‘मोदीचूर’ के इतने लड्डू बनते कैसे हैं?

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एक बार फिर से मोदी की अगुआई में भाजपा ने कांग्रेस की बची-खुची ताकत को समाप्त कर दिया और संघीय राजनीति का एक नया अध्याय लिखना शुरू कर दिया। मोदी के नेतृत्व में पिछले आठ साल से भाजपा आशा का प्रतीक बनी हुई है; हारी हुई, वंशवाद में फँसी, फफूंद लगी परम्पराओं में जकड़ी कांग्रेस से देश को मुक्ति दिलाने वाली उद्धारक बनी हुई है। टूटे हुए, क्लांत विपक्ष को आईना दिखा रही है। विधान सभा चुनावों में भाजपा ने स्थानीय मुद्दों पर बातें तो कीं, पर साथ ही अपने राष्ट्रीय एजेंडा को एक बार भी नहीं भूली।

कुल मिला कर ये फिर से मोदी के चुनाव थे; एक ओर मोदी और दूसरी तरफ देश के नए-पुराने राजनीतिक समीकरण के साथ थका-मांदा, भ्रमित और घबराया हुआ विपक्ष। मोदी (और उत्तर प्रदेश में योगी-मोदी की जोड़ी) ने एक बार फिर साबित किया कि वह न सिर्फ दूसरी पार्टी के नेताओं से, बल्कि खुद अपनी पार्टी के नेताओं से, और अपनी पार्टी से भी ज्यादा मजबूत हो गए हैं। देश की सियासी किताब नए सिरे से लिखी जा रही है। यह कहानी किस मोड़ पर जाकर रुकेगी, लोगों को पसंद आएगी या नहीं, इन सवालों का जवाब अभी देना मुश्किल है। पर हकीकत है कि मोदी की महत्वाकांक्षा, उनकी आक्रामकता के सामने विपक्ष के कई ‘युवा, ऊर्जावान’ नेता भी फीके पड़े जा रहे हैं।

विपक्ष का कमज़ोर होना, उसका गायब हो जाना लोकतंत्र के सिद्धांत के लिए खतरनाक है, पर यदि ऐसा हो रहा है तो उसके कारण समझने और ख़त्म करने की ज़िम्मेदारी भी विपक्ष की ही है। विजेता की जीत में पराजितों की कमजोरी का बड़ा योगदान होता है। यह भूलना नहीं चाहिए।  

क्या दर्शाते हैं उत्तर प्रदेश, गोवा, मणिपुर और उत्तराखंड के चुनाव? पहला और सबसे स्पष्ट निष्कर्ष तो यह है कि मोदी लहर का चमत्कार, जनता के साथ उसका हनीमून अभी भी जारी है। ये चुनाव यह भी बता रहे हैं कि कांग्रेस विरोधी लहर भी उतनी ही मजबूत है, जितनी मोदी समर्थक लहर। अधिक से अधिक कांग्रेस पार्टी अब प्रियंका गांधी पर लटकने की कोशिश कर सकती है, पर अपने परंपरागत संदूक से बाहर निकलना और नए सिरे से सोचना उसके लिए मुमकिन नहीं लगता।

भाजपा ने मोदी के इर्द-गिर्द एक जादुई माहौल तैयार किया है, और वोटर्स प्रोफाइल को समझने में उसके मार्केटिंग उस्ताद पूरी तरह लगे हुए हैं। जहाँ स्थानीय मुद्दे उठाये जाने हैं, वहां स्थानीय मुद्दे उठाये गए हैं, और जहाँ सपने दिखाए जाने हैं, वहां सपने दिखाये गए हैं। मंदिर भी देना है, गैस का चूल्हा भी; राम भी देना है, राशन भी। सब कुछ सुनियोजित है। एक सोची-समझी नीति का परिणाम। 

भाजपा क्षेत्रीय दलों के लिए एक गंभीर चुनौती बन चुकी है। विश्लेषक यह भी कहते हैं कि मोदी की मार्केंटिंग स्किल्स काम आ गयीं, पार्टी ने बहुत पैसा लगाया वगैरह वगैरह। किसी पार्टी ने अपने बुरे, असंतोषजनक काम के बारे में ज़िक्र नहीं किया। इसका मतलब अभी मोदी की जीत की ओर ध्यान ज़्यादा, अपनी हार की ओर कम दिया जा रहा है। आत्मविश्लेषण का तरीका यह नहीं। विपक्ष मोदी को कम करिश्माई नहीं बना सकता, उनकी मार्केटिंग स्किल्स नहीं छीन सकता, न ही उन्हें कम उग्र और कम कुशल बना सकता है। उसे जो भी काम करना है, खुद पर ही करना होगा। सिर्फ एकजुट होकर ही अब विपक्ष मोदी के तूफ़ान का सामना कर सकता है। मोदी के खिलाफ मुस्लिम विरोधी होने के जो सबसे बड़े आरोप हैं, वे उन्हें धीरे धीरे ही बोथरा बना दे रहे हैं। समाज के सभी तबकों को साथ लेकर जिस तरह उनका रथ बढ़ा जा रहा है, उसे रोकने के लिए विपक्ष को बड़ा ही मजबूत गठबन्धन, एक बहुत ही विश्वसनीय नेतृत्व चाहिए होगा।

