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Thursday, September 23, 2021

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डरा हुआ विपक्ष केवल ट्विटर से निभा रहा अपनी भूमिका

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क्या नोटबंदी, जीएसटी, मंहगाई, बेरोजगारी, नौकरियों का खात्मा, रेल निजीकरण, सरकारी कम्पनियों को औने पौने में बेचने, ईवीएम की धांधली, आर्थिक दुरावस्था, मनमाने टैक्स जैसे मुद्दों पर किसी भी राजनीतिक दल ने आम जनता को साथ लेकर चलने की पिछले छह साल में एक बार भी कोशिश की? मुझे तो न दिखाई दी न महसूस हुयी, क्या आपको दिखाई दी? अब सवाल है कि क्या भारत में विपक्ष केवल कागज में बचा है? सालों साल विपक्ष सुषुप्तावस्था में रहता है और चुनाव के समय जागृतावस्था में आता है। फिर चुनाव में ईवीएम और पोस्टल बैलेट के कारण हार कर फिर चुनावी धांधली का आँसू बहाकर फिर उसी अवस्था में चला जाता है। 

ऐसा लगता है कि विपक्ष को घुन लग गया है। पिछले दिनों बिहार में कांग्रेस के राहुल गाँधी, राजद के तेजस्वी यादव और भाकपा के कन्हैया कुमार की रैलियों में हजारों लाखों की भीड़ उमड़ती थी पर चुनाव में धांधली की शिकायतों के बाद न तो ये नेता दिखाई पद रहे हैं और न भीड़। ट्विटर पर प्रतिदिन सरकार की जन विरोधी नीतियों पर ट्वीट करके राहुल गाँधी, प्रियंका गाँधी, तेजस्वी यादव, अखिलेश यादव, सीताराम येचुरी सरीखे नेता विपक्ष की अपनी भूमिका निभाने की इतिश्री कर दे रहे हैं।

विपक्ष लगता है पूरी तरह डरा हुआ है। सीबीआई और ईडी के साथ-साथ इनकम टैक्स विभाग को केंद्र सरकार ने मुस्तैद कर रखा है। इधर विपक्ष के किसी नेता ने फूं फां की उधर रेड शुरू। इसे केवल दो ताजे उदाहरण से समझा जा सकता है। यूपी में शिवपाल यादव ने विधानसभा चुनाव में सपा के साथ जाने की बात कही उधर लखनऊ के रिवर फ्रंट की फ़ाइल खुली और अधिकारी की गिरफ्तारी हो गयी। महाराष्ट्र में जिस शिवसेना विधायक ने सरकार के चहेते अर्णब गोस्वामी के खिलाफ सदन में विशेषाधिकार हनन का प्रस्ताव रखा था उसके घर पर ईडी का छापा शुरू हो गया है। 

गौरतलब है कि पाकिस्तान में सेना के वर्चस्व और इमरान खान को सेना के समर्थन के बावजूद विपक्ष जनसरोंकारों को लेकर लगातार सड़क पर उतरता रहा है। पाकिस्तान में इमरान ख़ान सरकार पर विपक्ष का हमला बढ़ता ही जा रहा है। लगातार विरोध-प्रदर्शन हो रहे हैं। विपक्ष आरोप लगा रहा है कि इमरान ख़ान सेना के साथ मिलीभगत और धांधली कर सत्ता में आए थे। देश के चार प्रांतों में पंजाब, सिंध, बलूचिस्तान और ख़ैबर पख़्तूनख़्वाह प्रांत में बड़ी-बड़ी रैलियां की जा चुकी हैं। विरोध-प्रदर्शन करने वाले पाकिस्तान डेमोक्रेटिक मूवमेंट (पीडीएम) में दक्षिणपंथी धार्मिक समूहों से लेकर सेंट्रिस्ट, लेफ्ट सेंट्रिस्ट और राष्ट्रवादी सेक्युलर भी जुड़े हैं। विपक्षी पार्टियों का कहना है कि वे अप्रतिनिधित्व वाली सरकार को हटाना चाहते हैं जिस पर न्यायपालिका पर दबाव डालने और अर्थव्यवस्था के कुप्रबंध के आरोप हैं।

