‘मिथ और रियलटी’ की लड़ाई में ‘फेक और फेवरेबल’ का मुकाबला सत्ता के भ्रमास्त्र से है

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अब चुनाव की घोषणा हो चुकी है। आदर्श आचार संहिता लागू हो गई है। 2024 का आम चुनाव कई मामलों में ऐतिहासिक होगा। जितनी मुस्तैदी और दृढ़ता से चुनाव आयोग ने प्रेस वार्ता में आदर्श आचार संहिता की बात दुहराई है उस से, भरोसा तो होता है। मुख्य चुनाव आयुक्त, राजीव कुमार ‎की बात से यह साफ-साफ झलक रहा था कि वे सार्वजनिक व्यवस्था (Public Order) को बाधित करने या होने की स्थिति को बरदाश्त नहीं करेंगे। सार्वजनिक व्यवस्था को ग्रहण लगानेवालों के साथ वे कोई मुरव्वत ‎नहीं करना ही ठीक है।

स्वतंत्र निष्पक्ष, भय एवं दबाव से मुक्त वातावरण में चुनाव संपन्न करवाने के लिए सात चरणों में चुनाव करवाने की व्यवस्था की गई है। कई राज्यों में तो सभी सात चरणों में उसकी कुछ-कुछ संसदीय क्षेत्रों में चुनाव करवाये जायेंगे। इन चरणबद्धताओं में कोई चारण वृत्ति नहीं है। हां, किसी को थोड़ा लाभ, थोड़ा नुकसान का अनुमान लगा रहे हैं, कुछ लोग। किसी भी फैसले का किसी को लाभ, किसी को नुकसान तो हो ही सकता है। जो हो, यह है तो अनुमान ही। अनुमान कभी वास्तव नहीं होता, वस्तुगत चाहे जितना भी हो। अनुमान ज्ञान की पूर्व स्थिति होने के कारण महत्वपूर्ण होते हैं। इतना अनुमान करने या लगाने की छूट केंद्रीय चुनाव आयोग दे सकता है।

‎कहने वाले कहते रहें, वन नेशन, वन इलेक्शन! ‎यह बात तो अपनी जगह है। यहां तो ‘वन स्टेट, वन फेज’ चुनाव ही संभव नहीं है; चहिअ अमिअ जग जुरइ न छाछी! कहने की जरूरत नहीं है कि चुनाव आयोग ने चुनाव कार्यक्रम की जो भी रूप-रेखा बनाई है, वह स्वतंत्र निष्पक्ष भय एवं दबाव से मुक्त वातावरण में चुनाव संपन्न करवाने की दृष्टि से ही बनाई है।

चुनाव में संघर्ष का समान अवसर (Level Playing Field)‎ सभी राजनीतिक दलों को मिले इस के लिए अधिकार-संपन्न निर्वाचन अधिकारी और चुनाव आयोग सजग और सतर्क है और उम्मीद है रहेगा। चुनाव संघर्ष होता क्या है? सैद्धांतिक तौर पर कहें तो विचारधारा, कार्यक्रम और रणनीति का जनसाधारण तक प्रसार, पहुंच और प्रवेश का रास्ता बनाना। जनसाधारण के मन-मस्तिष्क में अपने मंतव्यों के लिए अभेद्य जगह बनाना।

आज-कल की राजनीति, खासकर चुनावी राजनीति में विचारधारा, कार्यक्रम और रणनीति एक में सिमटकर ‘तिकड़म’ हो गया है। अब ‘तिकड़म’ ही ‘पराक्रम’ है। तिकड़म को समझना जरूरी है। तिकड़म क्या होता है? विभिन्न संघर्षशील पक्षों में से किसी पक्ष का पलड़े को अपनी ओर झुकाने के लिए अप्रत्यक्ष ढंग से, संघर्ष से बाहर के किसे ‘अन्य’ को अपने पक्षपोषण के लिए घुसपैठिया बनाकर ‎संघर्ष में शामिल कर, पलड़े को अपनी ओर झुका लेने का इंतजाम कर लेने को तिकड़म कहा जा सकता है। नागरिक दृष्टि से तो प्रत्यक्ष और सैद्धांतिक पक्ष पर ही बात की जा सकती है। अप्रत्यक्ष को राजनीति में सक्रिय लोगों के लिए छोड़ देना ही उचित है।

