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मोदी जी के नेतृत्व में देश सोमालिया और सूडान बनने की तरफ अग्रसर

गाल बजाने और बड़ी-बड़ी डींगें हांकने से अगर सब कुछ सुधर जाए तो विकास और बदलाव लाने की सारी राजनीति बेकार ही है। मौजूदा सरकार की सबसे बड़ी उपलब्धि तो यही है कि उसने भारतीय लोकतंत्र, प्रेस की आज़ादी और ग्लोबल हंगर इंडेक्स में भारत की ऐसी की तैसी कर दी है। हम मुंह दिखाने लायक नहीं रहे। जो भारत अपने लोकतंत्र और प्रेस की आज़ादी के लिए दुनिया भर में जाना जाता था, आज रुदाली का शिकार है और हम ऐसे अंध कूप में गिरते जा रहे हैं जहां से निकलना कठिन है।

अगर यही हाल रहा तो हम सोमालिया और सूडान जैसे देशों की श्रेणी में जल्द आ सकते हैं। लेकिन हमारी सरकार का ठसक ये है कि उसे लगता है कि वह जो भी करती है सब ठीक है और इससे बेहतर कुछ हो ही नहीं सकता। बिहार चुनाव के दौरान पीएम मोदी क्या-क्या कहते नजर आते हैं। शायद उन्हें खुद पता नहीं या फिर वे जानकार भी बिहारी जनमानस को ठग रहे हैं। लेकिन सबसे बड़ा यक्ष प्रश्न ये है कि देश की मौजूदा हालत के बारे में उनसे सवाल कौन करे। जो सवाल पूछ सकता है उसे तो पहले ही बौना कर दिया गया है।

अभी हाल में ही स्वीडन की वी-डेम इंस्टीट्यूट की साल 2020 की डेमोक्रेसी रिपोर्ट जारी हुई है। इस रिपोर्ट के मुताबिक प्रधानमंत्री मोदी के नेतृत्व वाली सरकार में मीडिया, नागरिक समाज और विपक्ष के लिए कम होती जगह के कारण भारत अपना लोकतंत्र का दर्जा खोने की कगार पर है। गौरतलब है कि स्वीडन के गोथेनबर्ग विश्वविद्यालय में 2014 में स्थापित वी-डेम एक स्वतंत्र अनुसंधान संस्थान है। इसकी डेमोक्रेसी रिपोर्ट दुनिया भर के देशों में लोकतंत्र की स्थिति का आकलन करती है।

यह संस्थान अपने आप को लोकतंत्र पर दुनिया की सबसे बड़ी डेटा संग्रह परियोजना कहता है। साल 2020 की रिपोर्ट का शीर्षक ‘आटोक्रेटाइज़ेशन सर्जेज- रेजिस्टेंस ग्रो’, यानी ‘निरंकुशता में उछाल- प्रतिरोध बढ़ा है, जिसमें आंकड़ों के आधार पर बताया गया है कि दुनिया भर में लोकतंत्र सिकुड़ता जा रहा है। रिपोर्ट में बताया गया कि प्रमुख जी-20 राष्ट्र और दुनिया के सभी क्षेत्र अब ‘निरंकुशता की तीसरी लहर’ का हिस्सा हैं, जो भारत, ब्राजील, अमेरिका और तुर्की जैसी बड़ी आबादी के साथ प्रमुख अर्थव्यवस्थाओं को प्रभावित कर रहा है।

उदारवादी लोकतंत्र सूचकांक के आकलन के लिए रिपोर्ट में जनसंख्या को पैमाना बनाया गया है जो जनसंख्या आकार के आधार पर औसत लोकतंत्र स्तर को मापता है जिससे पता चलता है कि कितने लोग प्रभावित हैं। यह सूचकांक चुनावों की गुणवत्ता, मताधिकार, अभिव्यक्ति और मीडिया की स्वतंत्रता, संघों और नागरिक समाज की स्वतंत्रता, कार्यपालिका पर जांच और कानून के नियमों को शामिल करता है। रिपोर्ट में पाया गया कि भारत जनसंख्या के मामले में निरंकुशता की व्यवस्था की ओर आगे बढ़ने वाला सबसे बड़ा देश है। इस में उल्लेख किया गया, भारत में नागरिक समाज के बढ़ते दमन के साथ प्रेस स्वतंत्रता में आई कमी प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के वर्तमान हिंदू-राष्ट्रवादी शासन से जुड़ा है।

