झारखंडः मनरेगा कर्मियों की हड़ताल जारी, भर्ती की नई योजना भी हुई ध्वस्त

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झारखंड में मनरेगा कर्मियों की हड़ताल अभी खत्म नहीं हुई है। इसके बदले में नई व्यवस्था लागू करके लोगों को काम पर रखने की प्रक्रिया चल रही है। यह प्रक्रिया भी फलीभूत होती नहीं दिख रही है। नतीजा यह है कि राज्य भर में तमाम योजनाएं अधर में लटक गई हैं।

उधर, ग्रामीण विकास विभाग, झारखंड सरकार के मनरेगा आयुक्त सिद्धार्थ त्रिपाठी ने 28 अगस्त 2020 को जिले के उप विकास आयुक्त-सह-जिला कार्यक्रम समन्वयक को पत्र निर्गत कर कहा है कि मनरेगा अंतर्गत मजदूरों के काम की मांग को प्राप्त करने के लिए एक नई व्यवस्था लागू की गई है, जिसके तहत पूरे राज्य में अब तक चार लाख मजदूरों के काम की मांग की सूची प्राप्त हो चुकी है।

मनरेगा अधिनियम के अनुसार उक्त सभी मजदूरों को ससमय कार्य उपलब्ध कराया जाना है। मजदूरों द्वारा काम की मांग की स्थिति का आकलन करने के लिए राज्य स्तरीय टीम उसके नाम के सामने अंकित जिला में क्षेत्र भ्रमण करेगी। उक्त दल 29 या तीस अगस्त को एक दिन आवटित जिला के कुछ गांवो में मजदूरों के कार्य की मांग तथा मांग के अनुरूप कार्य के आवंटन के निरीक्षण के लिए जाएगी।

इस पत्र क बाद ही दौरा भी शुरू हो गया। 29 अगस्त को ही बोकारो, गिरिडीह, हजारीबाग और पलामू का चार अधिकारियों ने भ्रमण किया। इसमें राज्य के विशेष सचिव रवि रंजन एवं राज्य समन्वयक, प्लानिंग सेल के शिव शंकर बोकारो, मनरेगा आयुक्त सिद्धार्थ त्रिपाठी पलामू, मुख्य कार्यपालक पदाधिकारी, आर थंगा पाण्डियन एवं सहायक नरेंद्र कुमार ने गिरिडीह एवं संयुक्त सचिव, आदित्य रंजन ने हजारीबाग जिले का क्षेत्र भ्रमण किया।

बतातें चलें कि 28 अगस्त को विडियो कॉन्फ्रेन्सिंग के माध्यम से मनरेगा कमिश्नर ने जिले के पदाधिकारियों को दस लाख लेबर इंगेजमेंट का लक्ष्य देते हुए, कहा कि मनरेगा कर्मियों के हड़ताल पर चले जाने से कोई फर्क नहीं पड़ा है। सोशल ऑडिट यूनिट वाले अच्छा काम कर रहे हैं। उन्होंने पर्याप्त डिमांड कलेक्ट की है। हम लोग अगर इस पर काम करेंगे तो दस लाख का लक्ष्य आसानी से प्राप्त कर सकते हैं।

इस पर पलामू डीडीसी उखड़ गए। उन्होंने कहा कि इधर जिला से लेकर प्रखंड तक सभी पदाधिकारियों एवं कर्मचारियों की नींद हराम हो गई है। सबका एक-सूत्री कार्यक्रम चल रहा है डिमांड बढ़ाओ, मनरेगा कर्मियों के हड़ताल पर चले जाने से एक भी काम धरातल पर नहीं हो रहा है। मनरेगा कर्मियों के बिना अब मनरेगा में कोई काम संभव नहीं है। सोशल ऑडिट यूनिट वालों ने डिमांड के नाम पर ऊलजुलूल लोगों का नाम लिखकर दे दिया है। मृत, अपंग, समृद्ध एवं कार्य के लिए इच्छा नहीं रखने वाले लोगों का नाम भी बेरोजगारी भत्ते का लालच देकर लिखा गया है, जो जिला प्रशासन के लिए सरदर्द बन गया है।

पलामू डीडीसी शेखर जमुआर के इस विरोध के बाद राज्य के सभी डीडीसी ने बोलना शुरू किया। सरायकेला के डीडीसी ने यहां तक कह दिया कि अगर मनरेगा कर्मियों के साथ वार्ता करके जल्द ही हल नहीं निकाला गया तो हम लोग भी हाथ खड़े कर देंगे। जिले के पदाधिकारियों के इस विरोध के बाद ही मनरेगा आयुक्त सिद्धार्थ त्रिपाठी ने राज्य के जिलों के क्षेत्र भ्रमण की चिठ्ठी निकाल दी।

