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झारखंड ने फासीवाद को नकारा: विपक्ष की नहीं जनता की जीत

झारखंड विधानसभा चुनाव 2019 के जो परिणाम आए हैं, वह कोई अप्रत्याशित नहीं है। महागठबंधन के पक्ष में और भी बेहतर परिणाम हो सकते थे, अगर विपक्ष, सत्ता द्वारा जनता के बीच फैलायी गई झूठ का पर्दाफाश करने में सफल रहता। मगर विपक्ष ऐसा नहीं कर सका। झारखंड की मूल समस्याओं में बेरोजगारी, सीएनटी—एसपीटी एक्ट में संशोधन की कोशिश, भूमि अधिग्रहण क़ानून में बदलाव, लैंड बैंक नीति, भूख से हो रही मौतें, भीड़ द्वारा लोगों की हत्या, आदिवासी, दलित, अल्पसंख्यक और महिलाओं के विरुद्ध बढ़ती हिंसा, सरकार द्वारा प्रायोजित संप्रदायिकता, अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर हमलें, आदिवासियों के पारंपरिक स्वशासन व्यवस्था ग्रामसभा के तहत पत्थलगड़ी पर हमला, पत्थलगड़ी के मामले में हजारों लोगों पर मुकदमा एवं बढ़ता दमन सहित पिछले पांच सालों में जन अधिकारों और लोकतंत्र के मूल सिद्धांतों पर लगातार हमले आदि पर विपक्ष अक्रामक नहीं रहा। विपक्षी दलों ने अपने घोषणा पत्रों में जो भी जन मुद्दों को शामिल किया था, वे भी उनके चुनावी अभियान के चर्चाओं में नहीं झलके। दूसरी ओर भाजपा अपनी नाकामियों को छुपाने के लिए राम मंदिर, 370, सीएए, एनआरसी को मुद्दा बनाके जनता के बीच ध्रुवीकरण करने की कोशिश करती रही। भाजपा की इस कूटनीति पर विपक्ष द्वारा पलटवार की उदासीनता के बावजूद, झारखंडी जनता ने भाजपा की फासीवादी नीतियों को नकार दिया। तो इसे विपक्ष की सफलता नहीं, बल्कि झारखंडी जनता के भीतर सत्ता के खिलाफ आक्रोश के रूप में देखा जाना चाहिए। अब देखना होगा कि विपक्ष (अब सत्तापक्ष) जनता द्वारा दी गई जिम्मेवारी और उसके भरोसा को कैसे निभाता है।
भाकपा-माले झारखण्ड राज्य सचिव जनार्दन प्रसाद ने कहा है कि झारखंड विधानसभा चुनाव भाजपा के खिलाफ जनता का जनादेश है। भाजपा ने सीएए-एनआरसी, मंदिर निर्माण जैसे भावनात्मक सवालों को उभारने की कोशिश की, जिसे झारखंड की जनता ने नकार दिया है। भाजपा द्वारा साम्प्रदायिक ध्रुवीकरण करने की कोशिश को जनता ने नकार दिया है। भाकपा-माले ने चुनाव में जनता के सवालों को मुस्तैदी से रखा है और आनेवाले समय में सड़क से सदन तक जनता की आवाज बुलंद करेगा। बगोदर की जनता ने भाकपा-माले के विधायक बिनोद सिंह पर भरोसा किया है, अत: वे विधानसभा में जनता की आवाज बनेंगे।
पूर्व मंत्री व कांग्रेसी नेता थियोदोर किड़ो ने कहा कि झारखंड की जनता ने भाजपा की जनविरोधी नीतियों के विरुद्ध जनादेश देकर, कांग्रेस-झामुमो -राजद महागठबंधन को जीत दिलायी है। मुख्यमंत्री के अहंकार को आदिवासी-मूलवासियों ने करारा जवाब दिया है। यह जनादेश भाजपा की गलत आर्थिक नीतियों, मंहगाई-बेरोजगारी, पूंजीपतियों को जमीन देने की नीति, गलत स्थानीय नीति, आदिवासी परंपराओं को असंवैधानिक कहने, केंद्र की CAA और NRC जैसी असंवैधानिक नियम / कानून के खिलाफ है। अत: भाजपा के कुशासन से झारखंड को मुक्ति दिलाने के लिए झारखंडी जनता बधाई के पात्र है।
