Monday, January 24, 2022

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घट नहीं रही हैं झारखंड में पुलिसिया दमन की घटनाएं

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झारखंड में मानवाधिकार हनन की घटनाएं लगातार घटती रही हैं। इनमें सबसे चर्चित घटना पश्चिम सिंहभूम जिले के चिरियाबेड़ा गाँव की है जहां 20 आदिवासियों को जून 2021 में CRPF के जवानों ने सर्च अभियान के दौरान बेरहमी से पीटा था, जिनमें तीन बुरी तरह से घायल हुए ग्रामीणों का दोष यही था कि वे जवानों को हिंदी में जवाब नहीं दे पा रहे थे। उन्हें माओवादी कहा गया और डंडों, जूतों, कुंदों से पीटा गया। पीड़ितों ने पुलिस को अपने बयान में स्पष्ट रूप से बताया था कि सीआरपीएफ ने उन्हें पीटा था, लेकिन पुलिस द्वारा दर्ज प्राथमिकी में कई तथ्यों को नजरअंदाज किया गया और इस हिंसा में एक की भी भूमिका का कोई उल्लेख नहीं किया गया। पिछले एक साल के दौरान राज्य के विभिन्न भागों में सुरक्षा कर्मियों द्वारा आम जनता पर हिंसा की वारदातें होती रही हैं।

दूसरी तरफ राज्य में आदिवासियों, गरीबों व सामाजिक कार्यकर्ताओं पर माओवादी होने का फर्जी आरोप लगाने का सिलसिला जारी है। पिछले कई सालों से UAPA के मामलों में लगातार वृद्धि हुई है। यह दुःखद है कि पुलिस द्वारा UAPA के बेबुनियाद इस्तेमात कर लोगों को परेशान करने के विरुद्ध हेमंत सोरेन सरकार ने कोई कदम नहीं उठाया है, बोकारो के ललपनिया के कई मजदूरों, किसानों, जो आदिवासी-मूलवासी अधिकारों के लिए संघर्षत रहे हैं, के खिलाफ माओवादी होने का आरोप लगाकर UAPA के तहत मामला दर्ज किया गया है। वे पिछले कई सालों से बेल एवं अपनी बेगुनाही साबित करने के लिए संघर्ष कर रहे हैं।

मानवाधिकार हनन के मामलों में आदिवासियों और मुसलमानों पर गोमांस बेचने/ खाने के आरोप लगा कर हिन्दुत्ववादी गुंडों द्वारा पीटे जाने की घटनाएं भी चर्चे में रहीं। लेकिन सरकार और पुलिस इन पर चुप रही है। पिछले शासन के दौरान 24 से भी ज्यादा लोगों की लिंचिंग गोमांस खाने/ बेचने के नाम पर की गयी जो राष्ट्रीय स्यतर पर चर्चे में रही। जुलाई 2020 में दुमका व जमशेदपुर में गो मांस खाने/ बेचने के आरोप में आदिवासियों की हिन्दुत्ववादी भीड़ द्वारा पिटाई हुई थी। सितम्बर 2020 में सिमडेगा के सात आदिवासियों को बेरहमी से पीटा गया, उनका मुंडन किया गया और उनसे जय श्री राम का नारा लगवाया गया। ज्यादातर मामलों में पीड़ितों को सहायता नहीं मिली और पुलिस दोषियों को बचाने में जुटी रही। सरकार द्वारा अभी तक लिंचिंग के विरुद्ध सर्वोच्च न्यायालय के आदेशों को पूर्ण रूप से लागू नहीं किया गया जैसे स्पीडी ट्रायल, 30 दिनों में अंतरिम गुआवजा, SP द्वारा केस का अनुश्रवण आदि…

