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भंवर में महाराज की राजनीतिक पगड़ी!

राजनीति में एक गलत कदम किसी भी स्थापित राजनेता को अर्श से फर्श पर ला पटकता है। कोरोना की आहट के बावजूद कांग्रेस के कद्दावर नेता रहे ज्योतिरादित्य सिंधिया ने जिस तरह पाला बदल के मध्यप्रदेश में कांग्रेस की सरकार गिरवाई और अपने समर्थक विधायकों का इस्तीफा करवाया उसके बाद अभी तक अनिश्चितता बनी हुयी है कि भाजपा उनसे किये गये वादों का सम्मान करेगी अथवा नहीं। अभी तक के राजनीतिक लक्षणों से मामला फिफ्टी-फिफ्टी का लग रहा है क्योंकि ज्योतिरादित्य सिंधिया के हाथ से फ़िलहाल बाजी निकल गयी है। ज्योतिरादित्य सिंधिया ने भाजपा में जाकर बहुत बड़ा जुआ खेला है जिसका विपरीत परिणाम भी निकल सकता है।

होली के पहले ज्योतिरादित्य सिंधिया अपने समर्थक विधायकों के साथ कांग्रेस से इस्तीफा देकर भाजपा में शामिल हो गए। लेकिन भाजपा में उनका कद और हैसियत क्या कांग्रेस जैसी रहेगी इस पर गम्भीर सवाल उठ रहे हैं। वैसे तो ज्योतिरादित्य सिंधिया का भाजपा के टिकट पर राज्यसभा जाना तय माना जा रहा है। भाजपा इसके लिए बहुत एहतियात बरत रही है और शिवराज के मंत्रिमंडल का विस्तार नहीं हो रहा है, क्योंकि जो भाजपाई विधायक मंत्री नहीं बनाये जाएंगे उनके क्रास वोटिंग करने का खतरा मंडरा रहा है। यदि राज्यसभा चुनाव में ज्योतिरादित्य सिंधिया के साथ कोई अनहोनी हो गयी तो यह भाजपा को बहुत भारी पड़ सकती है, जिसका अंदाजा भाजपा आला कमान को है।

जब तक ज्योतिरादित्य सिंधिया कांग्रेस में थे तब तक मध्यप्रदेश के भाजपा नेता नरेंद्र सिंह तोमर, प्रभात झा, जयभान सिंह पवैया और नरोत्तम मिश्रा कई बार सिंधिया पर हमला बोलते हुए नजर आए हैं। अब इन सभी के साथ सिंधिया कैसे तालमेल बैठाएंगे और मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री बनने की अपनी चाहत कैसे पूरी करेंगे, इस पर कयास लग रहे हैं। आरएसएस की कट्टर पृष्ठभूमि से आये नरेंद्र सिंह तोमर और नरोत्तम मिश्रा स्वयं मुख्यमंत्री बनने के दावेदार हैं। कहा तो यहां तक जा रहा है कि ज्योतिरादित्य सिंधिया को भाजपा में केंद्र की राजनीति करने की शर्त पर लिया गया है ऐसे में यदि उनके समर्थकों को भाजपा में तरजीह नहीं मिली तो सिंधिया की राजनीतिक हैसियत पर सवाल उठने लगेगा। देर सबेर केएन गोविंदाचार्य, उमा भारती, कल्याण सिंह, विनय कटियार सरीखे नेताओं की तरह सिंधिया को भी भाजपा राजनीतिक बियाबान में धकेल सकती है क्योंकि भाजपा में व्यक्तिवादी राजनीति को संघ चलने नहीं देता।

