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भारतीय समाज में बर्बरता और क्रूरता की इंतहा था केरल का स्तन टैक्स

लगभग संपूर्ण भारतीय इतिहास हमेशा से, हर काल में कुछ घोर जातिवादी वैमस्यता, वर्णवादी अशिष्टता की कलुषित विचारधारा अपने मन मस्तिष्क और दिल में रखने वाले कुछ निकृष्ट व अमानवीय व दरिंदे पुरूषों द्वारा लिखा गया है, जो इस देश के 85 प्रतिशत बहुजनों, आदिवासियों, शूद्र जातियों और उनकी स्त्रियों को सदा से पददलित, अंतहीन शोषण, घृणा के अतिरेकता और कामुकता की भीषण त्रासदी के लिए नियम, कायदे और कानून बनाते रहे हैं। उक्त वर्णित त्रासद स्थितियों का सदियों तक सामना करने वाले दलितों और शूद्रों की अत्यंत दयनीय स्थिति का इस देश के बौद्धिक, न्यायप्रिय, मानवीय और निष्पृह लोगों को अगर जानना-समझना है, अध्ययन करना है, उसका वैचारिक और सैद्धांतिक विरोध करना है, तो हम आपको आज से लगभग 220 साल पीछे के समय में सन् 1800 के आस पास घोर जातिवादी आदि शंकराचार्य की भूमि केरल लिए चलते हैं, जो उस समय उसका अधिकांश भूभाग वहाँ के तत्कालीन त्रावणकोर के एक पैशाचिक सोच वाले राजा के राज्य के अधीन था।

केरल के श्री शंकराचार्य संस्कृत विश्वविद्यालय की दलित स्टडीज, जेंडर इकॉलाजी तथा इतिहास विषय को पढ़ाने वाली एक महिला प्रोफेसर के अनुसार उस दौर में कुछ शातिर जाति व धर्म के स्वंयभू ठेकेदारों ने जाति आधारित ऐसे पहनावे निर्धारित किए गए थे कि किसी भी व्यक्ति को उसके पहनावे को देखकर बहुत ही आसानी से उसकी जाति की पहचान की जा सकती थी। उस समय केरल जैसे राज्य में जातिवाद की जड़ें इतनी गहरी, दृढ़ और कठोर थीं कि कथित नीची जातियाँ यथा नायर या नाडार, एड़वा, थिया और अन्य दलित या शूद्र जातियों के खेतिहर मजदूरों के रूप में काम करने वाली स्त्रियों को कथित उच्च जाति के या सवर्ण जाति के पुरूषों के सामने आते ही अपने बदन के ऊपरी हिस्से के वस्त्र को गिरा देना पड़ता था।

अगर कोई दलित स्त्री ऐसा नहीं करती थी तो उसे अपने स्तनों के आकार के अनुरूप बार-बार टैक्स देना पड़ता था। कथित उच्च जाति के घोर संकीर्णतावादी, क्रूर, बेहया, बेशर्म, नीच, अधम, पातकी, कामुक और दरिंदे शातिर पुरूष दलित और शूद्र स्त्रियों की बेइज्जती करने, उनकी अस्मत का मजाक उड़ाने, उनके अनावृत्त स्तन को कामुक दृष्टि से देखने व भद्दा मजाक करने, एक अंतहीन सीमा तक हेय दृष्टि से देखने के लिए उन पर स्तन टैक्स लगाने का घिनौना, वीभत्स एक सामाजिक नियम और कानून बनाए थे। उस समय स्तन टैक्स को केरल की स्थानीय भाषा मलयालम में मूलाकरम के नाम से पुकारा जाता था। केरल में सन् 1800 ईसवी के आसपास त्रावणकोर के राजा के शासन में आम जनता से कई तरह के टैक्स वसूले जाते थे,उनमें कई टैक्स ऐसे थे, जो उस व्यक्ति या उसके परिवार के आमदनी के आधार पर नहीं, अपितु जातिवादी कुव्यवस्था को अक्षुण रखने के लिए दलितों और हिन्दू समाज के सबसे गरीब, असहाय, निर्बल और कमजोर शूद्रों से वसूले जाते थे। उसी क्रम में दलित जातियों यथा नायर या नाडार, एड़वा, थिया और अन्य दलित या शूद्र जातियों की गरीब व निर्धन महिलाओं से स्तन टैक्स वसूलने की दुनियाभर में विरलतम् या इकलौते एक अमानवीय, बर्बर और दरिंदगी भरा नियम या प्रथा जारी थी।