इस क्रम में बोकारो जिला के पेटरवार प्रखंड के उतासारा पंचायत के टकाहा ग्राम और ओरदाना पंचायत के मदवा जारा ग्राम के क्षेत्र भ्रमण के दौरान राज्य के विशेष रवि रंजन एवं राज्य समन्वयक, प्लानिंग सेल के शिव शंकर ने मनरेगा योजना के तहत सात एकड़ जमीन पर की गई बिरसा मुंडा आम बागबानी एवं कूप निर्माण का जायजा लेने गए। वहां उपस्थित एक महिला से अधिकारियों ने पूछा कि यहां रोजगार दिवस होता है? तो महिला ने कहा रोजगार दिवस क्या होता है हमें नहीं पता। अधिकारियों ने कहा कि हर सप्ताह रोजगार दिवस होता है। मजे की बात तो यह है कि योजना भ्रमण में लेबर इंगेजमेंट का कोई जिक्र नहीं हुआ। दूसरी तरफ यहां 1700-1800 के लेबर डिमांड में किसी भी योजना में एक भी मजदूर नहीं मिला।

मनरेगा कर्मचारी संघ के प्रदेश अध्यक्ष अनिरुद्ध पाण्डेय ने कहा कि मनरेगा कमिश्नर द्वारा बयान दिया गया है कि सबसे अधिक वर्क डिमांड वाले पंचायत में निरीक्षण किया गया, जबकि शनिवार को पथरा पंचायत में 22 योजनाओं में मात्र 140 लेबर का ही वर्क डिमांड चल रहा था।

मनरेगा आयुक्त ने केवल एक आम बागबानी का निरीक्षण किया तथा आम बागबानी में कितने मजदूर स्थल पर कार्य कर रहे थे यह भी बताने से परहेज किया गया, जबकि हुसैनाबाद प्रखंड के ही अन्य पंचायतों में 897, 858, 625 तथा 599 मजदूर की डिमांड चल रही थी। वहां योजनाओं का निरीक्षण क्यों नहीं किया गया? यह एक बड़ा प्रश्न है, क्योंकि मनरेगा आयुक्त के भ्रमण का उद्देश्य यही था कि लेबर इंगेजमेंट के अनुरूप स्थल पर वास्तविक मजदूर का सत्यापन किया जा सके।

बताते चलें कि 2016 में मनरेगा आयुक्त के पलामू दौरे में पांच रोजगार सेवकों को मनरेगा आयुक्त के कोप का भाजन बनकर बर्खास्त होना पड़ा था। आरोप यह लगाया गया था कि मशीन के इस्तेमाल की संभावना प्रतीत होती है, जबकि मशीन के इस्तेमाल का कोई साक्ष्य नहीं मिला था। प्रायः मनरेगा आयुक्त के क्षेत्र भ्रमण में कम से कम चार-पांच पंचायतों का निरीक्षण किया जाता है, जबकि इस बार एक पंचायत के एक ही योजना का निरीक्षण किया गया।

राज्य भर के मनरेगा कर्मचारी हड़ताल पर हैं। हड़ताल को प्रभावहीन साबित करने के लिए मनरेगा आयुक्त ने तरह-तरह की युक्तियां लगाई हैं। मजदूरों का डिमांड कलेक्ट करने के लिए राज्य के 35000 स्वयं सहायता समूह की दीदी, जेएसएलपीएस के कर्मचारी तथा सोशल ऑडिट यूनिट के कर्मचारियों को लगाया गया है। ये लोग किसी तरह फर्जी डिमांड तो निकाल दे रहे हैं, लेकिन कार्य स्थल पर मजदूर नदारद हैं, यही कारण है कि अधिकांश मस्टररोल में मजदूरों को अनुपस्थित दिखा दिया जा रहा है।

मनरेगा आयुक्त द्वारा संबंधित मंत्री को बार-बार बरगलाया जा रहा है कि मनरेगा कर्मियों के हड़ताल पर चले जाने से मनरेगा कार्यों में कोई अंतर नहीं पड़ा है, लेकिन सत्य यह है कि मनरेगा कर्मियों के हड़ताल पर चले जाने से प्रदेश से लेकर पंचायत तक के सभी पदाधिकारियों एवं कर्मचारियों की नींद उड़ गई है। इनका एक-सूत्री कार्यक्रम चल रहा है, कि किसी तरह मनरेगा सॉफ्ट में लेबर डिमांड बढ़ाया जाए।

