Wednesday, February 8, 2023

उत्तराखंड के चुनाव में असल मुद्दे नदारद

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प्रचंड शीतलहर के बीच उत्तराखंड में चुनावी माहौल पूरे शबाब पर है। उम्मीदवार अपनी जीत सुनिश्चित करने के लिए हर तरह के हथकंडे अपना रहे हैं। कोविड पाबंदियों के कारण भले ही बड़ी सभाएं न हो पा रही हों, लेकिन छोटी-छोटी सभाएं करके और लोगों से संपर्क साध कर उम्मीदवार अपने लिए वोट जुटाने का प्रयास कर रहे हैं। उत्तराखंड के चुनाव में वे सब हथकंडे अपनाए जा रहे हैं, जिन पर चुनाव आयोग की ओर से पाबंदियां हैं। पाबंदियों के बावजूद मतदाताओं को व्यक्तिगत  लाभ पहुंचाना चुनावों का प्रमुख हिस्सा बन चुका है। इसके लिए तरह-तरह के प्रयास किए जा रहे हैं। मतदाताओं को व्यक्तिगत रूप से लाभ पहुंचाने की इस होड़ के बीच उत्तराखंड की जनता के असली मुद्दे गुम हो गए हैं। ऐसे बहुत कम उम्मीदवार हैं, जो चुनावी सभाओं में राज्य की समस्याओं और मुद्दों पर बात कर रहे हैं।

त्रिलोचन भट्ट द्वारा भेजी तस्वीर 3
केदानाथ विधानसभा क्षेत्र का अंतिम गांव चैमासी

जनचौक ने राज्य के रुद्रप्रयाग और चमोली जिले के विभिन्न विधानसभा क्षेत्रों का जायजा लिया। इस दौरान यह बात साफ तौर पर स्पष्ट हुई कि उत्तराखंड में उम्मीदवारों और मतदाताओं को राज्य की ज्वलंत समस्याओं और यहां के प्रमुख मुद्दों से कोई लेना-देना नहीं है। लगभग हर क्षेत्र में ऐसे मतदाताओं की तादाद काफी अधिक है, जो क्षेत्र में आने वाले हर उम्मीदवार से व्यक्तिगत लाभ की उम्मीद कर रहे हैं। ऐसा अचानक नहीं हुआ है। दरअसल पिछले कई चुनावों से राज्य में कुछ ऐसे उम्मीदवार चुनाव मैदान में उतरे हैं, जिन्होंने धन-बल से चुनाव जीतने के प्रयास किए हैं और वे इसमें सफल भी रहे हैं।

अलग-अलग क्षेत्रों का जायजा लेने के बाद जो प्रमुख बात सामने आई, वह यह है कि ज्यादातर मतदाता हर उम्मीदवार से कुछ न कुछ व्यक्तिगत लाभ पाने की उम्मीद बांधे हुए हैं। उम्मीदवार भी मतदाताओं को रिझाने के लिए नकदी से लेकर शराब और अन्य तरह के लाभ देने में जुटे हुए हैं। इस तरह के व्यक्तिगत लाभ के अलावा उत्तराखंड के चुनाव में जातिगत समीकरण भी प्रमुख स्थान बनाए हुए है। उत्तराखंड में अल्पसंख्यक समुदाय के गिने-चुने वोट हैं, ऐसे में यहां ब्राह्मण और ठाकुर मतदाताओं का ध्रुवीकरण करने का प्रयास किया जा रहा हैं। पार्टियों ने भी राज्य के पर्वतीय क्षेत्रों में जातिगत समीकरणों को देखते हुए ही टिकट वितरित किए हैं। हालांकि इस प्रयास में कहीं-कहीं पार्टियां असफल होती भी प्रतीत हुई हैं।

