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पड़ताल: कैसे सरकारी विज्ञापनों ने बनाया मीडिया को सत्ता का दलाल

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा गत माह विपक्षी नेताओं से कोविड-19 और उससे पैदा हुए आर्थिक संकट का सामना करने के संदर्भ में सुझाव मांगे थे। इस संदर्भ में कांग्रेस की कार्यकारी अध्यक्ष सोनिया गांधी ने सरकारी धन की बचत करने और उसका इस्तेमाल कोविड-19 से पैदा हुए संकट का सामना करने के लिए पांच सुझाव दिए। उनके सुझाव विचारणीय होने के साथ ही साथ विवादास्पद भी साबित हुए और मीडिया घरानों में तो लगा जैसे भूचाल सा आग गया हो।

उन्होंने जो पांच सुझाव दिए उनमें एक यह था कि दो वर्षों के लिए सरकार और सार्वजनिक क्षेत्र के प्रतिष्ठानों द्वारा मीडिया को दिए जाने वाले सभी विज्ञापनों पर पूर्ण प्रतिबंध लगा दिया जाए। सिर्फ स्वास्थ्य से जुड़ी आवश्यक सूचनाओं का ही विज्ञापन दिया जाए। उन्होंने अपने सुझाव पत्र में साफ शब्दों में मीडिया के तीनों रूपों- टेलीविजन, प्रिंट और ऑनलाइन – को दिए जाने वाले विज्ञापन पर दो वर्षों के लिए पूर्ण प्रतिबंध का सुझाव दिया। इससे पहले कि सरकार इन प्रस्तावों पर कुछ कहती मीडिया ने जिस तरह की प्रतिक्रिया की, उससे वर्तमान समय में उसकी भूमिका, आर्थिक बनावट और सत्ता से उसके संबंधों को लेकर कुछ आधारभूत सवाल उठते हैं।।

इन सवालों पर विचार करने से पहले सरकार द्वारा मीडिया को दिए जाने वाले विज्ञापनों के हिस्से का लेखा-जोखा लेते हैं। नरेंद्र मोदी की सरकार ने अपने पहले कार्यकाल (2014-19) के बीच में खुद के प्रचार के लिए 5,726 करोड़ रुपया खर्च किए ( इंडिया टुडे , 8 सितंबर 2019, इंडो-एशियन न्यूज सर्विस)

इस दौरान हिंदी अखबारों में सबसे अधिक 100 करोड़ का विज्ञापन हिंदी दैनिक जागरण को दिया गया। दैनिक भास्कर को 56 करोड़ 42 लाख, हिंदुस्तान को 50 करोड़ 66 लाख, पंजाब केसरी को 50 करोड़ 66 लाख और अमर उजाला को 47 करोड़ 4 लाख दिया गया।

अंग्रेजी अखबारों में टाइम्स ऑफ इंडिया को सर्वाधिक 217 करोड़, हिंदुस्तान टाइम्स को 157 करोड़, डेक्केन क्रोनिकल को 40 करोड़ और हिंदू दैनिक को 33.6 करोड़ ( इसमें बिजनेस लाइन को प्राप्त विज्ञापन भी शामिल हैं) दिया गया। टेलीग्राफ को 20 करोड़ 8 लाख, ट्रिब्यून को 13 करोड़, डेक्कन हेराल्ड को 10 करोड़ 2 लाख, इकनामिक्स टाइम्स को 8.6 करोड़, इंडियन एक्सप्रेस को 26 लाख, फाइनेंशियल एक्सप्रेस को 27 लाख विज्ञापन के मद में दिया गया।

इस दौरान इंटरनेट पर दिए जाने वाले विज्ञापन में चार गुने की वृद्धि हुई और सरकार ने इंटरनेट पर विज्ञापन पर 26.95 करोड़ खर्च किया।

सोनिया गांधी ने विज्ञापनों के मद में मीडिया घरानों को दिए जाने वाली संपूर्ण राशि को बंद कर देने और उसका इस्तेमाल कोविड-19 संकट से निपटने के लिए खर्च करने का सुझाव दिया।

मीडिया के प्रमुख तीनों रूपों को सरकारी और सार्वजनिक क्षेत्र की कंपनियों द्वारा दो वर्षों के लिए विज्ञापन पर पूर्ण प्रतिबंध लगाने का सुझाव आते ही मीडिया की तरफ से तीखी प्रतिक्रिया आई और करीब सभी संस्थानों और इनकी संचालक-संरक्षक संस्थाओं ने इस सुझाव को खारिज करने के साथ ही उनके सुझाव की तीखी आलोचना की। कुछ अखबारों को इसमें आपात काल की बू आई और मीडिया ने सोनिया गांधी पर यह भी दवाब बनाया कि वह अपना सुझाव वापस ले लें।