खास बात ये है कि ये रिपोर्ट राज्यसभा से कृषि कानूनों को पास करवाने, संसद सत्र में प्रश्नकाल को शामिल नहीं करने, न्यायपालिका की स्वतंत्रता पर उठने वाले सवाल और हाथरस मामले से पहले प्रकाशित हो चुकी थी, अन्यथा भारत की स्थिति और खराब दिखाई जा सकती थी। वैसे ये पहली बार नहीं है जब भारत के लोकतंत्र पर अंतरराष्ट्रीय स्तर पर सवाल उठे हों। इस साल जनवरी में द इकोनॉमिस्ट ग्रुप की खुफिया इकाई द्वारा तैयार की गई रिपोर्ट में 2019 के लोकतंत्र सूचकांक में बड़ी गिरावट दर्ज करते हुए भारत 10 पायदान फिसलकर 51 वें स्थान पर आ गया है। कुछ वक्त पहले जस्टिस डी वाई चंद्रचूड़ ने भी सरकार विरोधी आवाजों के दमन पर चेतावनी दी थी कि असहमति लोकतंत्र के लिए सेफ़्टी वॉल्व है। अगर आप इन सेफ़्टी वॉल्व को नहीं रहने देंगे तो प्रेशर कुकर फट जाएगा।

उधर जम्मू-कश्मीर में पहले समूचे विपक्ष को नजरबंद कर राज्य का विभाजन किया गया, उसके विशेष प्रावधान खत्म कर दिए गए और अब केंद्र सरकार ने  जम्मू-कश्मीर में भूमि स्वामित्व अधिनियम संबंधी कानून में बड़ा संशोधन करते हुए नए भूमि कानून का नोटिफिकेशन जारी कर दिया। इस नोटिफिकेशन के बाद कोई भी भारतीय जम्मू-कश्मीर में जमीन की खरीद-फरोख्त कर सकता है हालांकि अभी लद्दाख में ऐसा संभव नहीं होगा, क्योंकि वहां के नेताओं ने केंद्र सरकार से पहले ही इसके लिए समझौता कर लिया था। इनमें भाजपा के नेता भी शामिल थे। इन नेताओं ने राज्य की आदिवासी आबादी के अधिकारों का हवाला देते हुए अनुच्छेद 371 की मांग की।

गौरतलब है कि अनुच्छेद 371 में छह पूर्वोत्तर राज्यों सहित कुल 11 राज्यों के लिए विशेष प्रावधान हैं, इसके तहत इन राज्यों में अन्य राज्यों के लोगों द्वारा जमीन खरीदने पर प्रतिबंध है। लद्दाख के नेताओं ने यह मांग न मानने की सूरत में एलएएचडीसी के चुनाव का बहिष्कार करने की बात कही थी।  लिहाजा केंद्र सरकार को उनकी बात माननी पड़ी। एलएसी पर चल रहे तनाव को देखते हुए भी सरकार ने फिलहाल लद्दाख की जमीन दूसरों को खरीदने की अनुमति नहीं दी है। एक सच ये है कि केंद्र सरकार और केंद्र शासित प्रदेश की मदद से देश के जाने-माने 30 कार्पोरेट घराने जम्मू-कश्मीर के युवाओं के लिए आउटरीच इनीशियटिव के तहत श्रीनगर का दौरा करने वाले हैं। प्रशासन ये उम्मीद लगा रहा है कि ये दौरा इस क्षेत्र में निवेश करने के लिए कार्पोरेट्स का भरोसा बढ़ाएगा।

भारत में प्रेस की आजादी उठते सवाल

इसी साल के अप्रैल महीने में एक और रिपोर्ट सामने आयी थी। यह रिपोर्ट प्रेस की स्वतन्त्रता को लेकर थी और उस रिपोर्ट में दर्ज किया गया था कि भारतीय लोकतंत्र में सबसे नाजुक हालत में प्रेस की हालत हो गई है। सरकार के दबाव में भारतीय प्रेस लगातार बौनी हो जा रही है। वैश्विक प्रेस स्वतंत्रता सूचकांक में 180 देशों के समूह में दो स्थान नीचे उतरकर 142 वें नंबर पर आया है। नॉर्वे लगातार चौथे साल लिस्ट में सबसे ऊपर है और नॉर्थ कोरिया अंतिम स्थान पर है। वर्ल्ड प्रेस फ्रीडम इंडेक्स 2020 ‘ने कहा कि 2018 में भारत में 6 पत्रकारों की हत्या हुई थी, हालांकि 2019 में किसी भी भारतीय पत्रकार की हत्या नहीं हुई।

रिपोर्ट कहती है, लगातार स्वतंत्रता का उल्लंघन किया गया जिनमें पत्रकारों के खिलाफ पुलिसिया हिंसा, राजनीतिक कार्यकर्ताओं पर हमला, बदमाशों एवं भ्रष्ट स्थानीय अधिकारियों द्वारा बदले में हिंसा आदि शामिल हैं। इंडेक्स में गिरावट के लिए वजह, ‘हिंदू राष्ट्रवादी सरकार के पक्ष में काम करने के लिए मीडिया पर दबाव बनाना’ मानी जा रही है। उन पत्रकारों के खिलाफ हिंदुत्व के फालोअर्स द्वारा सोशल मीडिया पर घृणित अभियान चलाया गया जो जिन्होंने उन मुद्दों पर खुलकर बोलने की हिम्मत दिखाई। आगे रिपोर्ट में यह भी दर्ज है कि यह घृणित अभियान उस समय और जहरीला हो गया जब महिलाओं को निशाना बनाया गया।