बता दें कि इस चुनाव में भाजपा को सबसे अधिक नुकसान कोल्हान व दक्षिणी छोटानागपुर प्रमंडल में हुआ। कोल्हान में झामुमो व कांग्रेस गठबंधन ने 13 सीटें मिलीं वहीं संताल परगना में भी गठबंधन को 13 सीटें मिलीं। कोल्हान में जहां भाजपा का खाता नहीं खुला, वहीं दक्षिणी छोटानागपुर में भी भाजपा पिछले चुनाव में जीती चार सीटें हार गयी। केवल पलामू प्रमंडल में भाजपा को बढ़त मिली। संताल परगना में भी भाजपा को तीन सीटों का नुकसान उठाना पड़ा, भाजपा की सीट सात से घटकर चार हो गयी। उत्तरी छोटानागपुर प्रमंडल में भी भाजपा को नुकसान हुआ।
इस चुनाव में एक सीट की बढ़ोतरी हुई। जबकि पिछले चुनाव में झामुमो को एक भी सीट नहीं मिली थी। इस वर्ष झामुमो दो सीट जीतने में सफल रही। गढ़वा व लातेहार सीट पर झामुमो के प्रत्याशी ने जीत दर्ज की। वहीं, कांग्रेस ने भाजपा से मनिका सीट छीन ली, जबकि भाजपा ने पांकी सीट जीती है। पांकी में पिछले चुनाव में कांग्रेस को जीत मिली थी।
पलामू में पिछले चुनाव में कांग्रेस को एक सीट मिली थी। इस चुनाव में भी कांग्रेस को एक सीट से ही संतोष करना पड़ा। हुसैनाबाद सीट पर एनसीपी के कमलेश सिंह ने जीत दर्ज। पिछले चुनाव में हुसैनाबाद से बसपा के प्रत्याशी विधायक चुने गये थे। वहीं, झाविमो पलामू में एक भी सीट नहीं जीत सका। डालटनगंज से भाजपा व लातेहार से झामुमो ने जीत दर्ज की, जबकि इस सीट पर 2014 में झारखंड विकास मोर्चा का कब्जा था।
25 में से 11 सीट भाजपा को मिली, लेकिन दो सीटों का नुकसान हुआ। यहां कांग्रेस का प्रदर्शन पिछले चुनाव की तुलना में काफी बेहतर रहा। वर्ष 2014 के विधानसभा चुनाव में उत्तरी छोटानागपुर प्रमंडल में कांग्रेस को मात्र दो सीटें मिली थीं। जबकि इस चुनाव में संख्या बढ़ कर पांच हो गयी। भाजपा के प्रत्याशियों ने कोडरमा, हजारीबाग, सिमरिया, जमुआ, बोकारो, चंदनकयारी, सिंदरी, निरसा, धनबाद, बाघमारा व मांडू सीट पर जीत दर्ज की। वहीं, कांग्रेस ने बरही, बड़कागांव, रामगढ़, बेरमो व झरिया सीट पर जीत दर्ज की। झामुमो को डुमरी, गिरिडीह, गांडेय, टुंडी सीट पर जीत मिली। झामुमो को पिछले चुनाव में तीन सीटें मिली थी। इस बार यहां से झामुमो को एक सीट का फायदा हुआ।
वर्ष 2014 में झाविमो को एक सीट मिली थी। इस बार भी झाविमो को एक सीट से संतोष करना पड़ा। वहीं, आजसू को रामगढ़ व टुंडी में हार का समाना करना पड़ा। हालांकि गोमिया सीट आजसू जीतने में सफल रही। धनवार से माले के विधायक राजकुमार यादव को जनता ने नकार दिया और झारखंड विकास मोर्चा सुप्रीमो बाबूलाल मरांडी को स्वीकार कर लिया। बगोदर से भाकपा माले के प्रत्याशी बिनोद सिंह ने जीत दर्ज की। पिछले चुनाव में उन्हें हार का मुंह देखना पड़ा था। बरकट्ठा से निर्दलीय प्रत्याशी ने जीत दर्ज की। चतरा सीट पर राजद को जीत मिली। पिछले चुनाव में राजद को एक भी सीट नहीं मिली थी।
संताल परगना प्रमंडल में झारखंड मुक्ति मोर्चा सबसे बड़ी पार्टी बन कर उभरी है। मधुपुर, बोरियो, बरहेट, दुमका, लिट्टीपाड़ा, महेशपुर, शिकारीपाड़ा, नाला व जामा सीट पर झामुमो के प्रत्याशियों ने जीत दर्ज की है। यहां पिछले चुनाव झामुमो को छह सीटें मिली थीं। इस चुनाव में तीन सीटों का फायदा हुआ है। झामुमाे को 18 में नौ सीटें मिली हैं। वहीं, भाजपा को चार सीटें मिली हैं, जबकि 2014 में भाजपा को सात सीटें मिली थीं। इस तरह भाजपा को तीन सीटों का नुकसान उठाना पड़ा। इस चुनाव में