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छत्तीसगढ़: 80 हजार एससी, एसटी और ओबीसी कर्मचारियों पर पदावनति का ख़तरा, रत्नप्रभा की तर्ज पर कमेटी के गठन की मांग

छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट के फैसले के बाद राज्य के 80,000 एससी, एसटी, ओबीसी कर्मचारियों पर डिमोट होकर अपने मूल पद पर रिवर्ट होने का ख़तरा मंडरा रहा है जिसके चलते छत्तीसगढ़ में कर्नाटक राज्य की रत्नप्रभा कमेटी की तर्ज़ पर कमेटी गठित करने की माँग ने जोर पकड़ लिया है। इसी सिलसिले में 7 जुलाई को संयुक्त मोर्चा एवं छत्तीसगढ़ सर्व समाज महासंघ का एक संयुक्त प्रतिनिधि मंडल मुख्यमंत्री से उनके निवास में काफी देर तक मुलाकात करके SC/ST/ OBC वर्ग के अधिकारियों-कर्मचारियों के प्रमोशन में आरक्षण से संबंधित चिंताओं से अवगत कराते हुए कर्नाटक राज्य के रत्न प्रभा कमेटी जैसे छत्तीसगढ़ में भी 10 सामाजिक कार्यकर्ताओं के समन्वय समिति बनाकर राज्य के अतिरिक्त मुख्य सचिव स्तर के SC/STवर्ग अधिकारी की अध्यक्षता में तत्काल कमेटी गठित करने की मांग की।

रत्नप्रभा कमेटी क्या है

कर्नाटक सरकार ने अपने अनुसूचित जाति (एससी) और अनुसूचित जनजाति (एसटी) कर्मचारियों के लिए वर्ष 2002 में एक कानून लाकर प्रमोशन में आरक्षण की व्यवस्था की थी। संवैधानिक वैधता को चुनौती मिलने के बाद वर्ष 2006 में संविधान पीठ ने उसकी वैधता को तो माना लेकिन एक मात्रात्मक डाटा की उपलब्धता का मुद्दा उठाते हुए राज्य सरकार को एससी/एसटी समुदायों में पिछड़ेपन के निर्धारण से जुड़े आंकड़े इकट्ठा करने को कहा। इसके बाद साल 2011 और 2017 में राज्य सरकार के प्रमोशन में आरक्षण अधिनियम को फिर चुनौती दी गई। साल 2017 में मामले की सुनवाई करते हुए सुप्रीमकोर्ट ने कहा कि राज्य को इस बारे में आधिकारिक तौर पर स्पष्ट करने के लिए गाइडलाइन जारी किए। सुप्रीम कोर्ट ने गाइड लाइन दिया है तीन तरह का-

  1. इस तरह के आरक्षण को लागू करने की क्या अपरिहार्यताएं थीं।
  2. एससी/एसटी का जो प्रतिनिधित्व है प्रदेश में पर्याप्त है कि नहीं है?
  3. यदि प्रमोशन दिया जाता है तो सरकार के कामों में कोई विपरीत प्रभाव तो नहीं पड़ेगा

सुप्रीम कोर्ट के आदेश के आधार पर कर्नाटक सरकार ने तत्कालीन मुख्य सचिव के. रत्नप्रभा की अगुवाई में एससी/एसटी कर्मचारियों के प्रतिनिधित्व में अपर्याप्तता और उनके सामाजिक पिछड़ेपन का अध्ययन करने के लिए एक कमेटी का गठन किया। कमेटी की सिफारिशों के आधार पर ही राज्य सरकार ने आरक्षण बिल विधानसभा में रखा जो 2018 में अधिनियम के रूप में प्रभावी हो गया। इसे सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी गई। दस मई को सुप्रीम कोर्ट की बेंच ने कमेटी की सिफारिशों और अधिनियम के मकसद और पृष्ठभूमि का अध्ययन करते हुए पाया कि परिणामी वरिष्ठता, अतिरिक्त लाभ नहीं है बल्कि एससी/एसटी कर्मचारियों को हासिल पदोन्नति के परिणाम वश हासिल होती है।

क्या है पूरा मामला और क्या कहा था उच्च न्यायालय ने
4 फरवरी, 2019 के फैसले में उच्च न्यायालय ने छत्तीसगढ़ लोक सेवा पदोन्नति नियम 2003 की कंडिका 5 को खत्म कर दिया था। राज्य सरकार को सर्वोच्च न्यायालय के एम नागराज फैसले में दिए फ्रेम वर्क के आधार पर नया नियम बनाने की छूट दी गई। जीएडी ने ऐसा न करके एससी वर्ग का आरक्षण 12 की जगह 13 प्रतिशत करके नया नियम जारी कर दिया।

