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ओला और बारिश से बर्बाद किसान सरकार की चिंता में नहीं

आजादी के तिहत्तर साल के बाद आज भी भारत का किसान भाग्य भरोसे है। हाड़ तोड़ मेहनत करने के बावजूद उसकी जिंदगी में अंधकार और अनिश्चितता है। जुताई, बुआई, मड़ाई और कटाई में ही उसकी सारी उमर बीत जाती है। हर बार अच्छी फसल होने की वह कामना करता है, लेकिन ऐसा कितनी बार होता है?

खेती की लागत और पेट भर खाने की जुगाड़ के अलावा जो कुछ बचता है, वो बेटी के ब्याह और बूढ़े मां-बाप की दवा-दारू पर खर्च हो जाता है। अक्सर बुआई के पहले वह कभी बैंक से तो कभी साहूकार से कर्ज लेता है।

कभी सूखा तो कभी अत्यधिक वर्षा और  ओलावृष्टि से किसान की फसल चौपट हो जाती है। फसल खराब हुई तो उसके सामने खेती बेचने या आत्महत्या करने के अलाव कोई और विकल्प ही नहीं बचता है।

पिछले तीन दशकों में किसानों की आत्महत्या का ग्राफ तेजी से बढ़ा है। माना जाता है कि 1991 में आई नई आर्थिक नीति के चलते निजीकरण और उदारीकरण की व्यवस्था ने खेती-किसानी को एक ऐसे तंत्र में तब्दील कर दिया है जिससे किसान का उबरना लगभग नामुमकिन हो गया है। नेशनल क्राइम रिकार्ड ब्यूरो (एनसीआरबी) के आंकड़ों के अनुसार 1995 से लेकर 31 मार्च 2013 तक 296438 किसानों ने आत्महत्या की है।

यह आंकड़ा लगातार बढ़ता जा रहा है। 2015 से लेकर 2018 के बीच अकेले महाराष्ट्र में 11995 किसानों ने कर्जा न चुका पाने के कारण खुदकुशी की है। स्वराज इंडिया के संस्थापक योगेंद्र यादव कहते हैं कि किसानों के आज जो हालात हैं, उसके लिए किसी एक सरकार को जिम्मेदार ठहराना सही नहीं होगा।

पिछले सत्तर सालों में कांग्रेस ने सबसे ज्यादा सत्तासुख भोगा है, लेकिन देश के भले चंगे किसान को बीमार बना के अस्पताल में भर्ती करवा दिया। और मोदी सरकार ने उन बीमार किसानों को अस्पताल के वार्ड से आईसीयू तक पहुंचा दिया है। किसानों को उस आईसीयू से कैसे निकाला जाए, यह बड़ी चुनौती है।

मोदी सरकार किसानों के मुद्दों पर बेहद संवेदनहीन है। आत्महत्या के बढ़ते ग्राफ को रोकने के बजाय और किसानों की दुश्वारियों का उपचार करने के बजाय मोदी सरकार आंकड़ों को ही झुठलाने में लगी है। लोकसभा में एक प्रश्न के जवाब में सरकार की तरफ से कहा गया कि 2015 के बाद का किसानों की आत्महत्या से जुड़ा कोई डेटा ही नहीं है।

एक अन्य मसले पर गृह मंत्रालय की तरफ से जारी किए गए आंकड़े के मुताबिक 2016 में 6351 यानी रोजाना 17 किसानों ने आत्महत्या की है, जबकि 2015 में 8007 यानी रोजाना 22 किसानों ने खुदकुशी की। इस आधार पर सरकार ने दावा किया कि आत्महत्या में कमी आई है, जबकि हकीकत कुछ और है।

रामन मैग्सेसे पुरस्कार प्राप्त द हिन्दू अखबार के पत्रकार पी. साईनाथ इन आंकड़ों की सच्चाई को बताते हुए कहते हैं कि एनसीआरबी के आंकड़े पुलिस स्टेशनों के आधिकारिक आंकड़ों पर आधारित होते हैं। स्थानीय स्तर पर कांस्टेबल तय करता है कि आत्महत्या करने वाला किसान है या कोई खेतिहर मजदूर। यह रिपोर्ट राजस्व विभाग को जाती है।

