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हर साल डेनमार्क जितना बड़ा जंगल खत्म हो रहा धरती से, यूएन की रिपोर्ट में कॉरपोरेट लूट पर खामोशी

24 सितंबर को जारी यूनाइटेड नेशंस के स्टेटिक्स और डेटा के मुताबिक हर साल 4.7 मिलियन हेक्टेयर जंगल खत्म हो रहे हैं। सालाना खत्म होने वाला ये वनक्षेत्र डेनमार्क से भी बड़ा क्षेत्रफल है।

यूनाइटेड नेशंस का ‘इको सिस्टम रिस्टोरेशन’ दशक साल 2021 से शुरू हो रहा है। इसके लिए ट्वीटर पर #GenerationRestoration ज्वाइन करने की अपील की गई है। इनवारमेंटल क्राइसिस के खिलाफ़ ‘रिस्टोर आवर प्लैनेट’ के नाम से इसके लिए एक दस सूत्रीय कार्यक्रम भी घोषित किया गया है, लेकिन इसमें जंगल खत्म होने की मुख्य वजह यानी कॉरपोरेट द्वारा जंगलों की लूट को रोकने के संदर्भ में कोई बात नहीं कही गई है।

अब दुनिया में कुल कितना जंगल बचा है
ग्लोबल फॉरेस्ट रिसोर्सेस असेसमेंट-2020 की रिपोर्ट के मुताबिक विश्व में कुल 4.06 बिलियन हेक्टेयर जंगल बचे हैं। इसमें से 1.11 बिलियन हेक्टेयर आदिम जंगल हैं। बता दें कि ग्लोबल फॉरेस्ट रिसोर्सेस असेसमेंट 236 देशों और उनके उपनिवेशों में स्थित यूनाइटेड नेशंस के प्रतिनिधियों के नेटवर्क द्वारा रिपोर्ट किए गए डेटा और रिपोर्ट पर आधारित है। नेशनल फॉरेस्ट इन्वेंट्री, रिमोट सेंसिंग, वैज्ञानिक अध्ययन, और विशेषज्ञों के अनुमान से प्राप्त डेटा को ये इन प्रतिनिधियों से FAO में जमा करवाते हैं।

रिपोर्ट के मुताबिक 1990 से 2020 के बीच तीन दशकों में कुल 420 बिलियन हेक्टेयर जंगल धरती से खत्म कर दिए गए हैं। साल 1990-2000 के बीच जंगलों को नष्ट करने की सालाना दर 7.8 मिलियन हेक्टेयर थी, जबकि 2010 से 2020 के बीच जंगल उजाड़ने की सालाना दर 4.7 मिलियन हेक्टेयर रही है। 

असिसमेंट यूनाइटेड नेशंस की वैश्विक जंगल पर सबसे विश्वसनीय रिपोर्ट है, जोकि वैश्विक इकाई फूड एंड एग्रीकल्चर ऑर्गेनाइजेशन (FAO) द्वारा बीसवीं सदी के उत्तरार्द्ध से एक अंतराल पर बनाई जा रही है। पिछले दशक यानी 2010 से 2020 के बीच अफ्रीका में जंगलों को नष्ट करने की दर 3.9 मिलियन हेक्टेयर सालाना रही है, जोकि किसी भी महाद्वीप में सबसे ज़्यादा है।

दक्षिणी अमेरिका में पिछले दशक में यानि 2010-2020 के बीच जंगलों को नष्ट करने की दर 2.6 मिलियन हेक्टेयर रही है, जोकि 2001-2010 के बीच जंगलों के नष्ट होने की सालाना दर की आधी है। एशिया महाद्वीप में पिछले दशक यानि 2010-2020 के बीच जंगलों को खत्म करने की दर 1.2 मिलियन हेक्टेयर रही, जबकि इसके पहले के दशक में सालाना दर 2.4 मिलियन हेक्टेयर थी।

ओसेनिया (Oceania) में इस दशक (2010-2020) में जंगलों के नष्ट होने की दर 0.4 मिलियन हेक्टेयर रही, जोकि पिछले दशक की आधी है। यूरोप में इस दशक (2010-2020) में जगलों को खत्म करने की सालाना दर 0.3 मिलियन हेक्टेयर रही, जबकि 2001-2010 के दशक में सालाना दर 1.2 मिलियन हेक्टेयर थी। उत्तरी और केंद्रीय अमेरिका में इस दशक में जंगलों को खत्म करने की सालाना दर 0.1 मिलियन हेक्टेयर थी, जोकि पिछले दशकी की सालाना दर 0.2 मिलियन हेक्टेयर की आधी है।