इस सब के बावजूद कुछ उम्मीदवार ऐसे हैं जो राज्य के मुद्दों को उठाकर चुनाव मैदान में ताल ठोक रहे हैं। हाल के दिनों में भू-कानून राज्य का एक बड़ा मुद्दा बन गया है। चुनाव की तिथि घोषित होने से पहले तक भू-कानून को लेकर कई जगह धरने-प्रदर्शन हो रहे थे। लेकिन, चुनाव की घोषणा होते ही यह मुद्दा राजनीतिक पटल से लगभग गायब हो चुका है। कर्णप्रयाग क्षेत्र के सीपीआई (एमएल) प्रत्याशी इंद्रेश मैखुरी और केदारनाथ विधानसभा क्षेत्र के कांग्रेस उम्मीदवार मनोज रावत जैसे कुछ उम्मीदवार अवश्य चुनावों में इस मुद्दे को जीवित रखने का प्रयास किए हुए हैं।

राज्य गठन के बाद उत्तराखंड में राज्य से बाहर के निवासियों के लिए अधिकतम 500 वर्ग मीटर जमीन खरीदने की छूट दी गई थी। 2007 में इस कानून में संशोधन करके इस सीमा को 250 वर्ग मीटर तक सीमित कर दिया गया था। लेकिन, 2018 में इस कानून में एक बड़ा बदलाव तत्कालीन त्रिवेंद्र सिंह रावत सरकार ने किया। इस कानून में संशोधन करके इस सीमा को पूरी तरह हटा दिया गया। तर्क यह दिया गया था कि इस सीमा के रहते राज्य में औद्योगिक विकास रुक जाएगा। इसी दौरान देहरादून में देशभर के उद्योगपतियों की एक मीट भी करवाई गई थी। दावा किया गया था कि राज्य में जमीन खरीदने की सीमा पूरी तरह हट जाने के बाद बड़ी संख्या में उद्योगपतियों ने राज्य में उद्योग स्थापित करने के प्रस्ताव दिए हैं। हालांकि ऐसा हुआ नहीं।

वर्ष 2018 में नया भू-कानून सामने आने के बाद छिटपुट विरोध हुआ, लेकिन यह एक बड़ा जन-आंदोलन नहीं बन सका। 2021 में विधानसभा चुनाव से कुछ पहले अचानक यह मुद्दा जोर-शोर से गरमाने लगा और जगह-जगह इस कानून को समाप्त कर 2018 से पहले वाला कानून लागू किये जाने की मांग की जाने लगी। हालांकि चुनाव की घोषणा के साथ ही यह आंदोलन पूरी तरह से बिखर गया है। यहां तक कि चुनाव में भी यह कोई मुद्दा नहीं रह गया है।

राज्य का एक और बड़ा मुद्दा पलायन रहा है। राज्य गठन के समय और उससे पहले राज्य की मांग के आंदोलन के दौरान भी पलायन को लेकर लगातार चर्चाएं होती रहीं। राज्य में दो पार्टियों (कांग्रेस-भाजपा) की बारी-बारी से सरकारें बनती रही। हर सरकार में पलायन को लेकर चर्चाएं हुई। यहां तक कि राज्य पलायन आयोग का भी गठन किया गया। लेकिन, राज्य बनने के बाद पलायन कम होने के बजाय और बढ़ता चला गया। पलायन का ही नतीजा है कि 2017 के विधानसभा चुनाव में राज्य के पर्वतीय क्षेत्रों की 33 में से 32 विधानसभा सीटों पर महिलाओं का मतदान प्रतिशत पुरुषों की तुलना में ज्यादा दर्ज किया गया।

स्वास्थ्य और शिक्षा भी इन चुनावों में मुद्दा नहीं बन पा रहे हैं। स्वास्थ्य के क्षेत्र में राज्य की स्थिति यह है कि सुदूरवर्ती क्षेत्रों में आम लोगों के लिए प्राथमिक उपचार तक की सुविधा उपलब्ध नहीं है। इसी का नतीजा है कि राज्य में आए दिन स्वास्थ्य सुविधा न मिल पाने के कारण गर्भवती महिलाओं की मौत हो जाती है। कई बार तो अस्पताल ले जाते हुए रास्ते में ही महिलाओं को प्रसव करवाना पड़ जाता है। राज्य पलायन आयोग की रिपोर्ट भी इस तरफ इशारा करती है कि राज्य में पलायन के प्रमुख कारणों में स्वास्थ्य सुविधाओं का अभाव भी एक कारक है। कुछ वर्ष पहले राज्य में आपातकालीन एंबुलेंस सेवा 108 उपलब्ध करवाई गई थी। एक दौर में इसे एक अच्छी सेवा माना गया था और पहाड़ की लाइफ लाइन भी कहा गया था। लेकिन, आज यह सेवा बेहद खस्ताहाल है। यही स्थिति शिक्षा की भी है। स्कूल हैं लेकिन अध्यापकों के सैकड़ों पद रिक्त पड़े हुए हैं। ज्यादातर अध्यापक पहाड़ों के बजाय मैदानी क्षेत्रों में नौकरी करना पसंद करते हैं, और अपने राजनीतिक संपर्कों का लाभ उठाकर मैदानों में पोस्टिंग करवा लेते हैं। अध्यापकों के अलावा शिक्षा संबंधी अन्य साधनों का भी स्कूलों में भारी अकाल है।

