Sunday, May 29, 2022

ग्राउंड रिपोर्ट: बस्तर का बहिष्कृत भारत-1

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बस्तर। बस्तर आमतौर पर माओवाद से संबंधित हिंसा और प्रतिहिंसा के लिए कुप्रसिद्ध है, जिसके बारे में काफी कुछ मीडिया और अन्य माध्यमों से देश दुनिया जानती है। पर इसी क्षेत्र में एक ऐसा भारत भी रहता है जो अलग तरीके से पीड़ित है, पर इसके बारे में बहुत ही कम बातें लिखी पढ़ी गई होंंगी। इसमें कोई दो मत नहीं है कि माओवादी हमले और सुरक्षा बलों के द्वारा जवाबी कारवाई में आम आदिवासियों की जिंदगी काफी परेशानियों में है। इन सबके परे एक ऐसी दुनिया भी है, जो इससे भी ज्यादा परेशान और बहिष्कृत है।

बस्तर के आदिवासियों के बीच जिन लोगों ने भी ईसाई धर्म को स्वीकारा है, उनकी तकलीफ इन सबसे कहीं अधिक भयानक और त्रासदपूर्ण है। ग्राउंड जीरो में जाने से पता चलता कि इस तरह के सैकड़ों मामले हैं, जिन पर न तो कभी कोई सुनवाई हुई, और न ही कोई कार्रवाई। अधिकांश मामले पुलिस थाना तक नहीं पहुंचते हैं और जो पहुंचते हैं उसमें से 80 फ़ीसदी मामले थाने में ही रफा-दफा कर दिए जाते हैं। बाकी बचे खुचे मामले भी न्यायालय में या तो खत्म हो जाते हैं, या फिर सालों तक लंबित रहते हैं।

वर्ल्ड क्रिश्चियन डाटाबेस (डब्लूसीडी) और वर्ल्ड वॉच लिस्ट (डब्लूडब्लूएल) की ओर से जारी की गयी रिपोर्ट के अनुसार भारत ईसाईयों पर अत्याचार के मामले में विश्व में 10वें स्थान पर है। इस रिपोर्ट में दुनिया के लगभग सभी देशों को शामिल किया गया है। हालांकि 2011 की जनगणना के अनुसार भारत में ईसाईयों की आबादी 2.3 फ़ीसदी है।

विरोध और सामाजिक बहिष्कार के मामलों में बढ़ोत्तरी

19 फरवरी 2019 को बस्तर जिले के दरभा तहसील के गुमदपाल गांव में ग्राम परिषद ने एक बैठक बुलाई और गांव से ईसाइयों का बहिष्कार करने का फैसला किया। उन्होंने ईसाइयों को मसीह में अपना विश्वास त्यागने और हिंदू देवताओं की पूजा करने की नसीहत दी। परिषद ने आगे फैसला किया कि ईसाइयों को सार्वजनिक नल / कुएं से पानी नहीं दिया जायेगा और दैनिक राशन भी नहीं मिलेगा। निर्णय के अनुसार ईसाई धर्म को मानने वालों से उनकी जाति और स्थाई निवास प्रमाण पत्र भी छीन लिया जाएगा। इसके अलावा विश्वासियों के स्वयं के पट्टे वाले जमीन पर उन्हें खेती-किसानी से भी वंचित रखना तय हुआ। सबसे महत्वपूर्ण निर्णय यह रहा कि जो विश्वासी हैं, उनको गांव के रजिस्टर (पंजी) से हटाकर उनके सभी प्रकार के लाभ और अधिकार छीनने का फैसला हुआ।

10 अगस्त, 2019, को दंतेवाड़ा जिले के दंतेवाड़ा तहसील के बडेकामेली गांव में ग्राम प्रमुख और आदिवासी महासभा के सदस्य के नेतृत्व में ग्रामीणों की एक बड़ी भीड़ एकत्रित हुई। भीड़ ने गांव के पंद्रह ईसाई परिवारों से या तो ईसा मसीह में अपना विश्वास छोड़ने या गांव तुरंत छोड़ने की बात कही।

