ग्राउंड रिपोर्ट: जबरकोट की इन महिलाओं को सलाम

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उत्तराखंड में चमोली जिले के ग्वालदम या देवाल जाने के रास्ते में एक छोटा सा कब्बा है कुलसारी। कुलसारी से एक ग्रामीण सड़क पास्तोली और जबरकोट गांव की तरफ जाती है। कुलसारी के करीब 3 किमी ग्रामीण रास्ते पर एक प्राइमरी स्कूल मिलता है, जबरकोट गांव का। स्कूल के ठीक नीचे एक स्टोन क्रशर लगाया जा रहा है। क्रशर लगाने वाला व्यक्ति, संभवतः अच्छी पहुंच वाला है, यही वजह है कि तमाम प्रशासनिक मशीनरी उसके पक्ष में खड़ी है।

देहरादून में खनन माफिया को प्रश्रय देने वाले तथाकथित पत्रकारों से लेकर चमोली जिले के कई अधिकारी तक क्रशर मालिक के पक्ष में खड़े हैं। इसके बावजूद जबरकोट गांव की महिलाएं पिछले 9 महीने से इस स्टोन क्रशर के विरोध में खड़ी हैं।

पुलिस केस और तमाम तरह के कानूनी नोटिस मिलने के बाद भी ये महिलाएं क्रशर के खिलाफ अपनी लड़ाई जारी रखे हुए हैं। कई बार क्रशर मालिक को काम बंद करवाना पड़ा है और अब एक बार फिर से पुलिस की मौजूदगी में स्टोन क्रशर लगाने का काम शुरू हो चुका है।

क्रशर मालिक सुभाष मिश्रा और थराली के एसडीएम रविन्द्र कुमार जुवांठा कहते हैं कि क्रशर को बाकायदा परमिशन मिली हुई है और यह परमिशन सभी औपचारिकताएं पूरी करने के बाद ही मिली है, इसलिए क्रशर के खिलाफ यह आंदोलन अनुचित है।

सुभाष मिश्रा हर रोज लाखों रुपये का नुकसान होने की बात कहते हैं और चेतावनी देते हैं कि एक-एक दिन हो रहे नुकसान की भरपाई के लिए वे कोर्ट जाएंगे और विरोध करने वालों से अपने नुकसान की वसूली करेंगे। एसडीएम थराली भी सरकारी नीति का हवाला देते हैं और कहते हैं कि स्टोन क्रशर को राज्य के खनन नीति के अनुसार ही मंजूरी मिली है।

यह भी दावा किया जा रहा है कि स्टोन क्रशर ग्राम सभा से अनुमति मिलने के बाद ही लगाया जा रहा है। यह दावा पूरी तरह सही है, लेकिन इसमें एक चालाकी की गई है। जिस जमीन पर स्टोन क्रशर लगाया जा रहा है, वह पास्तोली ग्राम सभा के अधीन है। पास्तोली गांव यहां से कुछ दूर है। इस जमीन से मात्र 75 मीटर दूरी पर जबरकोट गांव का प्राइमरी स्कूल है और साइट से लगते जबरकोट वालों के खेत और पानी का स्रोत है।

यदि स्टोन क्रशर लगता है तो इससे पास्तोली गांव के लिए कोई समस्या नहीं है, लेकिन जबरकोट गांव बुरी तरह प्रभावित हो सकता है। यही वजह है कि पास्तोली ग्राम पंचायत ने स्टोन क्रशर लगाने की अनुमति दे दी, लेकिन जबरकोट की महिलाएं इसका विरोध कर रही हैं।

स्टोन क्रशर के विरोध में महिलाएं

आखिरकार महिलाएं इस स्टोन क्रशर का विरोध क्यों कर रही हैं, ऐसा क्या है कि प्रशासनिक, राजनीतिक और पुलिसिया दबाव के बावजूद वे 9 महीने से आंदोलन में सक्रिय हैं। यह जानने के लिए मैंने जबरकोट गांव का रुख किया। सुबह 10 बजे होंगे, जब मैं जबरकोट के प्राइमरी स्कूली के पास पहुंचा। स्कूल के पास ही वह साइट है, जहां स्टोन क्रशर लग रहा है। वहां 3 महिलाएं मौजूद थी।

स्टोन क्रशर के बारे में बातचीत शुरू करते ही महिलाओं ने गांव की अन्य महिलाओं को फोन करके स्कूल में बुला लिया। महिलाओं का लगा कि हम लोग स्टोन क्रशर मालिक की तरफ से हैं और काम शुरू करवाना चाहते हैं। लेकिन, जब उन्हें बताया गया कि मैं मीडिया से हूं और आप लोगों के संघर्ष पर रिपोर्ट बनाना चाहता हूं, तब वे बातचीत करने का तैयार हुईं।