रिपोर्ट में कश्मीर में प्रेस की आजादी का मुद्दा भी उठाया गया है। राज्य में धारा 370 हटाए जाने के बाद सरकार की ओर से इंटरनेट और फोन सेवा बंद कर दी गई। रिपोर्ट में कहा गया है कि, सरकार ने ऐसे हालात खड़े किए कि,जर्नलिस्ट के लिए उस जगह को कवर करना असंभव सा हो गया।अभिव्यक्ति की आजादी को यह सरकार बेकार मान रही है और जो सरकार से सवाल पूछता है उसे देशद्रोही मान लिया जा रहा है। आज से पहले कभी ऐसा देखा नहीं गया।

हंगर इंडेक्स में भारत का सच

पिछले महीने अक्टूबर  16 तारीख को एक और भारत की असलियत की पोल खोलती एक और ग्लोबल रिपोर्ट सामने आयी। यह रिपोर्ट है ग्लोबल हंगर इंडेक्स। भारत की हालत का इस रिपोर्ट में बखान किया गया है।  107 देशों की इस लिस्ट में भारत इस साल 94 वें पायदान पर है। पिछले साल वह 102वें पायदान पर था। यह सीरियस कैटिगरी में आता है। भारत की 14 फीसदी आबादी कुपोषित है। भारत की हालत क्या है उसकी जानकारी इस इंडेक्स से पता चलती है। इस इंडेक्स के मुताबिक, बांग्लादेश 75 वें, म्यांमार 78 वें, पाकिस्तान 88 वें , नेपाल 73 वें और श्रीलंका 64 वें स्थान पर हैं। नेपाल और श्रीलंका ‘मध्यम’ श्रेणी में आते हैं जबकि भारत, बांग्लादेश जैसे अन्य देश गंभीर श्रेणी में आते हैं। चीन, बेलारूस, यूक्रेन, तुर्की, क्यूबा और कुवैत सहित 17 देश शीर्ष रैंक पर हैं।

रिपोर्ट बताती है कि लॉकडाउन के बाद अभी तक देश में स्कूलें नहीं खुल पाई हैं। आपको नहीं भूलना चाहिए कि सरकारी स्कूलों में कक्षा 8 तक के बच्चों को स्कूल में दिन का खाना मिलता है। इन बच्चों की उम्र 6-14 साल के बीच होती है। इस योजना के तहत रोजाना करोड़ों बच्चों का पेट भरता है और जरूरी पौष्टिक आहार मिलता है। भारत में करोड़ों गरीब बच्चों का एक समय का पेट इसी योजना से भरता था। अभी यह बंद है।

ग्लोबल हंगर इंडेक्स  रिपोर्ट के अनुसार भारत की 14 फीसदी आबादी कुपोषण की शिकार है। रिपोर्ट में कहा गया है कि पांच साल से कम उम्र के बच्चों की मृत्यु दर 3.7 प्रतिशत थी। इसके अलावा ऐसे बच्चों की दर 37.4 थी जो कुपोषण के कारण नहीं बढ़ पाते। बांग्लादेश, भारत, नेपाल और पाकिस्तान के लिए 1991 से अब तक के आंकड़ों से पता चलता है कि वैसे परिवारों में बच्चों के कद नहीं बढ़ पाने के मामले ज्यादा है जो विभिन्न प्रकार की कमी से पीड़ित हैं। इनमें पौष्टिक भोजन की कमी, मातृ शिक्षा का निम्न स्तर और गरीबी आदि शामिल हैं।

ग्लोबल स्तर पर जारी ये रिपोर्ट्स से अनुमान लगाया जा सकता है कि भारत किस दिशा में आगे बढ़ता जा रहा है। लेकिन मौजूदा सरकार का सच यही है कि उसे इन बातों से कोई फर्क नहीं पड़ता। उसके पास कहने के लिए बहुत सी बातें हैं लेकिन जो परिणाम है उससे सरकार के लोग चौंकते नहीं। क्योंकि उनका एजेंडा तय है। सिर्फ सत्ता की लालच में आगे बढ़ती यह सरकार लोकतंत्र के हर अंग को कमजोर करने से बाज नहीं आती।

(अखिलेश अखिल वरिष्ठ पत्रकार हैं और आजकल दिल्ली में रहते हैं।)

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This post was last modified on November 2, 2020 6:00 pm

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