Wednesday, April 17, 2024

अब संसदीय लोकतंत्र के तामझाम पर चमक रहा है बिल्कुल नया सामंती ताला  

आम चुनाव में राजनीतिक दलों में कांटे की टक्कर में कांटेदार टकराव और चकराव है। अभी आगे सत्य हकलाता हुआ मारा-मारा फिरेगा और  झूठ दहाड़ता हुआ सामने आयेगा। पिछले दस सालों के शासन और राजनीतिक प्रक्रिया में सतरू (सत्तारूढ़) पक्ष की सब से बड़ी सफलता यह है कि जीवन और विचार से तर्क को लगभग विदा कर देने में दिखती है। यह कोई कम बड़ी उपलब्धि नहीं है। हालांकि इस उपलब्धि के लिए सारा श्रेय उन्हें ही नहीं दिया जा सकता है। हैं और भी बहुत सारे दावेदार। धर्म क्षेत्र से लेकर कुरुक्षेत्र तक उदाहरण के ढेर सारे प्रसंग हैं। तर्कहीनता की तार्किकता की भी अलग ही कहानी है। असल में तर्क की अपनी शक्ति होती है। शक्ति का अपना तर्क होता है। कहने की जरूरत नहीं है कि राज्य व्यवस्था में शक्ति का तर्क ही चलता है।

परिस्थिति तब अधिक भयावनी हो जाती है, जब राज्य व्यवस्था अपने तर्क के सामने किसी की सुनती हुई दिखती भी नहीं है, न व्यक्ति की न संस्था की और न नीति की न नैतिकता की। समाज व्यवस्था संवैधानिक प्रावधानों की नहीं, अपनी ही सामंती परंपराओं की दुहाई देती रहती है। इन ‘सामाजिक परंपराओं’ के संवैधानिक प्रावधानों के विरुद्ध होने पर भी राज्य व्यवस्था संवैधानिक प्रावधानों के साथ खड़ी होने के बदले, ‘सामाजिक परंपराओं’ के साथ क्षुब्धकारी ढिठाई से खड़ी होने में कोई संकोच नहीं करती है।  

यह संभव हुआ है कि संविधान अपनी जगह कायम रहे, लेकिन संविधान सम्मत शासन के प्रति सरकार और सरकारी संस्थाएं उदासीन रहें। माननीय अदालतें सब कुछ जानते हुए भी न्यायिक प्रक्रिया के त्वरित निपटान में बहुत सकारात्मक रुख न अख्तियार कर पायें। तो क्या किया जा सकता है? जनता का अनुभव है कि चुनाव के बाद राज्य व्यवस्था में उसकी किसी भागीदारी के लिए कोई जगह बनती और बचती नहीं है। राजनीतिक दलों की आपसी लड़ाई का खामियाजा जनता को भोगना पड़ता है। जनता, अधिक-से-अधिक, अपने वोट की ताकत से सत्तासीन दलों में अदल-बदल कर सकती है। इस अदल-बदल से बात बहुत बनती नहीं है।

चुनाव में हार-जीत पर औपचारिक चिंतन-मनन तो स्वाभाविक है। लेकिन नागरिक अनुभव इसके पार का भी है। औचित्य और न्याय का सवाल बहुआयामी होता है। बहुआयामी सवाल का एक प्रसंग नीति और नैतिकता से भी जुड़ता है। चुनाव के पार के औपचारिक चिंतन-मनन के समानांतर व्यावहारिक (Pragmatic), आनुभविक और आनुषंगिक प्रसंगों पर भी ध्यान देने की जरूरत से इस बार के आम चुनाव में इनकार नहीं किया जा सकता है।

अभी की शासन प्रणाली के व्यापक अनुभवों को याद किया जा सकता है। ऊपरी तौर पर भारत में कानून का राज है। कानून का राज तो है लेकिन कानून तक पहुंच आसान नहीं है। कानून तक पहुंचने के लिए सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक साहस की जरूरत होती है। उत्पीड़कताओं से त्रस्त लोगों में इतना सामाजिक, आर्थिक, बौद्धिक और राजनीतिक साहस ‎होता नहीं है कि वे कानून के घर तक पहुंचकर, नागरिक की हैसियत से न्याय का ग्राहक बन सकें। तो फिर कानून का राज एक अवास्तविक और अशोध्य (Unrealisable) प्रसंग बनकर रहने के लिए अभिशप्त होता है क्या?