एम. नागराज फ़ैसले में पदोन्नति में आरक्षण देने के लिए छ्ह पूर्व-शर्तें निर्धारित हुई थीं-

  1. अजा -अजजा का पिछड़ापन दिखाने के लिए मात्रात्मक आंकड़े जुटाने होंगे।
  2. दूसरी, संवर्ग विशेष में अजा-अजजा के अपर्याप्त प्रतिनिधित्व पर मात्रात्मक आंकड़े जुटाने होंगे।
  3. तीसरी, संवर्ग विशेष में पदोन्नति में आरक्षण से प्रशासन की कुशलता अप्रभावित रहने की घोषणा करनी होगी।
  4. चौथी, पदोन्नति में आरक्षण की उच्च सीमा 50 प्रतिशत से कम रखना होगा।
  5. पांचवी, अजा-अजजा वर्गों से क्रीमी लेयर को विलग करना होगा और
  6. छठवीं शर्त है, बैकलाग अनिश्चित काल तक विस्तारित न करने की घोषणा करनी होगी।

जीएडी सचिव को न्यायिक अवमानना का लीगल नोटिस

मामले के याचिकाकर्ता और छत्तीसगढ़ सर्वहित संघ के महासचिव आशीष अग्निहोत्री ने सामान्य प्रशासन विभाग के सचिव को कानूनी नोटिस भेजा है। नोटिस में अग्निहोत्री का कहना है, उच्च न्यायालय के आदेश के बाद राज्य सरकार पर यह बाध्यकारी हो गया था, 2004 से 2019 तक कंडिका 5 के आधार पर हुई पदोन्नतियों और उनसे मिली वरिष्ठता को रिवर्ट कर दिया जाए। सरकार ने ऐसा नहीं किया। अक्टूबर 2019 में एक नया नियम बनाया। न्यायालय ने जैसा कहा था वह न करके एससी वर्ग का आरक्षण 12 उस पर भी दिसम्बर से न्यायालय का स्थगन है। सामान्य प्रशासन विभाग ने फिर से पदोन्नति देना शुरू कर दिया है। यह न्यायालय के आदेश के खिलाफ है। अग्निहोत्री ने कहा, हमने अधिवक्ता के जरिए नोटिस भेजा है। एक सप्ताह में न्यायालय के आदेश को ठीक ढंग से लागू नहीं किया गया तो हम न्यायालय की अवमानना का मामला लेकर कोर्ट जाएंगे।

अगर पदावनति हुई तो समाज का मनोबल टूट जाएगा

संयुक्त मोर्चा छत्तीसगढ़ के मुख्य संयोजक व एडवोकेट रामकृष्ण जांगड़े ने फॉरवर्ड प्रेस से बात करते हुए कहा – “रत्नप्रभा कमेटी की सिफारिशों के आधार पर ही कर्नाटक में 70 प्रतिशत आरक्षण है। यही चीजें हम 2016 से छत्तीसगढ़ में कह रहे हैं। और मौजूदा सरकार से भी कह रहे हैं कि वो रत्नप्रभा कमेटी की तर्ज पर एक कमेटी गठित करे। लेकिन ब्राह्मण समुदाय के लोग लागू नहीं होने दे रहे हैं। जबकि छत्तीसगढ़ में ब्राह्मण एक प्रतिशत भी नहीं हैं। यहाँ एससी-13 प्रतिशत, एसटी 32 प्रतिशत हैं, 52 प्रतिशत ओबीसी हैं। लेकिन 3 प्रतिशत सवर्ण समाज हमें जीने नहीं दे रहा है”।

रामकृष्ण आगे कहते हैं, “यदि हमारे सारे कर्मचारी रिवर्ट हो जाते हैं जैसा कि इसका अंदेशा है क्योंकि आरएसएस और सवर्ण लॉबी बहुत तेजी से लगी हुई है। ये लड़ाई हम लोग 2016 से लड़ रहे हैं संयुक्त मोर्चा बना करके। हमारे अधिकारी जो कि 80 हजार के करीब हैं वो रिवर्ट होने के कगार पर हैं। टीआई से डीएसपी में प्रमोट हुआ उसके बाद एडिशनल एसपी में प्रमोशन होकर रिटायर होने वाला है। अब वह रिवर्ट होकर एडिशनल एसपी से टीआई में आ जाएगा। यदि ऐसा नहीं किया गया तो SC/ST वर्ग के DSP से TI, डिप्टी कलेक्टर से तहसीलदार, अवर सचिव से बाबू , EE से SDO, DFO से रेंजर बन जायेंगे। इसी तरह हजारों लोग अपने मूल पद पर रिवर्ट हो जायेंगे।”