निजी समाचार चैनलों एवं समाचार प्रसारकों की प्रतिनिधि संस्था न्यूज ब्रॉडकास्टर्स एसोसिएशन (एनबीए) ने सोनिया गांधी के सुझाव का प्रतिवाद करते हुए कहा कि ऐसे समय में जब पत्रकार बिना भय के कोविड-19 के रिपोर्टिंग कर रहे हैं, सोनिया गांधी का बयान उनका मनोबल गिराने वाला है। खुद मीडिया घरानों को पत्रकारों और उनके मनोबल की कितनी चिंता है, इस पर हम आगे विचार करेंगे। एनबीए के अध्यक्ष रजत शर्मा ने कहा कि यह गलत समय पर दिया गया सुझाव है और आधारहीन, अनुचित और मनमाना भी है। रजत शर्मा इंडिया टीवी के मालिक एवं मुख्य संपादक हैं और 2018 में दिल्ली क्रिकेट एसोसिएशन के अध्यक्ष भी चुने गए  थे। 2015 में मोदी सरकार ने उन्हें पदम भूषण सम्मान से भी नवाजा था। वह भाजपा के छात्र-संगठन एबीवीपी के नेता रहे हैं और भाजपा के घोषित समर्थक हैं।

प्रिंट मीडिया के मालिकों के संगठन इंडियन न्यूज़पेपर सोसाइटी (आईएनएस) ने   सोनिया गांधी के सुझाव पर अपनी प्रतिक्रिया में कहा कि यह प्रस्ताव अखबारों पर एक तरह का वित्तीय सेंसरशिप लगाने जैसा है। इंडियन ब्रॉडकास्टिंग फाउंडेशन (आईबीएफ) ने कहा कि यदि टीवी को सरकारी विज्ञापन मिलना रुक जाता है, तो इस व्यवसाय की ही मौत हो जाएगी। आईबीएफ भारत में टेलीविजन प्रसारण करने वाले टीवी चैनलों की एकीकृत प्रतिनिधि संस्था है और 250 से अधिक टीवी चैनल इससे जुड़े हुए हैं। इलेक्ट्रॉनिक मीडिया और प्रिंट मीडिया की इन प्रतिनिधि संस्थाओं ने एक स्वर से कहा कि कोविड-19 संकट के समय जब कार्पोरेट विज्ञापन मिलने बंद हो गए हैं या कम मिल रहे हैं, सरकारी विज्ञापन ही मीडिया के जिंदा रहने का सहारा हैं।

इंडियन न्यूजपेपर सोसायटी के अध्यक्ष शैलेश गुप्ता ने कहा कि जहां तक सरकार का सवाल है, वह जो विज्ञापन देती है, वह सरकारी खर्च का बहुत थोड़ा पैसा है, लेकिन अखबारों के लिए यह बहुत बड़ा पैसा है। अखबारों को सरकारी विज्ञापन देने के पक्ष में उन्होंने दो तर्क दिए। पहला सरकारी विज्ञापन पर चलने वाले अखबार जीवंत लोकतंत्र के लिए बहुत जरूरी हैं। अपनी बात के पक्ष में उन्होंने तर्क भी दिया कि चूंकि प्रिंट मीडिया में पत्रकारों के लिए वेज बोर्ड है और उनकी तनख्वाह सरकार द्वारा तय की जाती है इसलिए भी सरकारी विज्ञापन जरूरी हैं।

उनका यह भी तर्क था कि प्रिंट मीडिया में पत्रकारों की तनख्वाह बाजार के हिसाब से नहीं तय होती है। इसे सरकार तय करती है। ऐसी स्थिति में पत्रकारों के हितों की रक्षा के लिए सरकारी विज्ञापन जरूरी है। यहां इस तथ्य की ओर ध्यान देना जरूरी है कि शैलेश गुप्ता उस दैनिक जागरण के विज्ञापन एवं मार्केटिंग डिपार्टमेंट के मुखिया और पूर्ण कालिक निदेशक है, हिंदी अखबारों में जिसे सर्वाधिक विज्ञापन राशि मिली। दैनिक जागरण की भाजपा के प्रति खुली पक्षधरता शायद ही किसी से छिपी हो।

शैलेश गुप्ता ने सरकारी विज्ञापन के पक्ष में अखबारों पर पत्रकारों को वेतन देने के दबाव के संदर्भ में प्रिंट मीडिया में लागू वेज बोर्ड पर बहुत जोर दिया। पहले देखते हैं, वेज बोर्ड की सच्चाई क्या है? शायद ही किसी से यह तथ्य छिपा हो कि देश भर में ऐसे संस्थान अंगुली पर गिने जा सकते हैं जो वेज बोर्ड की सिफारिश मानते हों। खुद दैनिक जागरण में यह कितना लागू होता है, यह दैनिक जागरण में काम करने वाला कोई पत्रकार बता सकता है। गुप्ता जी के तर्क की सबसे बड़ी असंगति इस तथ्य में छिपी है कि सरकार सभी उद्योगों के श्रमिकों के लिए वेतन निर्धारित करती है। तो  सरकार सभी कर्मचारियों की तनख्वाहों के लिए सब्सिडी दे? या देती है? स्पष्ट है कि सरकार का काम नियम बनाना और देखना है कि उनका पालन किस तरह होता है।  फिर शैलेश गुप्ता वेज बोर्ड का हवाला देकर भारत सरकार से विज्ञापन के रूप में सब्सिडी क्यों मांग रहे हैं?