श्री पाण्डेय ने कहा कि सरकार को वास्तविकता स्वीकार कर लेनी चाहिए। मनरेगा का कार्य मनरेगा कर्मी के अतिरिक्त कोई नहीं कर सकता है, इसलिए सरकार को चाहिए कि जल्द से जल्द मनरेगा कर्मियों से वार्ता कर मांगों की पूर्ति करने के लिए ठोस पहल करें, ताकि मनरेगा को पूर्व की भांति सुगमता से चलाया जा सके।

इधर मुखिया संघ भी बगावत पर उतर गया है, मुखिया संघ के अध्यक्ष ने कहा है कि यदि यह अनुचित दबाव नहीं रोका गया तो मुखिया संघ भी आंदोलन करेगा। मनरेगा कर्मचारी संघ के महासचिव मु. इम्तेयाज बताते हैं कि झारखण्ड में मनरेगा कर्मियों के हड़ताल पर चले जाने के कारण mis (management information system) प्रबंधन सूचना प्रणाली में मानव दिवस सृजन में भारी गिरावट दर्ज की गई है। मनरेगा कर्मी 27 जुलाई से हड़ताल पर हैं।

आंकड़े बताते हैं कि हड़ताल पर जाते वक्त जुलाई 2020 में mis में दर्ज कुल मानव दिवस 94,67,352 था, जो वर्तमान में गिर कर अगस्त 2020 में मात्र 34,28,017 रह गया। यदि आंकड़ों पर गौर करें तो मनरेगा कर्मियों के हड़ताल पर चले जाने के बाद मानव दिवस सृजन में मात्र 1/3 ही रह गया, जबकि डिमांड बढ़ाने के लिए विभाग ने एड़ी चोटी एक कर दी।

मनरेगा mis में इतनी भारी गिरावट के बाद भी मनरेगा आयुक्त झूठ का आंकड़ा पेश करने में थक नहीं रहे हैं। वे कहते हैं कि मनरेगा कर्मियों की हड़ताल से कोई असर नहीं पड़ा, तो सवाल है कि मांग में इतनी गिरावट क्यों है। इम्तेयाज कहते हैं कि चतरा जिला में जिस 40 योजना में घोटाले के नाम पर वहां के 14 संविदा मनरेगा कर्मियों को बर्खास्त किया गया है, जबकि सच्चाई यह है कि इतनी योजना स्वीकृत ही नहीं हुई, योजना 22 थी 18 में काम हुआ 4 रदद् तो फिर बिना काम के पैसे की निकासी का सवाल कहां है।

हद तो तब हो गई जब एक हाथ से दिव्यांग मनरेगा कर्मी मनोज कुमार को बर्खास्त कर दिया, जिसके पास अभी आजीविका का कोई साधन भी नहीं है। इम्तेयाज कहते हैं कि मनरेगा आयुक्त का झूठ और फर्जी काम का सिलसिला यहीं नहीं रुका, पाकुड़ प्रखंड में 2009-10, 2010-11 की 10 वर्ष पुरानी योजना में विलंबित भुगतान के लिए दोषी लेखा सहायक को मान कर मुकदमा दर्ज किया गया है, जबकि योजना की स्वीकृति mis और क्रियान्वयन के छह माह बाद लेखा सहायक की पोस्टिंग पाकुड़ में हुई। इसमें आरोपी पर न कोई अवैध निकासी न कोई अनियमितता और न ही वित्तीय शक्ति सम्पन्न होकर कार्य करने की पुष्टि है फिर भी केस दर्ज हो गया।

दोष सिर्फ इतना है कि आरोपी द्वारा मनरेगा आयुक्त की तानाशाही के कारण मृत मनरेगा कर्मियों के परिजनों के कल्यणार्थ आवाज उठाया जाता रहा है, इसलिए करवाई की गई।

संघ के महासचिव कहते हैं कि मनरेगा में सारे ऑडिट को रोक कर मनरेगा कमिश्नर के छह वर्षो के कार्यकाल का विशेष ऑडिट जरूरी है। यदि यह निष्पक्ष हुआ तो मनरेगा कमिश्नर पर मनरेगा कर्मियों को आत्म हत्या के लिए प्रेरित करने, झूठा आंकड़ा प्रस्तुत करने, मनरेगा अधिनियम का उलंघन, मनरेगा में एनजीओ को हावी करने, आकस्मिकता मद घोटाला पौधा खाद आपूर्ति घोटाला जैसे कई आरोप स्वत सिद्ध हो जाएंगे।

(झारखंड से वरिष्ठ पत्रकार विशद कुमार की रिपोर्ट।)

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