ऐसे अमानवीय टैक्स वसूलना कथित उच्च जातियों की पितृसत्तात्मक बर्बरता को दर्शाता है, इसके अनुसार कथित उच्च जाति की महिलाओं को अपने स्तन ढकने का अधिकार है, परन्तु दूसरी तरफ कथित शूद्र व समाज के निचले स्तर की दलित महिलाओं को इसका अधिकार ही नहीं है, मतलब उनको अपने शरीर पर भी खुद के अधिकार से उन्हें वंचित कर दिया गया। इस स्तन टैक्स की बर्बरता, वीभत्सता, क्रूरता और हैवानियत की जरा कल्पना करिए कि जिस दलित औरत के जितने बड़े स्तन होते थे, उसे उतना ज्यादे टैक्स देना पड़ता था। ऐतिहासिक साक्ष्यों के अनुसार सन् 1803 ईसवी में केरल की जातिवाद कुव्यवस्था में सबसे नीच समझी जाने वाली एक दलित जाति एड़वा में जन्मी एक तीस वर्षीया खूबसूरत नंगेली नामक एक महिला ने, जो केरल के तटवर्ती चेरथला नामक स्थान में जन्मी थी, उक्त राक्षसी प्रथा का सशक्त और पुरजोर विरोध किया। उनके विरोध करने का तरीका यह था कि बगैर स्तन टैक्स दिए अपने शरीर को ढकेंगे।

उसने यह प्रण कर लिया था कि वह त्रावणकोर के राजा द्वारा लगाए गए इस अमानुषिक टैक्स को हर्गिज नहीं देगी। उसके इस कठोर निर्णय से उस समय के धर्म के ठेकेदार बने पाखंडी उससे बड़े नाराज हुए और उस टैक्स को वसूलने वाला अधिकारी, जिसे मलयालम भाषा में परवथियार कहते थे, अपने गुंडों और मुस्टंडों के दल-बल के साथ नंगेली के घर उसको धमकाने व निर्दिष्ट टैक्स, जो अब बढ़कर काफी बड़ी राशि हो चुका था, वसूलने के लिए बार-बार जाने लगा, अंतिम बार जब स्तन टैक्स अधिकारी मतलब परवथियार अपने दल-बल के साथ नंगेली के घर पहुँचा, तब उसने बहुत ही विवश और आजिज आकर एक बहुत ही कठोर निर्णय लिया, अबकी बार उन्होंने अपनी झोपड़ी के बारामदे के फर्श पर एक केले का पत्ता बिछाकर, उस पर एक दीप जलाया, कुछ प्रार्थना की और स्तन टैक्स अधिकारी या परवथियार को इंतजार करने के लिए कहकर अपने घर के अंदर चली गई, परवथियार यह सोच रहा था कि नंगेली घर के अंदर से टैक्स के पैसे लाने गई है,परन्तु ऐसा कुछ नहीं था, नंगेली ने अपने घर के अंदर जाकर एक तेज धार वाली चाकू से अपने दोनों स्तनों को काटकर, उन दोनों कटे स्तनों को अपने हाथों में लेकर बिल्कुल लहूलुहान अवस्था में बाहर लौटीं और उन दोनों कटे हुए स्तनों को फर्श पर रखे केले के पत्ते पर टैक्स के रूप में रख दिया।

