आदिवासी दिवस पर उठी बोधघाट परियोजना के विरोध की आवाज

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विश्व आदिवासी दिवस के अवसर पर बस्तर के विभिन्न क्षेत्रों में आदिवासी समुदाय के लोगों द्वारा विभिन्न किस्म के आयोजन किए गए। इस मौके पर सभी आदिवासी जनजाति समुदाय के लोग अपनी पारंपरिक वेशभूषा, अपनी संस्कृति और अपने पारंपरिक हथियार तीर धनुष के साथ नजर आए। तो वहीं बस्तर के हितालकुडुम में लगभग 30 गॉंवों के आदिवासी समुदाय के लोगों ने एक साथ मिलकर पहली बार आदिवासी दिवस मनाया। यहां लगभग दो हजार से तीन हज़ार के बीच में ग्रामीण उपस्थित थे और उन्होंने हजारों की संख्या में बाइक और पैदल रैली निकाल कर जल, जंगल, जमीन बचाने और पर्यावरण संरक्षण करने की आवाज़ उठाई।

यह रैली 8 किलोमीटर तक चली जिसमें आदिवासियों पर हो रहे अत्याचारों और जल, जंगल, जमीन को लेकर आदिवासी समुदाय द्वारा विशेष जोर देकर नारेबाजी की गई।

क्यों बनाया गया हितालकुडुम में पहली बार आदिवासी दिवस ?

आपको बता दें कि हितालकुडुम बस्तर का वही गांव है जहां पिछले 40 वर्षों से बंद पड़ी बोधघाट पन विद्युत परियोजना बांध बनना है जिसको बनाने का प्रस्ताव छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री भूपेश बघेल ने पिछले वर्ष केंद्र सरकार के सामने रखा था। यह गांव इंद्रावती नदी के किनारे बसा है जहाँ इस प्रोजेक्ट को बनाने का निर्णय कांग्रेस सरकार ने तय किया है। यह परियोजना पिछले 40 वर्षों से विवादों में और सुर्खियों में रहा है जिसका विरोध पिछले चालीस सालों से चलता आ रहा है। इस प्रोजेक्ट के बनने से लगभग 56 गांव डूब जाएंगे और 56 गाँव के हजारों आदिवासी समुदायों को बेघर होना पड़ेगा।

राज्य बनने के लगभग 15 साल के बाद कांग्रेस 2018 में सत्ता में आई और सत्ता में आते ही मुख्यमंत्री भूपेश बघेल ने इस बंद पड़े प्रोजेक्ट को फ़िर से चालू करने का निर्णय लिया और इस प्रोजेक्ट को व्योपकेस नाम की कंपनी को सौंपा है, 40 वर्षों से बंद पड़े प्रोजेक्ट के अचानक चालू होने की बात सुनकर डुबान क्षेत्र के ग्रामीणों में दहशत का माहौल है।

और इसके विरोध के स्वर भी अब तेज होने लगे है इसी वर्ष फरवरी में इस परियोजना को लेकर  4 जिलों के 56 गाँवो के ग्रामीणों द्वारा तीन दिवसीय परिचर्चा कर इसी स्थान में तीन दिनों तक सभी ग्रामीण एकत्रित होकर परिचर्चा कर विरोध भी कर चुके हैं, जिसमें 7 से 8 हज़ार की संख्या में सभी 4 जिलों के ग्रामीण आये हुए थे और एक बड़े आंदोलन करने की चेतावनी भी दी थी।

ठीक इसी जगह पर आज विश्व आदिवासी दिवस के अवसर पर डुबान क्षेत्र के ग्रामीणों द्वारा अपने जल, जंगल, जमीन को बचाने को के उद्देश्य को लेकर पहली बार हितालकुडुम में आदिवासी समुदाय द्वारा आदिवासी दिवस मनाया गया।

तो वही माँ दन्तेश्वरी जनजाति हित रक्षा समिति बोध घाट के अध्यक्ष सुखमन कश्यप ने बताया कि हम पहले से ही अपनी संस्कृति और जल, जंगल, जमीन के लिए लड़ते आ रहे हैं और संघर्ष कर रहे हैं, आज हम आदिवासियों का हक को छीना जा रहा है उसके लिए हम आवाज़ उठाते रहेंगे और हमारा जो अधिकार हैं उसे लेकर रहेंगे, साथ ही उन्होंने यह भी कहा कि हम पूर्व से इस प्रोजेक्ट का विरोध करते आ रहे हैं और आगे भी जल, जंगल, ज़मीन को बचाने के लिए संघर्ष करते रहेंगे और इसी उद्देश्य से आज इस जगह पर सब मिलकर आदिवासी दिवस बना रहे हैं।

आपको बता दें कि मध्यप्रदेश, महाराष्ट्र, नागालैंड, मिज़ोरम, आंध्र प्रदेश, झारखंड, और छत्तीसगढ़ जैसे राज्यों में जनजातीय समुदायों के लिए विशेष प्रावधान है और उनको संविधान में विशेष अधिकार और प्रावधान मिले हुए है फिर भी इनके संवैधानिक अधिकारों को राज्य और केंद्र सरकार द्वारा अनदेखी किया जाता है, साथ ही छत्तीसगढ़ राज्य में आदिवासी समुदाय के लिए इनके क्षेत्रों में ग्राम सभा, पेसा एक्ट, पांचवीं अनुसूची जैसे कानून लागू हैं फिर भी इन सब संवैधानिक अधिकारों को दरकिनार कर आदिवासी समुदाय का शोषण हो रहा है।

छत्तीसगढ़ के बस्तर में आदिवासी समुदाय अब अपनी मांगों और अधिकारों के लिए जंगलों से सीधे सड़कों पर आ रहे हैं और सरकार की आदिवासी विरोधी नीतियों का खुलकर विरोध कर रहे हैं।

बस्तर में पिछले दो सालों से आदिवासियों पर हो रहे अत्याचार जैसे फर्जी मुठभेड़ में निर्दोष आदिवासियों को घर से निकालकर मारना, निर्दोष आदिवासियों को माओवादी बताकर जेल में जबरन भरना जल, जंगल, ज़मीन से बेदखल करना बिना अनुमति के सुरक्षा बलों के कैम्प लगने इत्यादि को लेकर पिछले दो वर्षों में कड़ा संघर्ष देखने को मिल रहा है लेकिन इतना संघर्ष करने के बाद भी कुछ निष्कर्ष नहीं निकल रहा है।

(बस्तर से रिकेश्वर राणा की रिपोर्ट।)

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