आखिर क्या है पश्चिम बंगाल की मनरेगा महिला मजदूरों की समस्या, जो उन्हें जंतर-मंतर तक खींच लाई

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नई दिल्ली। पहली फरवरी को वित्तमंत्री निर्मला सीतारमण ने अमृतकाल का आम बजट पेश किया। इस साल पेश किए गए बजट में मनरेगा योजना में भारी कटौती की गई है। मनरेगा के लिए जीडीपी का मात्र 0.198% (60 हजार करोड़) आवंटित किया गया। जो अब तक के इतिहास का सबसे कम बजट है। जिसका असर अब धरने के रूप में देखने को मिल रहा है।

एक फरवरी को आए इस बजट के बाद दो फरवरी को देश के अलग-अलग हिस्सों में मनरेगा कर्मियों ने विरोध प्रदर्शन किया। मनरेगा के बजट में हुई कटौती को लेकर केंद्र सरकार को पत्र भी लिखे गए। लेकिन उसका कोई जवाब नहीं आता देख मजदूरों ने दिल्ली के जंतर-मंतर का रुख किया। जहां 13 फरवरी से लोग धरने पर बैठे हैं। इस धरने में देश के करीब 13 राज्यों से लोग हिस्सा ले रहे हैं। जिसमें सबसे ज्यादा महिलाएं हैं।

आंदोलन की शुरुआत में बिहार के लोगों ने हिस्सा लिया। अब पश्चिम बंगाल के लोग अपनी मांगों को लेकर जंतर-मंतर पर डटे हुए हैं। लोगों का कहना है कि जब तक सरकार उनकी बात को नहीं मानेगी, वह यहां से वापस नहीं जाएंगे।

2 फरवरी 2006 को ग्रामीण रोजगार गारंटी कानून (नरेगा) को देश के 100 जिलों में लागू किया गया था। जिसका मुख्य मकसद 100 दिनों तक मजदूरों को काम देना और 15 दिनों में काम का भुगतान करना है। इस योजना का एक मकसद रोजगार की तलाश में गांव से शहरों की ओर हो रहे पलायन को रोकना भी था। लेकिन योजना के 15 साल के बाद ही इसकी स्थिति में कई तरह के बदलाव आ गए हैं। जिसके कारण आज लोग धरना प्रदर्शन करने को मजबूर हैं।

पश्चिम बंगाल के करीब आठ जिलों के लोग जंतर-मंतर पर धरना-प्रदर्शन करने आए हैं। इसमें बड़ी संख्या में महिलाएं शामिल हैं। इन महिलाओं के पास स्लोगन के साथ कई प्लेकार्ड थे। जिसमें महिलाओं ने अपने दर्द को बयां किया था।

केंद्र सरकार से पैसा नहीं मिला

प्रतिमा महतो पश्चिम बंगाल के पुरुलिया से आई थीं। उन्होंने बांग्ला का एक प्लेकार्ड पहन रखा था। जिसमें लिखा था कि “घूसखोर कैसे जान पाएंगे कि मजदूरों के घरों में आटा कहां से आएगा”। प्रतिमा इस भीड़ में वो महिला थीं जिसके परिवार के छह लोगों ने अलग-अलग समय पर मनरेगा में 90 दिन तक काम किया है।

वह बताती हैं कि ‘लंबे समय तक हमें पैसा नहीं मिला। जिसके बाद से हमने पंचायत सेक्रेटरी से लेकर डीएम स्तर तक के हर अधिकारी के पास पैसे के लिए गुहार लगाई लेकिन कोई हमारी सुनने को तैयार नहीं है’।

प्रतिमा महतो

प्रतिमा महतो बताती हैं कि ‘वो सारे पेपर लेकर पंचायत प्रधान के पास गई थीं। उन्हें जाकर बोला कि हमारे पास काम के सारे दस्तावेज हैं लेकिन हमें पैसे नहीं मिल रहे हैं। जिस पर उनका साफ जवाब था कि जब केंद्र सरकार की तरफ से पैसा नहीं आ रहा है तो हम लोग कहां से दें’।

उन्होंने आगे बताया कि ‘हर किसी ने हमें बस एक ही जवाब दिया कि केंद्र सरकार की तरफ से पैसा नहीं आ रहा है तो हम कहां से दें। बीडीओ ने कहा कि हमारे हाथ में कुछ नहीं है। केंद्र सरकार की तरफ से पैसा आएगा तो लोगों को दिया जाएगा’।