आईएनएस के अध्यक्ष अंतत: यह आग्रह करने से भी नहीं चूके कि ”जीवंत और स्वतंत्र प्रेस के हित में सोनिया गांधी को अपना यह प्रस्ताव वापस ले लेना चाहिए।

निजी क्षेत्र के रेडियो प्रसारकों की संस्था एसोसिएशन ऑफ रेडियो आपरेटर फॉर इंडिया ( एआरओआई) भी सोनिया गांधी के प्रस्ताव का विरोध करने में पीछे नहीं रही। उसका आग्रह था कि सोनिया गांधी को अपने प्रस्ताव पर पुन:विचार करना चाहिए और उसे वापस ले लेना चाहिए। इस संस्था से पूरे भारत में 380 निजी एफएम चैनल जुड़ हुए हैं। इस संस्था के महासचिव उदय चावला का कहना था कि हम कोविड-19 के खिलाफ राष्ट्रीय युद्ध का पूरे मनोयोग से समर्थन कर रहे हैं। हमारा सरकार से अनुरोध है कि वह जितना विज्ञापन हमें देती थी, वह जारी रखे।

9 अप्रैल के अपने संपादकीय में इंडियन एक्सप्रेस ने सोनिया गांधी द्वारा मीडिया को सरकारी विज्ञापन न देने के सुझाव पर एक  संपादकीय लिखा। संपादकीय में मीडिया के मामले में सोनिया गांधी को नासमझ और असंवेदनशील तक ठहराया गया। इसकी जड़ों को कांग्रेस पार्टी द्वारा आपातकाल लगाने की मानसिकता में तलाश किया गया। संपादकीय के अनुसार ”सोनिया गांधी की नासमझी और असंवेदनशीलता पर आश्चर्य करने की जरूरत नहीं है। कांग्रेस वह पार्टी है, जिसने स्वतंत्रता के मौलिक अधिकार को आपातकाल के दौरान निलंबित कर दिया था, अखबारों पर सेंसरशिप लगा दिया था और विपक्ष के नेताओं को जेलों में डाल दिया था।

अखबार ने लिखा कि कांग्रेस पार्टी का यह सुझाव लोकतांत्रिक संरचना के एक बुनियादी आधार स्तंभ ( मीडिया) को कमजोर करने वाला है। संपादकीय जनता तक सही समाचार पहुंचाने में प्रेस की भूमिका का डंका पीटने से नहीं चूका । कोविड-19 के समय अखबारों की भूमिका का भी संपादकीय यशोगान करने से नहीं चूका । अखबार के अनुसार सोनिया गांधी का यह सुझाव धक्का पहुंचाने वाला है। यह बात रेखांकित करने योग्य है कि संपादकीय ने भी सोनिया गांधी के सुझाव का विरोध करने के लिए सबसे पहले पत्रकारों की ही आड़ लेते हुए लिखा है कि कैसे कोविड-19 के दौर में पत्रकार अपनी जान एवं स्वास्थ्य जोखिम में डालकर पत्रकारिता कर रहे हैं।

विडंबना यह है कि यह वही अखबार है, जिसने कोविड-19 के संकट के काल में अपने अखबार के कर्मचारियों के वेतन में 10 से लेकर 30 प्रतिशत तक कटौती करने में देर नहीं की, जब कि अखबारों की विज्ञापन की आय में कमी को एक महीना भी नहीं हुआ था। दूसरा, किसी भी उद्यम के हानि-लाभ का लेखा-जोखा तो अंतत: साल भर बाद ही लगेगा। सत्य यह है कि कई बड़े-बड़े मीडिया संस्थानों ने लॉकडाउन का नाजायज फायदा उठाते हुए अपने कर्मचारियों की तनख्वाहों को कम ही नहीं किया बल्कि नौकरी से भी निकालने में देरी नहीं की। इस मानसिकता और तौर- तरीके को क्या कहा जाए?

इंडियन एक्सप्रेस के संपादकीय की आक्रामकता का अंदाज इससे लगाया जा सकता है कि उसने प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष तौर पर सोनिया गांधी को नासमझ एवं असंवेदनशील ठहरा दिया और उनकी मानसिकता को आपातकाल से जोड़कर, अप्रत्यक्ष तौर पर ही सही, उन्हें तानाशाही समर्थक सिद्ध करने की कोशिश की है। सिर्फ इस वजह से कि उन्होंने सरकारी विज्ञापन पर रोक की बात की। निजी क्षेत्र की वकालत करने वालों की सरकारी विज्ञापनों को लेकर इतनी बेचैनी अपने आप में कम मनोरंजक नहीं है।

यह बात रेखांकित करने योग्य है कि इलेक्ट्रॉनिक मीडिया, प्रिंट मीडिया और निजी एफएम चैनल सभी इस मामले में पूरी तरह एकजुट हैं कि हर हालत में सरकारी विज्ञापन उन्हें मिलने ही चाहिए। इतना ही नहीं इन संस्थाओं ने सरकार से विज्ञापन की दर में 50 प्रतिशत बढ़ोत्तरी सहित कर छूट और अन्य सुविधाओं की मांग की है।

सरकारी विज्ञापन जारी रखने के पक्ष में इलेक्ट्रॉनिक मीडिया, प्रिंट मीडिया, एफएम चैनल के मालिकों की संस्था और इंडियन एक्सप्रेस के सारे तर्कों को संक्षेप में इस तरह रखा जा सकता है।

सभी निम्न बातें कह रहे-

1-  पत्रकारों के हितों का सभी हवाला दे रहे हैं।

2- कोविड-19 से संघर्ष में पत्रकारों की भूमिका जोरदार तरीके से रेखांकित कर रहे हैं।