13 जनवरी 2020, को बस्तर जिले के जगदलपुर तहसील में धार्मिक आस्था के कारण ग्रामीणों ने तीन लोगों का सामाजिक बहिष्कार किया। इनमें से एक महिला पर गांव के मुखियाओं ने 1,50,000 रुपये का जुर्माना लगाया क्योंकि उसने अपने पति को गांव में दफनाया था। इसके अलावा, उन्होंने विश्वासियों को धमकाया कि या तो वे गांव छोड़ें या फिर तुरंत 12,000 रुपये का भुगतान करें।

6 मई 2020, को बस्तर जिले के नकटोका गांव में धार्मिक कट्टरपंथियों की भीड़ ने भीम कश्यप के शव को दफनाने का घोर विरोध किया और मांग की कि हिंदू रीति-रिवाज से शव का अंतिम संस्कार किया जाए। कश्यप की मृत्यु 5 मई को हुई थी।

18 जनवरी 2021, को बस्तर जिले के बागबहार गांव में बालू सिंह और उनकी पत्नी गुड़िया को गांव से बहिष्कृत कर दिया गया था। उन्होंने हाल ही में ईसाई मत स्वीकार किया था। अपने परिवार द्वारा अपने घर से बाहर निकाल दिए जाने पर उन्होंने पास्टर सलीम हक्कू की मदद ली, जिन्होंने उनके रहने के लिए किराए के घर की व्यवस्था की।

25 नवंबर 2021, को कोंडागांव जिले के बासगांव नाम के गांव में ईसाइयों का सामाजिक बहिष्कार कर उन्हें पीने के पानी से वंचित कर दिया गया। ग्रामीणों ने उन्हें उनकी संपत्ति को छीनने की धमकी दी और कहा कि ईसाइयों को गांव की जमीन पर अपने मृतकों को दफनाने की अनुमति नहीं दी जाएगी।

19 दिसंबर, 2021, को दंतेवाड़ा जिले के कटेकल्याण के मट्टाडी गांव में एक बैठक आयोजित की गई जिसमें गांव के विश्वासियों को बुलाया गया और धमकी दी गई कि वे अपने विश्वास को त्यागें। इस गांव में हर अगले दिन ग्राम परिषद की बैठक का आयोजन होता रहा, जहां ईसाई धर्म अपनाने वालों को धमकाया जाता था। और उन्हें लगातार सामाजिक बहिष्कार और जान से मारने की धमकी दी जाती रही। पीड़ित लोगों में लक्ष्मण मंडावी, सोमाडु वाको, बुधराम मंडावी, संनु मरकामी, संजू मंडावी, मनोहर मंडावी, सुक्को वाको, अयातु वाको, होपे वाको, बुधरी वाको, आएते मंडावी, बुटकी मंडावी, लक्मे मंडावी, हिड़मे मरकामी शामिल हैंं।

मृत शरीर को दफनाने पर रोक

24 अगस्त 2019, को कोंडागांव जिले के बिश्रामपुरी गांव में एक पास्टर के पिता के मृतदेह को दफनाने का ग्रामवासियों ने विरोध किया। पास्टर ने पुलिस से सुरक्षा मांगी जिनकी मदद से पिता को उसके स्वामित्व वाली निजी भूमि पर दफनाया जा सका।

बस्तर जिले के दरभा तहसील के तीरथगढ़ गांव में 29 अगस्त 2019, को ग्रामीणों ने एक ईसाई परिवार के एक सदस्य सलमू के मृत शरीर को दफनाने पर रोक लगा दी। हालांकि खराब स्वास्थ्य के कारण सलमू का निधन हो गया था। परिवार वालों ने जब उनके शव को दफनाने की कोशिश की तो गांव वालों ने रोक दिया। इस मालमे की पास के थाने में शिकायत की गई। नतीजतन, पुलिस ने मध्यस्थता की और अंत में मृत लड़के को ग्राम परिषद द्वारा आवंटित स्थान पर दफनाने में मदद की।

