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Wednesday, September 29, 2021

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यौन उत्पीड़न की शिकार महिला की पेगासस जासूसी से सवालों के घेरे में आ गए हैं जस्टिस गोगोई के फैसले

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जस्टिस रंजन गोगोई उच्चतम न्यायालय के चार वरिष्ठ जजों में शामिल थे जिन्होंने आजादी के बाद देश में पहली बार शुक्रवार12 जनवरी, 2018 को प्रेस कॉन्फ्रेंस कर हंगामा मचा दिया। चीफ जस्टिस दीपक मिश्रा के बाद सुप्रीम कोर्ट के 4 वरिष्ठ जज जस्टिस चेलमेश्वर, जस्टिस मदन लोकुर, जस्टिस कुरियन जोसेफ, जस्टिस रंजन गोगोई ने मीडिया से बातकर शीर्ष अदालत के प्रशासन में अनियमितताओं पर सवाल खड़े किए लेकिन जब चीफ जस्टिस दीपक मिश्रा का रिटायरमेंट हुआ और जस्टिस रंजन गोगोई देश के चीफ जस्टिस बने तो उन्होंने उच्चतम न्यायालय की कार्यप्रणाली में कोई बदलाव नहीं किया, जिसे लेकर चार जजों ने प्रेस कांफ्रेंस किया था। और तो और अब पेगासस स्नूपिंग ने खुलासा किया है कि जस्टिस गोगोई पर यौन उत्पीड़न का आरोप लगाने वाली उन्हीं की एक महिला कर्मचारी से जुड़े 11 फोन नंबर भी सर्विलांस के लिए चुने गए थे। तो कहीं यह कारण तो नहीं था जिसने जस्टिस गोगोई के हाथ बांध दिए थे।  

मोदी सरकार बार-बार कहती है कि सिर्फ राष्ट्र हित को ध्यान में रख कर ही किसी की निगरानी की जाती है या उसका फ़ोन इंटरसेप्ट किया जाता है। सवाल उठता है कि उस महिला से राष्ट्र को क्या ख़तरा था। इतना ही नहीं, जिस समय उस महिला की सुनवाई उच्चतम न्यायालय के विशेष पैनल के सामने हुई, उस समय भी उसका फोन संभावित सूची में ही था। यानी उस सुनवाई के दौरान क्या हुआ, इसकी जानकारी दूर बैठे लोगों को हो सकती थी।

अब लाख टके का सवाल यही है कि महिला कर्मचारी से जुड़े 11 फोन नंबर को  सर्विलांस पर लेने का आदेश किसका था? क्या यह पूरा स्कैंडल उस विशेष साजिश से जुड़ा हुआ है जिसको उच्चतम न्यायालय ने स्वत:संज्ञान लेकर सुना था और अंत में सुनवाई बंद कर दी गयी थी। यही नहीं इस कांड में क्लीन चिट पाने के बाद तत्कालीन चीफ जस्टिस ने राफेल, अयोध्या भूमि विवाद में जो फैसले दिए वे सरकार और सत्तारूढ़ दल को सूट करते थे। तो क्या इस स्कैंडल ने न्याय के साथ समझौता करने को उच्चतम न्यायालय को मजबूर किया? इसलिए उच्चतम न्यायालय को न केवल स्वत: संज्ञान मामले को फिर से खोलने की आवश्यकता है बल्कि पूर्व चीफ जस्टिस गोगोई के कार्यकाल के अंतिम छह महीनों में उनकी पीठ या उनकी अगुआई वाली पीठ ने जो महत्वपर्ण फैसले दिए हैं, न्याय के हित में उनकी उच्चतम न्यायालय द्वारा स्वयं संविधान के आलोक में गहन समीक्षा किये जाने की जरुरत है।

उच्चतम न्यायालय ने इस साल फरवरी में न्यायपालिका के खिलाफ “बड़ी साजिश” की जांच के लिए लगभग दो साल पहले अपने द्वारा उठाए गए स्वत: संज्ञान मामले को बंद करते हुए कहा था कि इसकी सुनवाई जारी रखने से कोई उपयोगी उद्देश्य पूरा नहीं होगा।

इस बात का जवाब पूरा देश जानना चाहता है कि क्या पेगासस कांड की सीजेआई के रूप में गोगोई के कार्यकाल के दौरान कार्यपालिका को न्यायिक समर्पण के लिए परिस्थितियां पैदा करने में कोई भूमिका थी? इसलिए उच्चतम न्यायालय को इस बात की जांच करने के लिए बड़ी साजिश पर स्वत: संज्ञान मामले को फिर से खोलने की तत्काल आवश्यकता है कि क्या महिला शिकायतकर्ता और उसके परिवार को निगरानी में रखने का कोई प्रयास किया गया था और न्यायपालिका पर नियंत्रण हासिल करने का कोई प्रयास किया गया था।

उच्चतम न्यायालय को यौन उत्पीड़न कांड से संबंधित सवालों के जवाब खोजने की जरूरत है; कहीं ऐसा न हो कि यह मुद्दा न्यायपालिका पर एक स्थायी दाग बना रहे। नए घटनाक्रम के आलोक में, स्वत: संज्ञान मामले को दिया गया नाम, जो तब खाली लग रहा था, अब सार्थक लग रहा है। हकीकतन यह न्यायपालिका की स्वतंत्रता को प्रभावित करने वाले बड़े सार्वजनिक महत्व का मामला है।