प्रतिमा कहती हैं कि ‘पिछले डेढ़ साल से हमें एक पैसा नहीं मिला है। धीरे-धीरे हमारी आर्थिक स्थिति खराब होने लगी है। पैसों के बिना घर चलाना मुश्किल हो गया है। अंत में मेरे बेटे काम करने बाहर चले गए। ताकि घर चलाया जा सके’।

नई नियम बने जी का जंजाल

पुरुलिया से संध्या कुमारी भी आई हैं। उनके साथ भी उसी तरह की स्थिति है। संध्या का कहना था कि ‘मुझे भी पिछले 14 महीने से एक पैसा नहीं मिला है। पिछली फरवरी को हम 21 लोगों ने तीन गड्ढे किए थे। करीब 21 दिन तक हमने काम किया लेकिन अभी तक एक पैसा नहीं मिला’।

संध्या इन सबके पीछे कई वजहें बताती हैं। जिसमें एक बड़ी समस्या टेक्नोलॉजी को लेकर है। आपको बता दें कि मनरेगा में कई नए नियम लाए गए हैं। जिसमें एक नियम यह भी है कि काम होने के बाद अधिकारी मजदूर की फोटो खींचकर लेकर जाते हैं। उसे अपलोड करते हैं, जिसके बाद उस काम का पैसा मिलता है।

संध्या बताती हैं कि ‘अधिकारी हो रहे काम की फोटो लेने आते हैं और कहते हैं कि यहां नेटवर्क ही नहीं आता है। जिसके चलते फोटो बीडीओ तक नहीं पहुंच पाते हैं’।

संध्या कुमारी

वो कहती हैं कि ‘हम लोग गरीब लोग हैं। किसी तरह महिलाएं काम करके अपने घर में हाथ बंटाती हैं। लेकिन नई-नई टेक्नोलॉजी आने के कारण लोगों को परेशानी का सामना करना पड़ता है। ऐसी परिस्थिति में भी हमने स्वयं फोटो खींचकर अधिकारी तक पहुंचाने की कोशिश की। लेकिन पैसा अभी तक नहीं आया है’।

पश्चिम बंगाल खेत मजदूर समिति की स्टेट कमेटी की सदस्य अनुराधा तलवार भी इसी धरने में महिलाओं के साथ बैठी हैं। अनुराधा नरेगा को लागू करने वाले सदस्यों में से एक हैं। वह कहती हैं कि ‘मनरेगा को लेकर आए दिन आते नए-नए नियम लोगों के लिए जी का जंजाल बने हुए हैं। सबसे ज्यादा परेशानी महिलाओं को होती है और यह भी बात सही है कि इसमें ज्यादातर महिलाएं ही काम करती हैं’।

अनुराधा कहती हैं कि ‘ज्यादातर महिलाएं गरीब परिवार से होती हैं। जिसके कारण इनके पास एंड्रायड मोबाइल भी नहीं हैं। लोग मजबूरी में कर्ज लेकर मोबाइल खरीद रहे हैं क्योंकि आजकल सारे काम मोबाइल से हो रहे हैं। आधार कार्ड के साथ-साथ अब लोगों की हाजिरी भी इससे ही लगती है’।

उन्होंने कहा कि ‘अब तो सरकार ने एनएमएमएस ऐप (नेशनल मोबाइल मॉनिर्टिंग सॉफ्टवेयर) को जरूरी कर दिया है। ग्रामीण इलाकों में नेटवर्क की परेशानी रहती है। जिसके कारण हाजिरी भी समय पर नहीं लगती है। दूसरी सबसे बड़ी समस्या प्रतिदिन की फोटो अपलोड करने की है’।

वो बताती हैं कि ‘काम करने वाले मजदूरों की दो बार फोटो ली जाती है। कई बार किसी कारण से कोई महिला वहां मौजूद नहीं रही तो उसकी अनुपस्थिति दर्ज हो जाती है। जबकि पहले मास्टर रोल पर हाजिरी लगती थी। जिसके कारण कम से कम पूरी हाजिरी मिल पाती थी’।

सत्ताधारियों का दबदबा

पश्चिम बंगाल खेत मजदूर संघ की सदस्य सपना का कहना है कि वह मनरेगा में काम तो नहीं करती हैं, लेकिन महिलाओं को काम दिलाने के लिए उनके बाकी के कागज पत्र के काम पूरे करके देती हैं। सपना पश्चिम दिनाजपुर जिले की कुछ मनरेगा महिलाओं के साथ दिल्ली के जंतर-मंतर पर आई हैं।

