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कार्पोरेट घरानों को देश सौंपने की शुरुआत

लोकतंत्र में सरकारें इसलिए बनती हैं कि देश को संविधान के दायरे में रहकर एक लोकतांत्रिक प्रक्रिया के साछ चलाया जा सके। देश को चलाने में सरकारी विभागों के साथ ही सरकारी कंपनियों का सुचारु रूप से चलाना बहुत महत्वपूर्ण होता है।

मोदी सरकार है कि हर सरकारी कंपनी का निजीकरण करने पर उतारू है। रेलवे, दूरसंचार जैसे महत्वपूर्ण विभाग का एक तरह से निजीकरण किया ही जा चुका है। अब केंद्रीय कैबिनेट ने सरकारी कंपनियों में अब तक के सबसे बड़े विनिवेश को मंजूरी दी है।

इसके पीछे मंदी से निपटना बताया जा रहा है। इसका अंदाया किया जा रहा था वह काम अब मोदी सरकार ने पूरी तरह से करना शुरू कर दिया है। सरकार ने अब पांच ब्लू चिप कंपनियों भारत पेट्रोलियम कॉर्पोरेशन लिमिटेड, शिपिंग कॉर्पोरेशन ऑफ इंडिया और ऑनलैंड कार्गो मूवर कॉनकोर अपनी हिस्सेदारी कम कर निजीकरण की ओर कदम बड़ा बढ़ाया है।

बकायदा यह जानकारी आर्थिक मामलों की कैबिनेट कमेटी (सीसीईए) की बैठक के बाद वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने पत्रकारों को दे भी दी है। कैबिनेट के इस फैसले के बाद अब बीपीसीएल में इस समय सरकार की 53.29 फीसदी हिस्सेदारी को बेचा जाएगा। इतना ही नहीं इस कंपनी का प्रबंधकीय नियंत्रण भी खरीदने वाली कंपनी के पास रहेगा।

कैबिनेट ने शिपिंग कॉर्पोरेशन ऑफ इंडिया में भी सरकार की 63.75 फीसदी हिस्सेदारी को बेचने का निर्णय लिया है। रेलवे की कंपनी कॉनकोर को भी बेचा जाएगा। इसमें सरकार की हिस्सेदारी 54.8 बताई जा रही है।

इसके अलावा टिहरी हाइड्रो डेवलपमेंट कॉर्पोरेशन और नॉर्थ-ईस्टर्न इलेक्ट्रिक पावर कॉर्पोरेशन लिमिटेड की पूरी हिस्सेदारी को एनटीपीसी को बेचना सुनिश्चित हो गया है। उपरोक्त पांचों कंपनियों का प्रबंधकीय नियंत्रण खरीदने वाली कंपनी को मिलेगा।

चुनिंदा कंपनियों में सरकारी हिस्सेदारी 51 फीसदी से कम होगी। मतलब अब इन कंपनियों पर सरकार का नियंत्रण खत्म। सरकार इसके अतिरिक्त चुनिंदा सार्वजनिक उपक्रमों जैसे इंडियन ऑयल कॉर्पोरेशन में अपनी हिस्सेदारी 51 फीसदी से कम कर रही है। हालांकि इन पर प्रबंधकीय नियंत्रण सरकार का ही रहेगा।

इंडियन ऑयल में सरकार की मौजूदा हिस्सेदारी 51.5 फीसदी है। इसके अलावा 25.9 फीसदी हिस्सेदारी भारतीय जीवन बीमा निगम, ओएनजीसी और ऑयल इंडिया लि. (ओआईएल) के पास है। सरकार ने 26.4 फीसदी हिस्सेदारी 33000 करोड़ रुपये में बेचने का फैसला किया है।