पूर्व केंद्रीय मंत्री ज्योतिरादित्य सिंधिया का कांग्रेस पार्टी छोड़कर भाजपा का दामन थामने पर मध्यप्रदेश की राजनीति में कई समीकरण बनेंगे तो कई बिगड़ेंगे। सिंधिया के भाजपा में जाने से सबसे ज्यादा प्रभाव राज्य के ग्वालियर चंबल के क्षेत्र और इस क्षेत्र के भाजपा नेताओं पर पड़ेगा। ज्योतिरादित्य सिंधिया के साथ भाजपा के वीडी शर्मा, नरेंद्र सिंह तोमर, नरोत्तम मिश्रा, जयभान सिंह पवैया, प्रभात झा और कैलाश विजयवर्गीय कैसे निभाएंगे, यह लाख टके का सवाल बना हुआ है। भाजपा में ग्वालियर चंबल संभाग में बड़ी अंतर्कलह और गुटबाजी शुरू हो गयी है और इसका दुष्परिणाम आने वाले समय में निश्चित दिखेगा।

नरेंद्र सिंह तोमर मध्यप्रदेश भाजपा के वरिष्ठ नेताओं में से एक हैं। तोमर ग्वालियर चंबल संभाग के दिग्गज नेता हैं। सिंधिया के भाजपा में शामिल होने के बाद सबसे ज्यादा प्रभाव राज्य के इसी क्षेत्र में देखने को मिलेगा। अभी तक तोमर ही इस क्षेत्र से भाजपा के बड़े नेता रहे हैं। अब जब सिंधिया भाजपा में शामिल हो गए हैं तब ऐसा माना जा रहा है कि यहां के समीकरण तेजी से बदलेंगे और दोनों नेता एक दूसरे के सामने चुनौती बनकर उभरेंगे।

नरोत्तम मिश्रा का कद भारतीय जनता पार्टी में पिछले कुछ वर्षों में बहुत तेजी से बढ़ा है। ग्वालियर चंबल में नरेंद्र सिंह तोमर के बाद नरोत्तम मिश्रा का नाम दूसरे नंबर पर आता है। शिवराज सिंह चौहान सरकार में कई अहम मंत्री पदों पर रहे नरोत्तम मिश्रा सिंधिया के क्षेत्र में भी बहुत अच्छी पकड़ रखते हैं। इसके अलावा दिल्ली हाईकमान और प्रदेश के सभी बड़े नेताओं से उनके अच्छे संबंध जगजाहिर हैं। नरोत्तम के ज्योतिरादित्य सिंधिया के साथ-साथ उनकी दोनों बुआ यशोधरा राजे सिंधिया और राजस्थान की पूर्व सीएम वसुंधराराजे सिंधिया से भी बेहद मधुर संबंध हैं। लेकिन सिंधिया की भाजपा में एंट्री नरोत्तम मिश्रा के बढ़ते कद को कम कर सकती है।

इसी तरह प्रभात झा भी मध्यप्रदेश भाजपा के सबसे वरिष्ठ नेताओं में से एक हैं। झा की भाजपा के साथ-साथ संघ में अच्छी खासी पकड़ है। झा जब प्रदेश भाजपा अध्यक्ष थे तब से लेकर अब तक लगातार कांग्रेस और ज्योतिरादित्य सिंधिया पर हमला बोलते रहे हैं। झा ने कई बार सिंधिया पर भ्रष्टाचार के आरोप लगाने से लेकर सियासी हमले किए। झा का राज्यसभा का कार्यकाल भी खत्म हो रहा है। वहीं भाजपा उन्हें दोबारा राज्यसभा में नहीं भेज रही है। ऐसे में उनका असंतोष उपचुनाव में भाजपा को भारी पड़ सकता है।

भाजपा नेता और पूर्व मंत्री जयभानसिंह पवैया और ज्योतिरादित्य सिंधिया की लड़ाई मध्यप्रदेश के राजनीतिक गलियारों में जगजाहिर है। पवैया की प्रदेश में राजनीति केवल सिंधिया के विरोध पर टिकी रही है। पवैया ने पहले माधवराव सिंधिया का विरोध किया, फिर उनकी मृत्यु के बाद ज्योतिरादित्य का खुलेआम विरोध करने लगे। अब जब सिंधिया ने भाजपा का दामन थाम लिया है तो पवैया के सामने भी उनके अस्तित्व को लेकर संकट होगा।  वहीं सिंधिया को भी उनके साथ तालमेल बैठाना किसी चुनौती से कम नहीं होगा। कौन किसकी जय बोलेगा उपचुनाव में पता चल जायेगा।