3- इसे प्रेस की स्वतंत्रता के खिलाफ बता रहे हैं और प्रेस को लोकतंत्र के संरक्षक के रूप में प्रस्तुत कर रहे हैं।

4-कमोबेश सभी सोनिया गांधी के सुझाव को आपातकाल या आपातकाल जैसा ठहरा रहे हैं।

अब देखते हैं पत्रकारों के प्रति मीडिया घरानों के व्यवहार को, जिनकी आड़ लेकर ये सोनिया गांधी को तानाशाही समर्थक और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के लिए खतरा सिद्ध करने से नहीं चूके हैं। यह किसी से छिपा नहीं है कि आज मीडिया में अधिकांश कर्मचारी ( पत्रकार-संपादक) स्थायी नौकरी पर नहीं रखे जाते हैं। कई संस्थान तो ऐसे हैं जो उन्हें नियुक्ति पत्र तक नहीं देते हैं। मजीठिया वेज बोर्ड शायद ही पूरी तरह किसी मीडिया हाउस में लागू होता हो। इस संदर्भ में अदालतों के आदेशों का भी निरंतर उल्लंघन मीडिया घराने करते आ रहे हैं।

इस संकटकालीन दौर में मीडिया हाउस अपने पत्रकारों-कर्मचारियों के साथ कैसा व्यवहार कर रहे हैं, यह रोंगटे खड़े करने वाला है। बड़े-बड़े संस्थानों ने अपने कर्मचारियों को जिस तरह से सड़क पर खड़ा कर दिया है वह चकित करने वाला है। यह किसी से छिपा नहीं है कि इस समय नौकरियां नहीं हैं। दूसरे शब्दों में इन पत्रकारों और कर्मचारियों को रोटी के लाले पडऩे वाले हैं। 15 अप्रैल की ऑन लाइन समाचार पोर्टल द वायर की रिपोर्ट के अनुसार मीडिया संस्थानों ने बड़ी संख्या में पत्रकारों को नौकरी से निकाला है और कुछ की तनख्वाहों में कटौती की गई है। अन्य कुछ संस्थानों में कटौती के नोटिस दे दिए गए हैं। नेशनल एलायंस फॉर जर्नलिस्ट ( एनएजी) और दिल्ली यूनियन ऑफ जर्नलिस्ट ( डीयूजे) के अनुसार मीडिया संस्थानों के मालिक कोविड-19 के चलते कर्मचारियों की संख्या में कटौती कर रहे हैं और कार्यरत लोगों के वेतन में भी मनमाने तरीके से कमी कर रहे हैं। पत्रकारों की प्रतिनिधि संस्थाओं का कहना है कि मीडिया संस्थान लॉकडाउन का इस्तेमाल लॉकआउट ( तालाबंदी) की तरह कर रहे हैं।

टाइम्स ऑफ इंडिया ने इसकी शुरुआत संडे मैगजीन के सभी कर्मचारियों को छुट्टी पर जाने के लिए कहकर की थी, जिसमें ऐसे भी कर्मचारी शामिल थे, जो पिछले 24 वर्षों से काम कर रहे थे।  जो इस लेख के लिखे जाने तक तनख्वाहों के काटे जाने का सिलसिला लगभग पूरे संस्थान में लागू होने के समाचार आने लगे थे। इंडियन एक्सप्रेस ने अपने कर्मचारियों ( पत्रकारों सहित अन्य) को एक सूचना जारी की है, जिसमें कहा गया है कि कोविड-19 के चलते विज्ञापन से होने वाली आय में कमी के कारण वेतन में 10 प्रतिशत से 30 प्रतिशत तक की कटौती की जा सकती है। बिजनेस स्टैंडर्ड ने भी वेतन कटौती का नोटिस दिया है।

क्विंट वेबसाइट ने अपने आधे कर्मचारियों को बिना वेतन दिए छुट्टी पर भेज दिया है और शेष को वेतन में कटौती के लिए मजबूर किया गया है। हिंदुस्तान टाइम्स में भी वेतन में कटौती की सूचना आ रही है। यह परिघटना इलेक्ट्रॉनिक चैनलों में भी दिखाई दे रही है। न्यूज नेशन नेटवर्क ने अपनी अंग्रेजी डिजिटल टीम के सभी 15 सदस्यों को बिना हटाने का नोटिस दिए या नोटिस का समय पूरा हुए, बाहर कर दिया है। इधर समाचार है कि कई छोटे मीडिया समूहों और वेब साइटों के अलावा एनडीटीवी ने भी अपने कर्मचारियों के वेतन में कटौती की घोषणा कर दी है।

माना ये आर्थिक संकट है और पूरी तरह से अप्रत्याशित है। चूंकि सभी उद्योग व्यवसाय ठप हैं इसलिए विज्ञापन कम या नहीं मिल रहे हैं। पर इस तर्क को यथावत नहीं लिया जा सकता। क्योंकि अखबारों और सूचना के व्यापार में ऐसे दौर आते रहते हैं जब उन्हें सामान्य से कई गुना ज्यादा आर्थिक लाभ होता है। उदाहरण के लिए चुनावों के दौरान। क्या तब वे अपने कर्मचारियों के साथ अतिरिक्त आय को बांटते हैं?