सपना ने पश्चिम बंगाल में मनरेगा महिला मजदूरों की जो स्थिति बताई, वह चौंकाने वाली है। राज्य में सत्ताधारी लोगों की एक बड़े काम से लेकर मनरेगा की दिहाड़ी तक में कितना रोल है, यह साफ दिखाई देता है।

सपना बताती हैं कि ‘महिलाएं पिछले साल से ही 90 दिन काम करने के बाद पैसे न मिलने की शिकायत कर रही हैं। जिसको लेकर वो और अन्य महिलाएं लगातार अधिकारियों से मिलीं, लेकिन आजतक किसी को पेमेंट नहीं मिली’।

दूसरी परेशानी यह है कि मनरेगा में काम करने के लिए आपके पास जॉब कार्ड होना अनिवार्य है। स्थिति यह है कि जो भी व्यक्ति काम कर रहा है। उसका जॉब कार्ड सुपरवाइजर के पास रहता है। लोगों को यह कार्ड नहीं दिया जा रहा है’।

सपना बताती हैं कि ‘पश्चिम बंगाल में तो यह भी देखा जा रहा है कि जिनके पास जॉब कार्ड नहीं है उनसे भी काम कराया जा रहा है और किसी एक जॉब कार्ड धारक के अकांउट में पैसे मंगाकर लोगों को दिए जा रहे हैं। उसमें भी कुछ पैसे दलाल अपने पास रख लेते हैं और कुछ कर्मचारी को दे देते हैं।

इसके बाद पश्चिम बंगाल में सरकारी हस्तक्षेप भी बहुत है। जो लोग सत्ताधारी पार्टी के हैं उन्हें काम जल्दी मिलता है। इतना ही नहीं महिलाओं की हमेशा शिकायत रहती है कि राजनीतिक लोगों का इतना दबदबा है कि काम देने में भी भेदभाव दिया जाता है’।

सपना कहती हैं कि ‘अगर कोई व्यक्ति टीएमसी से ताल्लुक रखता है तो उसे गांव के नजदीक ही काम दिया जाता है। अगर कोई आम आदमी है तो उसे पांच किलोमीटर दूर भेज दिया जाता है। ऐसा ही पेमेंट देने में भी किया जाता है’।

जंतर मंतर पर धरना प्रदर्शन

वह कहती हैं कि ‘अब मनरेगा में ज्यादातर महिलाएं काम करती हैं। इसका सबसे बड़ा कारण है कम दिहाड़ी। पुरुष कम दिहाड़ी के चलते गांव से बाहर शहरों में काम कर रहे हैं और महिलाएं मनरेगा में। मनरेगा में इस वक्त 213 रुपये दिहाड़ी है। अगर कोई व्यक्ति पांच किलोमीटर आने जाने में ही भाड़ा खर्च कर देगा तो उसे बचेगा क्या?’

मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार मनरेगा को लेकर पिछले लंबे समय से चल रहे विरोध प्रदर्शन के बीच सरकार ने अपना पक्ष रखते हुए कहा कि मनरेगा के करीब 96 फीसदी मामलों में भुगतान पंद्रह दिनों में कर दिया गया है। काम पाने की योग्यता रखने वाले लगभग 99.81 फीसदी परिवारों को काम दिया गया है। बाकी एनएमएमएस ऐप को लेकर जो भी परेशानी आ रही हैं। उन्हें जल्द से जल्द निपटा लिया जाएगा।

पश्चिम बंगाल की एक समस्या राजनीति भी है। केंद्र में भाजपा की सरकार है और राज्य में तृणमूल कांग्रेस है। दोनों की आपसी टकरार से पूरा देश वाकिफ है। जिसका नतीजा आम मजदूरों को भुगताना पड़ा है क्योंकि मनरेगा का भुगतान केंद्र सरकार करती है और इसके काम राज्य के अधिकारी देखते हैं। कई बार राज्य सरकार द्वारा यह कहा गया कि उन्हें सही समय पर केंद्र से पैसे नहीं मिलते हैं।

दूसरों के घरों में काम करने को मजबूर

जंतर-मंतर पर अपनी मांगों को लेकर धरने पर बैठे लोगों में एक महिला ऐसी भी थीं जो मस्टर रोल लेकर आई थीं ताकि यह बता सकें कि उन्होंने कितने दिन काम किया है। अकाली सोदार नाम की ये महिला दक्षिण दिनाजपुर जिले से आई हैं। अकाली लंबे समय से मनरेगा में काम कर रही हैं। उन्होंने पिछले साल 90 दिन तक मैदान को मिट्टी से समतल करने का काम किया था लेकिन उसका मेहनताना अभी तक नहीं मिल पाया है।

