Sunday, May 22, 2022

आरक्षण और मेरिट एक दूसरे के विपरीत नहीं हैं: सुप्रीम कोर्ट

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उच्चतम न्यायालय ने ओबीसी आरक्षण पर ऐतिहासिक फैसला दिया है। उच्चतम न्यायालय ने कहा है कि आरक्षण और मेरिट एक दूसरे के विपरीत नहीं हैं।सामाजिक न्याय के लिए आरक्षण जरूरी है। उच्चतम न्यायालय ने नीट पीजी  एडमिशन में ओबीसी आरक्षण की अनुमति देने का कारण बताते हुए अपना फैसला जारी किया है। उच्चतम न्यायालय द्वारा ईडब्लूएस आरक्षण पर रोक क्यों नहीं लगाई गई, इसका कारण भी उच्चतम न्यायालय ने अपने फैसले में बताया है। उच्चतम न्यायालय का कहना है कि नीट पीजी और यूजी  प्रवेश के लिए ऑल इंडिया कोटे में ओबीसी आरक्षण मान्य है। अनुच्छेद 15(4) और 15(5) हर देशवासी को मौलिक समानता देते हैं। प्रतियोगी परीक्षाएं उत्कृष्टता, व्यक्तियों की क्षमताओं को नहीं दर्शाती हैं । ऐसे में कुछ वर्गों को मिलने वाले सामाजिक आर्थिक और सांस्कृतिक लाभ को प्रतिबिंबित नहीं किया जा सकता।

उच्चतम न्यायालय ने कहा कि उच्च स्कोर योग्यता के लिए एकमात्र मानदंड नहीं है। सामाजिक और आर्थिक पृष्ठभूमि के संबंध में योग्यता को प्रासंगिक बनाने की आवश्यकता है। पिछड़ेपन को दूर करने में आरक्षण की भूमिका को नकारा नहीं जा सकता।उच्चतम न्यायालय ने मेडिकल कॉलेज में एमबीबीएस, बीडीएस और सभी पोस्ट ग्रेजुएट कोर्स में 27 फीसदी ओबीसी आरक्षण को संवैधानिक तौर पर सही ठहराया है।हालांकि उच्चतम न्यायालय ने ये आदेश पहले ही दिया था लेकिन आज अदालत ने उस पर अपना विस्तृत फैसला सुनाया है।

उच्चतम न्यायालय के आज के फैसले में सबसे अहम बात सामाजिक न्याय को लेकर कही गई है। आमतौर पर स्पेशलाइज्ड कोर्स में आरक्षण का विरोध किया जाता है। कहा जाता है कि ऐसे कोर्स में आरक्षण नहीं होना चाहिए। आरक्षण देने से मेरिट पर असर पड़ता है। लेकिन आज उच्चतम न्यायालय ने इस विचार पर अहम टिप्पणी की है। कोर्ट ने कहा है कि मेरिट और आरक्षण एक दूसरे के विपरीत नहीं हैं। दरअसल आरक्षण सामाजिक न्याय के लिए जरूरी है।

उच्चतम न्यायालय ने कहा है कि जहां कहीं भी कंप्टीशन या एग्जाम से दाखिला होता है, उसमें सामाजिक और आर्थिक पिछड़ेपन को नहीं देखा जाता है।कुछ समुदाय आर्थिक और सामाजिक तौर पर आगे होते हैं। एग्जाम में इस बात को नहीं देखा जाता। इसलिए मेरिट को सामाजिक ताने बाने के साथ देखा जाना चाहिए।

उच्चतम न्यायालय  ने 7 जनवरी के निर्देशों, जिनमें अन्य पिछड़ा वर्ग (ओबीसी) के लिए मौजूदा 27% कोटा और अखिल भारतीय कोर्ट में आर्थिक रूप से कमजोर वर्गों (ईडब्ल्यूएस) के लिए 10% आरक्षण के आधार पर 2021-22 में प्रवेश के लिए नीट-पीजी और नीट-यूजी के लिए काउंसलिंग प्रक्रिया शुरू करने की अनुमति दी गई थी, गुरुवार को कारण बताते हुए विस्तृत आदेश सुनाया।

