Sun. Dec 8th, 2019

फ्रॉड बाबा, मीडिया, भक्त और विज्ञान का दुरुपयोग

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सत्ता पोषित पाखंड के दौर में एक नयी ज़मीन तोड़ने का वक्त… शीर्षक रचना का शेष भाग

एक सफल देव पुरुष बनने के लिए कौन सी योग्यताओं की आवश्यकता है? सबसे पहले वह लच्छेदार बातें एवं अर्थहीन भाषाएं बोलने में दक्ष हो। जैसे: आत्म-मुक्ति, आत्म-अनुभव, आत्म-शुद्धता, अन्तिम सत्य, ब्रहमण्डलीय शक्ति, आसमानी बुद्धि, अमर आत्मा, अपवित्रा जीवन, कर्मशक्ति, जमीर, पवित्रा-शक्ति एवं अध्यात्मिक प्रकाश।

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दूसरी बात यह है कि उसे चमत्कारों के नाम पर कुछ जादू के तमाशों का ज्ञान हो।

तीसरी सबसे आवश्यक योग्यता यह है कि उसके पास कुछ अफवाहें फैलाने वाले एजेंट हों, जो इस देव पुरुष की परी-कहानियों का समाचार-पत्रों, पुस्तकों, रेडियो और टेलिविजन के माध्यम से प्रचार कर सकें। उचित और भारी इश्तहारबाज़ी द्वारा देव पुरुष के इर्दगिर्द भक्त ऐसे इकटठे हो जाएंगे जैसे गल रही लाश पर मक्खियां इकट्ठी हो जाती हैं। ऐसा नहीं है कि यह सिलसिला नया है, बल्कि पहले से चल रहा है, अब हुआ यह है कि इन संतों ने या फ्रॉड बाबाओं ने भी विज्ञान की भाषा का इस्तेमाल शुरू किया है।

यह बाबा लोग हमेशा चमत्कार दिखाने वाले या आप के दुखहरण करने की बात करने वाले ही नहीं होते। उनमें एक ऐसी जमात भी खड़ी हो रही है, जो ‘जीने का सलीका’ सिखाने की बात करते हैं या जो अपने समूचे विमर्श को विज्ञान की जुबां में इस तरह लपेटते हैं कि भल-भले चकरा जाएं।

मिसाल के तौर पर हम बेहद नर्म अंदाज में बोलने वाले श्री श्री रविशंकर को देखें, जिनका वैश्विक आध्यात्मिकता कार्यक्रम 140 देशों में चलता है। इसके दो करोड़ सदस्य हैं। जिसके प्रति युवाओं के एक हिस्से में काफी क्रेज है। उन्हें यह सुन कर आश्चर्य होगा कि गुरुजी किन-किन विवादास्पद मसलों पर जुबां खोलते रहते हैं।

वैसे उन्हें बारीकी से देखने वाले बता सकते हैं कि किस तरह प्यार और खुशी और मीडिया की सहायता से बनाई गई खिलंदड़ीपन की इमेज के बावजूद श्री श्री के लिए बकौल सुश्री मीरा नंदा, अपनी ‘हिन्दू राष्ट्रवादी भावना को छिपा पाना असंभव है। और यह एक खुला सीक्रेट है कि राम मंदिर और अल्पसंख्यक मामलों के बारे में वह क्या सोचते हैं?

ब्रिटेन की बहुचर्चित पत्रिका ‘द इकोनॉमिस्ट’ ने उनकी राजनीति को बखूबी पकड़ा था: ‘आर्ट आफ लिविंग सभी आस्थाओं के सभी लोगों के लिए खुला है। मगर हक़ीकत यही है कि राम मंदिर की चर्चा करते हुए उनके गुरु आध्यात्मिक गुरु के बजाय राजनेता लगने लगते हैं, जो ‘अल्पसंख्यक समुदाय की तुष्टीकरण’ के लम्बे इतिहास की बात करता है, और इस व्यवस्था की गैरबराबरी को दिखाता है जो मक्का में हज यात्रा पर जाने के लिए मुसलमानों को सब्सिडी प्रदान करता है। (Page 100, The God Market, Meera Nanda, Random House.) 