बस्तर जिले में 25 अक्टूबर 2019, को एक पादरी को उसकी मृत मां को दफनाने की इजाजत नहीं मिली। हालांकि पुलिस ने बीच-बचाव करने की कोशिश की, लेकिन ग्रामीणों ने इसके एवज में गांव के देवता के लिए दस साल के योगदान के पैसे मांगे।

लोगों के बीच गोल्डी एम जॉर्ज

बस्तर के उलनार गांव में 27 अक्टूबर 2019, को मोहन नाग की बेटी सुमन की मृत्यु हुई। दफन के विरोध में लगभग 1500 ग्रामीणों की भीड़ जमा हो गई थी। मृतक के परिवार की मदद के लिए जब पुलिस वहां पहुंची तब पुलिस पर ही कुछ धार्मिक कट्टरपंथियों ने दबाव बनाकर भगा दिया।

26 नवंबर 2019, को बीजापुर जिले में कुछ धार्मिक कट्टरपंथियों के नेतृत्व में ग्रामीणों ने अंजलि कड़ती के मृतदेह को दफनाने का घोर विरोध किया। आक्रामक भीड़ ने जोर दिया कि मृतक के परिवार हिंदू धर्म में लौट आयें।

1 फरवरी 2020, को कोंडागांव जिले में ग्रामीणों ने एक विश्वासी के मृतशरीर को दफनाने का विरोध किया। जब परिवार ने दफनाने के लिए गांव के कब्रिस्तान का उपयोग करने की कोशिश की, तो उनकी ईसाई मान्यताओं के कारण उनका काफी विरोध हुआ।

28 अगस्त 2020, को कोंडागांव जिले के बाफना गांव में दयमती नाम की महिला को दफनाने का ग्रामीणों ने विरोध किया। ग्रामीणों ने दफन को रोककर मांग की कि मृत महिला का बेटा अपना ईसाई विश्वास छोड़ दे, तभी वे दफनाने की अनुमति देंगे। परिवार ने कोंडागांव थाने से संपर्क किया। अंतत: पुलिस कर्मियों और तहसीलदार (राजस्व अधिकारी) के संरक्षण में लाश को दफनाया गया।

19 जून 2021, को बस्तर जिले के मुतनपाल गांव में महादेव के बच्चे को दफनाने का ग्रामीणों ने विरोध किया। महादेव और उसका परिवार ईसाई धर्म को मानते थे। जब बच्चे की मृत्यु हो गई और वे दफनाने की प्रक्रिया में थे, तब कुछ ग्रामीणों ने महादेव की धार्मिक मान्यताओं के कारण दफनाने का विरोध किया।

गांव और समाज से बहार निकाला जाना

29 जनवरी 2019, को कोंडागांव जिले के केशकल तालुक के बड़े धेमली के ग्रामीणों ने जगेश्वर मरकाम को मसीहियत में चलने के कारण गांव छोड़ने का अल्टीमेटम दिया। ग्राम परिषद के आशमन वट्टी, बिरजू नेताम, मनीराम और सुखलाल मरकाम ने एक बैठक बुलाकर परिवार को बहिष्कृत करने की घोषणा की। मरकाम के परिवार को बैठक में बुलाकर कहा गया कि वे यीशु को त्याग दें या तत्काल गांव छोड़ दें। परिषद ने उन्हें फिर से गांव में प्रवेश करने पर गंभीर परिणाम भुगतने की धमकी दी।

बस्तर जिले के दरभा तहसील के छिंदबहार गांव में 6 सितंबर 2019, को एक बैठक बुलाई गई जिसमें मंजुली कश्यप और अन्य को कहा गया कि या तो वे ईसा मसीह को छोड़ दें या फिर गांव। नतीजतन, उन्हें समुदाय से बहिष्कृत कर दिया गया। इसी तरह 5 अक्टूबर 2019 को बस्तर में तीन ईसाई परिवारों को धमकी के बाद बहिष्कृत कर दिया गया। ग्रामीणों ने विश्वसी महिलाओं के साथ बहुत बदसलूकी की, जिसके बाद आखिरकार तीनों परिवार अपने 24 सदस्यों सहित गांव छोड़ने के लिए मजबूर हुए।