राज्य में बेरोजगारों की संख्या लगातार बढ़ती जा रही है। हाल के वर्षों में युवाओं को या तो रोजगार मिला ही नहीं है, यदि मिला भी है तो वह संविदा के रूप में मिला है। लगभग हर विभाग में पद खाली हैं, लेकिन स्थाई नियुक्तियां नहीं की जा रही हैं। रोजगार को लेकर भी लगातार आंदोलन होते रहे हैं लेकिन चुनाव में रोजगार भी प्रमुख मुद्दा नहीं बन पा रहा है। हालांकि कांग्रेस ने अपने चुनावी घोषणापत्र में इन तमाम मुद्दों को उठाया है, लेकिन दो बार राज्य में शासन कर चुकी कांग्रेस ने अपने शासनकाल के दौरान कभी भी इन मुद्दों की तरफ ध्यान नहीं दिया था।

आम मतदाता के लिए चुनावी मुद्दे क्या हैं, इसकी एक झलक केदारनाथ विधानसभा क्षेत्र के एक गांव में एक महिला से हुई बातचीत में साफ हो जाता है। प्रेमवती नामक महिला से जब जनचौक की ओर से सवाल किया गया कि वे कैसा उम्मीदवार चुनना चाहेंगी तो उनका कहना था कि “कोई बर्तन बांट रहा है, कोई कुर्सियां। हमें तो कुछ भी नहीं मिला। हम किसी को वोट नहीं देंगे।” इसी क्षेत्र में एक उम्मीदवार के लिए काम करने वाले दिवाकर ने चुनावी माहौल के बारे में विस्तार से बताया। उनका कहना था कि “जब भी वे आम मतदाताओं से संपर्क करते हैं तो ज्यादातर पुरुष मतदाता इशारों-इशारों में यह जरूर पूछते हैं कि उम्मीदवार की तरफ से शराब की व्यवस्था है या नहीं।” दिवाकर के अनुसार “कार्यकर्ताओं को भी हर शाम शराब पिलानी पड़ती है। यदि किसी कार्यकर्ता को नहीं मिल पाती तो वह सीधे उम्मीदवार के पास जाकर शिकायत करता है कि मैनेजमेंट ठीक नहीं चल रहा है। मैनेजमेंट का सीधा-सीधा अर्थ शराब होता है।”