उत्पीड़न के शिकार लोग यदि कानून तक पहुंच बनाने की कोशिश करते हैं, तो सबसे पहले, परिवार फिर समुदाय और समाज हर स्तर पर एक नेक सलाह से सामना होता है। नेक सलाह यह होती है कि पानी में रहकर मगरमच्छ से बैर करना ठीक नहीं। अर्थात, बरदाश्त करो, जाने दो। इस नेक सलाह की अंतरात्मा में सलाहकार की तमाम समझ और सहानुभूति के बावजूद कानून तक पहुंच बनाने के रास्ते में उन के सहयात्री नहीं हो सकने की अभिव्यक्ति होती है। ऐसी नेक सलाह में सलाहकार की अपनी असमर्थता की उदास अभिव्यक्ति छिपी रहती है। प्रारंभिक हो-हल्ला के बाद अंततः उत्पीड़ित व्यक्ति न्याय के रास्ते में सामाजिक रूप से अकेला पड़ जाता है।

कानून तक पहुंच बनाना व्यय-साध्य होता है। कितना व्यय-साध्य! पचकेजिया मोटरी-गठरी ढोनेवालों के लिए असाध्य और रोजी-रोजगार के लिए तरसते लोगों के लिए भी कम मुश्किल नहीं! इस के बावजूद, कानूनी प्रक्रिया इतनी जटिलताएं होती हैं कि माननीय अदालतों में लंबित-विलंबित मामलों के ऊंचे-ऊंचे पहाड़ होते हैं। इन पहाड़ों के नीचे न्याय ग्राहकों की निस्तेज हो चुकी अंतरात्माओं के दर्द और पीड़ा को अंतरात्मा के व्यवसायी समझ ही नहीं सकते हैं। जी, अंतरात्मा के व्यवसायी! आज-कल आत्म-विहीनता के दौर में अंतरात्मा का व्यवसाय भारत में बहुत तेजी से फल-फूल रहा है। नजारा देखना हो तो देश के लोकतांत्रिक और राजनीतिक क्षितिज की तरफ नजर डालिए। कानून के राज में कितना असहाय और लाचार होता है न्याय का ग्राहक, सामान्यतः इस की कल्पना भी नहीं की जा सकती है।

कानून के राज में होना नहीं चाहिए, लेकिन होता है अन्याय, उत्पीड़न और अत्याचार का एक राजनीतिक प्रसंग भी होता है। ऐसा इसलिए होता है कि कानून के राज में व्यक्ति को जो भी नागरिक और मानवाधिकार हासिल होता है वह, वर्ण-जाति-वर्ग-अर्थ-धर्म-लिंग-जन-सांख्यिकी विभाजकताओं और विषमताओं के पूर्वग्रह से ग्रस्त प्रदाताओं के हाथ से हासिल होता है। अन्याय, उत्पीड़न और अत्याचार के शिकार में जब भी न्याय और हक की हूक उठती है, आस-पास उपलब्ध वोटाकांक्षियों में राजनीतिक हलचल शुरू हो जाती है। इस में सब कुछ नकारात्मक ही नहीं होता है। लेकिन सकारात्मक इतना कम होता है, कि वह कानून के राज में व्यक्ति के न्याय और हक के पक्ष में खड़ा होने से अधिक नेताओं की राजनीतिक झोला-बंदी के पक्ष में जा लगता है। यहीं से जाति के नेता, क्षत्रप आदि का विकास होता है। आदि में क्या-क्या शामिल है, यह बहुत अस्पष्ट तो नहीं है!

कानून की जानकारी या विधि साक्षरता का स्तर बहुत दयनीय स्थिति में है। अच्छे-खासे पढ़े-लिखे लोगों में भी अपने लोकतांत्रिक अधिकारों की कोई पक्की जानकारी नहीं होती है। समय पर उन अधिकारों के इस्तेमाल की बात तो दूर की कौड़ी है। पुलिस और प्रशासन का सामना होते ही उनकी दयनीयता झलक जाती है। हालत यह होती है कि किसी ‘प्रोफेसर’ की पैरवी पुलिस और प्रशासन के आस-पास मंडराता हुआ ‘पांचवीं-छठी पास’ आदमी करता रहता है।