उल्लेखनीय है कि 12 जून, 2021 को झारखंड के लातेहार जिले में पिरी गांव के ब्रम्हदेव सिंह (खरवार जनजाति) समेत कई आदिवासी पुरुष नेम सरहुल (आदिवासी समुदाय का एक त्योहार) मनाने की तैयारी के तहत शिकार के लिए गाँव से निकलकर गनईखाड़ जंगल में घुसे ही थे कि जंगल किनारे से उन पर सुरक्षा बलों ने गोली चलानी शुरू कर दी। हाथ उठाकर चिल्लाये कि वे आम लोग हैं, पार्टी (माओवादी) नहीं हैं, वो गोली न चलाने का अनुरोध करते रहे। लेकिन सुरक्षा बलों ने उनकी एक न सुनी और फायरिंग कर दी। इन लोगों के पास पारंपरिक भरटुआ बंदूक थी, जिसका इस्तेमाल वे ग्रामीण छोटे जानवरों के शिकार के लिए करते हैं। सुरक्षा बलों की ओर से गोलियां चलती रहीं, नतीजतन दीनानाथ सिंह के हाथ में गोली लगी और ब्रम्हदेव सिंह की गोली से मौत हो गयी। इस घटना का सबसे दुखद और लोमहर्षक पहलू यह रहा कि ब्रम्हदेव सिंह को पहली गोली लगने के बाद उसे सुरक्षा बलों द्वारा थोड़ी दूर ले जाकर फिर से गोली मारी गई और उसकी मौत सुनिश्चित की गयी।

इस घटना के बाद इस कांड के दोषियों के खिलाफ कार्रवाई करने की बजाय पुलिस ने मृत ब्रम्हदेव सिंह समेत छः लोगों पर ही विभिन्न धाराओं के अंतर्गत प्राथमिकी (Garu P.S. Case No. 24/2021 dated 13/06/21) दर्ज कर दी। इस प्राथमिकी में पुलिस ने घटना की गलत जानकारी लिखी और पीड़ितों को ही प्रताड़ित किया गया।

इसी संदर्भ में 11 दिसंबर, 2021 को झारखंड की राजधानी रांची में स्थित फ़ादर कामिल बुल्के हॉल, मनरेसा हाउस में “अंतर्राष्ट्रीय मानवाधिकार दिवस” के अवसर पर आयोजित 25 नवंबर से 10 दिसंबर तक चल रहे 16 दिवसीय वैश्विक अभियान का समापन किया गया।

इस कार्यक्रम का संयोजन आदिवासी वीमेंस नेटवर्क, इंटर स्टेट आदिवासी वीमेंस नेटवर्क और झारखण्ड जनाधिकार महासभा द्वारा किया गया। कार्यक्रम में पूरे झारखण्ड राज्य में हो रहे पुलिसिया दमन के विभिन्न मामलों पर चर्चा हुई। विशेषकर लातेहार, बोकारो और चाईबासा की पुलिसिया दमन चर्चे में रही। 

इस अवसर पर लातेहार के लाल मोहन खेरवार एवं उनके साथियों द्वारा बताया गया कि कैसे 12 जून 2021 को ब्रम्हदेव सिंह की सुरक्षा बलों द्वारा हत्या कर दी गई। 

दूसरे मामले की चर्चा करते हुए मानकी तुबिद एवं विनोद कायम ने बताया कि पश्चिमी सिंहभूम के आदिवासियों की CRPF द्वारा पिटाई की गई। 15 जून 2020 को CRPF के जवानों ने नक्सल सर्च अभियान के दौरान चिरियाबेड़ा ग्राम, खूंटपानी प्रखंड, पश्चिमी सिंहभूम के आदिवासियों को बेरहमी से पीटा था। 11 ग्रामीणों को बुरी तरह से पीटा गया था, जिनमें से तीन को गंभीर चोटें आई थी।  

बोकारो से सामाजिक कार्यकर्ता दिनेश मुर्मू और उनके साथियों के द्वारा बताया गया कि कैसे 17 CLA/UAPA कानून व राजद्रोह धारा का अंधाधुंध इस्तेमाल हो रहा है। बोकारो के गोमिया प्रखण्ड के कई मज़दूरों व किसानों पर, जो आदिवासी-मूलवासी अधिकारों के लिए संघर्षत रहे हैं, माओवाद के फ़र्ज़ी आरोप व 17 CLA/UAPA के तहत मामला दर्ज किया गया है। वे पिछले कई सालों से बेल एवं अपनी बेगुनाही साबित करने के लिए संघर्ष कर रहे हैं।