या आप सदगुरु जग्गी वासुदेव को सुन सकते हैं, जो कहीं-कहीं किसी धर्म से न होने का एहसास भी देते हैं। मगर वह किस तरह छदम विज्ञान को परोसते हैं कि भले-भले चकरा जाएं।

विज्ञान के खिलाफ यह गोलबन्दी कब तक?

एक तरफ जहां भारत के वैज्ञानिक एवं उनकी सक्रियताएं देश-विदेश में सराही जा रही हैं, फिर वह चाहे गुरुत्वाकर्षणी तरंगों और हिग्स बोसोन की खोज में हाथ बटाने का मामला हो या मंगलयान के माध्यम से इंटरप्लानेटरी मिशन में और स्वदेशी उपग्रह प्रेक्षण क्षमता को विकसित करना हो; अक्सर हम अपनी पीठ को इसलिए थपथपाते रहते हैं कि भारत वैज्ञानिक-टेकनोलॉजी के मामलों में संकेंद्रित मानव शक्ति में दुनिया में तीसरे नंबर पर हैं; मगर दूसरी तरफ हमें अवैज्ञानिक मान्यताओं और धार्मिक विचारों की बढ़ती लहरों का सामना करना पड़ रहा है।

आलम यहां तक पहुंचा है कि संसद के पटल पर निहायत अनर्गल, अवैज्ञानिक बातें कहीं जा रही हैं और यकीन करना मुश्किल हो रहा है कि उसी संसद के पटल पर वर्ष 1958 में विज्ञान नीति का प्रस्ताव तत्कालीन प्रधानमंत्री ने पूरा पढ़ा था (13 मार्च 1958 और एक मई 1958), को उस पर हुई बहस में किसी सांसद ने यह नहीं कहा कि भारत धर्म और आस्था का देश है।

सांसदों ने कुंभ मेले, धार्मिक यात्राओं पर कटाक्ष किए थे, जिनका इस्तेमाल उनके मुताबिक ‘अंधविश्वास फैलाने के लिए किया जाता है।’ नवस्वाधीन भारत को विज्ञान एवं तर्कशीलता के रास्ते पर आगे ले जाने के प्रति बहुमत की पूरी सहमति थी।  

याद रहे भारत की संविधान की धारा 51 ए मानवीयता एवं वैज्ञानिक चिंतन को बढ़ावा देने में सरकार के प्रतिबद्ध रहने की बात करती है। वह अनुच्छेद राज्य पर वैज्ञानिक एवं तार्किक सोच को बढ़ावा देने की जिम्मेदारी डालता है। याद करें, एसआर बोम्मई मामले में उच्चतम न्यायालय का फैसला, जिसके अनुसार धर्मनिरपेक्षता का अर्थ है कि

1. राज्य का कोई धर्म नहीं होगा।
2. राज्य सभी धर्मों से दूरी बनाए रखेगा।

और
3. राज्य किसी धर्म को बढ़ावा नहीं देगा और न ही राज्य की कोई धार्मिक पहचान होगी।

आज जरूरत इस बात की है कि विज्ञान की रक्षा के लिए, वैज्ञानिक चिंतन को जड़मूल बनाने के लिए साधारण लोग- छात्र, अध्यापक, बुद्धिजीवी अपने-अपने स्तर पर आगे आएं और विज्ञान एवं मिथक शास्त्र के इस घोल को प्रश्नांकित करें।
सकारात्मक बात यह है कि सब कुछ समाप्त नहीं हुआ है।

विज्ञान की रक्षा के लिए अलग-अलग आवाज़ें भी बुलंद होती दिख रही हैं।
मालूम हो कि आईआईटी मुंबई के छात्र कुछ वक्त़ पहले सुर्खियों में आए जब छात्रों की अपनी पत्रिका में उन्होंने संस्थान में एक कार्यक्रम में बुलाए गए एक काबीना मंत्री के बयान पर सवाल उठाया। उन्होंने कहा कि क्या आईआईटी प्रबंधन के पास वक्ताओं का अभाव था कि उन्होंने एक मंत्री को बुलाया, जिन्होंने तरह-तरह की अवैज्ञानिक बातें कीं।

ख़बर यह भी आई कि इंडियन इंस्टिट्यूट ऑफ साइंस, बंगलुरू के छात्रों ने श्री श्री रविशंकर के व्याख्यान का विरोध किया।

