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आदिवासियों पर अदालत का वज्रपात! छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने वनाधिकार पट्टा बांटने पर लगायी रोक

रायपुर। वनाधिकार कानून के तहत आदिवासी तथा परंपरागत वनवासियों के जंगल अधिकार को मान्यता देने के विरुद्ध उन्हें अतिक्रमणकारी साबित करने के वाइल्ड लाइफ फर्स्ट एवं अन्य की तर्ज़ पर छत्तीसगढ़ उच्चन्यायालय में भी एक याचिका दाखिल की गई है। गत 06 सितंबर को वन और वनवासियों के हितों से जुड़ी हुई जनहित याचिका पर सुनवाई करते हुए छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने एक बड़ा आदेश जारी किया है। मुख्य न्यायधीश पीआर रामचंद्रन मेमन और न्यायमूर्ति पीपी साहू ने नितिन सिंघवी की याचिका पर आदेश देते हुए राज्य में वन अधिकार पट्टा बांटने पर रोक लगा दिया है।

गौरतलब है कि नितिन सिंघवी नामक व्यक्ति के द्वारा दायर याचिका, जिस पर आदिवासियों और अन्य परंपरागत वनवासियों के अधिकारों को चुनौती दी गयी है, की सुनवाई करते हुए माननीय न्यायालय ने छत्तीसगढ़ सरकार को आगामी दो माह तक  वनाधिकार कानून के तहत पट्टा देने तथा  अधिकारों को मान्यता देने की क्रियानवयन प्रक्रिया पर रोक लगा दी है। याचिका में पूर्व में निरस्त किये गए लगभग 04 लाख 62 हज़ार दावों पर वर्तमान सरकार द्वारा पुनर्विचार के निर्णय और संकल्पना को भी चुनौती दी गयी है। इस आदेश के बाद  पूरे प्रदेश में 24925 आदिवासी परिवारों के  बेदखली और उन्हें उजाड़े जाने की आशंका फिर से बढ़ गयी है।

इस मामले को लेकर छत्तीसगढ़ पीयूसीएल ने प्रेस विज्ञप्ति जारी कर कहा है कि छत्तीसगढ़ पीयूसीएल का यह स्पष्ट मत है कि इसे जमीनी स्तर पर ग्राम सभाओं और वन समितियों को निष्प्रभावी करने तथा उनके सिफारिशों पर रोड़ा अटका दिए जाने की गहरी साजिश के तौर पर देखा जाना चाहिए । लाखों की संख्या में तो जानबूझकर दावे निरस्त कर दिए गए और दावा कर्ताओं को इसकी सूचना भी नहीं दी गयी। अनुभाग स्तर पर दावों हेतु हजारों की संख्या में आवेदन स्वीकार नहीं किये गए। कानून के मुताबिक अपील के मौके भी नहीं दिए गए। पूरे प्रदेश मे छत्तीसगढ़ के संदर्भ में देखा जाए तो इस कानून के लागू होने के शुरुआत से ही प्रशासनिक मशीनरी का रवैया नितांत उपेक्षापूर्ण रहा। गौरतलब है कि प्रदेश में अभी भी लाखों आदिवासी और अन्य परम्परागत वन निवासी अपने वनाधिकारों से वंचित हैं।

यह चिंताजनक है कि प्रदेश में वनाधिकार कानून के क्रियान्वयन की संकल्पना ही विद्वेषपूर्ण प्रतीत होता है। बलौदा बाजार के कसडोल में कलेक्टर द्वारा उच्च न्यायालय  के आदेश का हवाला देते हुए वनाधिकार दावों को स्वीकार नहीं किया जाना इसका ताजा उदाहरण है। पूरे प्रदेश में  प्राप्त दावों पर पट्टा देने का प्रतिशत 47.54 है। सामुदायिक अधिकारों की मान्यता नगण्य है। आंकड़ों के मुताबिक प्रदेश में 30 हज़ार से अधिक गैर आदिवासियों को पट्टे वितरित किये गए हैं, दिलचस्प है कि इस मामले में छत्तीसगढ़ पूरे देश मे अव्वल है। राज्य सरकार इस मामले में उच्च न्यायालय के समक्ष जनता के हित में पक्ष रखने में विफल रही और जो कानून जनसंघर्षों के फलस्वरूप ऐतिहासिक अन्याय को ठीक करने की संकल्पना के साथ आया था, आज वही कानून प्रशासनिक विफलता के कारण देश के मूल रहवासियों को ही अतिक्रमणकारी  और घुसपैठिया साबित करने पर आमादा है।