यदि  ईस्ट इंडिया कंपनी का इतिहास पढ़ो तो हमारे देश पर अंग्रेजों ने इसी तरह से कब्जा जमाया था। जब किसी कंपनी का वर्चस्व सरकारी तंत्र पर बढ़ता जाता है तो देश की व्यवस्था एक तरह से उस कंपनी के हाथों में आती चली जाती है। मोदी सरकार का सरकारी कंपनियों का निजीकरण करने का निर्णय देश को गुलामी की ओर ले जा रहा है। भावनात्मक मुद्दों के बल पर देश पर राज करने वाली भाजपा सरकारी संसाधनों को पूंजपीतियों को बेचने पर लगी है।

जिन संसाधनों से देश की अर्थव्यवस्था मजबूत होती है वही संसाधन सरकार चुनिंदा पूंजीपतियों को बेच दे रही है। मतलब निजीकरण से देश की अर्थव्यवस्था मजबूत नहीं होगी बल्कि इन पूंजीपतियों की होगी। व्यवसाय करने वाले व्यक्ति का मकसद मुनाफा कमाना होता है। उसे देश और समाज से कोई मतलब नहीं होता है। यदि उस कंपनी को देश की किसी भी कीमत पर अपना मुनाफा मिल रहा होता तो वह मुनाफा की ओर जाएगी।

ऐसी ही देश की महत्वपूर्ण सरकारी कंपनियों के निजीकरण के बाद होगा। एक ओर तो सरकारी संसाधनों का दोहन युद्धस्तर पर होगा दूसरी श्रमिकों का शोषण अत्याचार में बदल जाएगा। वैसे भी मोदी सरकार श्रम कानून में संसोधन कर श्रमिकों को कंपनियों का बंधुआ बनाने जा रही है।

राजनीति में कार्पोरेट संस्कृति का यह चरम है। देश को निजीकरण की ओर जाने से सबसे अधिक नुकसान नौकरीपेशा व्यक्ति का होना वाला है। पहले से ही रोजगार के अभाव में श्रमिकों का शोषण चरम पर है। अब जब पूरी व्यवस्था निजी कंपनियों के हाथों में आ जाएगी तो यह शोषण अत्याचार में बदलना शुरू हो जाएगा। गत दिनों देश के स्वाभिमान लाल किले के निजीकरण की बात भी सामने आई थी। रक्षा विभाग में निजीकरण की बात सुनी जा रही है। यदि सब कुछ निजी हाथों में ही देना है तो फिर देश भी निजी हाथों में दे दो!

फिर क्या जरूरत है चुनाव पर इतना पैसा बहाने की। क्या जरूर है देश में क्या जरूरत है विभिन्न सदनों की। क्या जरूरत है न्यायपालिका, विधायिका, कार्यपालिका की। जब सब कुछ निजी हाथों में ही देना है तो फिर इन तंत्रों पर सरकारी पैसों की फिजूलखर्ची क्यों। देश को चलाने का जिम्मा भी निजी हाथों का सौंप दिया जाए। जब ये लोग सरकारों से अच्छी कंपनियां चला सकते हैं तो देश भी इनसे अच्छा चला लेंगे। वैसे भी राजनीतिक दल लूट-खसोट और वाटबैंक के अलावा कुछ कर तो नहीं रहे हैं।

विभिन्न सदनों में भी धंधेबाज लोग बैठे हैं। अधिकतर लोग भी इन कंनिपयों को चलाने वाले ही हैं, तो फिर जनता को क्यों बेवकूफ बनाने में लगे हो। देश का ही निजीकरण कर के देश इन पूंजीपतियों को सौंप दो। वैसे भी देश में जनता के लिए देश को चलाने वाले नेता तो बचे नहीं। जब इन नेताओं को कार्पोरेट घरानों का ही फायदा कराना है तो फिर इन राजनीतिक दलों, राजनेताओं, नौकरशाह और सरकारों की जरूरत ही क्या है?

(चरण सिंह पत्रकार हैं और आजकल नोएडा से प्रकाशित होने वाले एक दैनिक में कार्यरत हैं।)

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This post was last modified on November 23, 2019 3:45 pm

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