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अपनी जगह अन्नदाता के ‘मन की बात’ सुनें पीएम

कृषि कानूनों का विरोध देशव्यापी हो गया है। देश भऱ के किसानों ने आज ताली-थाली बजाकर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के ‘मन की बात’ कार्यक्रम का विरोध किया। किसानों ने कहा कि उन्हें अपने मन की बात करने की जगह किसानों के मन की बात सुननी चाहिए। अखिल भारतीय किसान संघर्ष समन्वय समिति और संयुक्त किसान मोर्चा के आह्वान पर छत्तीसगढ़ के किसानों ने भी गांव-गांव में मोदी सरकार की कृषि विरोधी नीतियों के खिलाफ ताली-थाली-ढोल-नगाड़ा बजाकर अपना विरोध प्रकट किया और किसान विरोधी तीन कानूनों और बिजली संशोधन विधेयक को वापस लेने की मांग की। एआईपीएफ ने इस मुद्दे पर कहा कि अन्नदाता किसानों को अपमानित करने, आंदोलन पर दमन करने और आंदोलन के खिलाफ दुष्प्रचार करने के लिए रोज राष्ट्र को संबोधित करने वाले प्रधानमंत्री मोदी को अपने मन की बात करने की जगह भीषण ठंड में एक माह से दिल्ली के बाहर बैठे किसानों के मन की बात सुननी चाहिए।

छत्तीसगढ़ किसान सभा, आदिवासी एकता महासभा सहित छत्तीसगढ़ किसान आंदोलन के सभी घटक संगठनों ने प्रदेश के सूरजपुर, कोरबा, मरवाही, रायपुर, धमतरी, सरगुजा, राजनांदगांव, गरियाबंद, बलौदाबाजार सहित 15 से अधिक जिलों में विरोध प्रदर्शन किया गया। छत्तीसगढ़ किसान सभा के अध्यक्ष संजय पराते और महासचिव ऋषि गुप्ता ने कहा कि मोदी को अपने मन की बात देश को सुनाने से पहले देश के जन-गण-मन की बात सुननी होगी और वह किसान विरोधी तीनों कानूनों और बिजली कानून में संशोधनों की वापसी चाहती है।

पूरे देश के किसान आज अपनी खेती-किसानी को बचाने के लिए सी-2 लागत का डेढ़ गुना न्यूनतम समर्थन मूल्य और कर्ज़ मुक्ति चाहता है, जबकि मोदी सरकार के कानून कृषि अर्थव्यवस्था को कॉरपोरेटों के हाथों में सौंपने के लिए किसानों के लिए डेथ वारंट है। उन्होंने कहा कि यदि सरकार इन कानूनों को वापस नहीं लेती, तो दिल्ली की सीमाओं पर डटे किसान दिल्ली कूच करने से नहीं हिचकेंगे और मोदी सरकार की लाठी-गोलियां धरी रह जाएंगी। उन्हें यह नहीं भूलना चाहिए कि हर वर्दी के नीचे एक किसान है।

इस देशव्यापी किसान आंदोलन के खिलाफ संघी सरकार द्वारा आधारहीन दुष्प्रचार करने की भी किसान सभा नेताओं ने निंदा की। उन्होंने कहा कि आंदोलनकारी किसान संगठनों से उनके मुद्दों पर बातचीत करने के बजाए सरकार उन पर अपना एजेंडा थोपना चाह रही है। उन्होंने कहा कि इन कानूनों में संशोधनों से इसका कॉरपोरेटपरस्त चरित्र नहीं बदलने वाला है, इसलिए इसमें संशोधन की कोई गुंजाइश नहीं है। 29 दिसंबर की वार्ता में सरकार को स्पष्ट करना होगा कि क्या वह इन कानूनों को वापस लेकर न्यूनतम समर्थन मूल्य सुनिश्चित करने का कानून बनाना चाहती है या नहीं। सरकार के इस जवाब पर ही किसान आंदोलन के आगे के कार्यक्रम तय किए जाएंगे।

किसान सभा नेताओं ने कहा कि देश में पर्याप्त खाद्यान्न का उत्पादन होने के बावजूद केंद्र सरकार की जन विरोधी नीतियों के चलते आज हमारा देश दुनिया में भुखमरी से सबसे ज्यादा पीड़ित देशों में से एक है और इस देश के आधे से ज्यादा बच्चे और महिलाएं कुपोषण और खून की कमी का शिकार हैं।

कृषि के क्षेत्र में जो नीतियां लागू की गई हैं, उसका कुल नतीजा किसानों की ऋणग्रस्तता और बढ़ती आत्महत्या के रूप में सामने आ रहा है। मोदी सरकार को जवाब देना होगा कि विकास के कथित दावों के बावजूद उसके राज में किसान इतने बदहाल क्यों हो गए? क्यों 5.5 करोड़ किसान परिवारों को उनको मिलने वाली निधि से असम्मानजनक ढंग से बाहर कर दिया गया है?