उच्चतम न्यायालय  ने 27% ओबीसी कोटे की संवैधानिकता को बनाए रखने के लिए एक विस्तृत निर्णय पारित किया और एक अन्य आदेश पारित किया, जिसमें जारी प्रवेशों के लिए मौजूदा ईडब्ल्यूएस मानदंड पर रोक नहीं लगाने का कारण बताया गया।

अखिल भारतीय कोटा में 27% ओबीसी आरक्षण को मंजूरी देने के लिए, जस्टिस डी वाई चंद्रचूड़ और जस्टिस एएस बोपन्ना की पीठ ने कहा कि-अनुच्छेद 15(4) और अनुच्छेद 15(5) अनुच्छेद 15(1) के अपवाद नहीं हैं। वे अनुच्छेद 15(1) के तहत मौलिक समानता के सिद्धांत के पुनर्कथन हैं।

मे‌रिट को एक खुली प्रतियोगी परीक्षा में प्रदर्शन की संकीर्ण परिभाषा तक सीमित नहीं किया जा सकता है। मौजूदा दक्षताओं का मूल्यांकन प्रतियोगी परीक्षाओं द्वारा किया जाता है, लेकिन वे किसी व्यक्ति की उत्कृष्टता, क्षमता और संभावना को प्रतिबिंबित नहीं करते हैं, जो जीवित अनुभवों, व्यक्तिगत चरित्र आदि से भी प्रभावित होते हैं। परीक्षाओं में सामाजिक, आर्थिक और सांस्कृतिक लाभ प्रतिबिंबित नहीं होते हैं, जो कुछ वर्गों को प्राप्त हैं और इन परीक्षाओं में उनकी सफलता में योगदान देते हैं।

परीक्षा मेरिट की प्रॉक्सी नहीं है। मेरिट को सामाजिक संदर्भ में देखा जाना चाहिए और समानता की दिशा में एक संस्था के रूप में फिर से संकल्पित किया जाना चाहिए, जिसे हम एक समाज के रूप में महत्व देते हैं।आरक्षण मेरिट के खिलाफ नहीं है बल्कि सामाजिक न्याय के वितरणात्मक प्रभाव को बढ़ाता है।

यह हो सकता है कि किसी चिन्हित समूह के अलग-अलग सदस्य जिन्हें आरक्षण दिया जा रहा हो, वे पिछड़े न हों या गैर-चिन्हित समूह के सदस्य की विशेषताएं किसी चिन्‍हित समूह के सदस्यों जैसी हो सकती हैं। व्यक्तिगत अंतर विशेषाधिकार, भाग्य और परिस्थितियों का परिणाम हो सकता है लेकिन इसका उपयोग परिस्थितियों की भूमिका को नकारने के लिए नहीं किया जा सकता है।प्रदीप जैन मामले में सुप्रीम कोर्ट के फैसले में डोमिसाइल रिजर्वेशन संबंधित टिप्पणियों को उसी संदर्भ में समझा जाना चाहिए। प्रदीप जैन की अदालत ने यह नहीं माना कि एआईक्यू सीटों पर आरक्षण की अनुमति नहीं है।

अखिल भारतीय कोटा में ओबीसी कोटा लागू करने के लिए केंद्र सरकार को न्यायालय की अनुमति लेने की आवश्यकता नहीं थी। अभय नाथ मामले में, यूनियन ऑफ इंडिया ने अखिल भारतीय कोटा में अनुसूचित जाति/अनुसूचित जनजाति के आरक्षण के लिए न्यायालय के समक्ष आवेदन दायर किया। यूनियन को न्यायालय की अनुमति लेने की आवश्यकता नहीं थी। एआईक्यू को आरक्षण प्रदान करना एक नीतिगत निर्णय है, जो न्यायिक समीक्षा के अधीन नहीं होगा।

