर्ण मुआवजा और न ही पुनर्वासित किया गया है।

यह विधान सभा कमेटी द्वारा रिपोर्ट में भी देखा जा सकता है, और रही बात सुप्रीम कोर्ट के 2008 के एक आदेश का, तो नियोजन के संबंध में 2008 के बाद अब तक लगभग 1300 विस्थापितों को नियोजन दिया गया है, जिसका सबसे ताजा उदाहरण बोदरोटांड के बांड्री वाला और कुंडौरी के आयल रिटेंशन पौंड का मामला है। जिसके तहत विस्थापितों को आईटीआई एवं ट्रेंनिग करवाकर शत प्रतिशत नियोजित बोकारो इस्पात संयंत्र में किया गया है। उसी तरह बोकारो इस्पात संयंत्र जितने भी विस्थापितों को अप्रेंटिस करवा रही है, उसको नियोजित करने कि दिशा में पहलकदमी करे। विस्थापितों का नियोजन बोकारो इस्पात संयत्र में होना उनका अधिकार है। अगर बोकारो इस्पात संयत्र को केवल अप्रेंटिस करवाना था, तो सभी विस्थापित गांवों के युवाओं को अप्रेंटिस करवाने हेतु फार्म को क्यों नहीं लिया गया? एक परिवार से केवल एक सदस्य को क्यों चयनित किया गया? उसमें भी उम्र में सबसे बड़े बेटे का चयन अप्रेंटिस के लिए क्यों किया गया? अवार्डी के परपोते को अप्रेंटिसशिप से क्यो वंचित किया गया।

अप्रेंटिस के लिए आवेदित विस्थापितों को डीपीएलआर (डायरेक्टर, प्रोजेक्ट लैंड एण्ड रिहैबिलिटेशन) कार्यालय से प्रमाणित क्यों कराया गया। इसलिए किसी भी हाल में बोकारो इस्पात संयंत्र विस्थापितों के भविष्य के साथ खिलवाड़ न करते हुए अप्रेंटिस किये हुए और जो अप्रेंटिस कर रहे हैं और जो अप्रेंटिस करेंगे, अप्रेंटिस करवा कर प्रबंधन नियोजन सुनिश्चित करे।

अरविंद कुमार ने कहा नियोजन में उम्र सीमा 45 वर्ष तक किया जाय, क्योंकि अप्रेंटिस करवाने के लिए बोकारो इस्पात संयंत्र द्वारा नोटिफिकेशन अगस्त 2016 में निकाला गया है, लेकिन अप्रेंटिस करवाने की प्रक्रिया काफी देर से प्रारम्भ की गयी। साथ ही साथ पिछली हुयी बहालियों में बोकारो इस्पात संयंत्र के द्वारा विस्थापितों की उम्र सीमा में छूट दी गयी थी, इसको ध्यान में रखते हुए आने वाली बहालियों में विस्थापितों के लिए उम्र सीमा 45 वर्ष किया जाय, ताकि अप्रेंटिस किये विस्थापितों को अवसर मिल सके।

राकेश सिंह ने कहा कि तीसरी सूची एवं बाकी बचे विस्थापितों की सूची जल्द से जल्द जारी की जाय।

शाहिद राजा ने कहा कि आज प्लांट में रोजाना घटनाएं हो रही हैं। इसका मुख्य कारण ठेकेदारी प्रथा में स्किल्ड कार्यों में अनस्किल्ड मजदूरों से काम लेना है। इसलिए जब तक अप्रेंटिस किये हुए हम सभी का नियोजन नहीं हो जाता है, तब तक विकल्प के तौर पर हम लोगों को जो स्किल्ड हैं और लगभग दो साल प्लांट के अंदर विभिन्न शॉप में कार्य कर चुके हैं, उन्हें रखा जाए। हम लोगों को बोकारो इस्पात संयंत्र के अंदर बोकारो प्रबंधन के अधीन एचएसडब्ल्यू (हाई स्कील्ड वर्कर) कार्य में रखकर, क्वार्टर, सभी के आश्रितों को बोकारो जनरल अस्ताल का मेडिकल का कार्ड जारी कर रखा जाय, ताकि तत्काल हम लोगों को राहत मिल सके।

वार्ता के दौरान इन तमाम बातों को एसडीएम (अनुमडल पदाधिकारी) द्वारा बोकारो इस्पात संयंत्र के प्रबंधन को 15 दिनों के अंदर समस्याओं का समाधान करने का निर्देश दिया गया। लेकिन अब तक मामला ढाक का तीन पात ही साबित हो रहा है।

 (बोकारो से वरिष्ठ पत्रकार विशद कुमार की रिपोर्ट।)

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