भारत के किसी भी चुनाव खासकर, आम चुनाव में विचारधारा की आवाज, चुनाव के मुद्दे, वायदों की फेहरिस्त, गाली-गलौज और जनविद्वेषी बयानबाजी (Hate Speech) से बचने की कोशिश का दिखावा करते हुए आक्रामक आरोप-प्रत्यारोप लगना-लगाना आम बात है। यही तो है चुनाव संघर्ष! क्या, इसी चुनाव संघर्ष में समान अवसर (Level Playing Field)‎ की बात की जाती है? संघर्ष के समान अवसर के संदर्भ में दो प्रमुख कारक हैं-एक संवैधानिक और प्रशासनिक संस्थाओं की ‘कार्रवाइयां’ दूसरे छापा मीडिया और तरंगी मीडिया के ‘क्रिया-कलाप’।

पिछले कई सालों में, संवैधानिक और प्रशासनिक संस्थाओं की भूमिका और रुझान ने संदिग्धता के अद्भुत रेकार्ड बनाये हैं, इस में किसी-किसी को ही शक हो सकता है। लोकतंत्र की व्यथा कथा के दिल दहलाने वाले प्रसंगों की कोई कमी नहीं है। भारत के विकसमान लोकतंत्र को एक समय पूरी दुनिया में आदर के साथ देखा जाता था। इस दौर में भक्त लोग भारत के विश्व-गुरु बन जाने की दांभिकता में जनसाधारण को लपेटने का हर पैंतरा आजमाते हैं।

वैश्विक लोकतंत्र के सार्वभौम नैतिक मानदंडों एवं मानवाधिकारों से संबंधित मूल्यों के आधार पर भारत के लोकतंत्र की बहुत ही निम्न रैंकिंग चिंता का विषय है। तो क्या ‘भारत के विश्व-गुरु’ बन जाने के ‘अतार्किक बखान और कुत्सित इरादे’ पर रोक लग सकती है! या इस झूठ को भारतीय राष्ट्रवाद का अनिवार्य हिस्सा और राष्ट्र गौरव के गान का अधिकार मानकर जारी रहने दिया जायेगा!

आबादी के लिहाज से दुनिया के सब से बड़े लोकतंत्र की यह ‘अवस्था’ त्रासद है। इसके पीछे कारणों की तलाश करने पर जो कहानी आम नागरिकों की कमजोर आंख के समाने तैरने लगती है उसका सीधा संबंध सत्ता के भागीदारों और नौकरशाहों का आचरण है। सत्ता के भागीदारों का राजनीतिक आका (पॉलिटिकल बॉस) और नौकरशाहों का राजनीतिक कार्यकर्ता की तरह का हो जाना है। शासन प्रमुख अपने को देश का मालिक जनसाधारण का ‘भाग्य विधाता’ समझता है।

जनसाधारण में विपक्ष के ही नहीं शासक दल से जुड़े नेता और जनप्रतिनिधियों को भी शामिल समझना जाना चाहिए। तब, यह जरूर है कि शासक दल और उस के गठबंधन से जुड़े नेताओं और जनप्रतिनिधियों को यह व्यवहार चुभता तो जरूर होगा, लेकिन लाज-लिहाज के मारे वे करें, तो करें क्या! कतार में लगे संघर्षशील साथियों के पर कतरते हुए कातर बना दिया जाना क्या कहता है! जिसे चाहा उसे मुख्यमंत्री बना दिया! निश्चित ही यह आंतरिक मामला है। हर आंतरिक मामले की एक बाहरी कथा भी तो होती है न! इस तरह के ‘आंतरिक मामला’ से कोई ‘लोकतांत्रिक कथा’ बाहर नहीं निकलती है।

