Sunday, May 29, 2022

झारखंड के लातेहार में बढ़ते पुलिस दमन और विस्थापन के खिलाफ ग्रामीण हुए गोलबंद

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रांची। झारखंड के लातेहार जिला मुख्यालय के उदयपुरा विद्यालय प्रांगण में ग्रामीणों की एक बैठक में जिले के आदिवासी क्षेत्रों की 3 अहम जन मुद्दों पर चर्चा की गई। पहला ग्रामीण क्षेत्रों में जवाहरलाल नेहरू के पंचशील सिद्धांत के विपरीत पुलिसिया दमन बेतहाशा बढ़ रहे हैं। जिसके तहत ब्रह्मदेव सिंह खेरवार की पुलिस की गोली से मौत, अनिल सिंह की गारू थाने में पुलिस टॉर्चर, अरमु के निर्दोष ग्रामीणों पर पुलिस प्रशासन द्वारा फर्जी मुकदमा दर्ज किये जाने जैसी दर्जनों घटनाएं हैं, जो आम ग्रामीणों को दहशत में जीने को विवश कर रही हैं। यह इस इलाके के लोगों के लिए गंभीर चिंता का विषय है। 

दूसरा लातेहार जिला खासकर उत्तरी भाग जिसमें आधे दर्जन से अधिक प्रस्तावित कोल ब्लॉक हैं, जैसे तुबेद, बनहरदी, चकला, गणेशपुर, रजबार, धाधु सबानो इत्यादि। इसके साथ ही महुआडांड़ का पाठ एरिया जहां बॉक्साइट खदान, नेतरहाट फील्ड फ़ायरिंग रेंज, भेड़िया अभयारण्य जैसे विस्थापन की योजनायें सरकार द्वारा प्रस्तावित हैं। इन परियोजनाओं के शुरू हो जाने से जिले के लाखों आदिवासी और दलित उजाड़े जायेंगे। उनकी जमीनें, जंगल, नदी नाले उनसे छीन लिए जाएंगे और विस्थापितों को उनकी बदहाली पर छोड़ दिया जाएगा।

जानी मानी सामाजिक नेत्री सुनीता उरांव ने बताया कि कैसे तेतरियाखाड खदान से विस्थापित लोग आज बदहाली का जीवन जी रहे हैं। जो भी लोग वहां अपने संवैधानिक अधिकारों की मांग के लिए आगे आते हैं, उन्हें फर्जी मुकदमों में फंसा दिया जा रहा है। वहां के रैयतों को आज तक न तो मुआवजा की पूरी राशि भुगतान की गई है, न कंपनियों के वायदे के अनुसार नौकरी मिली है और न ही उस इलाके के लोगों को सरकारी जन सुविधाओं का लाभ ही मिल पा रहा है। माईनिंग से होने वाला विस्थापन हमेशा से आदिवासियों के लिए विनाश का कारण साबित हुआ है। 

बैठक में तमाम मुद्दों के बीच जिले में वन अधिकार की स्थिति पर भी चर्चा की गई। जिसमें विभिन्न प्रखंडों से उपस्थित लोगों ने बताया कि राज्य के अन्य जिलों की भांति ही लातेहार जिले में भी जिला प्रशासन का रवैया वन कानून को लागू करने के प्रति ठीक नहीं है। गारू से आये ग्रामीणों ने बताया कि वहां का एक गांव है हुरदाग, जिसमें दावेदार ने 3 एकड़ से अधिक रकबा का दावा किया गया था, वहीं दावेदार को महज 1 डिसमिल का पट्टा निर्गत किया गया। ऐसे ही सैकड़ों दावेदार हैं, जिनके दावित रकबा में भारी कटौती कर पट्टा निर्गत किया गया है। दूसरी तरफ वन विभाग के अधिकारी वृक्षारोपण के नाम पर दावेदारों का भयादोहन कर रहे हैं। 

दावेदारों की सहमति, ग्राम सभा की सहमति के बिना जबरन उनके जोतकोड वाले भूमि से उन्हें बेदखल कर वृक्षारोपण कर रहे हैं। जबकि ऐसा करना दलित आदिवासी अत्याचार अधिनियम जिसे 2016 में संशोधित किया गया है, उसके अनुसार दलित आदिवासियों को किसी भी तरह की भूमि से बेदखल करना कानूनन अपराध है। 

उपरोक्त परिस्थितियों का डटकर सामना करने हेतु बैठक में व्यापक रणनीतियां बनाई गई हैं। जिसे आने वाले समय में जनआन्दोलन का रूप दिया जाएगा। बैठक में गारू, लातेहार, चंदवा, बालूमाथ, हेरहंज, मनिका और सतबरवा से प्रतिभागी उपस्थित थे।

बैठक की अध्यक्षता सेलेस्टीन कुजूर ने की। बैठक में बतौर राज्य प्रतिनिधि टॉम कावला, एलिना होरो और प्रवीर पीटर उपस्थित थे। 

(झारखंड से वरिष्ठ पत्रकार विशद कुमार की रिपोर्ट।)

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