दुनिया का 54 प्रतिशत जंगल सिर्फ़ पांच देशों यानि रूस, ब्राजील, कनाडा, संयुक्त राज्य अमेरिका और चीन नें हैं। रिपोर्ट में बताया गया है कि 22 प्रतिशत जंगलों पर निजी स्वामित्व है। 1990 के बाद जंगलों पर निजी स्वामित्व की प्रवृत्ति बढ़ी है, जबकि पांच प्रतिशत जंगलों पर सार्वजनिक और निजी स्वामित्व का विवाद है। वहीं कई अध्ययनों में ये बात स्पष्ट तौर पर निकलकर आई है कि आदिवासियों के देखभाल वाली जमीनों पर दुनिया के सबसे बेहतरीन संरक्षित जंगल हैं।

सेंटर फॉर इंटरनेशनल फॉरेस्ट्री रिसर्च के डायरेक्टर रॉबर्ट नसी (Robert Nasi) ने रिपोर्ट पर टिप्पणी करते हुए कहा है कि रिपोर्ट केवल ‘कुल जंगल हानि’ पर है, जबकि क्षेत्रवार ब्यौरा नहीं है। ये एक तरह से सेब (अक्षुण्ण मूल जंगल) को संतरों (फिर से उगे और द्वितीयक जंगल) और केला (वृक्षारोपण) को मिलाना है।

ब्राजील की दक्षिणपंथी सरकार में जंगल साफ करने का अभियान
ब्राजील की राजनीतिक सत्ता में दक्षिणपंथी जेयर बोल्सोनारो के काबिज होने के बाद ब्राजील में जंगलों की कटाई में बेताहाशा वृद्धि हुई है। इनवायरमेंट एक्टिविस्ट के मुताबिक ब्राज़ील के राष्ट्रपति जायर बोल्सोनारो की पर्यावरण विरोधी बयानबाज़ियों के चलते जंगल साफ़ करने की गतिविधियों में बढ़ोत्तरी हुई है। ब्राजील ने अमेज़न के जंगलों के बारे में बृहस्पतिवार को संशोधित आंकड़े जारी किए, जिनमें सामने आया कि अमेज़न वर्षा वन में जुलाई 2019 तक 10,000 वर्ग किलोमीटर से अधिक क्षेत्र वन रहित हो गया है। पिछले एक दशक से ज्यादा वक्त में इतनी बड़ी संख्या में पेड़ों का सफाया कभी नहीं हुआ।

नेशनल इंस्टीट्यूट फॉर स्पेस रिसर्च (आईएनपीई) ने पिछले हफ्ते कहा था कि उपग्रह से एकत्रित किए गए आंकड़ों में सामने आया है कि 12 माह की अवधि में 9,762 वर्ग किलोमीटर क्षेत्र में पेड़ खत्म हो गए, जोकि पहले की तुलना में यह 29.5 प्रतिशत ज्यादा है। आईएनपीई की तरफ से इस नवंबर 2019 में जारी किए गए संशोधित आंकड़ों के मुताबिक विश्व के सबसे बड़े वर्षा वन में पेड़ों का सफाया 43 फीसदी तक बढ़ गया था। जुलाई में खत्म होने वाली 12 माह की अवधि में 10,100 वर्ग किलोमीटर क्षेत्र में पेड़ साफ हो गए थे। इसकी तुलना में अगस्त 2017 से जुलाई 2018 के बीच 7,033 वर्ग किलोमीटर क्षेत्र में पेड़ों का सफाया हुआ था।

नेशनल इंस्टीट्यूट फॉर स्पेस रिसर्च (इनपे) ने अपने सैटेलाइट आंकड़ों में दिखाया है कि 2018 के मुकाबले साल 2019 के दरमियान आग की घटनाओं में 85 प्रतिशत की वृद्धि हुई है। सरकारी आंकड़ों के अनुसार, इस साल के शुरुआती आठ महीने में ब्राज़ील के जंगलों में आग की 75,000 घटनाएं हुईं, जबकि साल 2018 में आग की कुल 39,759 घटनाएं हुई थीं। बाद में उन्होंने कहा कि आग को काबू करने में सरकार के पास पर्याप्त संसाधन नहीं हैं।

बोल्सोनारो ने नकार दिया था आग बुझाने में मदद का ‘G-7’ का प्रस्ताव
ब्राजील ने अमेजन वर्षा वन में लगी भयावह आग को बुझाने के लिए जी-7 देशों की ओर से की गई मदद की पेशकश ठुकरा दी है। ब्राजील के पर्यावरण मंत्री रिकार्डो सल्लेस ने पहले पत्रकारों से कहा था कि वे जी-7 द्वारा आग बुझाने के लिए दिए कोष का स्वागत करते हैं, लेकिन बोल्सनारो और मंत्रियों के बीच हुई बैठक के बाद सरकार ने इस पर अपना रुख बदल लिया था।