17 अप्रैल 2021, को बस्तर जिले के लोहंडीगुडा ब्लॉक के मारेंगा गांव में दो पुरुषों – पूरन और नानी – और एक महिला, बेटी, को उनके परिवार के सदस्यों ने उनकी ईसाई मान्यताओं के कारण पिटाई की और गांव से बहिष्कृत कर दिया। जब स्थानीय पुलिस गांव पहुंची, तो उन्हें भी ग्रामीणों ने धमकी दी। पुलिस के साथ तर्क किया कि उन्होंने कोई हत्या या कोई बड़ा अपराध नहीं किया है, इसलिए उन्हें पुलिस गिरफ्तार नहीं कर सकती। 

कहां गया मौलिक अधिकार

सवाल यह है कि इन परिस्थितियों में नागरिकों के मौलिक अधिकार की रक्षा किस हद तक हो रही है। गौर फरमाने वाली बात यह भी है कि ईसाइयों के खिलाफ अधिकांश हमले देश के “आदिवासी पट्टी” में हुए हैं। इन घटनाओं ने लोगों को एक दूसरे के विपरीत खड़ा कर शत्रुता मनोभाव को बहुत बढ़ा दिया है और पूरे इलाके में एक भयानक असहिष्णुता का माहौल बन गया है। इन सभी इलाकों में हिंदू राष्ट्रवादी निगरानी समूह अधिक से अधिक हिंसा फैलाने के लिए क़ानून और पुलिस-प्रशासन को एक उपकरण के रूप में इस्तेमाल करते आये हैं। अधिकांश मामलों में इनकी मूल प्रवृत्ति शारीरिक, मानसिक, सामुदायिक और आर्थिक हिंसा की होती है।

ईसाईयों/धार्मिक अल्पसंख्यकों के खिलाफ बढ़ते अत्याचार की घटनाओं पर पीयूसीएल के प्रदेश अध्यक्ष डिग्री प्रसाद चौहान का कहना है कि यह उन लोंगों के द्वारा किया जाता है, जो इस देश के संविधान पर विश्वास नहीं करते हैं, और करते भी हैं तो अपने हित पूर्ति होने तक। इनका रुख  हिंदू आस्था और वर्चस्व के मामलों में अविश्वसनीय स्तर तक नरम पड़ जाता है। ये लोग जिन धारणाओं में  विश्वास करते हैं, उसकी जड़ें मनुस्मृति में पाई जाती हैं।

छत्तीसगढ़ हाई कोर्ट के अधिवक्ता आशिष बेक के अनुसार आदिवासिओं के बीच यह सवाल कभी नहीं उठता है, जब उनकी पहचान हिंदू धर्म से संबंधित होती है। कहने के लिए तो उनकी पहचान आदिवासी की है, पर वास्तव में हिंदू ही की है क्योंकि हर एक के जाति प्रमाण पत्र में हिंदू ही लिखा जाता है। यही वजह है कि जैसे ही हिंदू के अलावा और किसी धर्म, उदहारण से ईसाई, की बात होती है, तब पूरे के पूरे समाज में खलबली मचने लगती है।

देश में ईसाई आज हिंसा की पारिस्थितिकी तंत्र का दबाव महसूस कर रहे हैं। एक तरफ शारीरिक हिंसा की घटनाएं बढ़ रही हैं, तो दूसरी तरफ संरचनात्मक हिंसा (स्ट्रक्चरल वायलेंस) में बढ़ोत्तरी के जरिये भारत के जनतंत्र और धर्मनिरपेक्षता के भीतर नई खाई खोदी जा रही है। वर्तमान भारत का बहिष्कृत समाज। इसे देश के हिंदू राष्ट्र बनने की ओर धीरे-धीरे कदम के रूप में देखा जाना चाहिए।

(बस्तर से डॉ. गोल्डी एम जॉर्ज की रिपोर्ट।)

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