Monday, January 24, 2022

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करप्शन केस में जज श्रीनारायण शुक्ला के खिलाफ केस चलाने की सीबीआई को केंद्र की मंजूरी

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जल्द ही लखनऊ की सीबीआई अदालत में कोर्ट मुहर्रिर आवाज लगाएगा जज श्रीनारायण शुक्ला हाजिर हो ! शुक्ला जी मेडिकल प्रवेश घोटाले (प्रसाद इंस्टीट्यूट ऑफ मेडिकल साइंसेज संस्थान से जुड़े न्यायिक भ्रष्टाचार घोटाले) में अपने से जूनियर सीबीआई सत्र न्यायाधीश के कोर्ट में हाथ बंधे खड़े नजर आयेंगे। यूपी के एक निजी मेडिकल कॉलेज की तरफदारी कर संस्थान के हक में फैसला देने के मामले में इलाहाबाद हाईकोर्ट के रिटायर जज श्रीनारायण शुक्ला पर सीबीआई का शिकंजा कस गया है। अब उन पर कोर्ट में मुकदमा चलेगा। केंद्र की नरेंद्र मोदी सरकार ने गुरुवार शाम को इस आशय की मंजूरी प्रदान कर दी। सीबीआई का कहना है कि जज के खिलाफ जांच पूरी हो चुकी है। जल्दी ही चार्जशीट कोर्ट में दाखिल की जाएगी।

आरोप है कि प्रसाद इंस्टीट्यूट ऑफ मेडिकल साइंसेज को केंद्र ने मई 2017 में मानदंड पूरे न करने की वजह से छात्रों को दाखिला देने से रोक दिया था। जस्टिस शुक्ला पर आरोप है कि उन्होंने कॉलेज को फायदा पहुंचाया। 2017-18 बैच के छात्रों के प्रवेश की डेडलाइन गलत तरीके से बढ़ाई जो सुप्रीम कोर्ट के आदेश और मौजूदा नियमों का स्पष्ट उल्लंघन है। सीबीआई जांच में उन्हें कथित तौर पर अनियमितता और प्राइवेट मेडिकल कॉलेज को अनुचित फायदा पहुंचाने का दोषी पाया गया था।

जस्टिस शुक्ला पर केस दर्ज करने के लिए सीबीआई ने सीजेआई को एक चिट्ठी लिखी थी। एजेंसी ने अपनी चिट्ठी में बताया था कि सुप्रीम कोर्ट के पूर्व सीजेआई दीपक मिश्रा की सलाह पर उसने जस्टिस शुक्ला के खिलाफ एक जांच बिठाई थी। एजेंसी के मुताबिक, जस्टिस शुक्ला की अनियमितताओं का मामला तत्कालीन सीजेआई दीपक मिश्रा के संज्ञान में लाया गया था। ये चिट्ठी मिलने के बाद मौजूदा सीजेआई रंजन गोगोई ने सीबीआई को जस्टिस शुक्ला के खिलाफ एफआईआर दर्ज करने की अनुमति दी थी। जस्टिस गोगोई ने जनवरी, 2018 से ही उनकी न्यायिक सेवाओं पर रोक लगाने का आदेश दिया था।

गोगोई ने पीएम नरेंद्र मोदी से ये सिफारिश भी की थी कि जस्टिस शुक्ला को उनके पद से हटा दिया जाए। हालांकि, पहले भी ऐसी घटनाएं हुईं हैं जब जजों पर भ्रष्टाचार के आरोप लगे और सरकारों को उन्हें महाभियोग के जरिए हटाने की सिफारिशें की गईं लेकिन किसी जज को हटाया नहीं गया।

दरअसल, भारत में जुलाई, 1991 तक सुप्रीम और हाईकोर्ट के जजों पर मुकदमा चलाने की अनुमति नहीं थी। लेकिन इसके बाद 25 जुलाई, 1991 को सुप्रीम कोर्ट ने मद्रास हाईकोर्ट के एक मामले की सुनवाई के दौरान एक ऐतिहासिक फैसले में हाईकोर्ट और सुप्रीम कोर्ट के जजों पर भी केस दर्ज करने का आदेश दिया था।