यह कैसे संभव होगा? विपक्ष के पास न ही कोई मजबूत आख्यान है और न ही संगठन। डिजिटल प्रचार में वह भाजपा से बहुत पीछे है। ले देकर उनके पास ईवीएम घपले और लोकतंत्र की हत्या का राग है जो अब लोगों पर असर नहीं डालता और उन्हें हास्यास्पद भी बना दे रहा है| ख़ास कर इसलिए क्योंकि यह चयनात्मक है, क्योंकि यह राग विपक्ष की जीत के समय नहीं अलापा जात। विपक्ष की सोशल इंजीनियरिंग काम नहीं आ रही। इस बार उत्तर प्रदेश में भाजपा ने गैर यादव ओबीसी वोट में भी सेंध लगाई है। यादव वोट भी पूरी तरह सपा के हिस्से में नहीं आये। महिलाओं के वोट, खास कर मुस्लिम महिलाओं के वोट, बड़ी संख्या में भाजपा के खाते में गिरे हैं। इस नए समीकरण के साथ भाजपा अब पहले से अधिक अविजेय हो गई प्रतीत हो रही है।

कुछ विश्लेषक कह रहे हैं कि उग्र राष्ट्रवाद, हिंदुत्व और कल्याणकारी योजनाओं के पैकेज ने भाजपा को जीत दिलाई। जब उत्तर प्रदेश में प्रियंका गांधी मंच से हर हर महादेव का नारा लगाती देखी गईं, तो एक बड़ा ही हास्यास्पद दृश्य उपस्थित हुआ। अचानक आप एक मत निरपेक्ष दर्शन से हिन्दुत्ववादी नारे लगाने वाली नेता कैसे बन गईं? अपने शत्रु की नक़ल करता हुआ प्रतिद्वंद्वी बहुत ही बेचारा दिखता है, क्योंकि वह भ्रमित होता है। न ही अपनी विचारधारा के प्रति आश्वस्त और न ही नक़ल में उस्ताद। ऐसा ही कुछ कांग्रेस के साथ हो रहा है। अन्य विपक्षी दलों के साथ भी। भाजपा जिस राजनीति में माहिर है, वह नक़ल के द्वारा हासिल नहीं की जा सकती। राजनीति या यह ब्रांड उनके रक्त में प्रवाहित हो रहा है, और इसे कुछ वर्षों में सीखा नहीं जा सकता।

विधान सभा के ये चुनाव विपक्ष के लिए फिर से खतरे की घंटी बजा रहे हैं। कांग्रेस अपनी ही राख में दफ़न हुई जा रही है। राख से उठकर पुनर्जीवित होने और फिर से अपने डैने फैलाने के लिए उसे जिस तरह की ऊर्जा चाहिए, उसके कोई भी संकेत उसमें नहीं दिखाई देते। उनका आत्मनिरीक्षण अधूरा और बेईमानी से भरा होता है। अब पार्टी के पास नेतृत्व परिवर्तन या पार्टी को तोड़ कर उसके एक से अधिक हिस्से करने के अलावा कोई रास्ता नहीं। पर वंशवाद के पंजे उसकी रूह में इतनी गहराई तक धंसे हुए हैं, कि उससे निजात पाने की क्षमता उसमें बची ही नहीं। रामचन्द्र गुहा ने हाल ही में एक इंटरव्यू में कहा कि प्रियंका, राहुल और सोनिया, तीनों को ही न सिर्फ कांग्रेस पार्टी से, बल्कि राजनीति से ही दूर हो जाना चाहिए।

पंजाब में आम आदमी पार्टी की जीत से अरविन्द केजरीवाल ने एक उम्मीद जगाई है। ममता बनर्जी से भी अधिक, क्योंकि अरविन्द केजरीवाल हिंदी पट्टी से हैं, और भारत की राजनीति में हिंदी पट्टी की भूमिका के बारे में कुछ भी लिखने की जरुरत नहीं। पर विपक्ष के आपसी मनोमालिन्य को देखते हुए, उनकी व्यक्तिगत महत्वाकांक्षाओं को देखते हुए, यह काम मुश्किल लगता है| क्या अगले लोकसभा चुनावों से पहले भारतीय विपक्ष अरविन्द केजरीवाल के इर्द गिर्द सिमटने की कोशिश करेगा? कांग्रेस के निरंतर पतन ने एक बड़ा शून्य पैदा किया है, और केजरीवाल शायद उसे भरने की कोशिश कर रहे हैं| पर पिछले कई वर्षों से जिस तरह भाजपा की नीतियों ने भारतीय चेतना पर असर डाला है, उसे पहले मिटाना और फिर खुद को स्थापित करना, एक टूटे हुए विपक्ष के लिए आसान काम नहीं होगा। लोगों के मन में सवाल फिर भी उठ रहे हैं। क्या केजरीवाल देश की अगली कांग्रेस पार्टी बनेंगे? क्या उनका गवर्नेंस मॉडल लोगों को स्पर्श कर रहा है? क्या वह वोट में परिवर्तित हो रहा है? अभी इन सवालों का जवाब भविष्य के गर्भ में छिपा है।

यह नहीं भूलना चाहिये कि मोदी-शाह के नेतृत्व वाली भाजपा वाजपेयी-आडवाणी के नेतृत्व वाली भाजपा से अलग है। यह अधिक उग्र है, यह अपनी हिंदुत्ववादी और राष्ट्रवाद की बातों के अलावा आम आदमी की जरूरतों के साथ भी जुड़ी हुई है, आम आदमी के कल्याण के लिए काम भी करती है, महिलाओं या साइलेंट वोटर्स के साथ भी जुड़ कर उनके वोट हासिल कर लेती है। इनकी बहुआयामी नीतियां कामयाब हुई हैं, और लगातार होती जा रही हैं। विपक्ष और आम जनता के बीच की खाई को पाटने की इच्छा शक्ति और क्षमता क्या कांग्रेस, केजरीवाल, ममता बनर्जी सहित बाकी विपक्ष में है, यह उसके सामने सबसे बड़ा सवाल है आज की तारीख में।  

(चैतन्य नागर लेखक हैं।)       

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