भाजपा के दो-दो मंत्रियों को हार का सामना करना पड़ा। दुमका से लुईस मरांडी व मधुपुर से राज पलिवार को हार मुंह देखना पड़ा। वहीं, सारठ से रणधीर सिंह फिर से विधायक चुने गये। राजमहल, गोड्डा, देवघर सीट को बचाने में भाजपा जरूर सफल रही। दूसरी तरफ झाविमो को भी इस चुनाव में एक सीट का नुकसान हुआ, 2014 में झाविमो को दो सीटें मिली थीं। इस चुनाव में सारठ में झाविमो प्रत्याशी को हार का सामना करना पड़ा, जबकि पोड़ैयाहाट सीट पर कब्जा बरकरार रहा। वर्ष 2014 में कांग्रेस को संताल परगना प्रमंडल में तीन सीटें मिली थीं। इस चुनाव में कांग्रेस को चार सीटें मिलीं। पाकुड़, जरमुंडी, महगामा व जामताड़ा सीट पर कांग्रेस के प्रत्याशी फिर से जीतने में सफल रहे।
कोल्हान प्रमंडल में झारखंड मुक्ति मोर्चा को शानदार सफलता मिली है। 14 में से 13 सीटों पर झामुमो व कांग्रेस गठबंधन का कब्जा रहा। झामुमो ने कोल्हान प्रमंडल में 11 सीटों पर जीत दर्ज की, जबकि कांग्रेस दो सीट मिली। कांग्रेस को पिछले चुनाव में एक भी सीट नहीं मिली थी। वहीं 2014 में झारखंड मुक्ति मोर्चा के पास सात सीटें जीती थी। इस चुनाव में संख्या बढ़कर 11 हो गयी। एक सीट पर निर्दलीय प्रत्याशी सरयू राय के कब्जे में रहा, उन्होंने पूर्व मुख्यमंत्री रघुबर दास को पराजित किया। वर्ष 2014 के चुनाव में भाजपा को यहां से 5 सीटें मिली थीं। इस वर्ष कोल्हान में भाजपा का खाता तक नहीं खुला।
दक्षिणी छोटानागपुर प्रमंडल में भाजपा को पिछले विधानसभा चुनाव की तुलना में चार सीटों का नुकसान हुआ। इसके बाद भी भाजपा दक्षिणी छोटानागपुर प्रमंडल में सबसे बड़ी पार्टी के रूप में उभरी है। भाजपा को वर्ष 2014 में नौ सीटें मिली थीं। इस चुनाव में पांच सीट पर ही जीत दर्ज कर सकी। रांची, कांके, हटिया, खूंटी व तोरपा सीट पर भाजपा ने जीत दर्ज की, जबकि गुमला, सिसई, खिजरी व सिमडेगा में हार का समाना करना पड़ा। वहीं, झामुमो व कांग्रेस आठ सीटें जीतने में सफल रही। दोनों दलों को चार-चार सीटें मिलीं। झारखंड मुक्ति मोर्चा को एक सीट का फायदा हुआ। झामुमो की सीट तीन से बढ़कर चार हो गयी। तमाड़, गुमला, सिसई व बिशनपुर सीट पर जीत दर्ज की। जबकि सिल्ली, तोरपा सीट हार गयी। कांग्रेस को 2014 में दक्षिणी छोटानागपुर प्रमंडल में एक भी सीट नहीं मिली थी। इस बार चार सीटों लोहरदगा, सिमडेगा, कोलेबिरा व खिजरी पर जीत मिली।
014 में हटिया में झाविमो को जीत मिली थी, इस वर्ष यह सीट भाजपा के खाते में चली गयी। जबकि मांडर विधानसभा सीट झाविमो ने भाजपा से छीन ली।
बता दें कि झारखंड में सत्ता की चाबी जनता ने झामुमो नेता हेमंत सोरेन के हाथों में सौंप दी है. आज झामुमो विधायक दल और घटक दलों की बैठक होने वाली है, इसके बाद हेमंत सोरेन राज्यपाल से मिलकर सरकार बनाने का दावा पेश करेंगे। 27 दिसंबर को मुख्यमंत्री पद की शपथ लेंगे। मुख्यमंत्री के रूप में यह हेमंत सोरेन का दूसरा कार्यकाल होगा।
महागठबंधन के पक्ष में चली चुनावी बयार में बड़े राजनीतिक उलट-फेर हुए। कई दिग्गज इस चुनाव में पटखनी खाए। कोल्हान में मुख्यमंत्री रघुवर दास की सीट के साथ ही सभी सीटें भाजपा हार गयी। दूसरी तरफ झामुमो ने अपने चुनावी इतिहास में अब तक का सबसे बेहतर प्रदर्शन किया है। पार्टी गठन से अब तक में झामुमो ने इस बार सबसे ज्यादा सीटें जीती हैं। कांग्रेस ने भी अप्रत्याशित प्रदर्शन करते हुए झामुमो को सत्ता तक ले जाने में बड़ी भूमिका निभायी है। राजद ने भी खाता खोला है।