असल में मीडिया की भूमिका सिर्फ राजनीतिक रिपोर्टिंग तक सीमित नहीं होती है। मीडिया की बहुत बड़ी भूमिका विविध क्षेत्र में ‘जन शिक्षण’ की भी होती है। अब तो ऐसा लगता है कि समाज में मीडिया की यह भूमिका अधिकतर को याद भी नहीं है। ‘जन शिक्षण’ का कोई-न-कोई पक्ष प्रचार में भी रहना ही चाहिए, मगर होता नहीं है। किसी व्यवसायी से क्या उम्मीद की जाये जब ‘बाबा’ नाम से देश-विदेश में विख्यात रामदेव के ‘भ्रामक प्रचार’ का मुकदमा माननीय सुप्रीम कोर्ट तक पहुंच गया है।

कानून का राज सिर्फ संवैधानिक प्रावधानों से प्रभावी नहीं बनता है। कानून का राज प्रभावी बनता है, व्यक्ति और समाज के विवेक के सम्यक तालमेल से। कानून के राज के दालान भले ही संवैधानिक प्रावधानों के चौखंभों से बनते हों उसके निवास के अंतरंग की अल्पना तो विवेक से ही बनती और संवरती है। विडंबना यह है कि हमारे समय का विवेक ही विक्षिप्त हो गया है। अंतःकरण इतना विवेक विरहित पहले कभी नहीं था।  

कानून के राज की महिमा के प्रति सम्मान और समर्पण रखते हुए भी इतना कहना जरूरी है कि लोगों का न्याय और राहत माननीय अदालतों से उतनी नहीं मिलती है, जितनी समाज में स्थापित, स्व-प्रतिष्ठित और स्व-प्रमाणित सक्रिय ‘न्याय पुरुषों’ से, जिन्हें बाहुबली भी कहा जाता है। बाहुबलियों या ‎‘न्याय पुरुषों’ ‎की न्याय प्रियता और न्याय दान की कथाओं से यदि कोई बिल्कुल ही अपरिचित हो तो, उस से सिर्फ ईर्ष्या ही हो सकती है! दूर-दराज के गांव-देहात में ही नहीं, आधुनिक और स्मार्ट माने जानेवाले शहरों में भी ‎‘न्याय पुरुषों’ ‎की सक्रियता सराहनीय है। उनके इलाके में थानेदार भी उन की मर्जी से ही कोई कार्रवाई करता है। वे जो कह दें वही, कानून है, वही न्याय है! चाहे मनरेगा योजना में काम मिलने का संयोग, सिलसिला हो या कोई अन्य प्रसंग!

सामान्यतः ऐसे ‎‘न्याय पुरुषों’ के ‘पोशाकी न्याय’ से किसी भी पक्ष को कोई खास असहमति नहीं होती है। हां, स्थिति थोड़ी बे-पोशाकी या नंगी तब हो जाती है, जब शिकायत खुद ‎‘न्याय पुरुष’ से ही हो, उदाहरण के लिए अजय मिश्रा टेनी और बृजभूषण शरण सिंह से जुड़े मामले को याद किया जा सकता है। कल तक कहा जाता था कि ‎‘न्याय पुरुषों’ ‎को राजनीति का संरक्षण मिलता है, लेकिन अब स्थिति बदल गई है। राजनीतिक नेता और लोकतांत्रिक राजनीति दोनों ‎‘न्याय पुरुषों’ ‎के संरक्षण में सुरक्षित रहते हैं।

आज राजनीति की चौड़ी छाती और न्याय के चौड़े कंधे के मुहावरे संसदीय लोकतंत्र की हकीकत बयान ‎कर रहे हैं। ऐसे में जनता को अधिकतम सावधानी की मुद्रा अख्तियार करने की जरूरत है। इस सावधानी के साथ महत्त्वपूर्ण संवैधानिक ‎संस्थाओं की हैसियत को समझने की आखिरी कोशिश करनी चाहिए। अभी देश के जाने-माने वकीलों ने भारत के सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश को एक सामूहिक पत्र लिखा है, जिस में माननीय अदालतों पर दबाव और उस शक्ति बचाव की बात कही गई है। एएनआई (ANI) के अनुसार, हरीश साल्वे सहित 500 से अधिक प्रमुख वकीलों ने सुप्रीम ‎कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश डीवाई चंद्रचूड़ को पत्र लिखकर न्यायपालिका की अखंडता को ‎कमजोर करने के प्रयासों पर चिंता व्यक्त की।