दूसरा, बड़े अखबारों ने पूरे समाचारपत्र व्यापार को इस तरह से नियंत्रित किया हुआ है कि उसने छोटे अखबारों के लिए जीना ही मुश्किल कर दिया है। यानी 20-30 पृष्ठों के अखबारों को साढ़े चार से पांच रुपये में बेच कर प्रसार संख्या बढ़ाना और इस तरह सारे विज्ञापनों को इस रणनीति से हासिल कर लेना। आज स्थिति यह है कि जहां हिंदुस्तान टाइम्स की दिल्ली में कीमत पांच रुपये है, वहीं टाइम्स आफ इंडिया के साढ़े चार और इंडियन एक्सप्रेस की छह रुपये है जबकि हिंदू की कीमत प्रतिदिन दस रुपये और रविवार को 15 रुपये रहती है।

सवाल है ये अखबार अपने संस्करणों को इतना सस्ता क्यों बेचते हैं? आखिर क्यों प्रेस आयोग के सुझाव पर अमल नहीं किया गया ? यानी प्राइस पेज शिड्यूल का। इन अखबारों को ‘द हिंदू’ की ही तरह   अपनी कीमत प्रिंट लागत के आस-पास तो रखनी ही चाहिए। जिससे इनको घाटा न हो और कर्मचारियों का वेतन काटने व उन्हें नौकरी से निकालने की नौबत न आए।  

मीडिया घराने मुनाफे में आई सिर्फ एक महीने की थोड़ी-सी कमी को मालिक और अन्य शेयरधारक द्वारा खुद वहन करने की जगह, इसका ठीकरा पत्रकारों व कर्मचारियों के सिर फोड़ रहे हैं। यहां यह दोहराना जरूरी है कि एक महीने की आय या व्यय से किसी भी संस्थान के घाटे या नुकसान का फैसला नहीं किया जा सकता। देखा जाना चाहिए कि इन संस्थानों को पिछले पांच वर्ष में लाभ की दर क्या रही है। इसके बाद ही यह तय हो सकता है कि यह नुकसान है भी या नहीं? यह किसी से छिपा नहीं है कि यह असामान्य स्थिति है और देर तक नहीं चल सकती।

उदाहरण स्वरूप वर्ष 2017 मार्च तक (नवीनतम सूचना ) टाइम्स ऑफ इंडिया समूह को संचालित करने वाली कंपनी बेनेट कोलमैन कंपनी का शुद्ध लाभ 827 करोड़ रुपये रहा था और इसकी कुल कमाई 1,127 करोड़ की थी। यह तब था जब कि उस वर्ष इसके लाभ में 26.61 प्रतिशत की गिरावट हुई थी। यह इस कंपनी के बारे में उपलब्ध आखिरी जानकारी है। इसी तरह इंडियन एक्सप्रेस के बारे में कुछ भी रिकार्ड पर नहीं है पर अनुमान है कि इसकी वार्षिक कुल कमाई 100 करोड़ के आसपास है। माना कि, जैसा कि हिंदुस्तान टाइम्स की ओर से कहा गया है कि उन्हें एक दिन में ढाई करोड़ का घाटा हो रहा है और यदि यह सही है तो भी यह घाटा एक महीने में सिर्फ 90 करोड़ का बैठता है। ऐसी स्थिति में भी स्पष्ट है कि सभी बड़े संस्थान इस घाटे को उठा सकते हैं। 

इस संदर्भ में पत्रकारों के प्रतिनिधि संगठनों के प्रतिनिधियों का कहना है कि ”यह घोर अपराध है। सबसे धनी मीडिया संस्थान, टाइम्स ऑफ इंडिया समूह पूरी तरह आय में कमी को सहन करने की स्थिति में है, इसलिए जिसे अपने कर्मचारियों को किसी भी हालत में नौकरी से नहीं निकालना चाहिए, वह भी उन्हें बाहर का रास्ता दिखा रहा है। यह कंपनी जितना मुनाफा कमाती है, उसका बहुत थोड़ा सा हिस्सा कर्मचारियों के वेतन पर खर्च करती है। यह ऐसे लोगों को नौकरी से निकाल रही है, जो पिछले दो दशकों से उसकी सेवा कर रहे हैं और कंपनी के विकास एवं संपदा निर्माण में जिनकी अहम भूमिका है।

ऐसे दौर में जब समाचारपत्र उद्योग में मजदूर और पत्रकार संगठनों को पूरी तरह से प्रभावहीन कर दिया गया है, मीडिया घराने हर आपदा का इस्तेमाल अपने लाभ को बढ़ाने के लिए सुनियोजित तरीके से कर रहे हैं। नोटबंदी की तरह ही कोविड-19 संकट का भी इस्तेमाल कर्मचारियों-पत्रकारों को बाहर का रास्ता दिखाने के लिए जमकर किया जा रहा है। जबकि होना यह चाहिए था कि मीडिया जैसे हाई प्रोफाइल्ड और बौद्धिक व्यवसाय में मालिक अपने कर्मचारियों का अंत समय तक साथ देते।