विपक्ष या गठबंधन के नेताओं और जनप्रतिनिधियों का तो हाल जगजाहिर ही है। आदिवासी बहुल झारखंड के मुख्यमंत्री पद पर रहते हेमंत सोरेन प्रवर्तन निदेशालय (Enforcement Directorate) की ‘कृपा’ से जेल में हैं। आम आदमी पार्टी के कई नेता पहले ही जेल भेजे जा चुके हैं। दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल को जेल में डालने की किसी भी सूरत से जेल में डालने की कोशिश संवैधानिक और प्रशासनिक संस्था लगातार कर रही है।

आदर्श आचार संहिता अपनी जगह, 2024 में लोकसभा के आम चुनाव के दौरान मुख्यमंत्री को गिरफ्तारी की आशंकाओं को निर्मूल नहीं कहा जा सकता है। राहुल गांधी को अवमानना के मामले में दो साल के लिए जेल भेजने और संसद सदस्यता छीनकर दो साल के लिए जेल भेजने की व्यवस्था कर ही ली गई थी, सुप्रीम कोर्ट के आदेश पर निचली अदालतों के फैसले के अमल पर रोक लगने के कारण वे आज भारत जोड़ो न्याय यात्रा को पूरा कर सके और समापन के बाद महाराष्ट्र में सभा को संबोधित करनेवाले हैं। उनके साथ भी कभी भी कोई नया बखेड़ा खड़ा हो सकता है।

चुनावी चंदा (Electoral Bonds) ‎ पर सब की पोल खुल जाने के बाद भी संवैधानिक और प्रशासनिक संस्थाओं के इस तरह के इकतरफा आचरण का जारी रहना शर्मनाक ही नहीं, बहुत भयानक है। हां आदर्श आचार संहिता (Model Code of Conduct) अभी दूर है! इधर खबर आ रही है कि मॉडल से नेता बनीं अनुकृति गुसाईं ने प्रवर्तन निदेशालय (Enforcement Directorate) के समन के बाद कांग्रेस से इस्तीफा दे दिया है।

यह कदम कथित वन घोटाले के संबंध में प्रवर्तन निदेशालय से पूछताछ के लिए उन्हें और उनके ससुर को पेश होने के लिए कहने के लगभग एक महीने बाद आया है। ऐसा लगता है कि पूरी लोकतांत्रिक व्यवस्था और नौकरशाही भ्रष्टाचार के ऐसे लपेटे में बुरी तरह से आ गई है। ऐसा लगता है कि वे अपने ही अस्तित्व के बचाव में इस सरकार के पुनः सत्तासीन होने और विपक्ष को ठिकाने लगा देने की ‘राजनीतिक लड़ाई’ में किसी भी हद तक जाने के लिए अभिशप्त-से हो गये हैं।

छापा मीडिया और तरंगी मीडिया का हाल तो और भी विचित्र है। लोकतांत्रिक मूल्यों और पत्रकारिता के पेशेवर मानदंडों से विच्छिन्न इस तरह की पत्रकारिता को तो अब लोग पत्रकारिता मानने तक से इनकार कर रहे हैं। क्या कलम और कैमरा अपनी विश्वसनीयता के सब से बुरे दौर में हैं, या दौर का और बदरंग होना अभी बाकी है। ऐसा लगता है कि पूरी मीडिया किसी ‘अन्य जगह’ से निदेशित हो रही है। किसी भी स्वतंत्र और लोकतांत्रिक देश की मीडिया ऐसी भी भूमिका अपना सकती है! सोचना भी कष्टकर है।

पंद्रह-बीस साल पहले तक भी कोई सोच भी नहीं सकता था। उस समय भी मीडिया कोई बहुत जनपक्षधर नहीं थी, लेकिन ऐसा तमाशा। मीडिया, खासकर तरंगी मीडिया खुद गुलामी में आनंद का मजा लेते-लेते, जनसाधारण को भी गुलामी के मजे का पाठ पढ़ाने में लगी रही है। सरकार की मनःस्थिति को पसंद न आनेवाली बड़ी-से-बड़ी खबर पर मीडिया कोई ध्यान ही नहीं देता। विपक्ष की किसी उपलब्धि को उसी का दोष बताकर या उसके महत्व को लघुमित (Reduced) रूप में पेश करता है।

