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विशेषाधिकार हनन की नोटिस पर अर्नब को नहीं दिया सुप्रीम कोर्ट ने अंतरिम संरक्षण

उच्चतम न्यायालय ने रिपब्लिक टीवी के संपादक अर्नब गोस्वामी की याचिका पर कल 30 सितंबर को महाराष्ट्र विधानसभा को नोटिस जारी किया। अर्नब ने इस याचिका में विशेषाधिकार के कथित हनन के लिए उन्हें जारी कारण बताओ नोटिस को चुनौती दी है। अर्नब की ओर से अगली सुनवाई की तिथि तक अंतरिम संरक्षण का अनुरोध किया गया, लेकिन न्यायालय ने इस पर कोई टिप्पणी नहीं की। उधर, रिपब्लिक टीवी पर सांप्रदायिक रिपोर्टिंग के आरोप पर दिल्ली हाईकोर्ट ने सूचना और प्रसारण मंत्रालय को चार सप्ताह के भीतर शिकायत पर फैसला करने का निर्देश दिया है और याचिका निस्तारित कर दी है।

चीफ जस्टिस एसए बोबडे, जस्टिस  एएस बोपन्ना और जस्टिस  वी रामासुब्रमणियन की पीठ ने टिप्पणी की कि यह स्पष्ट नहीं है कि क्या महाराष्ट्र विधानसभा की विशेषाधिकार समिति ने कारण बताओ नोटिस पर विचार किया है और क्या गोस्वावी को सफाई देने के लिए समिति के समक्ष पेश होना चाहिए।

गोस्वामी के वकील वरिष्ठ अधिवक्ता हरीश साल्वे ने कहा कि उन्होंने विधानसभा के अधिकार क्षेत्र को चुनौती दी है, क्योंकि विशेषाधिकार हनन के लिए किसी को भी समन करने का अधिकार विधानसभा के बाहर नहीं है। उन्होंने कहा कि विधानसभा का विशेषाधिकार सदन के दायरे से बाहर सिर्फ इसलिए नहीं जा सकता कि आपने राज्य सरकार के लिए कटु वचनों का प्रयोग किया है। एक दिलचस्प सवाल है कि क्या संविधान के अनुच्छेद 19 और 21 विशेषाधिकार प्रस्ताव से अधिक महत्वपूर्ण है। एन राम का मामला एकदम यही है जो इस समय सात न्यायाधीशों की पीठ के समक्ष विचाराधीन है। साल्वे ने यह भी दलील दी कि अगर सदन या उसके किसी सदस्य के कामकाज में बाधा डाली गई हो तभी विशेषाधिकार हनन का सवाल उठता है।

चीफ जस्टिस ने इस पर टिप्पणी की कि हम इसकी गंभीरता समझते हैं, लेकिन यह सिर्फ कारण बताओ नोटिस है और ऐसा कोई प्रस्ताव नहीं है। उन्होंने कहा कि मैं अधिकार क्षेत्र के बारे में बात कर रहा हूं। विधानसभा का अधिकार क्षेत्र सदन के आगे नहीं बढ़ाया जा सकता। इनाडु मामले में उनके खिलाफ प्रस्ताव पर रोक लगाई गई थी और वह अवकाश पर चले गए। विशेषाधिकार प्रस्ताव पर विशेषाधिकार समिति विचार करती है। समिति द्वारा इस बारे में आरोप होना चाहिए।

इस पर साल्वे ने कहा कि विधानसभा सचिव ने कारण बताओ नोटिस भेजा है। पीठ ने साल्वे से यह भी पूछा कि विशेषाधिकार का नोटिस अवमानना से किस तरह भिन्न है और कहा कि अपने कथन के समर्थन में नियम पेश करें। चीफ जस्टिस ने कहा कि अगर आप किसी व्यक्ति की आलोचना करते हैं तो क्या इसे उसकी कार्य क्षमता पर सवाल नहीं उठाते हैं? साल्वे ने दलील दी कि गोस्वामी मुख्यमंत्री पर आरोप लगा सकते हैं या उन्हें बदनाम कर सकते हैं। इसके लिये विशेषाधिकार हनन का प्रस्ताव नहीं बल्कि मानहानि का मामला दायर करना होगा।

चीफ जस्टिस ने स्पष्ट किया कि अभी तक कोई प्रस्ताव पारित नहीं किया गया है और गोस्वामी को सिर्फ जवाब देने के लिए कहा गया है। इस मामले में अब अगले सप्ताह सुनवाई होगी। साल्वे ने इस मामले में सुनवाई की अगली तारीख से पहले टीवी ऐंकर के खिलाफ कार्रवाई की आशंका व्यक्त करते हुए अंतरिम संरक्षण का अनुरोध किया, लेकिन न्यायालय ने इस पर कोई टिप्पणी नहीं की।

