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देश ‘एक्ट ऑफ़ गाड’ से चल रहा और जज दे रहे ‘ईश्वरीय प्रेरणा’ से फैसले!

उज्जैन के महाकालेश्वर मन्दिर के प्रबंधन के सम्बंध में उच्चतम न्यायालय के जस्टिस अरुण मिश्रा ने अपने साथी जजों से कहा कि शिवजी की कृपा से ये आखिरी फैसला भी हो गया। दरअसल जस्टिस अरुण मिश्रा ने यह कहकर अपनी रूढ़िवादिता का प्रदर्शन किया। अपने विदाई भाषण में जस्टिस अरुण मिश्रा ने कहा कि उन्होंने हर मामले को अपनी अंतरात्मा से निपटाया है। अब सभी जानते हैं कि सनातन धर्म में आत्मा को परमात्मा यानि ईश्वर का अंश माना गया है। इसलिए अंतरात्मा को ईश्वरीय प्रेरणा भी कहा जा सकता है। यह देश भी एक्ट ऑफ़ गॉड से चल रहा है और विद्वान जज भी ईश्वरीय प्रेरणा से फैसले कर रहे हैं। संविधान और कानून किताबों तक सीमित होकर रह गया है।

जस्टिस अरुण मिश्रा की सामाजिक रूढ़िवादिता उनके द्वारा न्यायिक दृष्टान्तों की उपेक्षा में महत्वपूर्ण कारक प्रतीत होता है। पूजा स्थलों, अश्लीलता और लैंगिक न्याय के लिए राज्य की नीति पर उनके निर्णय कानून से अधिक व्यक्तिगत मूल्यों को दर्शाते हैं।जस्टिस मिश्रा की अध्यक्षता वाली पीठ ने राज्य सरकार को निर्देश दिया है कि वह कलेक्टर को आवश्यक मरम्मत, रखरखाव और सुधार की व्यापक योजना के लिए एक फंड स्वीकृत करे।

“अधीक्षण अभियंता और उपलब्ध वास्तुकार की मदद से कलेक्टर इस उद्देश्य के लिए एक व्यापक योजना तैयार करेंगे। राज्य सरकार तुरंत निधि मंजूर करेगी। एक उपयुक्त योजना और अनुमान चार सप्ताह के भीतर तैयार किया जाना चाहिए, और तत्काल आवश्यक मरम्मत और रखरखाव कार्य किया जाना चाहिए”।

जस्टिस मिश्रा की अध्यक्षता वाली पीठ ने शिवलिंग को क्षरण से बचाव के लिए तमाम आदेश पारित किए। पीठ कोर्ट ने कहा कि मंदिर के शिवलिंग पर कोई भी भक्त पंचामृत नहीं चढ़ाएगा, बल्कि वह शुद्ध दूध से पूजा करेंगे। उज्जैन के महाकालेश्वर मंदिर मामले में फैसला सुनाते हुए मंदिर कमेटी से कहा है कि वह भक्तों के लिए शुद्ध दूध का इंतजाम करेंगे और ये सुनिश्चित किया जाए कि कोई भी अशुद्ध दूध शिवलिंग पर न चढ़ाए।

जस्टिस अरुण मिश्रा ने मिसाल पेश की, जब उन्होंने कहा कि सरकार का कर्तव्य है कि वह उज्जैन में महाकालेश्वर मंदिर में बिगड़ते हुए ‘लिंगम’ को बनाए रखे।जस्टिस अरुण मिश्रा के रूढ़िवाद ने धर्म विषयक उनके फैसले को काफी हद तक प्रभावित किया। सारिका बनाम प्रशासक, श्री महाकालेश्वर मंदिर समिति, उज्जैन (म.प्र।) और अन्य में अपने वर्ष 2018 के फैसले में उन्होंने कहा था कि सरकार का कर्तव्य है कि वह उज्जैन के महाकालेश्वर मंदिर में ‘लिंगम’ की स्थिति बिगड़ने न दे।

जस्टिस मिश्रा ने इस फैसले में तत्कालीन चीफ जस्टिस  दीपक मिश्रा के 2002 के गुजरात दंगों में नष्ट किए गए धार्मिक स्थलों की बहाली पर पहले के फैसले का उल्लेख नहीं किया, जिसमें उन्होंने कहा था कि राज्य को उनकी बहाली के लिए सार्वजनिक धन खर्च करने का कोई अधिकार नहीं था [गुजरात राज्य बनाम आईआरसीजी]। जस्टिस मिश्रा इस न्याय दृष्टांत को भूल गये कि सरकार का काम सरकारी पैसे से मन्दिर के संरक्षण का नहीं है।