अब वह हमें अपनी हाजिरी की रसीद (मस्टर रोल) दिखाती हैं और कहती हैं कि ‘देखिए मैंने पूरा काम किया है। अभी तक न तो इसके हमें पैसे मिले हैं और न ही आगे काम मिलने की कोई आस दिख रही है’। लगातार लंबे समय से पैसे नहीं मिलते देख अकाली ने खेतों में मजदूरी करने के साथ-साथ लोगों के घरों में भी काम करना शुरू कर दिया है। वह कहती हैं कि घर में चार लोग हैं। बेटा और बेटी दोनों ही सरकारी स्कूल में पढ़ते हैं।

अकाली सोदार

पति बाहर काम करते हैं क्योंकि गांव के पास काम मिलता नहीं है। अगर कभी मिल भी जाता है तो पैसे इतने कम मिलते हैं कि उससे गुजारा करना बहुत मुश्किल होता है। इसलिए पति बाहर काम करने चले जाते हैं और वो खुद पिछले एक साल मजदूरी कर रही हैं।

वह बताती हैं कि ‘मेरे साथ काम करने वाली और कई महिलाएं है जो अब मजबूरी में खेतों में काम करने के साथ-साथ दूसरे के घरों में काम करने के लिए बाहर जा रही हैं’।

ऐसी ही स्थिति देश के अलग-अलग हिस्सों में मनरेगा के तहत काम करने वाली महिलाओं की है। महिलाओं को पुरुषों से ज्यादा परेशानी का सामना करना पड़ता है। पुरुष काम न मिलने पर महानगरों में काम करने चले जाते हैं, लेकिन महिलाओं के लिए यह संभव नहीं है।

पश्चिम बंगाल से जंतर मंतर पर आए ज्यादातर लोगों को कहना था कि उन्हें 14 महीने से पैसे नहीं मिले हैं। लेकिन मनरेगा की सरकारी वेबसाइट में दिए आंकड़ों के अनुसार वित्तीय वर्ष 2022-23 में 14,97,05,876 एक्टिव कर्मचारी हैं। जिसमें सिर्फ पश्चिम बंगाल में ही 1,53,53,079 एक्टिव कर्मचारी है। जंतर-मंतर पर धरने पर बैठे लोगों कहना है कि फरवरी, 2022 के बाद उन्हें काम ही नहीं मिला है।

पश्चिम बंगाल खेत मजदूर कमेटी की जनरल सेक्रेटरी उत्तम गायन का कहना है कि ‘पश्चिम बंगाल के विभिन्न इलाकों में साल 2019 से ही काम बंद है। जिसके कारण 26 दिसंबर 2019 के बाद से ही हम अपनी मांगों के लेकर विरोध प्रदर्शन कर रहे हैं’।

उत्तम गायन ने कहा कि ‘इस साल 10 फरवरी को सभी जिलों के डीएम को ज्ञापन दिया गया। जिसमें बताया गया है कि कितने लोगों ने काम किया है। किनको पेमेंट मिल गई है, कितनी बाकी है। यह सारी जानकारी विस्तार पूर्वक बताई गई है। ताकि लोगों को सही से चिन्हित किया जा सके’।

वह बताते हैं कि ‘इससे पहले हमने अपनी समस्याओं को लेकर हाईकोर्ट में पीआईएल लगाई थी। जिसमें नौ जनवरी को हाईकोर्ट ने सभी जिलाधिकारियों को आदेश दिया था कि कर्मचारियों की तीन महीने की पेमेंट जल्द से जल्द की जाए। इसके बाद भी कोई कार्रवाई नहीं हुई। जिसके बाद हमें बाध्य होकर यहां आना पड़ा है’। 

इस बात पर अनुराधा तलवार टिप्पणी करती हुई कहती हैं कि ‘पेमेंट के मामले में सबसे बुरी स्थिति पश्चिम बंगाल की है। यहां 26 दिंसबर 2020 के बाद कोई भी एफटीओ (फंड ट्रांसफर ऑर्डर) नहीं दिया गया है’।

ये तो है फंड न मिलने की परेशानी, इसके अलावा भी कई परेशानी हैं। जिसमें काम देते वक्त यह जरूर देखा जाता है कि मजदूर सत्ताधारी पार्टी से ताल्लुक रखती हैं कि नहीं। इसी के आधार पर महिलाओं को प्रताड़ित किया जाता है।