रामकृष्ण जांगड़े सरकारी विभागों में सवर्ण अधिकारियों की बदमाशी पर बताते हैं, “तमाम कार्यालयों में जो बड़े अधिकारी हैं वो सवर्ण हैं। हमारे जो सीआर लिखने वाले बड़े अधिकारी लोग हैं हम चाहे कितना इंटेलिजेंसी लेकर आएं, अच्छा काम कर दें फिर भी हमें कभी वो गुड मार्क नहीं देते। हर जगह भेदभाव होता है। हमारा जो सीआर लिखा जाता है वो ए क्लास में तो बहुत कम मिलता है। ठीक है डिग्री कर देते हैं।”

वंचित समाज के खिलाफ़ न्यायपालिका का इस्तेमाल किया जा रहा

पिछड़ा समाज छत्तीसगढ़ के अध्यक्ष विष्णु बघेल फॉरवर्ड प्रेस से बात करते हुए कहते हैं, “पिछले 6-7 सालों से भाजपा सरकार के शासनकाल में चारों तरफ से हमला हो रहा है अल्पसंख्यकों, दलितों और पिछड़े वर्ग के लोगों पर ये 80 हजार लोगों के डिमोशन का मसला भी उसी की एक हिस्सा है। हम लोगों ने छत्तीसगढ़ की भूपेश बघेल सरकार को ज्ञापन सौंपा है। यदि भूपेश बघेल सरकार कर्नाटक सरकार की तर्ज पर फैसले लेती है तो 80 हजार लोग रिवर्ट होने से बच जाएंगे। छत्तीसगढ़ के हमारे मुख्यमंत्री जी ने 27 प्रतिशत आरक्षण दिया था। उस आरक्षण के खिलाफ़ 41 ब्राह्मण हाईकोर्ट चले गए। और सिर्फ़ एक बिंदु पर कि ‘जनसंख्या का अभी कोई अधिकृत आँकड़ा नहीं है और आधार न होने के कारण’ ओबीसी रिजर्वेशन को स्टे दे दिया। न्यायपालिका में हमारा यानी एससी-एसटी, ओबीसी का एप्रोच नहीं है और न्याय पालिका से ही ये सारे निर्णय कराए जा रहे हैं। तो 2016 की लड़ाई धीरे-धीरे आगे बढ़ते-बढ़ते यहाँ तक आ गई है।”

रामकृष्ण जांगड़े न्यायपालिका की भूमिका पर टिप्पणी करते हुए कहते हैं, “पूरे लॉकडाउन के दौरान कई फैसले ऐसे आए हैं अगर वो नॉर्मल समय में आए होते तो अब तक 2-3 बार तो भारत बंद हो चुका होता। सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि रिजर्वेशन की समीक्षा होनी चाहिए। सुप्रीम कोर्ट को बोलना नहीं चाहिए पहली बात तो। फिर कह रहे हैं जो लोग 70 साल से लाभ पा रहे हैं उनको छोड़ देना चाहिए। तो जो चीज नेता बोलते हैं वो सुप्रीम कोर्ट बोल रहा है, कर रहा है। न्यायपालिका का इस्तेमाल करके हमारे अधिकारों को कम करवाया जा रहा है।“

समाजिक राजनीतिक फर्क पड़ेगा। इससे हमारे समाज के लोगों का, उनके बच्चों का मनोबल टूटेगा। विधायकों के रिजर्वेशन से सवर्णों को दिक्कत नहीं है। क्योंकि उनके रूप में उन्हें एक बँधुआ मजदूर मिला जाता है। लेकिन हमारे समाज के करोड़ों लोगों का जीवन जिस पर निर्भर है फिर चाहे वो शिक्षा में आरक्षण है, नौकरी में आरक्षण है, प्रमोशन में आरक्षण है तो इन आरक्षणों पर वो घात लगाकर बैठा है आरएसएस। और न्यायपालिका का इस्तेमाल हमारे खिलाफ़ फैसले दिलवाने में किया जा रहा है।

संघर्ष आखिरी रास्ता है। नहीं होता है तो हम समाज को संगठित करेंगे। भूपेश बघेल हमारे समाज का प्रतिनिधित्व करते हैं। हमें आंदोलन करने की ज़रूरत नहीं पड़ेगी। सवर्ण लोग जो कांग्रेस में बैठे हैं वो कितना असर डालेंगे, वो करने देंगे कि नहीं करने देंगे ये भी शक़ है। इसीलिए हम आंदोलन की तैयारी में हैं।

(जनचौक के विशेष संवाददाता सुशील मानव की रिपोर्ट।)

This post was last modified on July 20, 2020 12:48 pm

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