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Friday, September 24, 2021

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विवाह के लिए हिंदू से मुस्लिम या मुस्लिम से हिंदू बनना जरूरी नहीं

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इलाहाबाद हाई कोर्ट ने कहा है कि केवल शादी के लिए धर्म परिवर्तन वैध नहीं है। विपरीत धर्म के जोड़े की याचिका को खारिज करते हुए कोर्ट ने याचियों को संबंधित मैजिस्ट्रेट के समक्ष हाजिर होकर अपना बयान दर्ज कराने की छूट दी है। याची ने परिवार वालों को उनके शांतिपूर्ण वैवाहिक जीवन में हस्तक्षेप करने पर रोक लगाने की हाई कोर्ट से मांग की थी। कोर्ट ने इस याचिका पर हस्तक्षेप करने से इनकार कर दिया है। यह आदेश जस्टिस एमसी त्रिपाठी की एकलपीठ ने प्रियांशी उर्फ समरीन और अन्य की याचिका पर दिया है।

एकलपीठ ने कहा है कि एक याची मुस्लिम तो दूसरा हिंदू है। लड़की ने 29 जून 2020 को हिंदू धर्म स्वीकार किया और एक महीने बाद 31 जुलाई को विवाह कर लिया। एकलपीठ ने कहा कि रिकॉर्ड से साफ है कि शादी करने के लिए धर्म परिवर्तन किया गया है। पीठ ने नूर जहां बेगम उर्फ अंजलि मिश्रा एवं अन्य बनाम उत्तर प्रदेश सरकार के मामले में 2014 में दिए गए एक फैसले का हवाला दिया, जिसमें कहा गया था कि केवल शादी के उद्देश्य से धर्म परिवर्तन करना अस्वीकार्य है।

नूर जहां बेगम केस में हिंदू लड़की ने धर्म बदल कर मुस्लिम लड़के से शादी की थी। सवाल था कि क्या हिंदू लड़की धर्म बदल कर मुस्लिम लड़के से शादी कर सकती है और यह शादी वैध होगी। कुरान की हदीसों का हवाला देते हुए कोर्ट ने कहा था कि इस्लाम के बारे मे बिना जाने और बिना आस्था विश्वास के धर्म बदलना स्वीकार्य नहीं है। इस्लाम के खिलाफ है। इसी फैसले के हवाले से कोर्ट ने मुस्लिम से हिंदू बन शादी करने वाली याची को राहत देने से इंकार कर दिया। इसका संज्ञान लेकर एकलपीठ ने रिट याचिका यह कहते हुए खारिज कर दी कि वह संविधान के अनुच्छेद 226 के तहत दायर इस मामले में हस्तक्षेप करने के पक्ष में नहीं है।

‘नूर जहां बेगम’ मामले में इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने उन रिट याचिकाओं को खारिज कर दिया था, जिनमें शादीशुदा जोड़े को संरक्षण देने का अनुरोध किया गया था। याचिकाओं में कहा गया था कि लड़की ने हिंदू धर्म छोड़ कर, मुस्लिम धर्म अपनाया था और उसके बाद निकाह किया था। संबंधित मामले में इस मुद्दे पर विचार किया गया था कि इस्लाम की जानकारी के बगैर या उसमें भरोसा हुए बिना महज शादी (निकाह) के लिए क्या मुस्लिम लड़के के इशारे पर हिंदू लड़की का धर्म परिवर्तन वैध है? इलाहाबाद हाई कोर्ट ने इस सवाल का जवाब न में दिया था।

लिली थॉमस बनाम केंद्र सरकार के मामले में उच्चतम न्यायालय के रुख को दोहराते हुए इलाहाबाद हाई कोर्ट ने कहा था कि एक व्यक्ति का अपना धर्म छोड़ कर इस्लाम धर्म अपनाना तभी प्रमाणिक कहा जा सकता है यदि वह वयस्क हो, मानसिक तौर पर स्वस्थ हो तथा उसने इस्लाम को अपनी इच्छा से अपनाया हो एवं उसे अल्लाह के एकात्मवाद और पैगंबर मोहम्मद के करिश्माई व्यक्तित्व में भरोसा एवं विश्वास हो।

यदि धर्मांतरण धार्मिक भावनाओं से प्रेरित न हो और अपने फायदे के लिए किया गया हो, यदि यह धर्मांतरण किसी अधिकार के दावे का आधार बनाने या अल्लाह के एकात्मवाद या पैगंबर मोहम्मद पर भरोसा किए बिना शादी से बचने के उद्देश्य से किया गया हो, तो यह धर्म परिवर्तन प्रामाणिक नहीं माना जाएगा।

इलाहाबाद हाई कोर्ट ने कहा था कि धर्म परिवर्तन के मामले में मूल धर्म की रीति-नीतियों के बदले नये धर्म की रीति-नीतियों के प्रति हृदय परिवर्तन होना और ईमानदार आस्था का होना जरूरी है।एकलपीठ ने याचियों को संबंधित मजिस्ट्रेट के समक्ष हाजिर हो कर अपना बयान दर्ज कराने की छूट दी है। याची ने परिवार वालों को उनके शांति पूर्ण वैवाहिक जीवन में हस्तक्षेप करने पर रोक लगाने की मांग की थी, जिसे एकलपीठ ने स्वीकार नहीं किया।

(लेखक वरिष्ठ पत्रकार और कानूनी मामलों के जानकार हैं। वह इलाहाबाद में रहते हैं।)

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