मध्यप्रदेश में भाजपा का फिलहाल सबसे बड़ा चेहरा शिवराज सिंह चौहान ही हैं।लेकिन सिंधिया के पार्टी में शामिल होने के बाद उनको कई चुनौतियों का सामना करना पड़ सकता है। पिछले चुनावों में भाजपा ने यह नारा भी दिया था कि माफ करो महाराज, हमारा नेता शिवराज।

राज्यसभा चुनाव के बाद सरकार में बने रहने के लिए उपचुनाव में भाजपा को बड़ी जीत की चुनौती होगी। भाजपा के समर्थक मानते हैं कि सिंधिया के आने के बाद ग्वालियर-चंबल संभाग में भाजपा की जीत एकतरफा हो गयी है लेकिन हकीकत में भाजपा की चुनौती बढ़ गई है। पार्टी के पुराने नेता नाराज चल रहे हैं, ऐसे में भाजपा को डर है कि उपचुनाव में खेल खराब न हो जाए। ग्वालियर-चंबल संभाग में अपने लोगों को मनाने की जिम्मेदारी गृह मंत्री नरोत्तम मिश्रा को सौंपी गयी है।

प्रदेश में प्रस्तावित 24 विधानसभा सीटों पर उपचुनावों के लिए लॉकडाउन के बीच सियासत जोरों पर है। बयान बाजी के बाद अब मैदानी जंग की तैयारी हो रही है । संघ ने जीत के लिए अपने सारे घोड़े खोल दिए हैं। ज्योतिरादित्य सिंधिया के भाजपा ज्वॉइन करने के बाद और 24 में से 16 सीटें ग्वालियर चंबल से होने के कारण सरकार और विपक्ष दोनों की निगाहें इसी अंचल पर टिकी हैं। लेकिन सिंधिया के गढ़ में हमेशा सिंधिया को घेरने वालों को अब उनके साथ काम करने के लिए तैयार करना बड़ी चुनौती है।

ग्वालियर चंबल अंचल को जहां ज्योतिरादित्य सिंधिया का गढ़ कहा जाता है, वहीं ये भारतीय जनता पार्टी को गढ़ने वाली राजमाता विजया राजे सिंधिया यानि ज्योतिरादित्य सिंधिया की दादी की कर्मभूमि भी है। भाजपा इसी अंचल से फली फूली और पूरे विश्व तक पहुंची। प्रदेश से लेकर देश तक की राजनीति कहीं ना कहीं ग्वालियर से प्रभावित होती ही है। चाहे सत्ता के केंद्र में भाजपा हो या कांग्रेस, ग्वालियर उसका बड़ा केंद्र रहता है।

कांग्रेस छोड़कर 22 विधायकों के लाव लश्कर के साथ ‘महाराज’ गए तो उसमें से 16 ग्वालियर चंबल के ही थे। अब इन सबके भाजपा में शामिल हो जाने के बाद भाजपा के पुराने और स्थापित नेताओं में बेचैनी है। उन्हें अपने राजनैतिक भविष्य पर ग्रहण लगता दिखाई दे रहा है, उनके नाराज और रूठने की खबरें सरकार और संगठन तक पहुंच रही हैं । उपचुनाव से पहले भाजपा पार्टी के पुराने नेताओं को भरोसे में लेना चाहती है, जिससे चुनावों में उनका बेहतर उपयोग कर सके और उनके अनुभव का लाभ लेकर उपचुनाव में अधिक सीटें जीतकर सरकार में बने रहें।

(जेपी सिंह वरिष्ठ पत्रकार हैं और आजकल इलाहाबाद में रहते हैं।)

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This post was last modified on June 8, 2020 3:02 pm

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