कार्पोरेट घरानों को बैंक खोलने की अनुमति देने की चर्चा हवा में तैर रही है। भारतीय रिजर्व बैंक (आरबीआई) के पूर्व डिप्टी गवर्नर आर गांधी ने सोमवार को कहा कि केंद्रीय बैंक को उन नियमों पर पुनर्विचार करने की जरूरत है, जो बड़े कॉरपेारेट घरानों को बैंकों का प्रवर्तक बनने से रोकते हैं। उन्होंने कहा कि आवश्यक सुरक्षा उपायों के साथ बैंकों में किसी एक निकाय को हिस्सेदारी 26 प्रतिशत से ऊंचा करने की मंजूरी दी जानी चाहिये। उन्होंने कहा कि भारतीय अर्थव्यवस्था की आवश्यकताएं व आकांक्षाएं इस प्रकार की हैं जिसको देखते हुए बैंकिंग क्षेत्र में बड़ी पूंजी के स्रोतों को प्रवेश देने पर विचार करने की जरूरत है। इससे बड़ी परियोजनाओं की मदद में आसानी हो सकती है।

रिजर्व बैंक के पूर्व गवर्नर रघुराम राजन और पूर्व डिप्टी गवर्नर विरल आचार्य ने कॉरपोरेट घरानों को बैंक स्थापित करने की मंजूरी देने की सिफारिश की आलोचना की है। उन्होंने कहा कि आज के हालात में यह निर्णय चौंकाने वाला और बुरा विचार है। राजन और आचार्य ने कहा कि इस प्रस्ताव को अभी छोड़ देना बेहतर है। लेकिन राजनीतिक क्षेत्रों में इसे लेकर कोई हलचल तक नहीं दिखी। केवल राहुल गाँधी ने ट्वीट करके विपक्ष की भूमिका निभा दी। 

इसके लिए कांग्रेस के पूर्व अध्यक्ष राहुल गांधी ने मोदी सरकार पर निशाना साधा। कारोबारी घरानों को बैंक खोलने की अनुमति के सुझाव पर राहुल गांधी ने क्रोनोलॉजी समझाते हुए कहा कि पहले बड़ी कंपनियों का कर्ज माफी होगा, फिर उन कंपनियों को बड़े कर छूट मिलेंगे और अब इन कंपनियों के द्वारा बनाए गए बैंक में लोगों की सेविंग दे देना।#सूट बूट सरकार!

अब जनता से यह सवाल कैसे जुड़ेगा कि कार्पोरेट घरानों के पक्ष में ही सरकार सकारात्मक कदम उठा रही है और आम जनता के लिए जीने की परिस्थितियाँ निरंतर कठिन से कठिन बनाई जा रही हैं। लेकिन इसे लेकर कोई भी दल जनान्दोलन शुरू करने पर उदासीन बना हुआ है। इसका विरोध भी ट्विटर तक सीमित है।

कृषि से जुड़े तीन कानूनों को लेकर कुछ किसान संगठन और विपक्ष केवल सरकार को बयानबाजी से घेर रहा है। किसान हितैषी होने के दावों के बीच मोदी सरकार के खिलाफ कई बड़े किसान आंदोलन हो चुके हैं और अब नये कानूनों को लेकर किसान आंदोलित हैं। पर इन आंदोलनों में विपक्ष की सक्रिय भागीधारी नगण्य है। किसी भी प्रदेश में किसानों को न्यूनतम समर्थन मूल्य नहीं मिल रहा पर इस पर भी विपक्ष में कोई हलचल नहीं है।

(वरिष्ठ पत्रकार जेपी सिंह का लेख।)

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