दिनेश कुमार II में यह स्पष्ट किया गया था कि AIQ के लिए निर्धारित सीटों को आरक्षण को छोड़कर निर्धारित किया जाएगा जैसा कि पहले प्रदीप जैन द्वारा निर्देशित किया गया था और दिनेश कुमार I में स्पष्ट किया गया था। बुद्धि प्रकाश शर्मा में इस अदालत ने गलती से समझ लिया कि एआईक्यू सीट पर आरक्षण नहीं होना चाहिए। अभय नाथ में आदेश बुद्धि प्रकाश शर्मा में आदेश के मद्देनजर केवल एक स्पष्टीकरण था।

सरकार ने काउंसलिंग से पहले ओबीसी/ईडब्ल्यूएस कोटा शुरू किया। इस प्रकार यह नहीं कहा जा सकता है कि खेल के नियम बदल दिए गए हैं। काउंसलिंग प्रक्रिया शुरू होने से पहले काउंसलिंग अथॉरिटी द्वारा आरक्षण की सूचना दी जाएगी। इसलिए, नीट पीजी के लिए आवेदनकर्ता उम्मीदवारों को सीट मैट्रिक्स के वितरण के बारे में कोई जानकारी नहीं दी जाती है। काउंसलिंग सत्र शुरू होने के बाद ही काउंसलिंग अथॉरिटी द्वारा ऐसी जानकारी दी जाती है। यह तर्क नहीं दिया जा सकता है कि परीक्षा के लिए पंजीकरण बंद होने पर खेल के नियम निर्धारित किए गए थे।

ईडब्ल्यूएस मानदंड ईडब्ल्यूएस (रुपये 8 लाख सकल वार्षिक आय कट-ऑफ) निर्धारित करने के मानदंड के संबंध में पीठ  ने मौजूदा वर्ष के लिए मौजूदा मानदंडों को संचालित करने की अनुमति दी, ताकि प्रवेश प्रक्रिया में और देरी न हो। हालांकि, ईडब्ल्यूएस मानदंड को भविष्य में लागू करना, जिसे जुलाई 2019 के ऑफ‌िस मेमो में निर्धारित किया गया है, याचिकाओं के अंतिम परिणाम के अधीन होगा।

एक अन्‍य मामले में उच्चतम न्यायालय ने बुधवार को महाराष्ट्र सरकार को निर्देश दिया कि वह अन्य पिछड़ा वर्ग (ओबीसी) से संबंधित आंकड़े अन्य पिछड़ा वर्ग आयोग के समक्ष पेश करे, ताकि इनकी सत्यता की जांच की जा सके और वह स्थानीय निकायों के चुनावों में उनके प्रतिनिधित्व पर सिफारिशें कर सके। उच्चतम न्यायालय ने राज्य पिछड़ा वर्ग आयोग (एसबीसीसी) को यह निर्देश दिया कि वह राज्य सरकार से सूचना मिलने के दो हफ्ते के अंदर संबंधित प्राधिकारियों को अपनी अंतरिम रिपोर्ट सौंपे।जस्टिस एएम खानविलकर, जस्टिस दिनेश माहेश्वरी और जस्टिस सीटी रविकुमार की तीन सदस्यीय पीठ ने कहा कि महाराष्ट्र ने इस अदालत से अन्य पिछड़े वर्गों के संबंध में राज्य के पास पहले से उपलब्ध आंकड़ों के आधार पर चुनाव की अनुमति देने के लिए कहा है। आंकड़ों की जांच करने की बजाय इन आंकड़ों को राज्य द्वारा नियुक्त आयोग के समक्ष प्रस्तुत करना उचित कदम होगा जो इनकी सत्यता की जांच कर सकता है।

(वरिष्ठ पत्रकार जेपी सिंह की रिपोर्ट।)

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