प्रदेश में अतिक्रमण को परिभाषित करने और अवैध अतिक्रमण रोकने अन्य सम्यक कानून प्रभावी हैं। यदि यह वनों के विनाश और वनकर्मियों के सुरक्षा से संबंधित मामला  है तो भी ऐसे कथित अवैधानिक कृत्यों के रोकथाम के लिए व्यापक विधिक और प्रशासनिक उपचार मौजूद हैं, बावजूद इसके विडंबना यह कि राज्य सरकार आदिवासियों के हित संरक्षण का पक्ष रखने में नाकाम रही और कोर्ट ने राज्य के कमजोर दलील के चलते वनाधिकार मान्यता पर ही रोक लगाने का आदेश पारित कर दिया। छत्तीसगढ़ पीयूसीएल प्रदेश में सन 2005 के पहले से वनों पर काबिज लाखों आदिवासियों  तथा अन्य परंपरागत वनवासियों का पक्ष लेते हुए  उनके संवैधानिक अधिकारों की संरक्षा का पुरजोर मांग करती है।

याचिकाकर्ता नितिन सिंघवी का कहना है कि वन अधिकार पट्टा प्राप्त करने के लिये ग्रामीणों द्वारा वनों को काट कर वन अधिकार पट्टा प्राप्त किया जा रहा है। उन्होंने कोर्ट के समक्ष कहा कि, सर्वोच्च न्यायालय में सीतानदी अभ्यारण्य में वन भैसों के संरक्षण के लिये टीएन गोधावर्मन की याचिका पर वर्ष 2012 में वनभैसों का संरक्षण करने तथा वनों से कब्जों को हटाने के आदेश दिये थे। आदेश में आवश्यक होने पर वन क्षेत्रों में बांटे गए पट्टों को निरस्त करने के भी आदेश दिए गए थे। उन्हीं जंगलों में वनों की अवैध कटाई हो रही है।

याचिकाकर्ता के मुताबिक हाईकोर्ट ने कहा कि इन मुद्दों पर सरकार द्वारा कोई सकारात्मक पहल नहीं की गई है। छत्तीसगढ़ वन विकास निगम ने भी किये गये कब्जों के संबंध में पत्र लिखा है। राष्ट्रीय बाघ संरक्षण प्राधिकरण ने भी वनों को हो रहे नुकसान को लेकर शीघ्र कार्यवाही करने की रिपोर्ट दी है। सुनवाई के बाद हाईकोर्ट ने आदेशित किया कि याचिका में उठाये गये मुद्दों पर शीघ्र सुनवाई आवश्यक है और वन अधिकार पट्टों के वितरण पर दो माह की रोक लगा दी। साथ ही शासन को जवाब प्रस्तुत करने हेतु आदेशित किया। याचिकाकर्ता ने बताया कि वन अधिकार अधिनियम के प्रावधानों के अनुसार अगर कोई अनुसूचित जनजाति का 13 दिसम्बर 2005 के पूर्व 10 एकड़ वनभूमि तक कब्जा था, तो वही पट्टा प्राप्त करने की पात्रता रखेगा। जिसके लिये उसे प्रमाण प्रस्तुत करना पड़ेगा। इसी प्रकार अन्य परंपरागत वन निवासियों, जो 13 दिसम्बर 2005 के पूर्व वर्ष 1930 से वन क्षेत्रों में रह रहे हैं वे भी पट्टा प्राप्त करने के पात्र होंगे।