यहां जितनी महिलाएं आई थीं। उनमें से ज्यादातर सत्ताधारी पार्टी से ताल्लुक नहीं रखती हैं। इसमें ही पुरुलिया से आई हुई महिलाओं का कहना था कि ‘उन्हें पत्थर तोड़ने का काम दिया जाता है’। चूंकि पुरुलिया पठारी इलाका है। इसलिए जो महिलाएं सत्ताधारी पार्टी से नहीं है उन्हें कष्टदायक काम दिए जाते हैं।

अनुराधा बताती हैं कि ‘पिछले डेढ़ साल से पैसे न मिल पाने के कारण विधवा और सिंगल मदर के लिए घर चला पाना मुश्किल होता जा रहा है। हमें कई ऐसी महिलाएं मिलती हैं जो कहती हैं कि अब हम दो टाइम का भी खाना नहीं खा पा रहे हैं’।

अनुराधा कहती हैं कि ‘नरेगा की शुरुआत में 33 प्रतिशत महिलाओं को आरक्षण दिया गया था। लेकिन पहले साल में यह टारगेट पूरा नहीं हो पाया। धीरे-धीरे महिलाएं घर से बाहर निकलने लगीं और आज लगभग 60 प्रतिशत तक महिलाएं यहां काम कर रही हैं। यह एक सकारात्मक कदम था महिलाओं के आर्थिक रुप से मजबूत बनाने के लिए। लेकिन पिछले लंबे समय से रुकती पेमेंट ने महिलाओं के हौसले को तोड़ दिया है’। 

जंतर-मंतर पर नरेगा संघर्ष मोर्चा के बैनर तले हो रहे इस विरोध प्रदर्शन में लगभग 25 अन्य संगठन भी जुड़े हैं। संगतिन किसान मजदूर संगठन की सदस्य रिचा सिंह का कहना है कि ‘स्थिति ऐसी है कि होली सर पर है और लोगों के पास पैसा नहीं है। मार्च के पहले सप्ताह में सिर्फ सीतापुर में 6 करोड़ 83 लाख और यूपी में 2 अरब 10 करोड़ की मजदूरी बाकी है’।

रिचा का कहना है कि ‘ऐसी स्थिति में लोग अब मनरेगा में काम भी नहीं करना चाहते हैं क्योंकि यहां मजदूरी बहुत कम है। सामान्य तौर पर अप्रैल और मई के महीने में मजदूर खेतों में कटाई करने चले जाते हैं। जहां उनकी दिहाड़ी तीन सौ से ऊपर होती है। जबकि मनरेगा में सिर्फ 213 रुपए हैं। उसमें मजदूरी करने पर उन्हें कैश पैसे मिल जाते हैं। लेकिन यहां तो लंबे समय से लोगों के पैसे अटके हुए हैं’।

नरेगा संघर्ष मोर्चा की सदस्य अपूर्वा गुप्ता ने इस बार के बजट के बारे में बात करते हुए कहा कि ‘नरेगा की शुरुआत के बाद से ही कई वर्कशॉप कराके महिलाओं को आर्थिक रूप से मजबूत बनाने की कोशिश की गई थी। जिसका सकारात्मक असर देखने को मिला भी था।

लेकिन इस साल के अमृतकाल के बजट में मनरेगा के लिए जीडीपी का मात्र 0.198% आवंटित किया गया है। जिसका सीधा असर महिलाओं पर पड़ने वाला है। आज के समय में मनरेगा के तहत लगभग 60 प्रतिशत महिलाएं काम कर रही हैं’।

अपूर्वा कहती हैं कि ‘अगर बजट कम होगा तो महिलाओं पर काम ज्यादा और मजदूरी कम के तहत काम कराया जाएगा। पश्चिम बंगाल की तो इस मामले में स्थिति पहले ही बहुत खराब है।

अब पंचायत सेक्रेटरी बजट के हिसाब से ही महिलाओं से काम कराएंगे। ऐसे में उनको शारीरिक परेशानियों से भी सामना करना पड़ेगा क्योंकि इतनी महंगाई में पैसे कम मिलेंगे तो खाना कैसे चलेगा। ऐसे में लाजमी सी बात है कि महिलाओं के शरीर पर भी इसका असर देखने को मिलेगा’।

(जनचौक संवाददाता पूनम मसीह की रिपोर्ट)

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