Sunday, October 17, 2021

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कर्मचारियों और पेंशनधारियों का पेट नहीं, सरकारी फ़िज़ूलख़र्ची में कटौती की जरूरत

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देश वैश्विक महामारी कोविड-19 संक्रमण से जूझ रहा है, देशव्यापी लॉकडाउन के कारण लोग अपने घरों में कैद हैं लेकिन सरकार इस विपदा की घड़ी में भी लोगों को मदद करने के बजाय अधिक से अधिक लूटने की कवायद में इस शिद्दत से जुटी है जैसे ‘कोरोना’ एक आपदा नहीं बल्कि ‘लूट का मौका’ हो।

कोरोना संकट की वजह से अर्थव्यवस्था अब तक के सबसे भीषण संकट में है, महंगाई अपने उच्चतर स्तर पर है और इस बीच मोदी सरकार ने केंद्रीय कर्मचारियों और पेंशनधारियों को बड़ा झटका देते हुए उन्हें मिलने वाले डीए यानी महंगाई भत्ता पर रोक लगा दी है। केंद्र सरकार के इस फैसले के बाद जैसे रामराज्य के मठाधीश योगी आदित्यनाथ जी की लॉटरी लग गई, उन्होंने भी राज्य के कर्मचारियों का महँगाई भत्ता नहीं देने का ऐलान कर दिया। सवाल उठता है कि-

■ जब अर्थव्यवस्था की हालत पहले से खराब है, महंगाई की मार सीधे लोगों के बजट को बिगाड़ रही है तो ऐसे में कोरोना संकट से लड़ रहे केंद्रीय कर्मचारियों या किसी राज्य विशेष के कर्मचारियों को मिलने वाला महंगाई भत्ता रोकना कहाँ तक जायज है ?

■ क्या स्थिति से निपटने के लिए कर्मचारियों का महंगाई भत्ता रोकने के अलावा कोई रास्ता नहीं बचा था ? 

■ सरकार का यह असंवेदनशील फैसला कर्मचारियों का हौसला तोड़ने वाला नहीं है ? 

■ सरकार अपनी फिजूलखर्ची रोकने और अनावश्यक या कम महत्वपूर्ण कार्यक्रमों में भारी-भरकम निवेश को रोकने के बजाय इस तरह के असंवेदनशील फैसले ही क्यों ले रही है ?

प्रश्न अनेक हैं, लेकिन दरबारी मीडिया के इस चाटुकारिता के दौर में सरकार से ये सवाल कौन करेगा? आइए सबसे पहले जानने का प्रयास करते हैं कि क्या है कर्मचारियों को मिलने वाला डीए ।

महंगाई भत्ता ( Dearness Allowance) /DA वास्तव में  कर्मचारियों के रहने-खाने के स्तर को बेहतर बनाने के लिए दिया जाता है। इसकी गणना बेसिक सैलरी के आधार पर होती है। इसका मकसद महंगाई में बढ़ोतरी की भरपाई करना होता है। भारत में इसकी शुरुआत 1972 में हुई जिसके अनुसार ऑल इंडिया सर्विस एक्ट 1951 के तहत आने वाले सभी कर्मचारियों को यह भत्ता दिया जाने लगा।

विदित हो कि पिछले महीने सरकार ने केंद्रीय कर्मचारियों के महंगाई भत्‍ते में 4 फीसदी बढ़ोतरी की घोषणा की थी। डीए को 17 फीसदी से बढ़ाकर 21 फीसदी किया गया था। लेकिन अब इस पर रोक लगा दी गई है और जुलाई 2021 तक कर्मचारियों या पेंशनधारियों को यह भत्ता नहीं मिलेगा। सरकार के इस फैसले का असर 54 लाख सरकारी केन्द्रीय कर्मचारियों और 65 लाख पेंशनभोगियों पर पड़ेगा। 

कर्मचारियों और पेंशनधारियों को मिलने वाले इस भत्ते पर रोक के बाद सरकार को चालू वित्त वर्ष 2020-21 और अगले वित्त वर्ष 2021-22 में कुल मिलाकर 37,530 करोड़ रुपये की बचत होगी। आम तौर पर इस भत्ते के निर्धारण के मामले में राज्य सरकारें भी केंद्र सरकार का ही अनुसरण करतीं हैं। अगर राज्य सरकारें भी जुलाई 2021 तक महंगाई भत्ते की बढ़ी दर पर भुगतान नहीं करती हैं तो उन्हें 82,566 करोड़ रुपये तक की बचत होगी। कुल मिलाकर केंद्र और राज्यों के स्तर पर इससे 1.20 लाख करोड़ रुपये की बचत होगी।

पूर्व प्रधानमंत्री और प्रतिष्ठित अर्थशास्त्री मनमोहन सिंह, कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गाँधी, पूर्व कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गाँधी समेत कई विपक्षी नेताओं ने सरकार के इस फैसले को दुर्भाग्यपूर्ण और असंवेदनशील बताया है।