इसी किस्म की ख़बरें पंजाब से भी आयी हैं। गौरतलब है कि चुनावों के पहले 200 से अधिक वैज्ञानिकों ने एक खुला ख़त लिख कर लोगों से अपील की थी कि वह कुछ अतिवादी समूहों द्वारा प्रस्तुत किए जा रहे भेदभाव और हिंसा की राजनीति को खारिज करें।
यूं तो 2014 में मौजूदा हुकूमत के आगमन के बाद लम्बे समय तक वैज्ञानिक समुदाय में चुप्पी देखने को मिली थी, यहां तक कि प्रधानमंत्री द्वारा अंबानी अस्पताल के उद्घाटन पर दी गई तकरीर का भी जोरदार प्रतिवाद नहीं हुआ था।

अलबत्ता अब चीज़ें बदल रही हैं।

नौ अगस्त 2017 को जब देश में 1942 के भारत छोड़ो आंदोलन की 75वीं सालगिरह पर बहस जारी थी, उस दिन गोया इतिहास रचा गया। देश के तीस से अधिक शहरों में वैज्ञानिक, विज्ञान प्रेमी और सरोकार रखने वाले लोग हजारों की तादाद में जुटे और उन्होंने अपनी संगठित आवाज़ बुलंद की। ऐसी आवाज़ जो विज्ञान के पक्ष में थी, ऐसी आवाज़ जो अंधश्रद्धा की मुखालिफत कर रही थी।

एक तरह से देखें तो उसी साल 22 अप्रैल को जहां दुनिया के 600 से अधिक शहरों में पृथ्वी दिवस पर जिस तरह हजारों की तादाद में वैज्ञानिक, विज्ञान प्रेमी और सरोकार रखने वाले लोग विज्ञान बचाने की खातिर उतरे थे, जब उन्होंने दुनिया भर में फैल रही नव उदारवादी नीतियों के तहत विज्ञान पर घटते जोर को लेकर आवाज़ बुलंद की थीं, उसी प्रयोग को यहां दोहराया जा रहा था।

उनकी साफ मांग थी कि विज्ञान एवं टेक्नोलॉजी के विकास के लिए सकल घरेलू उत्पाद का कम से तीन फीसदी आवंटित किया जाए और शिक्षा के लिए यही राशि दस फीसदी की जाए। अवैज्ञानिक, अस्पष्ट विचारों और धार्मिक असहिष्णुता का प्रचार रोका जाए और संविधान के अनुच्छेद 51 के अनुपालन में वैज्ञानिक स्वभाव, मानव मूल्यों और जांच की भावना को विकसित किया जाए। यह सुनिश्चित किया जाए कि शिक्षा प्रणाली केवल उन विचारों को प्रदान करे जो वैज्ञानिक प्रमाणों द्वारा समर्थित है। साक्ष्य आधारित विज्ञान के आधार पर नीतियों को लागू किया जाए।

आखिर ऐसी क्या बात थी कि वैज्ञानिक, जिनके बारे में यह मिथक गढ़ा गया है कि वह अपने आप को प्रयोगशालाओं तक, सेमिनारों-संगोष्ठियों तक या जनता के बीच विज्ञान पहुंचाने को लेकर सक्रिय रहते हैं, दुनिया में ही नहीं बल्कि देश के अंदर भी सड़कों पर उतरने के लिए मजबूर हो रहे हैं। इसकी दो साफ वजहें देखी जा सकती हैं। एक, विचार जगत में समतामूलक, प्रगतिवादी, समावेशी धारणाओं को प्रतिस्थापित करके विषमतामूलक, पश्चगामी और असमावेशी, नस्लवादी, समुदायवादी धारणाओं को मिलती बढ़त, जिसका प्रतिबिंबन विभिन्न लोकतंत्रों में हाल में हुए परिवर्तनों, संकीर्णतवादी आंदोलनों के उभार में देखा जा सकता है। वहीं इसी का दूसरा पहलू जनकल्याण खर्चों में लगातार कटौती कर सब कुछ बाज़ार के हवाले करने की तरफ नीतियों का जोर।