दरअसल उच्चतम न्यायालय की एक स्टाफर ने गोगोई पर अप्रैल 2019 में आरोप लगाया था। द वायर का कहना है कि महिला के आरोप लगाने के कुछ दिनों बाद उसके तीन में से दो नंबरों को किसी अज्ञात भारतीय एजेंसी ने सर्विलांस के संभावित टारगेट के तौर पर चुना था। ये एजेंसी पेगासस स्पाइवेयर बनाने वाली इजरायली साइबर सिक्योरिटी कंपनी एनएसओ की क्लाइंट थी। द वायर की रिपोर्ट कहती है कि महिला का तीसरा फोन नंबर इसके एक हफ्ते बाद संभावित सर्विलांस के लिए चुना गया था।

दिसंबर 2018 में महिला को जूनियर कोर्ट असिस्टेंट के पद से हटा दिया गया था। ये महिला के उन दावों के कई हफ्तों बाद हुआ था, जिसमें उन्होंने कहा था कि उन्होंने गोगोई के प्रस्तावों को खारिज किया था। अप्रैल 2019 में महिला के एक हलफनामे में आरोप रिकॉर्ड करने के कुछ दिन बाद ही उन्हें संभावित सर्विलांस के लिए चुना गया था। पेगासस सर्विलांस से जुड़ी लीक हुई लिस्ट में महिला के पति और दो भाइयों के आठ फोन नंबर भी टारगेट किए गए थे। शिकायतकर्ता और उनके परिवार के 11 फोन नंबरों को संभावित सर्विलांस के लिए चुनना पेगासस प्रोजेक्ट के इंडिया चैप्टर का सबसे बड़ा क्लस्टर है।

महिला ने अपना सशपथ हलफनामा सुप्रीम कोर्ट के 22 सिटिंग जजों को भेजा था। इसमें उन्होंने दावा किया था कि गोगोई के प्रस्तावों को ठुकराने के बाद उनके पति और दूसरे पारिवारिक सदस्यों को जानबूझकर परेशान किया जा रहा है। महिला के पति और देवर उनके कथित यौन उत्पीड़न के समय दिल्ली पुलिस में काम करते थे। महिला को नौकरी से निकाले जाने के बाद उनके पति और देवर को जनवरी 2019 में निलंबित कर दिया गया था।

महिला ने दावा किया था कि गोगोई के प्रस्तावों को ठुकराने के बाद कुछ ही हफ्तों में उनका तीन बार ट्रांसफर किया गया, अनुशासनिक कार्रवाई की गई और फिर नौकरी से निकाल दिया गया। उनके देवर को सीजेआई के विवेकाधीन कोटे से नियुक्ति मिली थी और उसे भी बिना किसी स्पष्टीकरण के ऑफिस से हटा दिया गया। इसके अलावा महिला के खिलाफ मार्च 2019 में रिश्वत का एक केस दर्ज किया गया, जिसमें उन्हें गिरफ्तार कर एक दिन के लिए जेल भेज गया। वो अभी जमानत पर बाहर हैं।

20 अप्रैल 2019 को एक स्पेशल सिटिंग के दौरान जस्टिस गोगोई खुद अध्यक्षता कर रहे थे और उन्होंने दावा किया कि उनके खिलाफ़ आरोप ‘एक बड़ी साजिश’ का हिस्सा हैं। गोगोई ने दावा किया था कि न्यायपालिका की आजादी खतरे में है और अगर जजों को इन परिस्थितियों में काम करना होगा, तो ‘अच्छे लोग इस पद पर कभी नहीं आएंगे।

वहीं, शिकायतकर्ता धमकियों और ‘संवेदनशीलता के अभाव’ में सुनवाई से पीछे हट गई। यौन उत्पीड़न के आरोपों के बावजूद रंजन गोगोई 17 नवंबर 2019 तक चीफ जस्टिस रहे थे। रिटायरमेंट के छह महीनों के अंदर ही गोगोई को केंद्र सरकार ने राज्यसभा के लिए नामित किया था।

यौन उत्पीड़न कांड के बाद नवंबर 2019 में चीफ जस्टिस रंजन गोगोई की अगुआई में उच्चतम न्यायालय की पीठ ने अयोध्या की विवादित जमीन का मालिकाना हक रामलला को दे दिया। इसके साथ ही पीठ ने केंद्र सरकार को निर्देश दिया कि अयोध्या में कहीं और मुस्लिमों को 5 एकड़ जमीन दी जाए ताकि वे मस्जिद का निर्माण कर सकें। कोर्ट ने केंद्र सरकार को आदेश दिया कि एक ट्रस्ट बनाकर राम मंदिर निर्माण में मदद ली जाए। ट्रस्ट के गठन के लिए कोर्ट ने केंद्र सरकार को 3 महीने का वक्त दिया।

इसी प्रकार नवंबर 2019 में ही रंजन गोगोई की अध्यक्षता में उच्चतम न्यायालय  की पीठ ने राफेल डील मामले में केंद्र की नरेंद्र मोदी सरकार को क्लीनचिट दे दी। कांग्रेस सहित अन्य विपक्षी दलों ने केंद्र सरकार पर 36 राफेल लड़ाकू विमानों की खरीद में अनियमितता का आरोप लगाया था। बाद में यह मामला सुप्रीम कोर्ट में चला गया था। राफेल डील मामले में विपक्षी दलों ने समीक्षा याचिका दायर की थी लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने खारिज कर दिया। अब फ़्रांस में ही इस डील की अनियमितताओं की आपराधिक जाँच शुरू हो गयी है। 

(वरिष्ठ पत्रकार जेपी सिंह की रिपोर्ट।)

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