अभी हाल ही में, निशिकांत दुबे बनाम भारत संघ में जस्टिस अरुण मिश्रा ने कहा कि श्रावण माह के दौरान देवघर के बैद्यनाथ ज्योतिर्लिंग मंदिर में जनता द्वारा कोविड -19 के कारण पूजा पर पूर्ण प्रतिबंध अनुचित है। जस्टिस मिश्रा, जस्टिस बी आर गवई और जस्टिस कृष्ण मुरारी की पीठ ने कहा कि हम राज्य में मंदिरों, चर्चों और मस्जिदों में आम जनता के सीमित प्रवेश की संभावना का पता लगाने के लिए उनसे (राज्य सरकार) अनुरोध करते हैं। पीठ ने राज्य सरकार से इसका प्रबंध करने को कहा है।

पीठ ने कोरोना संकट काल में भीड़ न लगे, इसके लिए सीमित संख्या में दर्शन करने की व्यवस्था की सलाह दी है। इस दौरान पीठ ने टिप्पणी करते हुए कहा कि मंदिर में ई-दर्शन कराना दर्शन कराना नहीं होता है। कोर्ट ने कहा है कि दर्शन के लिए श्रद्धालुओं को ई-टोकन जारी करना भी एक तरीका हो सकता है। पीठ ने कहा आने वाली पूर्णमासी और भादो महीने में नई व्यवस्था लागू करने की कोशिश की जाए।

झारखण्ड सरकार की ओर से 30 जुलाई को जारी आदेश में मंदिरों को खोलने की अनुमति नहीं दी गई थी। इसी आदेश को भाजपा सांसद निशिकांत दुबे ने सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी थी। इस दौरान निशिकांत दुबे के अधिवक्ता की ओर से मंदिर में ज्यादा संख्या में पंडों के पूजा करने का मुद्दा उठाया गया, जिस पर कोर्ट ने कहा कि नियमों का पालन करते हुए सीमित संख्या में पंडा पूजा करें। इसको लेकर सरकार उन्हें रेगुलेट भी करे। पीठ ने झारखंड सरकार से पूछा कि पूरा देश खुल रहा है केवल मंदिर, मस्जिद, चर्च और दूसरे धार्मिक स्थल क्यों बंद हैं। महत्वपूर्ण दिनों में उन्हें खुलना चाहिए। झारखंड सरकार की ओर से बताया गया कि राज्य में कोरोना के मामले बढ़ रहे हैं, इसलिए राज्य सरकार ने ये आदेश दिया है कि सभी धार्मिक स्थल फिलहाल बंद रखे जाएं।

केरल की  एक एक्टिविस्ट रेहाना फ़ातिमा की अग्रिम जमानत याचिका को 7 अगस्त को जस्टिस अरुण मिश्रा, जस्टिस बी आर गवई और जस्टिस कृष्ण मुरारी की पीठ ने खारिज कर दिया। जस्टिस मिश्रा ने रेहाना फ़ातिमा के वकील गोपाल शंकर नारायणन से पूछा, वह उनके कार्यकाल के अंतिम दौर में यह याचिका उनके सामने क्यों लाए।

जस्टिस मिश्रा ने कहा कि ये किस तरह का केस आप हमारे पास लेकर आए हैं? मैं हैरान हूं। इस तरह के केस में इंटरेस्ट नहीं है। आप बच्चों का इस्तेमाल इस तरह से कैसे कर सकते हैं? इससे किस तरह की संस्कृति बच्चे सीखेंगे? रेहाना के वकील ने कहा कि जो वीडियो बनाया गया था, उसका मकसद सेक्शुअलिटी को लेकर फैली छोटी सोच के खिलाफ जागरूकता पैदा करना था। उनका (रेहाना) स्टैंड ये था कि अगर कोई आदमी सेमी न्यूड खड़ा होता है, तो इसमें कोई सेक्शुअल बात नहीं होती।लेकिन अगर कोई औरत ऐसा करे, तो इसे अश्लील माना जाता है। उनका कहना है कि इसे खत्म करने का तरीका ये है कि लोगों को संवेदनशील बनाया जाए।