सीबीआई के मुताबिक, इस साल 16 अप्रैल को उन्होंने उच्च न्यायालय में सेवानिवृत्त न्यायाधीश के खिलाफ भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम के तहत मुकदमा चलाने की अनुमति के लिए आवेदन किया था।सीबीआई ने इलाहाबाद उच्च न्यायालय की लखनऊ पीठ के न्यायमूर्ति शुक्ला के अलावा छत्तीसगढ़ उच्च न्यायालय के सेवानिवृत्त न्यायाधीश आईएम कुद्दूसी, प्रसाद शिक्षा न्यास के भगवान प्रसाद यादव और पलाश यादव, स्वयं ट्रस्ट और निजी व्यक्तियों भावना पांडे और सुधीर गिरी को नामजद किया है। आरोपियों पर भारतीय दंड संहिता (आपराधिक साजिश) की धारा 120बी और भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम के तहत आरोप लगाए गए हैं।

अधिकारियों के अनुसार, ट्रस्ट ने कथित तौर पर प्राथमिकी में नामित एक आरोपी को एक अनुकूल आदेश प्राप्त करने के लिए अवैध रूप से रिश्वत दी। उनके मुताबिक, सीबीआई ने एफआईआर दर्ज करने के बाद लखनऊ, मेरठ और दिल्ली में कई जगहों पर तलाशी ली। अधिकारियों के अनुसार, प्रसाद इंस्टीट्यूट ऑफ मेडिकल साइंसेज को मई 2017 में केंद्र द्वारा 46 अन्य मेडिकल कॉलेजों के साथ-साथ घटिया सुविधाओं और आवश्यक मानदंडों को पूरा करने में विफलता के कारण छात्रों को प्रवेश देने से रोक दिया गया था।

दरअसल केंद्रीय जांच ब्यूरो (सीबीआई) ने मेडिकल प्रवेश घोटाले (प्रसाद इंस्टीट्यूट ऑफ मेडिकल साइंसेज संस्थान से जुड़े न्यायिक भ्रष्टाचार घोटाले) में इलाहाबाद उच्च न्यायालय के सेवानिवृत्त जज श्रीनारायण शुक्ला (एस एन शुक्ला) के खिलाफ मेडिकल प्रवेश घोटाले में अभियोजन स्वीकृति की मांग की थी जिसे मोदी सरकार ने स्वीकार कर लिया है , जिसमें  कथित तौर पर एक अनुकूल आदेश पाने के लिए रिश्वत का भुगतान किया गया था। जुलाई 2020 में सेवा से सेवानिवृत्त हुए शुक्ला पर लखनऊ स्थित मेडिकल कॉलेज के पक्ष में एक आदेश पारित करने के लिए रिश्वत लेने का आरोप है, जिसे मई 2017 में नियामक द्वारा छात्रों को प्रवेश देने से रोक दिया गया था।

केंद्रीय जांच एजेंसी ने प्रथम सूचना रिपोर्ट (एफआईआर) दर्ज करने के बाद दिसंबर 2019 में शुक्ला के आवास पर छापा मारा, जब वह न्यायाधीश की कुर्सी पर मौजूद थे। उन पर ओडिशा उच्च न्यायालय के सेवानिवृत्त न्यायाधीश आईएम कुद्दूसी, भगवान प्रसाद यादव और प्रसाद एजुकेशन ट्रस्ट के पलाश यादव, भावना पांडे और एक अन्य कथित बिचौलिया सुधीर गिरी के साथ आपराधिक साजिश, भ्रष्टाचार रोकथाम अधिनियम की धाराएं, जो रिश्वत स्वीकार करने से संबंधित हैं, और आपराधिक कदाचार के तहत मामला दर्ज किया गया था।

आरोप है कि शुक्ला और कुद्दूसी, जिन्हें सीबीआई ने सितंबर 2017 में गिरफ्तार किया था, ने मेडिकल काउंसिल ऑफ इंडिया द्वारा अपने कॉलेज के डिबारमेंट से संबंधित मामले में राहत देने का वादा करते हुए प्रसाद एजुकेशन ट्रस्ट से रिश्वत लेने की साजिश रची थी। सीबीआई ने जस्टिस कुद्दूसी को जुलाई 2019 में चार्जशीट दी थी। वह फिलहाल जमानत पर बाहर हैं। सितंबर 2017 में ही, केंद्रीय एजेंसी ने शुक्ला के खिलाफ एक प्रारंभिक जांच (पीई) शुरू की।