सरकार के इस असंवेदनशील फ़ैसले के बाद एक सेवानिवृत्त मेजर ओंकार सिंह गुलेरिया ने भी सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाया है। कैंसर पीड़ित सेवानिवृत्त मेजर ने सुप्रीम कोर्ट में एक याचिका दायर कर कहा है कि वो अपनी बीमार पत्नी के साथ किराये के घर में रहते हैं और उनकी आय का एक मात्र स्रोत मासिक सैन्य पेंशन है। उन्होंने यह भी कहा कि कोरोना वायरस का संक्रमण बुजुर्गों के लिए ज्यादा घातक है। ऐसे में पेंशनधारियों को मिलने वाला महंगाई भत्ता रोकना बिल्कुल गलत फैसला है।

अब आते हैं उन वैकल्पिक उपायों पर जिन्हें अपना कर सरकार कोरोना संकट से उत्पन्न समस्याओं से लड़ने के लिए रकम जुटा सकती है। 

● सेंट्रल विस्टा प्रोजेक्ट: 

एक ओर पूरा देश कोरोना संकट से परेशान है। कोरोना संकट ने गम्भीर आर्थिक समस्याओं को उत्पन्न कर दिया है लेकिन सरकार सेन्ट्रल विस्टा जैसे गैर जरूरी और विलासिता वाले प्रोजेक्ट को पूरा करने में जुटी है। सेंट्रल विस्टा के इस हाई-प्रोफाइल प्रोजेक्ट का बजट 20,000 करोड़ (बीस हजार करोड़ रुपये) है। इस प्रस्तावित योजना के अंतर्गत रायसीना हिल से लेकर इंडिया गेट तक फैले विभिन्न भवनों यथा संसद भवन, राजपथ, नॉर्थ एवं साउथ ब्लॉक, राष्ट्रपति भवन और इंडिया गेट का रिमॉडलिंग एवं पुनर्निर्माण किया जायेगा। कई भवनों को स्थानांतरित भी किया जाएगा।

यानि दुनिया की तमाम सुविधाओं से लैस इन भवनों को और विलासितापूर्ण बनाया जाएगा, भारी-भरकम प्रोजेक्ट के सहारे कमीशन खोरी को अंजाम दिया जाएगा लेकिन कोरोना संकट और आर्थिक संकट की दोहरी मार झेल रहे आम जनता की बुनियादी आवश्यकताओं की भी पूर्ति नहीं की जाएगी। मालूम हो कि कई विपक्षी नेताओं ने पहले ही सरकार से इस प्रोजेक्ट को स्थगित कर इस रकम को कोरोना संकट से उत्पन्न परिस्थितियों के ख़िलाफ़ लड़ाई में खर्च करने की सलाह दी है। कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गाँधी तो प्रधानमंत्री को पत्र लिख कर सेंट्रल विस्टा प्रोजेक्ट को स्थगित करने की सलाह दे चुकी हैं।

■ बुलेट ट्रेन प्रोजेक्ट:

कोरोना संकट से निपटने के लिए लगभग 1,10,000 करोड़ रुपये की लागत वाली बुलेट ट्रेन परियोजना को फिलहाल स्थगित कर देना ही एक कारगर उपाय हो सकता है। वैसे भी सरकार का यह प्रोजेक्ट प्रारंभ से ही विवादों में रहा है। इस प्रोजेक्ट के बारे में हमेशा यह आरोप लगता रहा है कि यह परियोजना केवल पूंजीपतियों को ध्यान में रख कर बनाया गया है जिनके पास पहले से ही कई तरह की सुविधाएँ मौजूद हैं। पिछले दरवाजे से रेलवे के निजीकरण की सरकार की तमाम कोशिश वैसे ही फुस्स हो चुकी है। ऐसे में आम जनमानस को बुलेट ट्रेन जैसे कॉरपोरेट हितैषी प्रोजेक्ट से कोई फायदा नहीं पहुँचने वाला है ये सर्वविदित है।

■ सरकार की फिजूलखर्ची:

भारत सरकार के खर्चे के बजट (वेतन, पेंशन एवं सेंट्रल सेक्टर की योजनाओं को छोड़कर) में कटौती भी आर्थिक तंगी से निपटने का एक कारगर उपाय है। कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी ने पहले ही इस मद में 30 प्रतिशत की कटौती की सलाह पीएम को लिखे अपने पत्र में दे चुकी हैं। एक अनुमान के तहत इससे सरकार को लगभग 250000 करोड़ रुपये की प्राप्ति होगी।

इसके अलावा विदेश यात्राओं पर खर्च, मीडिया को दिए जाने वाले सरकारी विज्ञापन में कटौती करके भी बहुत बड़ी बचत की जा सकती है लेकिन सरकार की मंशा कुछ और है। कोरोना संकट और आर्थिक महामन्दी के बीच सरकार की संवेदनहीनता अब आम जनमानस के साथ-साथ सरकार के कर्मचारियों को भी भारी पड़ने वाली है। सरकार का यह कदम इस बात की ओर भी संकेत दे रहा है कि आने वाले वर्षों में सरकारी नौकरियों में नियुक्तियां ठप्प रहेंगीं और बड़े पैमाने पर लोगों को अपनी नौकरियों को गंवानी पड़ सकती है। बेरोजगारी का दंश झेल रहे युवाओं को पकौड़े का ठेला लगाने के लिए भी संसाधन जुटा पाना मुश्किल होने वाला है।

(दया नन्द स्वतंत्र लेखक हैं और शिक्षा के पेशे से जुड़े हुए हैं।)

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