Saturday, October 23, 2021

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राकेश अस्थाना की नियुक्ति पर दो हफ्ते में आएगा फैसला, सुप्रीम कोर्ट ने दिल्ली हाईकोर्ट को दिया आदेश

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दिल्ली पुलिस आयुक्त राकेश अस्थाना पर न्यायालय की तलवार लटक रही है। उच्चतम न्यायालय ने बुधवार को दिल्ली हाईकोर्ट से राकेश अस्थाना की दिल्ली पुलिस आयुक्त के रूप में नियुक्ति के खिलाफ दायर याचिकाओं पर दो सप्ताह के भीतर फैसला करने को कहा। उच्चतम न्यायालय ने यह आदेश सेंटर फॉर पब्लिक इंटरेस्ट लिटिगेशन द्वारा अनुच्छेद 32 के तहत अस्थाना की नियुक्ति को चुनौती देने वाली एक रिट याचिका पर विचार करते हुए जारी किया।

चीफ जस्टिस एनवी रमना ने कहा कि कुछ मुद्दे हैं, जो मामले में मेरी भागीदारी के बारे में हैं। मैंने सीबीआई चयन में इस व्यक्ति के बारे में अपने विचार व्यक्त किए हैं। चीफ जस्टिस ने उच्चाधिकार प्राप्त समिति के सदस्य के रूप में अस्थाना की सीबीआई प्रमुख के रूप में नियुक्ति पर आपत्ति जताई थी। बाद में उच्चतम न्यायालय की वेबसाइट पर प्रकाशित आदेश ने पुष्टि की कि मामले की सुनवाई उपयुक्त पीठ द्वारा की जाएगी। आदेश में कहा गया है कि रजिस्ट्री को इस मामले को उपयुक्त पीठ के समक्ष दो सप्ताह के बाद सूचीबद्ध करने का निर्देश दिया जाता है।

उच्चतम न्यायालय अस्थाना की नियुक्ति को चुनौती देने वाली सेंटर फॉर पब्लिक इंटरेस्ट लिटिगेशन की याचिका पर सुनवाई कर रही थी। याचिकाकर्ता का प्रतिनिधित्व करने वाले अधिवक्ता प्रशांत भूषण ने दलील दी कि मुझे नहीं लगता कि यह लॉर्डशिप को बिल्कुल भी अक्षम करता है।

इस पर चीफ जस्टिस के साथ पीठ में शामिल जस्टिस डीवाई चंद्रचूड़ और जस्टिस सूर्यकांत ने कहा कि इसी मुद्दे पर दिल्ली हाईकोर्ट में एक याचिका दायर की गई है। पीठ ने कहा कि हम उच्च न्यायालय को इसे (याचिका) निपटाने के लिए 2 सप्ताह का समय देंगे। इसके साथ ही पीठ ने याचिका को दो सप्ताह के लिए स्थगित कर दिया।

प्रशांत भूषण ने तर्क दिया कि दिल्ली हाईकोर्ट में याचिका उनके मुवक्किल की याचिका से कॉपी-पेस्ट है। भूषण ने कहा कि हमारे यहां याचिका दायर करने के बाद इसे किसी और के माध्यम से दायर किया गया है। पीठ ने प्रशांत भूषण को दिल्ली हाईकोर्ट के समक्ष दायर याचिका में हस्तक्षेप करने की छूट दी।

सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने उच्चतम न्यायालय से मामले पर फैसला करने के लिए हाईकोर्ट को कम से कम 4 सप्ताह का समय देने का आग्रह किया, लेकिन पीठ नहीं मानी। पीठ ने मामले को दो सप्ताह के लिए स्थगित कर दिया।

दरअसल 1984 बैच के गुजरात कैडर के आईपीएस अधिकारी अस्थाना को सेवानिवृत्त के तीन दिन पहले जुलाई के अंत में दिल्ली पुलिस आयुक्त के रूप में नियुक्त किया गया था। राकेश अस्थाना को दिल्ली पुलिस आयुक्त के रूप में नियुक्त करने के फैसले पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह के खिलाफ अदालत की अवमानना की कार्रवाई शुरू करने की मांग करने वाली एक अन्य याचिका भी वरिष्ठ अधिवक्ता एमएल शर्मा द्वारा दायर की गई है।

सीपीआईएल की याचिका में कहा गया है कि केंद्र सरकार का आदेश कई आधारों पर पूरी तरह से अवैध है। यह तर्क दिया गया था कि चुनौती के तहत आदेश प्रकाश सिंह बनाम भारत संघ में सर्वोच्च न्यायालय के फैसले का स्पष्ट रूप से उल्लंघन है क्योंकि अस्थाना के पास छह महीने का आवश्यक न्यूनतम शेष कार्यकाल नहीं था, उनकी नियुक्ति के लिए कोई यूपीएससी पैनल नहीं बनाया गया था और दो साल के न्यूनतम कार्यकाल के मानदंड की अनदेखी की गई, जैसा कि फैसले में निर्देश दिया गया था।

याचिका में स्पष्ट किया गया है कि भले ही प्रकाश सिंह में निर्देश किसी राज्य के डीजीपी के पद के संबंध में थे, वे वर्तमान मुद्दे पर लागू होते हैं क्योंकि पुलिस आयुक्त, दिल्ली का पद एक डीजीपी के पद के समान है।

सीपीआईएल ने इस बात पर भी प्रकाश डाला कि मई 2021 में प्रधान मंत्री, विपक्ष के नेता और भारत के मुख्य न्यायाधीश की उच्चाधिकार प्राप्त समिति की बैठक में केंद्र सरकार ने अस्थाना को सीबीआई निदेशक के रूप में नियुक्त करने का प्रयास किया था। हालाँकि, प्रस्ताव को कथित तौर पर चीफ जस्टिस  रमना ने प्रकाश सिंह में निर्धारित “छह महीने के नियम” का हवाला देते हुए खारिज कर दिया था। याचिका में कहा गया है कि अखिल भारतीय सेवा (मृत्यु-सह-सेवानिवृत्ति लाभ) नियम, 1958 के मौलिक नियम 56 (डी) के अनुसार 60 वर्ष की आयु से अधिक सेवा में विस्तार नहीं दिया जा सकता है।

 हालांकि चुनौती के तहत आदेश ने स्पष्ट किया कि जनहित के लिए एक विशेष मामले में विस्तार की अनुमति देने वाले नियम 16 में ढील देकर विस्तार दिया गया है, याचिका में दोहराया गया है कि अस्थाना के लिए ऐसा कोई अपवाद नहीं बनाया जा सकता है क्योंकि उन्हें इस पद पर नियुक्त किया गया था जब वह सेवानिवृत्ति के कगार पर थे।

(वरिष्ठ पत्रकार जेपी सिंह की रिपोर्ट।) 

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