प्रस्तुत मार्च फार साइंस की तरफ से देश के नीतिनिर्माताओं से यह अपील की गई कि देश के वैज्ञानिक समुदाय से उनकी उंची अपेक्षाओं को तभी जमीन पर उतारा जा सकता है जब वह वैज्ञानिक अनुसंधान के लिए दी जा रही सहायता को बढ़ाने का निर्णय लें। इस संबंध में उन्होंने कहा कि जहां भारत में हम सकल घरेलू उत्पाद का महज 0.8 से 0.9 फीसदी खर्च करते आए हैं, वहीं तमाम देशों में यह खर्चा तीन फीसदी से भी अधिक है।

मिसाल के तौर पर दक्षिणी कोरिया अपने सकल घरेलू उत्पाद का 4.15 फीसदी विज्ञान टेक्नोलॉजिकल अनुसंधान पर खर्च करता है। जापान 3.47 फीसदी, स्वीडन 3.1 फीसदी और डेनमार्क 3.18 फीसदी खर्च करता है। उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि इतना कम फंड दिए जाने के बाद भी उसका बंटवारा भी विषम हो रहा है। डिपार्टमेंट ऑफ साइंस एंड टेक्नोलॉजी को उसका महज 7.5 फीसदी मिलता है तो सेंटर फार साइंटिफिक एंड इंडस्ट्रियल रिसर्च को सात फीसदी मिलता है।

क्या इतना ही काफी है या कुछ और नया गुनने बुनने की जरूरत

यह एक साधारण व्यक्ति भी बता सकता है कि अभी बहुत कुछ अधिक, अधिक सृजनात्मक तरीके से, अधिक उर्जा के साथ करने की जरूरत है। नए प्रश्नों से रूबरू होने की जरूरत है।

हमें यह भी सोचना है कि लोक विज्ञान आन्दोलन, जो समूची दुनिया में एक अनोखे हस्तक्षेप के तौर पर सामने आया, जिसके बीज 60 के दशक में पड़े और सत्तर के दशक के उत्तरार्द्ध या अस्सी के दशक के पूर्वार्द्ध में उसने ‘सामाजिक क्रांति के लिए विज्ञान’ का नारा बुलंद किया, जिसने विज्ञान प्रचार, वैज्ञानिक नीतियों में हस्तक्षेप, वैकल्पिक विकास की अवधारणा या साक्षरता अभियान तथा कई अभियानों से जनता से जुड़ने का काम किया। वह जितना असर छोड़ना चाहिए वह क्यों नहीं छोड़ पाया।

एक सवाल समाज में विज्ञान विरोध के आधार को या उसे मजबूती दिलाने वाले कारकों से जुड़ा भी है। पूंजीवादी व्यवस्था, सिस्टम के तर्क को बखूबी देखा जाता है, मगर सामाजिक-सांस्कृतिक पक्षों को धर्म, जाति, संप्रदाय या समुदाय के व्यक्ति पर वर्चस्व आदि बातों को लेकर हमारी समझदारी क्या है और उसे लेकर हमारा कार्यक्रम क्या है?

क्या कहीं का विज्ञान आंदोलन धर्म की चिकित्सा या धर्म का निषेध किए बगैर आगे बढ़ सकता है?

हमारे मुल्क में 19वीं सदी से मौजूद सामाजिक विद्रोहियों की धारा ने फुले, पेरियार, अंबेडकर आदि ने एक तरह से भारत में धर्म की प्रबोधन मार्का आलोचना (enlightenment style critique) करने की कोशिश की थी। (देखें, 35, मीरा नन्दा, ब्रेकिंग द स्पेल आफ धर्म)

अंबेडकर ने अकसर फ्रांसिसी इंकलाब के नारों, स्वतंत्राता, समता और बंधुता का प्रयोग भारत के जनतांत्रिक आंदोलन के सन्दर्भ में किया। पुराने मूल्यों के सतत् संशोधन और उनके रैडिकल बदलाव के नए पैमाने के तौर पर वैज्ञानिक चिंतन की बात अंबेडकर ने की।