 कार्यक्रम में उपरोक्त सभी मामलों में उचित कार्रवाई कर पीड़ितों को न्याय और मुआवज़ा व दोषियों के विरुद्ध कार्रवाई सुनिश्चित की जाने की मांग को भी रखा गया। साथ ही राज्य सरकार से आदिवासी-मूलवासियों के हितों के लिए निम्न मांगों को भी रखा गया –

·        मानव अधिकारों के उल्लंघन की सभी घटनाओं से सख्ती से निपटा जाए। सरकार सुनिश्चित करे कि पीड़ितों द्वारा दोषियों पर प्राथमिकी दर्ज करने में किसी प्रकार की परेशानी न हो।

·        स्थानीय प्रशासन और सुरक्षा बलों को स्पष्ट निर्देश दिए जाएं कि वे किसी भी तरह से लोगों, विशेष रूप से आदिवासियों, का शोषण न करें। नक्सल विरोधी अभियानों की आड़ में सुरक्षा बलों द्वारा लोगों को परेशान न किया जाए।

·        पांचवीं अनुसूची प्रावधानों व पेसा को पूर्ण रूप से लागू किया जाए। पांचवीं अनुसूची क्षेत्र के थाने व स्थानीय प्रशासन के निर्णायक पदों पर केवल आदिवासियों की पदस्थापना हो। स्थानीय प्रशासन और सुरक्षा बलों को आदिवासी भाषा, रीति-रिवाज, संस्कृति और उनके जीवन-मूल्यों के बारे में प्रशिक्षित किया जाए और समवेदनशील बनाया जाए। मुंडा/मानकी या मुखिया को बिना सूचना दिए पांचवीं अनुसूची क्षेत्र में स्थानीय प्रशासन और सुरक्षा बलों को घुसने की अनुमति न दी जाए।

·        सुप्रीम कोर्ट के लिंचिंग-सम्बंधित अनुदेशों को लागू किया जाए व उनका व्यापक प्रचार-प्रसार हो, लिंचिंग के विरुद्ध क़ानून बनाया जाए एवं पीड़ितों को 25 लाख रु मुआवज़ा दिया जाए। गोवंशीय पशु हत्या प्रतिषेध अधिनियम व झारखंड धर्म स्वातंत्र्य कानून को रद्द किया जाए।

·        निर्जीव पड़े हुए महिला आयोग/अल्पसंख्यक आयोग/ श्रम आयोग/ बाल आयोग/राज्य मानवाधिकार आयोग को पुनर्जीवित किया जाए और यह जनता के लिए सुलभ हो। मानवाधिकार उल्लंघन मामलों के लिए स्वतंत्र शिकायत निवारण तंत्र बनाया जाए। महिलाओं के लिए एक सिंगल विन्डो शिकायत निवारण प्रणाली बनायी जाए जिससे महिलाएँ किसी भी प्रकार के शोषण की स्थिति में न्यूनतम दस्तावेजों के साथ शिकायत दर्ज कर सकती हैं।

·        राज्य में 17 CLA/UAPA व राजद्रोह धारा के इस्तेमाल पर पूर्ण रोक लगे।

·        पुलिस द्वारा किए गए दमन की जाँच करते हुए, निर्दोष आदिवासी किसान मजदूर को रिहा किया जाए तथा केस वापस हो।

·        दोषी प्रशासनिक अधिकारियों पर कानूनी कार्रवाई की जाए।

·        पुलिस द्वारा हत्या किए गए आश्रित परिवारों को नौकरी व मुवाअजा, तथा छोटे बच्चों को 12 तक की पढ़ाई की व्यवस्था, महिलाओं को नौकरी, युवाओं को नौकरी दी जाए।

मौके पर आदिवासी वीमेंस नेटवर्क द्वारा प्रकाशित “जाने अपना अधिकार” पुस्तिका का भी विमोचन किया गया। इस कार्यक्रम में विभन्न जिलों जैसे लातेहार, बोकारो, कोडरमा, गढ़वा, पश्चिम सिंहभूम, सरायकेला-खरसावां के सामाजिक कार्यकर्ताओं ने भाग लिया। साथ ही साथ सभी साथियों के द्वारा अल्बर्ट एक्का चौक, रांची में मानव श्रृंखला भी बनायी गई।

(झारखंड से वरिष्ठ पत्रकार विशद कुमार की रिपोर्ट।)

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