पत्र में लिखा है, “कानून को बनाए रखने के ‎लिए काम करने वाले लोगों के रूप में, हमें लगता है कि यह हमारी अदालतों के लिए खड़े ‎होने का समय है। हमें एक साथ आने और गुप्त हमलों के खिलाफ बोलने की जरूरत है, यह ‎सुनिश्चित करने के लिए कि हमारी अदालतें हमारे लोकतंत्र के स्तंभों के रूप में रहें, इन ‎सुनियोजित हमलों से अछूते रहें।” आदरणीय हरीश साल्वे देश-दुनिया के बड़े वकीलों में से ‎एक हैं।

अभी चुनावी चंदा (Electoral Bonds) के मामले में वे भारतीय स्टेट बैंक के ‎वकील थे। उनकी बड़ी भूमिका से पूरा देश वाकिफ है। पता नहीं कानून के ये त्रस्त रक्षक किस दबाव की बात कर रहे हैं! वैसे, प्रधानमंत्री ने बिना कांग्रेस के डराने ‎धमकाने की प्रवृत्ति से बिना किसी विलंब के इसे ‘दक्षतापूर्वक’ जोड़ दिया है। वे शक्ति-सिद्ध हैं, कुछ भी कर सकते हैं। मजे की बात यह है कि इस पूरे संदर्भ के रहस्य को ‎समझना बहुत मुश्किल है और महसूस करना बहुत ही आसान।‎  यानी स्थिति लबालब है।

1990 के बाद नई वैश्विक अर्थव्यवस्था की अनुरूपता में राज्य व्यवस्था में बदलाव के लिए वैश्विक राजनीति में भी तेजी से बदलाव आना शुरू हुआ। सब से बड़ा उदाहरण, चीन की अर्थनीति में बदलाव की बात रहने भी दें, तो सोवियत संघ के औपचारिक विघटन (26 दिसंबर 1991) के रूप में सामने आया। जिस का ज्ञात-अज्ञात असर, पूर्व आकललन से कहीं अधिक दिखने लगा। सब से बुरा असर श्रम-संबंधों और लोक कल्याणकर नीतियों पर पड़ने लगा। अंतर्राष्ट्रीय श्रम संगठन (ILO)‎ और राष्ट्रीय श्रमनीतियों पर इस के विपरीत असर के आसार तभी दिखने लगे थे। विज्ञान और तकनीक का लाभ कॉरपोरेट की झोली में गिरने लगा। कॉरपोरेट और करप्शन के जुड़ाव पर काफी लिखा जा चुका है।

लोकतांत्रिक सरकारों और संवैधानिक संस्थाओं और सरकारी विभागों का रवैया लोकतांत्रिक अधिकार-संपन्न आम नागरिकों के प्रति लापरवाही और उदासीनता, खतरनाक बल्कि आपराधिक, हद तक बढ़ती चली जा रही है। चुनाव में हार-जीत का सिलसिला तो लोकतंत्र की राजनीतिक प्रक्रिया की आम बात है। लेकिन भारत में 2024 का आम चुनाव एक असाधारण राजनीतिक वातावरण में होने जा रहा है।

‘पवित्रता और सदाचार के प्रयोग और पराक्रम’ के पराभव के कारण भय-भूख-भ्रष्टाचार से संसदीय लोकतंत्र का परिप्रेक्ष्य टेढ़ा हो चुका है कि अविलंब इस के परिप्रेक्ष्य को सही नहीं किया जा सका तो संसदीय लोकतंत्र धीरे-धीरे आत्मसिद्ध साक्ष्य के संसदीय सामंतवाद में पूरी तरह पर्यवसित हो जायेगा। ध्यान देने की बात है कि लोकतंत्र के पानी में मगरमच्छ बहुत हैं।

बहुत मुश्किल से लोकतांत्रिक शासन पर लटके पुराने सामंती तामझाम के ताले की चाभी अभी-अभी मिली थी। अब संसदीय लोकतंत्र के तामझाम पर चमक रहा है बिल्कुल नया सामंती ताला। सारी परिस्थिति आम नागरिकों के सामने है। इसलिए जरूरी यह है कि आम मतदाता 2024 के आम चुनाव में पहले से कहीं अधिक सोच-समझकर अपना फैसला करे। ‎   

 (प्रफुल्ल कोलख्यान स्वतंत्र लेखक और टिप्पणीकार हैं)

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