त्रिलोचन भट्ट द्वारा भेजी तस्वीर 2
चैमासी गांव में कांग्रेस उम्मीदवार मनोज रावत

इन तमाम विडंबनाओं के बावजूद कुछ उम्मीदवार राज्य के मुद्दों को प्राथमिकता दे रहे हैं। केदारनाथ विधानसभा क्षेत्र के अंतिम गांव चैमासी में कांग्रेस उम्मीदवार मनोज रावत से जनचौक संवाददाता की भेंट हुई। राज्य के मुद्दों के बारे में पूछे जाने पर उन्होंने कहा कि “इस क्षेत्र में रोजगार सबसे बड़ा मुद्दा है। पिछले 5 सालों में इस क्षेत्र के कुछ युवा फौज में अवश्य भर्ती हुए हैं और कुछ शिक्षा विभाग में। इसके अलावा कहीं भी कोई नियुक्ति नहीं हुई है। क्षेत्र के हजारों युवा नौकरी की कतार में हैं।” उन्होंने कहा कि “केदारनाथ घाटी प्राकृतिक सौंदर्य से भरपूर है। यहां पर्यटन को बढ़ावा देकर न सिर्फ राज्य की आर्थिकी का विकास हो सकता है, बल्कि बड़ी संख्या में युवाओं को रोजगार भी मिल सकता है। लेकिन सरकार ने इस तरफ कोई ध्यान नहीं दिया।” वे कहते हैं कि “चैमासी गांव से केदारनाथ तक तीन ट्रैकिंग रूट हैं। उन्होंने सरकार से इन ट्रैकों को विकसित करने की मांग की थी, लेकिन सरकार की ओर से कोई रिस्पांस नहीं मिला।” पिछले 3 सालों में उन्होंने अपने स्तर पर करीब 30 ट्रैकिंग दल इस रूट से केदारनाथ भेजे हैं। इससे कई स्थानीय युवाओं को रोजगार भी मिला है। उनका प्रयास है कि यह सिलसिला और तेज किया जाए। अब तक उनका टारगेट 1,000 लोगों को हर वर्ष इस रूट से केदारनाथ भेजने का रहा है, लेकिन अब वे हर वर्ष 10,000 से ज्यादा लोगों को चैमासी से केदारनाथ भेजने का प्रयास करेंगे। वे चैमासी से केदारनाथ हेलीकॉप्टर सेवा शुरू करने की भी बात कहते हैं।

चमोली जिले के कर्णप्रयाग विधानसभा क्षेत्र के सीपीआई (एमएल) उम्मीदवार इंद्रेश मैखुरी भी लगातार राज्य बनने के पीछे की वजहों को फिर से याद दिला रहे  हैं। वे लोगों के बीच में जाकर भू-कानून, पलायन और रोजगार जैसे मुद्दों को उठा रहे हैं। कर्णप्रयाग में इंद्रेश मैखुरी से राज्य के मुद्दों पर जनचौक ने बातचीत की। वे अफसोस जताते हुए कहते हैं “इस कानून के लिए हाल-हाल तक बड़े आंदोलन होने के बावजूद चुनावों में यह मुद्दा गौण हो गया है। शिक्षा, स्वास्थ्य, रोजगार और पलायन जैसे मुद्दों पर भी कोई गंभीरता से बात नहीं कर रहा है।” वे कहते हैं कि “राज्य में बारी-बारी से शासन करने वाली कांग्रेस और भारतीय जनता पार्टी के पास इन मुद्दों को लेकर कोई स्पष्ट विजन ही नहीं है। यही वजह है कि चुनाव को व्यक्तिगत लाभ और जातिवाद पर केंद्रित करने का लगातार प्रयास किया जा रहा है।”

बद्रीनाथ विधानसभा क्षेत्र के जोशीमठ में पूर्व नगर पालिका सभासद प्रकाश नेगी कहते हैं कि “चुनाव मुद्दों से पूरी तरह से भटक गया है। वे पर्वतीय क्षेत्रों में स्वास्थ्य सुविधाओं के अभाव को राज्य का सबसे बड़ा मुद्दा मानते हैं।” दो दिन पहले ही अपने पड़ोस में हुई एक घटना का जिक्र करते हुए वे कहते हैं कि जोशीमठ में प्रसूति सुविधा ना होने के कारण एक महिला को श्रीनगर ले जाया गया। प्रसव के बाद जब जच्चा-बच्चा वापस लौटे तो बच्चे को पीलिया हो गया। जोशीमठ में इलाज की कोई व्यवस्था नहीं थी, लिहाजा बच्चे को गोपेश्वर ले जाया गया। गोपेश्वर में भी बच्चे का इलाज नहीं हो पाया और उसे श्रीनगर रेफर कर दिया गया। श्रीनगर पहुंचने तक नवजात की मौत हो गई। प्रकाश नेगी के अनुसार “यह सिर्फ एक उदाहरण है। राज्य के दूर-दराज के गांवों का क्या हाल होगा, इसका अंदाजा आप खुद लगा सकते हैं।”

(त्रिलोचन भट्ट स्वतंत्र पत्रकार हैं और आजकल देहरादून में रहते हैं।)

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