गैलीलिओ, न्यूटन और डार्विन की पद्धतियों और सत्य का समृद्ध करने वाले मूल्यों के प्रति वरीयता देने का अंबेडकर का आग्रह उनके हिसाब से ‘बुद्ध और अवैदिक भौतिकवादियों और संदेहवादियों की शिक्षा के अनुरूप था।’ पारंरिक हिन्द ज्ञान मीमांसा जो आधिभौतिक इकाईयों एवं ताकतों के सन्दर्भ में चीजों का स्पष्टीकरण प्रस्तुत करती है, जिन कारकों को मानवीय बोध और तर्क से प्रमाणित नहीं किया जा सकता, इस पद्धति में एक कदम आगे के तौर पर सामाजिक विद्रोही धारा ने आधुनिक विज्ञान को समझा था।

प्रश्न है भारत में विज्ञान आंदोलन के प्रोग्राम में क्या इस पहलू को सामाहित किया जा सका है या नहीं?

एक मसला, जिससे हमें बार-बार टकराना पड़ता है, वह है प्राचीन भारत में खगोलशास्त्र, चिकित्सा शास्त्र में हुई प्रगति का तथा उसके पतन को लेकर हिन्दुत्ववादी ताकतों की एक किस्म की पुनरुत्थानवादी व्याख्या का। मिसाल के तौर पर दक्षिणपंथी ताकतें प्राचीन भारत में विज्ञान की जबरदस्त तरक्की का हवाला देती हैं और उसके पतन के लिए बाहरी आक्रमण को जिम्मेदार ठहराती है, ताकि आम जनमानस में यही छवि मजबूत हो कि अगर ‘मुसलमान राजा’ नहीं आते या अंग्रेज नहीं आते क्या हम उसे कैसे देखते हैं? (देखें, ‘चार्वाक के वारिस, आथर्स प्राइड, विस्तृत चर्चा के लिए)

अगर हम उसे बाह्य ताकतों पर डालेंगे तो उससे सही नतीजे कभी नहीं निकल सकते हैं।

अन्त में, अभी हम जब यहां बैठे हैं तो ख़बर आई है कि ब्राजील में होने वाले अन्तरराष्ट्रीय सेमिनार की, जिसका फोकस होगा यह पड़ताल करना कि पृथ्वी गोल है या चपटी? आप पूछेंगे कि यह कैसा वाहियात सवाल है। पांच सौ साल पहले ही कोपर्निकस ने उसे हल किया है। गौरतलब है कि ब्राजील के जिन लोगों ने इस सेमिनार के लिए पहल ली है, वह अकेले नहीं हैं। पश्चिम के कई मुल्कों में इस ‘सिद्धांत’ के हिमायती आज मिल जाएंगे।

एक तरफ जहां खगोल विज्ञान की इस बेसिक जानकारी को लेकर लोग भ्रमित हैं, वहीं साथ ही साथ जीवन कैसे निर्मित हुआ उसे लेकर भी बहस जोरों पर है। डार्विन के विकास, इवोल्यूशन के सिद्धांत के बरअक्स इंटेलिजेंट डिजाइन का सिद्धांत पेश किया गया है, जो अमरीका के कई राज्यों में पढ़ाया भी जाता है।

एक दिलचस्प बात यह भी है कि ऐसे लोगों तथा दक्षिणपंथी जमातों में आपस में काफी घनिष्ठ रिश्ता दिखता है। एक अपवित्र गठबंधन सा उभरा है कार्पोरेट ताकतों, दक्षिणपंथी जमातों एवं ऐसे लोगों के बीच।

कहने का तात्पर्य कि अगर हमारे यहां पढ़े-लिखे अहमकों की पौध अचानक उग आई दिखती है, तो परेशान होने की आवश्यकता नहीं है। अहमक दुनिया भर में फल-फूल रहे हैं।

और एक सकारात्मक बात है कि इन अहमकों का मुंहतोड़ जवाब देने के लिए भी लोग, आंदोलन, राजनीतिक पार्टियां गोलबंद हो रही हैं।

एक शायर ने वाजिब फरमाया है,

मशालें लेकर चलना कि जब तक रात बाकी है

संभल कर हर कदम रखना कि जब तक रात बाकी है

(छत्तीसगढ़ विज्ञान सभा के राज्य सम्मेलन के अवसर पर प्रस्तुत बातों का मसविदा, 16 नवंबर 2019, रायपुर)

(लेखक वामपंथी विचारक हैं और दिल्ली में रहते हैं।)

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