हालांकि ऐतिहासिक साक्ष्यों के अनुसार यह बात बताई जाती है कि अत्यधिक रक्तश्राव के कारण उस वीरांगना नंगेली नामक महिला की कुछ ही घंटों में तत्काल मृत्यु हो गई, लेकिन नंगेली जैसी वीरांगना ने स्वयं को प्राणोत्सर्ग करके इस दुःखद व नारकीय प्रथा से अपने जैसी करोड़ों दलित महिलाओं की इज्ज़त व आबरू को सरेआम नीलाम होने से बचा लिया, क्योंकि इस दुःखद घटना के बाद त्रावणकोर के उस क्रूरतम्, हत्यारे राजा को अपने राज्य से ये अमानवीय स्तन टैक्स कानून को रद्द करना पड़ा।

केरल के चेरथला नामक स्थान पर नंगेली ने अपना बलिदान दिया था, उसे मलयालम भाषा में मुलाचिपा राम्बु कहते हैं, इसका हिन्दी में रूपांतरण है, ‘महिला के स्तन की भूमि।’ केरल सहित इस देश के इतिहास की पुस्तकों में नंगेली जैसी वीरांगना औरत के बारे में बहुत ही कम दृष्टांत और सामग्री उपलब्ध है,यह बहुत ही दुःखद है, क्योंकि नंगेली की बहादुरी की बातों और सुकृत्यों को समाज को जानने से जानबूझकर वंचित करने का यह एक सुनियोजित षड्यंत्र है। केरल के चेरथला नामक स्थान पर नंगेली का घर या झोपड़ी अभी भी मौजूद है, जिसमें उन्होंने एक बर्बर व अमानवीय कानून के खिलाफ अपना बलिदान दिया था। नंगेली और उनके पति चिरूकंदन से कोई संतान नहीं है,परन्तु उनकी बहन के पड़पोते और एक पड़पोती अभी भी उसी गाँव चेरथला में रहते हैं।

परंतु उक्तवर्णित इस रक्तरंजित पक्ष का सबसे दुःखद पहलू बताना अभी शेष है। आजकल नई दिल्ली में केन्द्र में बैठी सरकार भारतीय समाज में व्याप्त किसी भी व्यभिचार, क्रूरता, अंधविश्वास और पाखंड का निराकरण या निर्मूलन नहीं करती, अपितु उसे ढकने की, छिपाने की भरसक कोशिश और प्रयत्न करती है, उसे उक्तवर्णित जातिवादी कुकृत्यों और अमानवीय प्रथाओं के विरोध में अपना प्राण गंवाने वाली नाडार महिलाओं और नंगेली के बलिदान संबन्धित स्कूली पाठ्यपुस्तकों के अध्यायों से बड़ी परेशानी हो रही है, वह केरल की सीबीएससी द्वारा लागू स्कूली पुस्तकों से नंगेली सम्बन्धित अध्याय को ही हटवा दिया है, लेकिन नंगेली जैसी वीरांगना औरत का किसी अन्याय के खिलाफ दिया गया बलिदान आज भी केरल और समूचे भारतीय आबोहवा में गूँजती रहेगी, वह भारतीय जनमानस के दिलो दिमाग में तब-तक अजर-अमर बनी रहेगी, जब-तक इस भारतीय भूमि पर जातिप्रथा, स्तन टैक्स जैसे पैशाचिक नियम-कानून बनाने वाले नरपशुओं के कुकृत्यों को भुलाया नहीं जा सकता।

न हम नंगेली जैसी वीरांगना के वीरोचित्त सुकृत्य को भुला सकते हैं, जो खुद अपनी मर्यादा की रक्षा करते हुए अपना प्राणोत्सर्ग करके इस दुःखद और नारकीय प्रथा से अन्य करोड़ों दलित महिलाओं को बचा लिया। पाठ्यपुस्तकों से ऐसे शर्मनाक कुकृत्यों को हटा लेने मात्र से जनमानस इन नरपिशाचों के कुकृत्यों को कभी भी विस्मृत नहीं करेगा। जब भी नंगेली का जिक्र होगा, इन नरपिशाचों के कुकृत्यों की कटु यादें जनमानस के जहन में बरबस ताजा हो जाया करेंगी ।

(निर्मल कुमार शर्मा, ‘गौरैया एवम पर्यावरण संरक्षण के साथ पत्र-पत्रिकाओं में स्वतंत्र लेखन का काम करते हैं।)

This post was last modified on June 28, 2021 12:35 pm

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