फिर तहसीलदार राज्य सरकार को आत्महत्या करने वाले किसानों का ब्यौरा भेजता है। आमतौर पर खेतिहर मजदूर और ठेके पर लेकर खेती करने वाले किसानों को इसमें नहीं जोड़ा जाता है। इस तरह से किसानों की आत्महत्या का आंकड़ा दर्ज होता है।

एक अन्य आंकड़े के मुताबिक देश में  रोजाना 31 किसान आत्महत्या करते हैं। सरकार का रवैया बेहद गैरजिम्मेदाराना है। राज्यसभा में एक प्रश्न के जवाब में गृह मंत्रालय का कहना है कि सरकार के पास  किसानों की आत्महत्या के कारण स्पष्ट नहीं हैं, जबकि दस साल पहले कृषि लागत एवं मूल्य आयोग (सीएसीपी) ने पंजाब में अध्ययन करके किसानों की आत्महत्या का प्रमुख कारण छोटी जोत और बढ़ता कर्ज बताया था।

पहले महाराष्ट्र के विदर्भ और आंध्र के तेलंगाना से किसानों की आत्महत्या की खबरें आती थीं। अब हरित क्रांति की कामयाबी वाले हरियाणा, पंजाब और पश्चिमी उत्तर प्रदेश में भी किसान बड़े पैमाने पर आत्महत्या कर रहे हैं। इसका बड़ा कारण फसल की लागत का निरंतर बढ़ते जाना है। रासायनिक खाद और प्रसंस्कृत बीजों के अलावा भूजल में भारी गिरावट के चलते बोरवेल की लागत कई गुना बढ़ गई है।

आवारा पशुओं के कारण किसानों को बाड़बंदी में भी बहुत खर्च करना पड़ता है। इन हालातों में किसान सहकारी, सरकारी बैंकों और स्थानीय साहूकारों से मोटे ब्याज पर कर्ज उठाता है, लेकिन जब फसल का दाम किसान को नहीं मिलता या फसल बर्बाद हो जाती है तो उसके पास कर्ज से उबरने का कोई उपाय नहीं होता। समय पर फसल का सही दाम नहीं मिलना भी आत्महत्या का कारण बनता है।

उत्तर प्रदेश और महाराष्ट्र में चीनी मिलों द्वारा समय पर गन्ना किसानों का भुगतान नहीं होता। यह भी देखने में आया है कि जब किसान की बंपर फसल होती है तो सरकारी लिवाली और उम्दा निर्यात नीति न होने के कारण भी किसान बदहाल हो जाता है। महाराष्ट्र में प्याज, टमाटर और उत्तर प्रदेश में आलू की बंपर पैदावार के समय किसान फसल को सड़क पर फेंकने के लिए मजबूर होता है।

ऐसे में किसान के पास विकल्प ही क्या बचता है। कृषि विज्ञानी देवेन्द्र शर्मा का कहना है कि भारत में खेती घाटे का सौदा है, इसलिए कोई भी किसान अपने बेटे को खेती के कामकाज में नहीं लगाना चाहता है।

साल दर साल हालात बद से बदतर होते जा रहे हैं। दूसरी तरफ अरबपति पूंजीपतियों की तादाद लगातार बढ़ती जा रही है। इस आवारा पूंजीवादी व्यवस्था में पूंजीपति, नेता और प्रशासन की मिलीभगत से देश के भीतर असमानता की खाई चौड़ी होती जा रही है। पूंजीपतियों और दलालों ने गोया किसानों की जिंदगी का सौदा कर लिया है।

जमीनों के अधिग्रहण द्वारा किसानों को उनकी जमीन से बेदखल किया जा रहा है। सरकार में बैठे राजनेताओं की तिजोरियां भरती जा रही हैं। पूंजीपति ऐसे नेताओं और पार्टियों की ब्रांडिंग करते हैं। बदले में सरकार उन्हें औने-पौने दाम पर किसानों की खेती छीन कर दे देती है या फसल बीमा के नाम पर करोड़ों का फायदा कराती है।