देखा जाए तो सोनिया गांधी के सुझाव में एक और बात निहित है। वह है विज्ञापनों का मीडिया को नियंत्रित करने के लिए इस्तेमाल होना। यह दोतरफा है। उदाहरण के लिए हिंदी के सबसे बड़े अखबारों में से एक दैनिक जागरण के मालिक एक अर्से से भारतीय जनता पार्टी से जुड़े रहे हैं और यह कोई छिप के नहीं होता रहा है। अगर उनके हिंदी अखबार को भाजपा सरकार के दौरान सबसे ज्यादा विज्ञापन मिल रहे हैं तो स्वाभाविक है कि इसे उनके राजनीतिक संबंधों से जोड़ा जाएगा। वह संपादक भी रहे हैं और सांसद भी। वैसे यह बात कांग्रेस पर भी लागू होती है। कांग्रेस से जुड़े लोकमत समूह के मालिक दर्दा परिवार के दो सदस्य सांसद और महाराष्ट्र विधानसभा के सदस्य तथा मंत्री भी रहे हैं।

इसी तरह हिंदुस्तान टाइम्स समूह के मालिक पहले स्व. केके बिड़ला और फिर उनकी पुत्री शोभना भरतिया कांग्रेस की प्रतिनिधि के तौर पर राज्यसभा में लगातार वर्षों तक रहे हैं। इधर शोभना भरतिया सांसद नहीं हैं। अफवाहें रहती हैं कि वह अब भाजपा के समर्थन पर राज्यसभा में जाना चाहती हैं।  स्थितियों के बदलने के साथ जो हो रहा है उस अवसरवादिता का सबसे अच्छा उदाहरण हिंदुस्तान टाइम्स ही है। जाने माने उदारवादी इतिहासकार और लेखक रामचंद्र गुहा का एक स्तंभ ‘पास्ट एंड प्रेजेंट’ (विगत और वर्तमान) हर रविवार को पिछले छह वर्षों से हिंदुस्तान टाइम्स में प्रकाशित होता था। पर 19 अप्रैल को यह हिंदुस्तान टाइम्स की जगह अंग्रेजी समाचार पोर्टल ‘द वायर’ में प्रकाशित हुआ।

गुहा ने अपने लेख ‘फॉली एंड वैनिटी ऑफ द प्रोजेक्ट टु रिडिजाइन दिल्ली’ से पहले लगाई टिप्पणी में स्पष्ट कर दिया है कि संपादक चाहते थे कि मैं किसी और विषय पर लिखूं। यह लेख मूलत: समाचार पोर्टल न्यूज़लॉन्ड्री में मार्च में दो किस्तों में प्रकाशित अल्पना किशोर के लेख से प्रेरित था। अल्पना किशोर ने 16 मार्च को प्रकाशित अपने लेखक में नरेंद्र मोदी सरकार की सेंट्रल विस्टा यानी केंद्रीय सचिवालय और राष्ट्रपति भवन के सामने के क्षेत्र, को मूलत: इसलिए पुन: विकसित करने की आलोचना की थी, क्योंकि इसके मूल में नरेंद्र मोदी की मंशा एक भव्य प्रधानमंत्री आवास के निर्माण की है। गुहा का तर्क यह है कि जब किशोर ने यह लिखा था, तब उसने सिर्फ दिल्ली के प्रदूषण और उससे बढ़ती बीमारियों को इसके विरोध का आधार बनाया था।

पर आज जब कि कोविड -19 जैसा संकट हमारे सामने है और अर्थव्यवस्था तहस-नहस हो चुकी है, यह ”गलती और दिखावे की परियोजना”  है।  सरकार की वित्तीय स्थिति किस हद तक बिगड़ चुकी है, इसका सबसे अच्छा उदाहरण यह है कि सरकार प्रधानमंत्री सहायता कोष (पीएम-केयर्स) के लिए लगभग बलात अपने कर्मचारियों के वेतन से अगले एक वर्ष तक हर महीने एक दिन का वेतन काटने जा रही है, गो कि इसे कहा स्वैच्छिक जा रहा है। (देखें: द हिंदू, 20 अप्रैल 20) और केंद्रीय कर्मचारियों एवं पेंशन धारकों के डीए पर जून 2021 तक लिए रोक लगा दी गई है।

असल में उपरोक्त प्रसंग इस बात का प्रमाण है कि अखबारों के मालिक लाभ कमाने के लिए किस तरह से सत्ताधारियों को प्रसन्न करने में लगे रहते हैं। अखबारों में विशेष परिशिष्ट निकालना, अधिक विज्ञापन बटोरना इसी का हिस्सा है। इसका ज्यादा भयावह पक्ष यह है कि इस तरह से सत्ताधारी ऐसे अखबारों और चैनलों को विज्ञापन न देकर दंडित करते हैं जो उन से सहमत नहीं हैं और उनकी आलोचना करते हैं। इसमें राज्य सभा में जाना भी एक लाभ है। यह इस मामले में सुविधाजनक है कि सदस्य की हैसियत मिलते ही उनकी पहुंच मंत्रियों और सांसदों से सीधे हो जाती है। इस प्रसंग में दैनिक जागरण जो सदा से भाजपा के साथ रहा है वह सबसे अच्छा उदाहरण है।       