सहमति-असहमति अपनी जगह लेकिन विपक्ष की आवाज को पूर्वग्रह मुक्त मन-मस्तिष्क और खुले दिल से जनसाधारण तक पहुंचाने की बात तो एक तरफ, पहुंचने देने में भी प्रकारांतरिक बाधा खड़ी करती रहती है। मीडिया के इस तरह के अस्वाभाविक आचरण का भी कारण कहीं-न-कहीं सुप्रीम कोर्ट के द्वारा असंवैधानिक घोषित किये जा चुके चुनावी चंदा (Electoral Bonds) ‎ से जुड़ा प्रतीत होता है। मीडिया हाउस पर उन्हीं लोगों का या उन में अपने पक्के हित खोज लेनेवाले बड़े लोगों का ही कब्जा है जो लग भय-भूख-भ्रष्टाचार के खिलाफ नारे के साथ अपने दमकते हुए चाल-चरित्र-चेहरा लेकर आये थे। भय का हाल यह है कि हक और न्याय की बात के अनजाने भी मुंह से निकल जाने के प्रति लोग भयभीत हैं।

ऐसा लगता है कि मुल्क का सामान्य साहस ही खतम हो गया है। भय ही उनके प्रति प्रीति का आधार है। भूख का हाल यह है कि देश की बहुत बड़ी आबादी अपने लिए दो रोटी के लिए भी सरकारी इमदाद का मोहताज बनकर रह गया है। आदमी को ‘दो रोटी’ चाहिए जरूर, लेकिन परमुखापेक्षी बना दिये जाने से आदमी की गरिमा खंडित हो जाती है। ‘दो रोटी’ अपनी ‘उपार्जक क्षमता’ से हासिल होने के बजाये किसी के ‘उपकार’ से हासिल होती है तो आदमी की गरिमा निश्चित ही खंडित होती है; ‘दो रोटी’ का मतलब दो रोटी ही तो नहीं होता है। भ्रष्टाचार! अकेले चुनावी चंदा (Electoral Bonds) ‎से निकलती कहानियां ही क्या काफी नहीं हैं! ये कहानियां अगर केस में बदल गई तो फिर क्या होगा, कहना मुश्किल है। कहने की जरूरत नहीं है कि कहानियों का केस में बदलना इतना आसान न होगा! चाल-चरित्र-चेहरा चुनावी चंदा (Electoral Bonds) से साफ हो गया है।

आदर्श आचार संहिता और संघर्ष का समान अवसर (Level Playing Field)‎ का क्या होगा, यह देखना दिलचस्प होगा। मुख्य चुनाव आयुक्त, राजीव कुमार ‎ ने साफ-साफ कह दिया है, मिथ और रियलटी की लड़ाई में केंद्रीय चुनाव आयोग के अधिकार-संपन्न अफसर सक्रिय भागीदारी करेंगे। देखना यह भी होगा कि ‘मिथ और रियलटी’ ‎ की लड़ाई में ‘फेक और फेवरेबल’ के साथ कैसा व्यवहार चुनाव आयोग के ‘अधिकार-संपन्न’ अधिकारी करते हैं।

‘मिथ और रियलटी’ ‎ की लड़ाई में ‘फेक और फेवरेबल’ का सवाल मतदाताओं का सवाल है। ‘मिथ और रियलटी’ ‎ की लड़ाई में ‘फेक और फेवरेबल’ में मुकाबला सत्ता के भ्रमास्त्र से है। भ्रमास्त्र का मुकाबला आम मतदाता कैसे करेगा! उम्मीद है। आम मतदाता कर लेगा। आम चुनाव है। तय आम मतदाताओं को करना है। आदमी पेट की आग से हर भ्रमास्त्र का मुकाबला करता आया है, आगे भी करता रहेगा।

(प्रफुल्ल कोलख्यान स्वतंत्र लेखक और टिप्पणीकार हैं)

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