आज की सरकार में बैठे राजनेता इतने संवेदनहीन हैं कि उन्हें किसानों की आत्महत्या और फसल की बर्बादी से कोई फर्क नहीं पड़ता। मुआवजा भी नाप तौल कर पार्टी और निजी हितों को ध्यान में रखकर दिया जाता है। अब देखना है कि कब तक इस बारिश से हो रही बर्बादी का आकलन करके किसानों को राहत और मुआवजा दिया जाता है।

2014 में केंद्र में आने वाली सरकार ने अपने संकल्प पत्र में यह वादा किया था कि स्वामीनाथन आयोग की रिपोर्ट की संस्तुति के अनुसार किसानों को फसल लागत का दोगुना दाम दिया जाएगा, लेकिन ऐसा अभी तक नहीं हो सका है। फसल होने पर किसानों के सामने उनकी फसल की लिवाली यानी सरकारी खरीद की प्रक्रिया भी बेहद लचर साबित हो रही है।

मध्य प्रदेश में शिवराज सिंह चौहान के नेतृत्व में पिछली भाजपा सरकार के समय मंदसौर जैसे कई स्थानों पर किसानों के विरोध प्रदर्शन को बर्बरतापूर्वक दबा दिया गया था। कई किसान पुलिस की गोली से मारे गए थे।

2018 और 2019 में बुंदेलखंड, राजस्थान, महाराष्ट्र से लेकर दक्षिण भारत तक किसानों की समस्याओं को लेकर बड़े-बड़े विरोध प्रदर्शन हुए। दुर्भाग्य की बात यह है कि मुख्य मीडिया ने इन विरोध-प्रदर्शनों की खबर को बिल्कुल नजरअंदाज किया।

चुनाव नजदीक आने के समय आनन फानन में किसान परिवारों को सालाना छह हजार रुपये देने का वायदा ही नहीं किया गया, बल्कि उनके खातों में पैसा ट्रांसफर भी कर दिया गया। इस फौरी राहत का फायदा भाजपा को हुआ। लोकसभा चुनाव में भाजपा बड़े बहुमत के साथ एक बार फिर सरकार बनाने में कामयाब हुई।

उसके बाद गोया सरकार ने फिर से किसानों की समस्याओं को अपनी प्राथमिकता से बाहर कर दिया है। एक ओर जहां नीरव मोदी, विजय माल्या, मेहुल चोकसी जैसे पूंजीपति हजारों करोड़ रुपये लेकर देश से फरार हो गए, जबकि दूसरी ओर उत्तर प्रदेश में ही देखिए मार्च क्लोजिंग के नाम पर बैंक के कर्मचारी किसानों से जबरिया वसूली कर रहे हैं।

बड़े-बड़े पूंजीपतियों को मिले सैकड़ों करोड़ के लोन के कारण पहले महाराष्ट्र बैंक फिर यस बैंक डूबने के कगार पर है,  लेकिन कभी फसल के लिए तो कभी बेटी के ब्याह के लिए किसानों के द्वारा लिए गए बैंक लोन की सख्ती से वसूली हो रही है। इसका प्रभाव पिछले पंद्रह दिनों में देखने में यह आया है कि अब तक उप्र में चार किसान आत्महत्या कर चुके हैं।

ऐसे में असमय बारिश और ओलावृष्टि किसानों पर कहर बनकर टूटी है। एक तरफ पहले ही किसान आवारा पशुओं के कारण चैन की नींद नहीं सो पा रहा है। रात दिन रखवाली करके और बड़ी रकम लगाकर खेतों के आसपास बाड़ लगाकर किसी तरह से किसान फसल को अपनी जिंदगी का एकमात्र सहारा बना रहा है, लेकिन इस मुसीबत से वह कैसे बच पाएगा?

सरकार अगर किसानों के प्रति हमदर्द और संवेदनशील है तो उसे तत्काल बैंकों द्वारा कर्ज वसूली को रोकना चाहिए और किसानों की बर्बाद हुई फसल का मूल्यांकन करके पर्याप्त मुआवजा देना चाहिए।

रविकान्त
(लेखक लखनऊ विश्वविद्यालय के हिंदी विभाग में असिस्टेंट प्रोफेसर हैं।)

This post was last modified on March 16, 2020 12:01 am

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