राष्ट्रपति जेयर बोल्सनारो के ‘चीफ ऑफ स्टाफ’ ओनिक्स लोरेन्जॉनी ने ‘जी1 न्यूज’ वेबसाइट से कहा था, “हम (मदद की पेशकश की) सराहना करते हैं, लेकिन शायद वे संसाधन यूरोप में पुन:वनीकरण के लिए ज्यादा प्रासंगिक हैं। मैक्रों (फ्रांस के राष्ट्रपति) विश्व धरोहर गिरजाघर में आग लगने से रोक नहीं पाए। वह हमारे देश को क्या सिखाना चाहते हैं।” उनका इशारा ‘नोत्रे देम कैथेड्रल’ में अप्रैल में लगी आग की ओर था। बता दें कि लोरेन्जॉनी की यह टिप्पणी G-7 शिखर सम्मेलन के दौरान अमेजन वर्षा वन में लगी भयावह आग को बुझाने के लिए फ्रांस की ओर से दो करोड़ अमेरिकी डॉलर की सहायता देने का संकल्प लेने के संदर्भ में थी।

भारत में कार्पोरेट हित में जंगलों का अंधाधुंध खात्मा
भारत में पिछले दो दशकों में विकास की दिशा जंगलों की ओर घूमी है। नतीजे में वनों की अंधाधुंध कटाई हुई है। दिसंबर 2019 में भारतीय वन सर्वेक्षण द्वारा जारी इंडियन स्टेट ऑफ फॉरेस्ट रिपोर्ट, ‘आईएसएफआर-2019’ के मुताबिक सरकारी रिकॉर्ड में वन क्षेत्र के 7,67,419 वर्ग किलोमीटर में से 2,26,542 वर्ग किलोमीटर में फॉरेस्ट कवर नहीं है। करीब 30 प्रतिशत जंगलों को खत्म करके उक्त इलाके पर सड़क निर्माण, खनन और खेती की जा रही है।

वन नियमों के मुताबिक उस भूभाग को फॉरेस्ट कवर कहा जाता है, जिसका दायरा एक हेक्टेयर का हो और जिसमें वृक्ष वितान (कैनपी) की सघनता दस प्रतिशत से ज्यादा है, लेकिन वन विभाग के दस्तावेजों में जो जमीन जंगल की है वो जंगल क्षेत्र में मान ली जाती है, लिहाजा मापन में उस इलाके को भी वन क्षेत्र में शामिल कर लिया जाता है जहां वस्तुतः सघन वृक्ष उपस्थिति है भी नहीं। वन विभाग ऐसे क्षेत्र में निर्माण कार्य की अनुमति देते हुए ये शर्त भी जोड़ देता है कि परिवर्तित जमीन का वैधानिक दर्जा यथावत यानी जंगल का ही रहेगा। जंगल रहे न रहे जमीन वन विभाग के अधिकार में ही रहती है।

वहीं वन संरक्षण और आदिवासी हितों से जुड़े संगठनों और विशेषज्ञों का कहना है कि परिवर्तित भूमि को फॉरेस्ट कवर के रूप में डालकर निर्वनीकरण या वन कटाई की गतिविधियों का हिसाब कैसे रखा जा सकता है। निर्माण कार्यों और जंगल क्षरण से होने वाले नुकसान की अनदेखी कर परिवर्तित भूमि को भी वन में आंकना गलत है।

जंगलों के खात्मे के अनुपात में ही बढ़ा है आदिवासियों का खात्मा
कई अध्ययनों में ये बात स्पष्ट तौर पर निकलकर आई है कि आदिवासियों के देखभाल वाली जमीनों पर दुनिया के सबसे बेहतरीन संरक्षित जंगल हैं। जैसे जैसे छत्तीसगढ़, झारखंड, महाराष्ट्र के वनीय इलाके में कार्पोरेट ने खनन कार्यक्रम को आगे बढ़ाया है, वैसे-वैसे उसी अनुपात में उन वनीय इलाकों में रहने वाले आदिवासियों पर जुल्म दमन और प्रशासनिक सामूहिक जनसंहार और आगजनी की घटनाएं बढ़ी हैं। किसी इलाके से वन का खत्म होना सिर्फ़ पेड़ों का खत्म होना नहीं होता, बल्कि उस क्षेत्र की जैव विविधता और तमाम वनीय जैव नस्लों का अस्तित्व भी खत्म हो जाता है।   

(जनचौक के विशेष संवाददाता सुशील मानव की रिपोर्ट।)

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This post was last modified on October 4, 2020 12:01 pm

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