आप लोग स्टोन क्रशर का विरोध क्यों कर रही हैं, यह पूछने पर महिलाओं का नेतृत्व कर रही दीपा देवी कहती हैं कि ‘स्टोन क्रशर लगने से पहली बात तो स्कूल में पढ़ने वाले बच्चों के स्वास्थ्य पर असर पड़ेगा। क्रशर से निकलने वाली धूल से टीबी और कैंसर जैसी बीमारियां बच्चों को हो सकती हैं। दूसरी बात यह कि इस साइट से लगते जबरकोट वालों के खेत बर्बाद हो जाएंगे’।

दीपा आगे कहती हैं ‘अब तक हुई खुदाई से ही स्कूल के कमरों पर दरारें आ गई हैं और गांव की तरफ जाने वाला रास्ता भी धंस गया है। इसके अलावा यहां साइट से लगता गांव को प्राकृतिक पानी का स्रोत है, वह भी खत्म हो जाएगा’।

जब महिलाओं से कहा गया कि प्रशासन हर हाल में आंदोलन खत्म करना चाहता है तो वहां मौजूद करीब 15 महिलाओं का कहना था कि ‘प्रशासन उन्हें खत्म करके ही यहां स्टोन क्रशर लगवा पाएगा। उनको लगातार नोटिस दिये जा रहे हैं, डराया धमकाया जा रहा है, लेकिन वे हार नहीं मानने वाली हैं’।

आंदोलन में शामिल किरन भंडारी कहती हैं कि ‘सरकार की नई पाॅलिसी के तहत अब राजस्व पुलिस व्यवस्था वाले गांवों को धीरे-धीरे रेगुलर पुलिस के हवाले किया जा रहा है। इस नीति के तहत क्रशर जोन वाली साइट को रेगुलर पुलिस को दे दिया गया है’।

वे अफसोस जताती हैं कि ‘थराली से लेकर इस स्टोन क्रशर साइट तक कई गांव हैं, लेकिन उन्हें रेगुलर पुलिस को नहीं दिया गया, इसी हिस्से को ही रेगुलर पुलिस को सौंपा गया है’। वे कहती हैं कि ‘ऐसा उनके आंदोलन को कुचलने के इरादे से किया गया है’।

स्टोन क्रशर साइट पर जबरकोट की महिलाएं

जबरकोट की ग्राम प्रधान विजय लक्ष्मी के बारे में बताया गया कि वे स्टोन क्रशर के पक्ष में हैं। लेकिन, जब मैंने उनसे पूछा कि नुकसान उनका भी होगा तो वे क्यों स्टोन क्रशर के पक्ष में हैं। इस पर विजय लक्ष्मी ने साफ कहा कि वे पूरी तरह से स्टोन क्रशर के खिलाफ हैं। किसी भी हालत में गांव में क्रशर नहीं लगना चाहिए। विजय लक्ष्मी ने यह भी कहा कि बच्चे छोटे होने के कारण वे सक्रिय रूप से आंदोलन में हिस्सा नहीं ले पा रही हैं, लेकिन पूरी तरह से आंदोलन के साथ हैं।

लेकिन ग्राम प्रधान के ससुर, वीर राम आर्य, जिनके बारे में गांव में कहा जाता है कि कागजात पर दस्तखत करने के अलावा ग्राम प्रधान का सारा काम वही करते हैं, वे स्टोन क्रशर के मामले में अलग ही रुख रखते हैं।

वीर राम आर्य ने बताया, कि स्टोन क्रशर के खिलाफ आंदोलन उन्होंने ही शुरू किया था, लेकिन अब जो महिलाएं आंदोलन कर रही हैं, उनके निजी स्वार्थ हैं, इसलिए वे अब इस आंदोलन में नहीं हैं। वीर राम आर्य ने स्पष्ट रूप से कहा कि स्टोन क्रशर लगने से पूरे इलाके को फायदा होगा, इसलिए वे अब इसके पक्ष में हैं। गांव वालों ने माना कि वीर राम आर्य पहले उनके साथ थे, लेकिन बाद में अचानक उनका रुख बदल गया।

जबरकोट की आंदोलनकारी महिलाओं से मैंने कई विषयों पर बातचीत की। मसलन घर और खेती-बाड़ी की तमाम जिम्मेदारियों के बावजूद वे कैसे इतना लंबा आंदोलन चला पा रही हैं। इस सवाल का दीपा देवी, किरन भंडारी, यशोदा देवी, पुष्पा देवी, कली देवी, शांति देवी और अंशि कुमारी आदि ने अपनी-अपनी तरह से जवाब दिया।

लब्बोलुआब ये था कि यह उनके बच्चों का सवाल है, गांव के अस्तित्व का सवाल है। कई बार जब अचानक पता चलता है कि फिर से काम शुरू हो गया है तो वे घर का जरूरी काम छोड़कर साइट पर भाग आती हैं। महिलाओं ने स्टोन क्रशर साइट के पास घास-फूस और पाॅलीथिन का एक छप्पर भी बनाया हुआ है। वे कहती हैं कि क्रशर मालिक किसी भी समय काम शुरू करवा सकता है, इसलिए वे रात को भी इस छप्पर में रहती हैं।

(उत्तराखंड से त्रिलोचन भट्ट की ग्राउंड रिपोर्ट)

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