महाराष्ट्र विधानसभा के दोनों सदनों में शिवसेना द्वारा अर्नब के खिलाफ प्रस्ताव पेश किए जाने के बाद उन्हें 60 पेज का विशेषाधिकार नोटिस दिया गया है। अगर कोई व्यक्ति या प्राधिकारी संबंधित सदन या सदन या इसकी समिति के सदस्य के विशेषाधिकार या अधिकार या उसे प्राप्त छूट का हनन करता है तो ऐसे मामले में विशेषाधिकार का प्रस्ताव पेश किया जा सकता है। यह सदन फैसला करता है कि यह विशेषाधिकार हनन या अवमानना है या नहीं और यही इसकी सजा के बारे में भी निर्णय करता है। इस नोटिस के जवाब में गोस्वामी ने अपने चैनल रिपब्लिक टीवी पर एक बयान जारी किया कि वह उद्धव ठाकरे और दूसरे निर्वाचित प्रतिनिधियों से सवाल करते रहेंगे और उन्होंने इस नोटिस को चुनौती देने का फैसला किया है।

रिपब्लिक टीवी को नियमों का उल्लंघन करना भारी पड़ गया है। दिल्ली हाई कोर्ट ने केंद्रीय सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय को आदेश दिया है कि वह चार हफ्ते के भीतर रिपब्लिक टीवी चैनल के खिलाफ आदेश जारी करे। चैनल द्वारा लगातार कार्यक्रम संहिता एवं अपलिंकिंग एवं डाउनलिंकिंग गाइड लाइंस का उल्लंघन किया जा रहा है। इसी संबंध में दिल्ली हाई कोर्ट ने सूचना प्रसारण मंत्रालय को यह आदेश दिया है। कोर्ट ने यह आदेश भारतीय युवा कांग्रेस के सचिव अमरीश रंजन पांडेय द्वारा दायर याचिका पर दिया है।

दिल्ली हाईकोर्ट ने केंद्र सरकार को निर्देश दिया कि वह ‘पालघर मॉब लिंच‌िंग मामले’ की सांप्रदायिक रिपोर्टिंग करने के आरोप में रिपब्लिक टीवी के ‌खिलाफ यूथ कांग्रेस सचिव अमरिश रंजन पांडेय द्वारा दर्ज की गई शिकायत पर विचार करे। जस्टिस नवीन चावला ने सूचना और प्रसारण मंत्रालय को याचिकाकर्ता की शिकायत पर विचार करने और चार सप्ताह के भीतर निर्णय लेने का निर्देश दिया है। याचिका में आरोप लगाया गया है कि चैनल ने महाराष्ट्र के पालघर में मॉब लिंचिंग की घटना को सांप्रदायिक घटना के रूप में चित्रित करने का प्रयास किया, जिससे आम आदमी के मन में डर पैदा हो गया।

याचिका में कहा गया था कि पूरे शो का उद्देश्य विभिन्न धार्मिक समूहों के बीच दुश्मनी को बढ़ावा देना और घटना का राजनीतिकरण करना था। याचिका में आरोप लगाया गया कि मुंबई के बांद्रा में प्रवासियों के इकट्ठा होने की घटना को इसी मीडिया हाउस द्वारा विशाल षड़यंत्र  का नाम दिया गया था। 5 मई 2020 को दिल्ली हाई कोर्ट में याचिका दायर कर इस संबंध में शिकायत की गई थी।

याचिका में कहा गया है कि अभी तक मंत्रालय द्वारा रिपब्लिक टीवी से अपलिंकिंग एवं डाउनलिंकिंग मानदंड का पालन सुनिश्चित नहीं कराया गया है। याचिकाकर्ता के मुताबिक, इलेक्ट्रॉनिक मीडिया पर नियंत्रण के मकसद से गठित आत्म नियामक संस्था नेशनल ब्रॉडकास्टर एसोसिएशन (NBA) का कहना है कि चूंकि रिपब्लिक चैनल उनका सदस्य नहीं है, ऐसे में उनके न्यायाधिकरण में नहीं आता है। ऐसे में इस संदर्भ में सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय के विरुद्ध दिशा-निर्देश जारी करते हुए संगत आदेश जारी करने की मांग की गई थी।

(लेखक वरिष्ठ पत्रकार और कानूनी मामलों के जानकार हैं। वह इलाहाबाद में रहते हैं।)

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This post was last modified on October 1, 2020 1:44 pm

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