Monday, October 18, 2021

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पाटलिपुत्र की जंग: बीजेपी की चालबाजियां महागठबंधन पर पड़ सकती हैं भारी

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तमाम परेशानियों को झेल रहा बिहार आसन्न चुनाव में किसको सत्ता सौंपेगा यह किसी को पता नहीं लेकिन पिछले 15 साल से सत्ता पर काबिज जदयू-बीजेपी  किसी भी सूरत में इस बार भी सत्ता पाने को आकुल-व्याकुल है। हालांकि बिहार एनडीए के भीतर भी तूफ़ान है और सीट शेयरिंग को लेकर जदयू -बीजेपी और लोजपा में तनातनी है। ख़बरें तो यहां तक आ रही हैं कि भले ही बीजेपी ने सीएम नीतीश कुमार की अगुआई में चुनाव लड़ने की बात कही है लेकिन दूसरा सच ये भी है कि लोजपा की सारी नौटंकी बीजेपी के इशारे पर ही जारी है। जब से बीजेपी और संघ के आंतरिक सर्वे में बीजेपी की हालत खस्ता दिखी है, बीजेपी ने जदयू को किनारे लगाने के लिए लोजपा को आगे बढ़ा दिया है।

खेल यही है कि लोजपा के सहारे जदयू पर अंकुश लगाई जाए। बिहार एनडीए का एक सच यह भी है कि भले ही बीजेपी नीतीश कुमार को पसंद नहीं करती लेकिन नीतीश के सहारे बिहार में राजनीति करना बीजेपी की मज़बूरी है। कह सकते हैं कि नीतीश कुमार को झेलना बीजेपी की मज़बूरी है। इसके कारण भी हैं। एक तो बिहार में बीजेपी के पास कोई ऐसा चेहरा नहीं है जिस पर बीजेपी दांव लगाकर चुनावी खेल को अपने पक्ष में कर सके और दूसरा केवल सवर्ण और बनिया वोट के दम पर बीजेपी सत्ता के करीब नहीं पहुँच सकती।

तीसरा सच ये भी है कि बिहार में अब किसी भी पार्टी की इतनी हैसियत नहीं रह गई है कि वह अकेला अपने दम पर सरकार बना सके। आसन्न विधान सभा चुनाव में भी अन्य राज्यों की तरह बीजेपी एक अलग एजेंडे पर काम करती जा रही है। वह एजेंडा है चुनाव के बाद भी सरकार बनाने की रणनीति। बीजेपी इस चालबाजी में माहिर हो गई है और पार्टी के लोग इस खेल को सबसे सहज मानते हैं। यही वजह है कि बीजेपी वाले अक्सर यह कहते हैं कि चुनाव हार जाने के बाद उसकी सरकार बनने की संभावना ज्यादा बढ़ जाती है।

मौजूदा बिहार की राजनीति में बीजेपी इस दिशा में भी काम कर रही है और पहले से ही एक टीम को इस खेल के लिए तैयार कर रही है।

बिहार में एनडीए की मुश्किलें

ऊपर से भले से ही मोदी भक्तों को सब कुछ ठीक लग रहा हो लेकिन सच्चाई यही है कि एनडीए की हालत सबसे ज्यादा खराब है। बिहार एनडीए चारों तरफ से जनता और युवाओं के निशाने पर है। इसकी वजह भी है। किसान विरोधी बिल, मजदूर विरोधी बिल, सीएए-एनआरसी, गिरती जीडीपी, बिहार में बाढ़ की बदहाली, रोजगार के अभाव जैसी परिस्थितियों में बिहार में एनडीए के सामने नया बखेड़ा खड़ा कर दिया है। बीजेपी को यह भी लगने लगा है कि 15 सालों की सत्ता से जनता ऊब सी गई है और सरकार के खिलाफ एंटी इंकम्बेंसी भी है। हालांकि ऊपर से पार्टी के लोग इसे नहीं मानते और कहते फिर रहे हैं कि सुशासन से सूबे की जनता को लालू राज से निजात मिली है।