जनता ने झामुमो को 30 सीटें सौंप कर उसे झारखंड का बड़ा दल बना दिया, जबकि कई मीडिया ने शुरूआती दौर के रूझान पर ही भाजपा को बड़े दल के रूप में प्रस्तुत करने लगा था। 16 सीटों पर कांग्रेस और राजद को एक सीट देकर महागठबंधन को 47 सीटों तक पहुंचा दी जबकि बहुमत का आंकड़ा 41 है। पुन: सत्ता का सपना लिए भाजपा 25 सीटों पर सिमट कर रह गई। भाजपा की सरकार में सहयोगी रही आजसू को भी गठबंधन तोड़ने का जबर्दस्त खामियाजा भुगतना पड़ा और उसे सिर्फ दो सीटों से संतोष करना पड़ा, जबकि उसने 53 सीटों पर चुनाव लड़ा था। झारखंड विकास मोर्चा ने भी बड़ी उम्मीदों के साथ सबसे अधिक 81 की 81 सीटों पर अपने उम्मीदवार चुनाव मैदान में उतारे थे। लेकिन उसे अपने सुप्रीमो बाबूलाल मरांडी और विधायक दल के नेता प्रदीप यादव के अलावा सिर्फ एक और सीट पर जीत हासिल हुई और उसे शेष 78 सीटों पर हार का सामना करना पड़ा।
भाकपा माले लिबरेशन के विनोद सिंह और राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी के कमलेश सिंह तथा दो निर्दलीयों ने भी सफलता हासिल की। जहां हार के बाद मुख्यमंत्री रघुवर दास ने संवाददाता सम्मेलन में दो टूक कहा कि यह हार उनकी व्यक्तिगत हार है और यह भाजपा की हार नहीं है। वहीं झामुमो के कार्यकारी अध्यक्ष हेमंत सोरेन ने इस जीत को जनता का स्पष्ट जनादेश बताया और कहा कि इससे उन्हें जनता की आकांक्षा पूरा करने के लिए संकल्प लेना होगा।
इस जनादेश पर हेमंत सोरेन ने कहा कि आज राज्य में जो परिणाम आये हैं वह हम सभी के लिए उत्साह का दिन है। जनता का जनादेश स्पष्ट है। उन्होंने कहा कि आज राज्य में आया जनादेश झारखंड के इतिहास में नया अध्याय साबित होगा। यह यहां मील का पत्थर साबित होगा। उन्होंने कहा कि हम यह पूरा प्रयास करेंगे कि लोगों की उम्मीदें टूटें नहीं। उन्होंने स्पष्ट किया कि महागठबंधन पूरे राज्य के सभी वर्गों, संप्रदायों और क्षेत्रों की आकांक्षाओं का ख्याल रखेगा।
इस चुनाव में कुछ रणनीतिकारों को लग रहा है कि असदुद्दीन ओवैसी की पार्टी ऑल इंडिया मजलिस-ए-इत्तेहादुल मुस्लिमीन ने गैर भाजपा दलों को नुकसान किया है, जबकि आंकड़ों पर नजर डालें तो उनका आकलन कोरा साबित हो रहा है।

बता दें कि झारखंड विधानसभा चुनाव- 2019 में अपनी पार्टी का खाता खोलने के लिए ओवैसी ने धुआंधार प्रचार किया था। लेकिन ओवैसी के उम्मीदवार जमानत भी नहीं बचा पाए।
बताते चलें कि झारखंड विधानसभा चुनावों असदुद्दीन ओवैसी की पार्टी ऑल इंडिया मजलिस-ए-इत्तेहादुल मुस्लिमीन (एआईएमआईएम) का प्रदर्शन निराशाजनक रहा। एआईएमआईएम का वोट शेयर नोटा से भी कम है। एआईएमआईएम का वोट शेयर 1.16 प्रतिशत है वहीं, नोटा का वोट शेयर 1.37 प्रतिशत है। चुनाव आयोग की वेबसाइट के मुताबिक एआईएमआईएम को सिर्फ 172872 वोट मिले हैं जबकि नोटा के तहत 203706 वोट पड़ चुके हैं। यही हाल आम आदमी पार्टी का भी है। आप को भी नोटा से कम वोट पड़े हैं।

This post was last modified on December 24, 2019 6:37 pm

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