Sunday, December 5, 2021

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संभल और सीतापुर के बाद बागपत में किसान नेताओं को दो लाख के बॉन्ड का नोटिस

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उत्तर प्रदेश के संभल और सीतापुर के बाद बागपत जिला प्रशासन ने भी केंद्र सरकार के तीन नए और विवादित कृषि कानूनों के खिलाफ आंदोलन करने वाले किसानों को नोटिस जारी किया है और शांति बरकरार रखने का वादा करते हुए दो लाख रुपये के निजी बॉन्ड पर हस्ताक्षर करने के लिए कहा है। इलाहाबाद हाईकोर्ट में सीतापुर का मामला उठने और जवाब तलब होने पर यूपी सरकार ने ये नोटिस वापस ले लिए थे।

रालोद पार्टी के पूर्व विधायक वीरपाल सिंह राठी ने कहा कि 31 जनवरी को बड़ौत तहसील में एक महापंचायत में शामिल होने से एक दिन पहले उन्हें और छह अन्य लोगों को नोटिस मिला था। महापंचायत में फैसला किया गया था कि क्षेत्र के लोग दिल्ली की सीमाओं पर जारी आंदोलन में शामिल होने के लिए गाजीपुर और सिंघु बॉर्डर के लिए कूच करेंगे।

राठी के अनुसार उन्हें 30 जनवरी को नोटिस मिला और पता चला कि जिले में लगभग 200 किसानों को इस तरह के नोटिस जारी किए गए हैं। ये नोटिस जारी करके प्रशासन चाहता है कि हम किसानों का समर्थन करना बंद कर दें। उन्होंने महापंचायत में भाग लिया और उनके साथ नोटिस पाने वाले छह अन्य लोगों ने भी ऐसा ही किया।

जिलाधिकारी राजकमल यादव का कहना है कि उन्हें इस मामले के बारे में कोई जानकारी नहीं है। वहीं, नोटिसों पर हस्ताक्षर करने वाले बड़ौत के सब-डिविजनल मजिस्ट्रेट दुर्गेश मिश्रा ने टिप्पणी करने से इनकार कर दिया। अतिरिक्त जिलाधिकारी अमित कुमार ने कहा कि राज्य में होने वाले आगामी पंचायत चुनावों और अन्य कानून-व्यवस्था के मुद्दों को ध्यान में रखते हुए सीआरपीसी की धारा 107/116 के तहत नोटिस जारी किए गए हैं। यह किसानों के विरोध से संबंधित नहीं है। बड़ौत के क्षेत्राधिकारी अजय कुमार शर्मा ने कहा कि हमने प्रशासन से वीरपाल सिंह राठी सहित छह व्यक्तियों को बांड भेजने का अनुरोध किया, क्योंकि यह संदेह है कि वे अपने भाषणों के माध्यम से कृषि कानूनों का विरोध कर रहे लोगों को उकसा सकते हैं। ऐसी आशंका है कि उनके उकसावे की वजह से विरोध हिंसक हो सकता है।

वीरपाल सिंह को जारी किए गए नोटिस में शांति बनाए रखने के लिए उन्हें 2 लाख रुपये के निजी बॉन्ड पर हस्ताक्षर करने और एक साल के लिए उतनी ही राशि की दो प्रतिभूति सौंपने के लिए कहा गया है। बागपत के छपरौली से साल 2012 में विधानसभा चुनाव जीतने वाले सिंह ने कहा कि प्रशासन ने यह नोटिस जारी किया कि हम कानून और व्यवस्था का उल्लंघन कर सकते हैं। मैं अब तक प्रशासन के सामने पेश नहीं हुआ हूं। तीन कृषि कानून पर हमारा मौन विरोध जारी रहेगा।

बागपत के एक प्रभावशाली ‘देश खाप’ के सदस्य संजीव चौधरी ने कहा, ‘प्रशासन ने लगभग 200 किसानों को नोटिस जारी किए हैं, जो विरोध प्रदर्शन का सक्रिय समर्थन कर रहे थे। गरीब किसानों को 50 हजार रुपये से लेकर 2 लाख रुपये तक के निजी बांड की मांग के लिए नोटिस जारी किए गए थे, ताकि सुनिश्चित किया जा सके कि वे बाहर न निकलें और विरोध में शामिल हों।

पिछले महीने इलाहाबाद हाईकोर्ट ने सीतापुर जिला प्रशासन से एक जनहित याचिका पर जवाब मांगा था, जिसमें आरोप लगाया गया था कि कानून-व्यवस्था की समस्या पैदा कर सकने की आशंका पर जिला प्रशासन ने किसानों से 50 हजार रुपये से लेकर 10 लाख रुपये तक की भारी-भरकम निजी बॉन्ड के साथ प्रतिभूति भी जमा करने के लिए कहा गया था। हाईकोर्ट के जवाब तलब करने पर सरकार ने अपने कदम पीछे खींच लिए थे।

उत्‍तर प्रदेश सरकार ने हाईकोर्ट में कहा था कि उसने उन 162 किसानों को शांतिभंग को लेकर जारी नोटिस पर कार्यवाही नहीं करने का फैसला किया है, जिनसे इस मामले में स्‍पष्‍टीकरण मांगा गया था कि उनमें से प्रत्‍येक को 10 लाख रुपये का बांड भरने को क्‍यों नहीं कहा जाए। यह नोटिस 19 जनवरी को सीतापुर में ट्रैक्‍टर रखने वाले ज्‍यादातर किसानों को इस आशंका के तहत जारी गए थे कि ये जिले में कानून व्‍यवस्‍था को भंग कर सकते हैं।

इसके पहले हाईकोर्ट ने राज्‍य और जिले के अधिकारियों से यह स्‍पष्‍ट करने को कहा था कि गरीब किसानों को यह नोटिस कैसे और क्‍यों जारी किए गए? किसानों की ओर से पेश वकीलों के जरिये पेश याचिका में कहा गया था कि ये नोटिस आधारहीन हैं और किसी शख्‍स के मूलभूत अधिकारों का उल्‍लंघन करते हैं। एडिशनल एडवोकेट जनरल वीके शाही ने जानकारी दी थी कि नोटिस 162 किसानों को जारी किए गए थे जिसमें 10 लाख रुपये का बॉन्ड भरने को कहा गया था, इसमें से 43 लोग पेश हुए थे। लेकिन सभी लोगों के खिलाफ कार्यवाही रोक ली गई है।

हाईकोर्ट ने कहा था कि वीके शाही ने न्‍यायाधीशों को इस बात का आश्‍वासन दिया है कि वे सीतापुर के डिस्ट्रिक्‍ट मजिस्‍ट्रेट को निर्देशित करेंगे कि भविष्‍य में ऐसी किसी भी कार्यवाही से पहले यह सावधानी बरतें कि इससे किसी को अनावश्‍यक तौर पर परेशानी न हो। यही नहीं, डीएम अपने मातहत काम करने वाले को भी यह निर्देश दें। इससे पहले पिछले साल दिसंबर में संभल जिला प्रशासन के ऐसे ही कदम का जोरदार विरोध हुआ था।

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