सारे तथ्य इस बात को प्रमाणित करते हैं कि मीडिया घराने सरकारी विज्ञापनों को अपना अधिकार मान कर चलते हैं, जबकि ऐसा होना नहीं चाहिए। सच यह है कि ये विज्ञापन नैतिक और वित्तीय भ्रष्टाचार का बड़ा माध्यम हैं। सरकारी विज्ञापन कितने हों और किस तरह के हों इनका मानक होना ही चाहिए।

मीडिया का यह कहना कि वह सरकारी विज्ञापनों के माध्यम से लोकतंत्र में अपनी भूमिका निभा रहा है, नैतिक तौर पर तो है ही, व्यावहारिक रूप से भी गलत है। अखबार निकालना अपने आप में व्यवसाय हो सकता है, पर इसका कथित ‘नैतिक दायित्व’ यह कत्तई नहीं कहता कि चूंकि वह सामाजिक विपदा के समाचार छाप रहा है, इसलिए उसे सरकारी विज्ञापन मिलने ही चाहिए। यह लोकतांत्रिक अनैतिकता का चरम रूप है। असल में यह उसका दायित्व है समाचारों को वस्तुनिष्ठ तरीके से रखे। ठीक उसी तरह का का दायित्व है जैसा चिकित्सक का ।

विज्ञापन बंद किए जाने के सोनिया गांधी के सुझाव का विरोध करने के लिए भले ही ये संस्थान पत्रकारों की आड़ ले रहे हैं, लेकिन सच यह है कि कोविड-19 को इस संकट के समय भी इन घरानों का पत्रकारों के प्रति व्यवहार उतना ही क्रूर एवं निर्मम है, जैसा कि अतीत में रहा है। पत्रकार इनके लिए मुनाफा कमाने और मीडिया हाउस के मालिकों के लिए सरकारों से सौदाबाजी करने के उपकरण मात्र हैं। पत्रकारों के वास्तविक हितों से इनका कोई लेना-देना नहीं है।

कोविड-19 के कठिन दौर में पत्रकारों द्वारा जान-जोखिम में डालकर की जा रही पत्रकारिता की बात भी मीडिया घरानों की प्रतिनिधि संस्थाओं ने की है और कहा है कि ऐसे दौर में विज्ञापन पर प्रतिबंध लगाने के सुझाव का क्या औचित्य है। इस मामले के दो आयाम है। पहला यह  कि यह सच है कि पत्रकार इस दौर में जोखिम उठाकर पत्रकारिता कर रहे हैं, लेकिन प्रश्न यह है कि ऐसे पत्रकारों के साथ मीडिया हाउस क्या व्यवहार कर रहे हैं, यही ना कि उन्हें बाहर का रास्ता दिखा रहे हैं या उनके वेतन में कटौती कर रहे हैं। सारे तथ्य साफ बता रहे हैं कि मालिकों को अपने मुनाफे से मतलब है, पत्रकारों से नहीं।

दूसरी बात यह कोविड-19 के दौर में बहुलांश मीडिया हाउस सकारात्मक पत्रकारिता के सरकार के निर्देशों का पालन करते हुए केंद्र सरकार की चौतरफा असफलता और कुप्रबंधन को ढकने-छिपाने की कोशिश कर रहे हैं और वास्तविक सच्चाई को उजागर करने के अपने कार्य से मुंह मोड़े हुए हैं। मीडिया का एक बड़ा हिस्सा तो इसकी जगह संघ-भाजपा की रणनीति-कार्यनीति पर कार्य करते हुए कोरोना का भी इस्तेमाल हिंदू-मुस्लिम ध्रुवीकरण करने और मुसलमानों के खिलाफ नफरत फैलाने के लिए कर रहा है या गैर-भाजपा सरकारों का बदनाम करने की मुहिम चला रहा है।

सरकारी विज्ञापन के पक्ष में मीडिया ने जनहित का भी हवाला दिया। यदि जनहित का इतना ही खयाल है, तब तो सोनिया गांधी के सुझाव का जरूर समर्थन करना चाहिए था। उन्होंने जनहित में मीडिया को दिए जाने वाले विज्ञापन पर रोक लगाने और उस पैसे का इस्तेमाल जनता के लिए करने की बात की और वह भी तब तक जब तक कि संकट है।

अब जरा जीवन्त एवं स्वतंत्र प्रेस और सरकारी विज्ञापन के रिश्ते पर विचार करते हैं। कमोबेश मीडिया घरानों के सभी प्रतिनिधि संस्थाओं ने स्वतंत्र प्रेस के लिए सरकारी विज्ञापन की जरूरत की जोर-शोर से पैरवी की। प्रेस की स्वतंत्रता को सबसे अधिक खतरा किससे होता है? आधुनिक प्रेस का इतिहास इस बात का साक्षी है कि प्रेस की स्वतंत्रता को सबसे अधिक खतरा सत्ताओं और उनको संचालित करने वाली सरकारों से होता है।

यह खतरा कई रूपों में होता है। लेकिन सबसे मुख्य रूप आर्थिक लाभ पहुंचाना है। प्रेस का मुंह बंद करने और उनके सत्ता का अप्रत्यक्ष एवं प्रत्यक्ष तौर पर समर्थक बनाने के लिए सरकारें उन्हें विभिन्न रूपों में लाभ पहुंचाने की कोशिश करती हैं। इस लाभ का सबसे मुख्य रूप आर्थिक लाभ होता है। इसका सबसे वैध दिखने वाला तरीका मीडिया को दिए जाने वाला सरकारी विज्ञापन है। आधुनिक लोकतांत्रिक समाज में जनमत का समर्थन किसी न किसी रूप में सरकारों के संचालन की अनिवार्य शर्त होती है और मीडिया जनमत निर्माण में अहम भूमिका निभाती है।