चारों तरफ विकास का वातावरण है। लेकिन सच्चाई यह नहीं है। बीजेपी को यह भी पता है कि पिछले कुछ सालों में नीतीश कुमार के रवैये से भी जनता परेशान है और नीतीश के प्रति जनता में गुस्सा भी है। यह गुस्सा कभी बीजेपी को छोड़ने तो कभी महागठबंधन को दगा देने को लेकर है। ऐसे में एनडीए के सामने एक मात्र विकल्प चुनाव के बाद विधायकों की खरीद बिक्री का है और यह उसके चरित्र के अनुसार ठीक भी लगता है। वास्तव में देखा जाए, तो बिहार में सीधे जीतना भाजपा के लिए मुश्किल है तो हारने के बाद जीतना उसके लिए काफी आसान दिख रहा है। चुनावों में उसकी कोशिश किसी न किसी तरह से आरजेडी को अपने दम पर बहुमत पाने से रोकने की है और इतने से भी उसका काम चल जाएगा।

महागठबंधन के घटक दलों पर बीजेपी की नजरें

बीजेपी की रणनीति यह है कि अगर राजद, कांग्रेस या अन्य दलों से गठबंधन करके, सभी के सहयोग से बहुमत जुटा भी लेती है, तो भी भाजपा या तो उसकी सरकार बनने नहीं देगी और बन भी जाएगी तो जल्द ही उसे गिराकर, अपने गठबंधन की सरकार बना लेगी जैसा कि उसने पिछली बार महा गठबंधन से जेडीयू को अलग करके किया था। हालांकि, पिछली बार जेडीयू महागठबंधन में बराबर या यूं कहें ज्यादा ताकतवर स्थिति में थी, लेकिन तब भी भाजपा को उसे अपने पाले में खींचने में कोई दिक्कत नहीं हुई। इस बार तो उसके लिए स्थितियां और ज्यादा आसान दिख रही हैं।

इस बार माना जा रहा है कि भाजपा को हराने के नाम पर राजद फिर से कांग्रेस, रालोसपा, वीआईपी, सीपीआई, सीपीएम, सीपीआई-माले जैसे दलों से गठबंधन करके लड़ेगी, और एनडीए-नीतीश-भाजपा की गिरती लोकप्रियता के कारण बहुमत पा भी सकती है, लेकिन ऐसी सरकार से रालोसपा, वीआईपी और कांग्रेस के विधायकों को लालच या दबाव देकर तोड़कर एनडीए की तरफ लाने में भाजपा को कोई दिक्कत नहीं होगी। वैसे भी कांग्रेस, रालोसपा, वीआईपी और वामदल राजद पर ज्यादा से ज्यादा सीटें छोड़ने का दबाव बनाने में जुट गए हैं, जिसका सीधा-सा मतलब यही है कि राजद को इतनी सीटें लड़ने के लिए नहीं मिलेंगी कि वह अपने दम पर 243 के सदन में 123 सीटें पाकर अपने दम पर सरकार बनाने की स्थिति में आ जाए। ऐसी स्थिति में ही भाजपा के हारकर जीतने के चांस ज्यादा बनेंगे।

कांग्रेस विधायकों के तोड़ने पर ज्यादा जोर

वैसे भी बिहार में कांग्रेस की हालत अभी खराब है लेकिन पार्टी का अस्तित्व बचाने के लिए वह महागठबंधन में अधिक सीटें मांग रही है। यह बात और है कि पिछले चुनाव में कांग्रेस को 27 सीटें मिल गई थीं और संभव है कि इस बार भी उसे इतनी ही सीटें मिल जाएं। लेकिन कांग्रेसी विधायकों की कमजोरी बीजेपी को मालूम है कि सत्ता के बिना वह नहीं रह सकती। सत्ता और धन का लालच देकर ही बीजेपी ने पिछले कुछ सालों में बीजेपी विधायकों को खरीदा है और कई राज्यों में सरकार बनाया है।

कांग्रेस की स्थिति तो ये है कि मध्यप्रदेश में उसके 25 से ज्यादा विधायक भाजपा में शामिल हो चुके हैं और उपचुनाव लड़ने की तैयारी कर रहे हैं। राजस्थान में भी किसी तरह कांग्रेस सरकार बचाने में सफल हो गई वरना वहां भी भाजपा ने खेल कर ही दिया था। ऐसे में बिहार में तो कांग्रेस वैसे भी काफी कमजोर स्थिति में पिछले कई दशकों से है, तो वहां के कांग्रेसी विधायकों को तो भाजपा जब चाहे अपनी तरफ खींच लेगी।

(अखिलेश अखिल वरिष्ठ पत्रकार हैं और बिहार की राजनीति पर गहरी पकड़ रहते हैं।)

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