उल्लेखनीय है कि आज रेडियो और टीवी में मोदी ने ‘मन की बात’ का प्रसारण किया है, तो किसान संगठनों ने भी इन तीन काले कानूनों के खिलाफ अपनी बात सुनाने के लिए पूरे देश में थालियां बजाने का फैसला किया था।

उधर, एआईपीएफ ने कहा कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को किसान कानूनों की वापसी, एमएसपी पर कानून बनाने, विद्युत संशोधन विधेयक रद्द करने और पराली कानून से किसानों को राहत देने की मांग पूरी कर भीषण ठंड में जान गंवाते अन्नदाता की जान बचाने की पहल करनी चाहिए। यह बात किसान आंदोलन के राष्ट्रव्यापी आह्वान पर आज आल इंडिया पीपुल्स फ्रंट और मजदूर किसान मंच के कार्यकर्ताओं ने मन की बात कार्यक्रम का विरोध करते हुए कही। आज उत्तर प्रदेश के विभिन्न जनपदों के गांवों में बहरे कानों को सुनाने के लिए मन की बात कार्यक्रम के दौरान ताली, थाली और सुपा बजाया गया।

एआईपीएफ के राष्ट्रीय प्रवक्ता एसआर दारापुरी और मजदूर किसान मंच के महासचिव डॉ. बृज बिहारी ने प्रेस को जारी बयान में कहा कि आज सुबह ही सोनभद्र के एआईपीएफ के जिला संयोजक और प्रदेश उपाध्यक्ष कांता कोल को उनके घर से पुलिस ने गिरफ्तार कर लिया था। इसकी जानकारी होने पर घोरावल के कई गांव के एआईपीएफ कार्यकर्ताओं ने आदिवासियों के नरसंहार के लिए चर्चित उभ्भा गांव में स्थित पुलिस चैकी का घेराव कर लिया।

एआईपीएफ और मंच के कार्यकर्ताओं ने कहा कि मोदी सरकार घोर संवेदनहीन और झूठे प्रचार की सरकार साबित हो रही है। उनके द्वारा बार-बार बोले जा रहे आत्मनिर्भरता अर्थात सेल्फ रिलांयस को लोग उनके रिलांयस के प्रति समर्पण के रूप में देख रहे है। चंद कॉरपोरेट घरानों के प्रति इसी समर्पण के कारण मोदी शांतिपूर्ण लोकतांत्रिक आंदोलन के खिलाफ जहर उगल रहे हैं और आंदोलन को राजनीतिक दलों द्वारा संचालित बता कर बदनाम कर रहे हैं। वास्तव में ये किसान आंदोलन सरकार की किसान विरोधी नीतियों के खिलाफ है और देश की खाद्य सुरक्षा और संप्रभुता की रक्षा के लिए होने के नाते अपनी अंतर्वस्तु में राजनीतिक है, लेकिन इसका चुनावी राजनीति से कुछ लेना देना नहीं है। जमीन से उठा ये संगठित किसान आंदोलन आम जन की भावना से जुड़ा है, जिसका समाज का हर तबका समर्थन कर रहा है, इसलिए इस आंदोलन पर हमलावर मोदी सरकार किसानों से अलग-थलग हो रही है।

आज हुए कार्यक्रमों का नेतृत्व बिहार के सीवान में पूर्व विधायक और एआईपीएफ प्रवक्ता रमेश सिंह कुशवाहा, लखीमपुर खीरी में एआईपीएफ के प्रदेश अध्यक्ष डॉ. बीआर गौतम, लखनऊ में वर्कर्स फ्रंट अध्यक्ष दिनकर कपूर, उपाध्यक्ष उमाकांत श्रीवास्तव, एडवोकेट कमलेश सिंह, वाराणसी में प्रदेश उपाध्यक्ष योगीराज पटेल, सोनभद्र में प्रदेश उपाध्यक्ष कांता कोल, इलाहाबाद में युवा मंच संयोजक राजेश सचान, मऊ में बुनकर वाहनी के इकबाल अहमद अंसारी, बलिया में मास्टर कन्हैया प्रसाद, बस्ती में एडवोकेट राजनारायण मिश्र, श्याम मनोहर जायसवाल ने किया।

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This post was last modified on December 27, 2020 9:25 pm

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