भारत के तत्कालीन मुख्य न्यायाधीश दीपक मिश्रा ने न्यायिक कदाचार का आरोप लगाते हुए उत्तर प्रदेश के महाधिवक्ता राघवेंद्र सिंह की शिकायत पर शुक्ला के खिलाफ जांच का आदेश दिया। तत्कालीन मद्रास उच्च न्यायालय की मुख्य न्यायाधीश इंदिरा बनर्जी, तत्कालीन सिक्किम उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश एसके अग्निहोत्री और मध्य प्रदेश उच्च न्यायालय के न्यायाधीश पीके जायसवाल की तीन सदस्यीय समिति ने शुक्ला को जनवरी 2018 में न्यायिक अनियमितताओं का दोषी पाया जिसके बाद राष्ट्रपति से महाभियोग की सिफारिश की गई थी। शुक्ला , जो उस समय इलाहाबाद हाईकोर्ट  की लखनऊ बेंच में सिटिंग जज थे, को कोर्ट परिसर में प्रवेश करने से रोक दिया गया और उनसे सभी न्यायिक और प्रशासनिक कार्य छीन लिए गए थे।

 बाद में, जुलाई 2019 में, तत्कालीन चीफ जस्टिस  रंजन गोगोई ने सीबीआई को मामले में मामला दर्ज करने की अनुमति दी। गोगोई ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को भी पत्र लिखकर शुक्ला को हटाने की सिफारिश की थी ।

सीबीआई ने आरोप लगाया है कि प्रसाद इंस्टीट्यूट ऑफ मेडिकल साइंसेज को मई 2017 में एमसीआई द्वारा शैक्षणिक वर्ष 2017-18 और 2018-19 के लिए छात्रों को प्रवेश देने से वंचित कर दिया गया था, क्योंकि 46 अन्य मेडिकल कॉलेजों के साथ-साथ समान आधार पर घटिया सुविधाओं और आवश्यक मानदंडों को पूरा नहीं करने के कारण भी प्रतिबंधित कर दिया गया था। इस फैसले को प्रसाद इंस्टीट्यूट ने शीर्ष अदालत में एक रिट याचिका के जरिए चुनौती दी थी।बाद में, एक साजिश रची गई और अदालत की अनुमति से रिट याचिका को वापस ले लिया गया।

दरअसल मेडिकल प्रवेश घोटाले के नाम से जाने जाने वाले इस पूरे मामले की एसआईटी जांच की मांग करने वाली एक याचिका सुप्रीम कोर्ट में आई, जिसकी सुनवाई 9 नवंबर, 2017 को जस्टिस एस अब्दुल नजीर और जस्टिस जे चेलामेश्वर की पीठ ने की। पीठ ने इसे गंभीर माना और इसे पांच वरिष्ठतम जजों की पीठ में रेफर कर दिया। इस पीठ में चीफ जस्टिस दीपक मिश्रा को भी रखा गया और सुनवाई के लिए 13 नवंबर 2017 की तारीख तय की गई। इसी तरह के एक और मामले का जिक्र कैंपेन फॉर ज्यूडिशियल अकाउंटेबिलिटी एंड रिफॉर्म (सीजेएआर) नाम की संस्था ने भी 8 नवंबर 2017 को जस्टिस चेलामेश्वर की अगुवाई वाली पीठ के सामने रखा था। उस मामले में पीठ ने 10 नवंबर को सुनवाई की तारीख तय की थी।

10 नवंबर को सुप्रीम कोर्ट में हुए एक हाई वोल्टेज ड्रामे के बाद मुख्य न्यायाधीश की पीठ ने जस्टिस चेलामेश्वर की अध्यक्षता वाली पीठ द्वारा 9 नवंबर को दिए गए उस फैसले को खारिज कर दिया, जिसमें अदालत को रिश्वत देने के आरोपों में एसआईटी जांच की मांग वाली दो याचिकाओं को संविधान पीठ को रेफर किया गया था। इस पूरी बहस के दौरान वकील प्रशांत भूषण और चीफ जस्टिस के बीच तीखी नोक झोंक हुई थी, जिसमें कहा गया था कि किसी भी रिपोर्ट या एफआईआर में किसी जज का नाम नहीं है।

(वरिष्ठ पत्रकार जेपी सिंह की रिपोर्ट।)

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