याचिका में बताया गया कि छत्तीसगढ़ में सितम्बर 2018 तक 401551 पट्टे अनुसूचित जनजाति तथा अन्य परम्परागत वन निवासी को बांटे गये। छत्तीसगढ़ में वनों का भाग लगभग 42 प्रतिशत है, जिसमें से 3412 वर्ग किमी जो कि कुल वन भू भाग का 6.14 प्रतिशत वन अधिकार पट्टे के रूप में बांटा गया। निरस्त किये गये वन अधिकार पट्टों पर पुनर्विचार नहीं किया जा सकता। निरस्त किये गये वन अधिकार पट्टों पर पुनर्विचार के नाम पर अपात्रों को पट्टे बांटे जा रहे हैं। नवम्बर 2015 तक 497438 पट्टों के आवेदनों को निरस्त कर दिया गया था परंतु पुनर्विचार कर के मार्च 2018 तक निरस्त पट्टों की संख्या घटकर 455131 रह गई।

जिन पट्टों के आवेदनों को निरस्त किया गया है वे कब्जाधारी अभी भी वन भूमि में काबिज हैं। छत्तीसगढ़ वन विकास निगम लिमिटेड, कवर्धा परियोजना मण्डल के वन क्षेत्र में गूगल मैप के अनुसार वर्ष 2013 और वर्ष 2015 में घना जंगल था, जिसकी वन भूमि 21122 हेक्टर थी, जिसमें से 9.24 प्रतिशत अर्थात 1949 हेक्टर भूमि पर 1510 वन अधिकार पट्टे बांटे गये। कक्ष क्र. पीएफ 498 पठरिया परिक्षेत्र, छत्तीसगढ़ राज्य वन विकास निगम लिमिटेड में गूगल अर्थ के अनुसार वर्ष 2015 तक घना जंगल था, अतिक्रमणकारियों के द्वारा कब्जा उसके बाद किया गया और 80 हेक्टर भूमि में 43 वन अधिकार पट्टे प्राप्त किये।

याचिकाकर्ता ने कोर्ट में उदन्ती सीतानदी टाइगर रिजर्व में हो रही वनों की कटाई के फोटो प्रस्तुत करते हुये बताया कि पेड़ों की छाल को नीचे से काट कर उन्हें मार दिया जाता है। पेड़ों को जलाया जाता है। टाइगर रिजर्व क्षेत्र में प्रधानमंत्री आवास योजना (ग्रामीण) के मकान बनाये गये हैं। वहां कई स्थानों में इंट-भट्ठे कार्यरत हैं।

छत्तीसगढ़ बचाओ आंदोलन के संयोजक आलोक शुक्ला ने कहा है कि ऐतिहासिक अन्याय को खत्म करने के लिए लाये गए कानून को अलग अलग तरीके से कमजोर किया जा रहा हैl कोर्ट का यह आदेश काफी चिंतनीय हैl यदि अपवाद स्वरुप कही जंगल के अवैध कब्जे की बात हुई हैं तो उनकी जांच के आदेश हो सकते थे न कि वनाधिकार कानून के क्रियान्वयन की पूरी प्रक्रिया को ही रोक दिया जायेl प्रदेश में अभी भी लाखों आदिवासी और अन्य परम्परागत वन निवासी अपने वनाधिकारों से वंचित हैंl 4 .55 लाख लोग लोगों के वनाधिकार के दावों को निरस्त किया जा चुका हैl सामुदायिक अधिकारों की मान्यता नगण्य है l पिछले 10 वर्षों में कानून की मूल मंशा के विपरीत प्रदेश में कार्य हुआ है। हाल ही में  निर्वाचित भूपेश बघेल जी की सरकार ने इस कानून का प्रभावी क्रियान्वयन शुरू किया था कि ऐसे आदेश इस पूरी प्रक्रिया को पीछे धकेल देंगे l राज्य सरकार को तत्काल आईएएम मामले में पुनर्विचार के लिए हस्तक्षेप करना चाहिए।

(रायपुर से जनचौक संवाददाता तामेश्वर सिन्हा की रिपोर्ट।)

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This post was last modified on September 11, 2019 2:15 pm

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