Sun. Apr 5th, 2020

बीजेपी आईटी सेल मुखिया के बेटे ने की नौकरी जाने के डर से खुदकुशी

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खबर के साथ प्रतीकात्मक चिन्ह।

नई दिल्ली/जमशेदपुर। कोई झूठा सपना जब हकीकत की धरातल से टकराता है तो उसका कुछ वैसा ही हस्र होता है जैसा जमशेदपुर में बीजेपी आईटी सेल के एक मुखिया और उनके बेटे के साथ हुआ। बारीडीह मंडल आईटी प्रभारी होने के नाते विश्वजीत पूरे देश में अच्छे दिनों का सपने बेच रहे थे लेकिन वह खुद अपने बेटे को उसका भरोसा नहीं दिला सके। इसका नतीजा यह हुआ कि उनका 25 वर्षीय बेटा आशीष कुमार नौकरी जाने के डर से खुदकुशी कर लिया।
दरअसल आशीष टाटा मोटर्स को मोटर पार्ट्स सप्लाई करने वाली एक कंपनी में काम करता था। इस बीच आटोमोबाइल सेक्टर में मंदी के चलते टाटा मोटर्स की कुछ इकाइयों में उत्पादन कार्य बंद हो गया है जिसका असर उससे जुड़ी दूसरी कंपनियों को भी पड़ा है। आशीष की कंपनी भी उसी की चपेट में आ गयी थी।
आशीष टेल्को कडंगाझार में स्थित इस कंपनी में कंप्यूटर आपरेटर था। और उसे अपनी नौकरी जाने की चिंता सताने लगी थी। जिसके बारे में उसने अपने पिता को भी बताया था। हालांकि पिता विश्वजीत ने भी उसे धैर्य बनाए रखने और सब कुछ ठीक हो जाने का भरोसा दिलाने की पूरी कोशिश की। लेकिन उनका दिलासा काम नहीं आया। उसका मानसिक तनाव बढ़ता गया और शुक्रवार को वह कमरे का दरवाजा बंद कर पंखे से झूल गया। जानकारी मिलने पर पिता विश्वजीत मौके पर पहुंचे और वह आनन-फानन में बेटे को टीएमएच अस्पताल ले गए। लेकिन उसे बचाया नहीं जा सका।
आशीष की अभी एक साल पहले ही शादी हुई थी। और उसकी पत्नी भी एमबीए थी तथा एक एमबीए कॉलेज में पढ़ाती थी। बावजूद इसके उसको अपनी नौकरी के जाने का डर इतना गहरा हो गया था कि वह खुद को संभाल नहीं सका और मौत के सामने समर्पण कर दिया।
लेकिन मसला किसी एक आशीष का नहीं है। यह एक प्रतीक है। इसी तरह के ढेर सारे आशीष हैं जिनकी गर्दन पर नौकरी जाने की तलवार लटकी हुई है। या फिर ढेर सारे डिग्रीधारी बेरोजगार हैं। लेकिन हकीकत समझने और उसे दुरुस्त करने की जगह सत्ता पक्ष और उससे जुड़े लोग मिलकर एक पूरा झूठ का नया संसार खड़ा कर रहे हैं। जिसमें भारत विकास कर रहा है। और वह बहुत जल्द ही विश्व गुरु बन जाएगा। और हम दुनिया पर राज करेंगे। और फिर देश में रामराज्य होगा। ये सब ऐसे सपने हैं जिनका कम से कम अभी हकीकत से कोई वास्ता नहीं है।
ये ह्वाट्सएप यूनिवर्सिटी के लिए तो ठीक हो सकते हैं। और इनके राजनीतिक प्रोपोगंडा का हथियार बने रहने तक भी चलता है। लेकिन जब इसे बिल्कुल सच की तरह पेश किया जाने लगे परेशानी तब शुरू होती है। क्योंकि सच्चाई बिल्कुल उल्टी है। देश में जिस तरह से झूठ का परनाला बह रहा है और उसकी अगुआई कोई और नहीं बल्कि देश का मुख्यधारा का मीडिया करने लगा है। तब से स्थितियां और कठिन हो गयी हैं।

इन हालात में अपने लिए किसी को सत्य की छोटी जमीन भी तलाश पाना बेहद मुश्किल हो गया है। जिस पर खड़ा होकर वह अपने वजूद की पहचान कर सके। झूठ और सच के बीच का बढ़ता यह संघर्ष मानसिक और मनोवैज्ञानिक रूप से पहले से ही कमजोर युवा पीढ़ी के लिए किसी खतरे की घंटी कम नहीं है। ऊपर से युवा पीढ़ी के सतरंगी सपनों और उसकी हकीकत की जिंदगी में जमीन-आसमान का अंतर है। इन दोनों को पाट पाना आज के युवाओं के लिए भारी पड़ रहा है। लिहाजा ऐसे किसी नाजुक मोड़ पर वह जिंदगी से हार जा रहे हैं।
एक पिता होने के नाते विश्वजीत के दर्द को समझा जा सकता है। और उसके प्रति जितनी भी सहानुभूति प्रदर्शित की जाए वह कम है। लेकिन वह जिस पेशे से जुड़े हैं और जो काम कर रहे हैं उसके बारे में उन्हें एक बार जरूर सोचना चाहिए।

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