शंकर नारायणन ने रेहाना की तरफ से कहा कि मैं यहां नैतिकता के मुद्दे पर नहीं हूं। मेरे ऊपर जिस तरह के प्रावधान लगाए गए हैं, मैं उन पहलुओं पर बात कर रही हूं।वीडियो में दिख रहे बच्चे पूरे कपड़े पहने हुए थे। फिर पॉक्सो का सेक्शन 13 कैसे लग सकता है? इस पर जस्टिस अरुण मिश्रा ने कहा कि हां, पहली नज़र में ये लगता है। हाईकोर्ट ने पहले ही इस मुद्दे पर ध्यान दे दिया है

दरअसल रेहाना पर पॉक्सो एक्ट के सेक्शन 13 के तहत भी केस दर्ज हुआ है। ये सेक्शन उस वक्त लगता है जब पोर्नोग्राफिक मैटेरियल प्रोड्यूस करने में बच्चों का इस्तेमाल किया जाता है। इसी पर रेहाना के वकील ने दलील दी थी कि बच्चे पूरे कपड़े में हैं, इसलिए ये सेक्शन नहीं लगना चाहिए

जस्टिस अरुण मिश्रा ने हाईकोर्ट के आदेश का ज़िक्र किया जिसमें केरल हाईकोर्ट ने अग्रिम जमानत याचिका को खारिज करते हुए कहा था कि ऐसा नहीं कहा जा सकता कि पॉक्सो एक्ट के तहत या फिर जो भी धाराएं इस केस में लगी हैं, उनके तहत अपराध नहीं हुआ है। हाईकोर्ट ने इस केस में पॉक्सो एक्ट के लगने को सही माना था और कहा था कि ऐसा लग रहा है जैसे ‘यौन संतुष्टि’ के लिए बच्चों का इस्तेमाल किया गया है, जो कि ‘अश्लील’ है। रेहाना इससे पहले ‘किस ऑफ लव प्रोटेस्ट’ और सबरीमाला मंदिर में महिलाओं के प्रवेश को लेकर सुर्खियों में रह चुकी हैं।

रेहना फातिमा की अग्रिम जमानत के मामले में अपने ही न्याय दृष्टान्त को नजरअंदाज किया जस्टिस अरुण मिश्रा ने। सुशीला अग्रवाल और अन्य बनाम दिल्ली एवं एक अन्य मामले में संविधान पीठ जिसकी अध्यक्षता जस्टिस अरुण मिश्रा ने की थी, ने 29 जनवरी को अग्रिम जमानत के सवाल पर एक विस्तृत निर्णय दिया।

पीठ ने इस मामले में सहमति व्यक्त की थी कि धारा 438 सीआरपीसी का अनुच्छेद 21 के साथ गहरा सम्बन्ध है। जहाँ तक नागरिकों के व्यक्तिगत अधिकारों और स्वतंत्रता की रक्षा के अपने कर्तव्य के साथ राज्य की शक्ति और अपराध की जांच करने की जिम्मेदारी को संतुलित करने का सवाल है।

पीठ ने कहा था कि अनुच्छेद 21 आरोपी के पक्ष में निर्दोषता का अनुमान लगता है इसलिए यह दंडात्मक विधियों और उनके कार्यान्वयन के बारे में विचार के केंद्र में होना चाहिए। धारा 438 सीआरपीसी, कानून द्वारा स्थापित प्रक्रिया का हिस्सा है जो निष्पक्ष, न्यायपूर्ण और उचित तरीके से लागू की जानी चाहिए।

पीठ ने इसके समर्थन में पूर्व न्याय दृष्टान्तों का भी उद्धरण दिया था। इस मामले में पीठ ने यह भी कहा था कि अग्रिम जमानत देना चाहे तो न्यायाधीश के विवेक का मामला है, लेकिन अगर यह मंजूर किया जाता है, तो इसे बिना किसी प्रतिबंध के अभियुक्त के पक्ष में होना चाहिए, जब तक कि इसे सीमित करने के लिए कोई विशिष्ट कारण न हो।

(वरिष्ठ पत्रकार और कानूनी मामलों के जानकार जेपी सिंह की रिपोर्ट।)

This post was last modified on September 4, 2020 6:27 pm

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