हर सरकार की कोशिश होती है कि वह मीडिया को अपने एक उपकरण के रूप में इस्तेमाल करे। मीडिया का खुलकर चुनावी जीत-हार तय करने के लिए भी इस्तेमाल होता है। इसका सबसे भद्दा रूप 2014 और 2019 के आम चुनावों में दिखाई दिया। पेड न्यूज, मीडिया घरानों को सौदेबाजी से मिलने वाले लाभ और कुछ पत्रकारों-संपादकों को राज्यसभा की सदस्यता आदि की बात छोड़ भी दी जाए और सिर्फ सरकारी विज्ञापन पर विचार किया जाए तो साफ दिखता है कि मीडिया को सत्ता का चाटुकार बनाने का सबसे वैध रूप विज्ञापन है। इस विज्ञापन और अन्य लाभों ने मीडिया को किस तरह सत्ता-सरकार का सिर्फ उपकरण बना कर रख दिया है, उसे हम आज के भारत में तथाकथित मुख्य धारा की मीडिया के चरित्र से समझ सकते हैं। कैसे केंद्र और राज्य सरकारें बड़े विज्ञापन देकर अपनी झूठी उपलब्धियों का गुणगान करती हैं और इसके बदलने में मीडिया की चुप्पी साफ-साफ दिखाई देती है।

मैं यहां एक अपना व्यक्तिगत अनुभव साझा करना चाहूंगा, मैंने रेलवे के भ्रष्टाचार के संदर्भ में कुछ तथ्य एक अखबार के स्थानीय संपादक मित्र को उपलब्ध कराया और उसे प्रकाशित करने का अनुरोध किया। उन्होंने बहुत विनम्रता पूर्वक लेकिन दृढ़ता से कहा कि हम रेलवे के खिलाफ खबर नहीं प्रकाशित कर सकते, वहां से हमें बहुत अधिक विज्ञापन मिलता है। उन्होंने यह भी बताया है कि अखबारों में कैसी खबरें जाएंगी यह केवल संपादक तय नहीं करते हैं, इसे तय करने में अखबार के विज्ञापन विभाग एवं मार्केटिंग विभाग की निर्णायक भूमिका होती है। सच तो यह है कि मीडिया हाउस के विज्ञापन विभाग एवं मार्केटिंग विभाग बाकायदा यह गाइडलाइन जारी करते हैं कि किनके और किसके खिलाफ कोई खबर प्रकाशित नहीं होनी चाहिए। संपादकों की तुलना में विज्ञापन और मार्केटिंग विभाग के सीईओ मीडिया में ज्यादा ताकतवर हो चुके हैं।

दुनिया भर की पत्रकारिता का इतिहास इस बात का साक्षी है कि वास्तव में जन पक्षधर एवं सत्ता-सरकार विरोधी पत्रकारिता उन्हीं मीडिया संस्थानों एवं व्यक्तियों ने ठीक तरीके से की है, जिन्होंने सत्ता से लाभ लेने की कोई कोशिश नहीं की, बल्कि सचेत तौर पर खुद को इस लाभ से दूर रखा। इसमें विज्ञापन भी शामिल है। आज भी वही संस्थान सचमुच की जन पक्षधर पत्रकारिता कर पा रहे हैं, जो खुद को सरकारी विज्ञापनों से दूर रखते हैं।

जब यह जगजाहिर तथ्य है कि सरकारी विज्ञापन मीडिया की स्वतंत्रता को सीमित या खत्म करते हैं। यदि मीडिया संस्थानों के हितों की संरक्षक संस्थाएं वास्तव में स्वतंत्र एवं जीवन्त मीडिया के पक्ष में है, तो उन्हें आगे बढ़कर सोनिया गांधी के सुझाव का समर्थन करना चाहिए था, न कि उसका विरोध।

असल बात यह  है कि चाहे जितना भी छिपाने की कोशिश की जाए, यह जगजाहिर तथ्य है कि मीडिया का मुख्य धंधा लोकतंत्र के तथाकथित चौथे स्तंभ के रूप में लोकतंत्र की रक्षा करना नहीं रहा गया है, जिसके लिए स्वतंत्र मीडिया जरूरी है। इसकी जगह पर मीडिया आज मुनाफा कमाने और मीडिया घरानों के मालिकों के लिए सरकार से सौदेबाजी करने के साधन-मात्र हैं, भले ही वे लोकतंत्र के प्रहरी होने का आभास देने की कोशिश करते हों।

स्वतंत्र मीडिया के लिए जरूरी है कि उसका संचालन सरकारी विज्ञापन और पूंजीपतियों की पूंजी से न होता हो। उसके संचालन के लिए आर्थिक संसाधन जनता से जुटाया जाए, चाहे शुल्क के रूप में या आर्थिक सहयोग के रूप में।

(डॉ. सिद्धार्थ जनचौक के सलाहकार संपादक हैं।)

This post was last modified on May 13, 2020 4:16 pm

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