Thu. Oct 24th, 2019

लूट की अर्थव्यवस्था को खत्म करने के लिए सत्ता के सरदार का गिरेबान पकड़ना जरूरी

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नरेंद्र मोदी और निर्मला सीतारमन।

मोदी जी समझते हैं कि वे जितना कहते हैं, लोग उतना ही समझते हैं। कहने वाले और सुनने वाले के बीच दूसरे ऐसे अनेक अनुभव काम करते रहते हैं जो कहे गये शब्द अपने अर्थ को प्राप्त करें, उसके पहले ही उनकी राह को भटका देते हैं। वे नहीं जानते कि कैसे राजनीतिक साजिशों, सरकारी तंत्र के बेजा प्रयोग से विरोधियों का दमन, हर मामले में स्वेच्छाचार का सिर्फ राजनीतिक नहीं, गहरा अर्थनीतिक संदर्भ भी बन जाता है। यह समग्र रूप से जिस डर के माहौल को तैयार करता है उसमें नागरिक अवसाद-ग्रस्त और बीमार होता है और उपभोक्ता वैरागी बन बाजार से मुंह मोड़ने लगता है। यह सब भारत के लोगों की आमदनी में गिरावट, अर्थात् उनकी बढ़ती हुई गरीबी के मूलभूत कारणों के अतिरिक्त है ।

कुल मिला कर डरा हुआ बीमार उपभोक्ता जहां आर्थिक मंदी का कारण बनता है, वहीं आर्थिक मंदी भी उपभोक्ता को बाजार से और ज्यादा दूर करती है। यह एक भयानक दुष्चक्र है । मौत के भंवर में खींच लेने वाला दुष्चक्र । जैसे मनोरोगी अवसाद में डूबता हुआ आत्म-हत्या के चरम तक जा सकता है, अर्थ-व्यवस्था का व्यवहार भी इससे ज्यादा भिन्न नहीं होता है। उपभोक्ता का डर उसे बाजार से दूर करता है और इससे उत्पन्न मंदी उसकी आमदनी को प्रभावित करती है; वह बाजार से और दूर जाता है तथा अर्थ-व्यवस्था और गहरी मंदी में धसती चली जाती है । भारत के घरेलू बाजार से जुड़ी अर्थ-व्यवस्था की आज की यही असली कहानी है।

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आज की हालत यह है कि भारत में सकल संचय की दर में भी तेजी से गिरावट आने लगी है। मोदी जब सत्ता में आए थे, यह दर 35 प्रतिशत थी, जो 2017-18 में 30 प्रतिशत हो चुकी है। यहां तक कि पारिवारिक संचय में वृद्धि की दर 17 प्रतिशत पर उतर गई है जो पहले 23 प्रतिशत थी।

जहां तक अन्तरराष्ट्रीय बाजार का सवाल है, उसके अपने संकट हैं। यह ट्रेडवार का एक विशेष जमाना है। इसमें किसी के लिये कोई अलग से रियायत नहीं है । जिसके पास रुपया है, ताकत है, वही राजा है । आज जिस दाम पर माल दुनिया के बाजार में बिक रहे हैं, भारत के पास उस दाम पर उनका उत्पादन करने की सिर्फ इसलिये सामर्थ्य नहीं है क्योंकि यहां मुनाफे के बटवारे के अनेक स्तर हैं। इसमें एक सबसे बड़ा हिस्सेदार तो खुद सरकार बनी हुई है । बैंकों पर सर्वाधिकार सरकार का है, और वे सरकारी दल के भ्रष्टाचार के मुख्य औजार बनी हुई हैं । इनके जरिये सरकार के करीब के लोगों के बीच रुपये लुटाये जाते हैं जो घूम कर भाजपा की आर्थिक मदद के कारक बनते हैं ।

भाजपा इसी लूट के भरोसे चुनावों में खरबों खर्च करती है । और भारत में चुनाव हर साल लगे ही रहते हैं, अर्थात् जनता के संचित धन से निवेश के बजाय एक प्रकार की शुद्ध निकासी का यह सिलसिला लगातार जारी रहता है । इसीलिये लाख जुबानी जमा-खर्च के बावजूद ऋणों पर ब्याज की दरें कम नहीं हो पाती हैं। रिजर्व बैंक की रेपो रेट में छूटों को भी बैंकें अपने घाटे की भरपाई के काम में लगाने की अभ्यस्त हैं । बैंकों की दुरावस्था के चलते ही उत्पादन के आधुनिकीकरण के सारे काम ठप पड़े हैं, जिनसे उत्पाद पर लागत को नियंत्रित किया जा सकता था ।  इसके कारण पड़ोसी छोटे-छोटे देश भी भारत को प्रतिद्वंद्विता में पछाड़ दे रहे हैं ।

बैंकों के हित के लिये ही सरकार ने एक नया कानून बनाया था इन्सोलवेंसी एंड बैंकरप्सी एक्ट। लक्ष्य था, सालों से कंपनियों में डूबे हुए धन का दस-बीस-तीस प्रतिशत जो भी हासिल हो जाए, शीघ्र हासिल करके बैंकों की नगदी की हालत को सुधारा जाए। कंपनियों को भी यह सब्ज बाग दिखाया गया कि इस कानून का लाभ उठा कर वे अपनी कंपनी की बेकार पड़ी छीज चुकी संपत्तियों को सलटा कर बैंकों के ऋण के बोझ से मुक्त हो जायेंगे। लेकिन कहना जितना आसान है, उसे करना उतना आसान नहीं होता है । इसमें शुरू से ही मोदी सरकार ने इस रास्ते पर बढ़ने वाली कंपनियों को बुरी नजर से देखना शुरू कर दिया; बोली लगाने वालों पर नाना शर्तें लादी जाने लगीं ; सरकार की मदद से बैंक अधिकारी भी मनमानी करने लगे । फलतः यह प्रक्रिया भी इसलिये फलवती नहीं हुई, क्योंकि इसकी सफलता का बुनियादी मानदंड था विवाद का जल्द निपटारा, और वही नौकरशाहों और राजनीतिज्ञों की बदौलत संभव नहीं था।

आज सरकार कह रही है कि उसने इस रास्ते से अब तक साठ हजार करोड़ रुपये जुटाये हैं, लेकिन यह नहीं बता रही है कि वे कौन से ऋण हैं जिनका इस रास्ते से निपटारा किया गया है, और कितने का निपटारा नहीं किया जा सका है! इन सबमें भी भ्रष्टाचार और राजनीतिक दखलंदाजी के सारे दाव-पेंच समान रूप से काम कर रहे हैं। सरकार का स्वेच्छचारी चरित्र इसमें भी निश्चित तौर पर अपनी भूमिका निभाता है; कोई किसी पर विश्वास नहीं कर पाता है।

सरकार के स्वेच्छाचार का सबसे बड़ा उदाहरण रिजर्व बैंक के आकस्मिक कोष, आरक्षित कोष और मुनाफे की पूरी राशि को हड़प लेने के मामले में देखा गया । विमल जालान कमेटी की सिफारिश के नाम पर रिजर्व बैंक से जो 1 लाख 76 हजार करोड़ रुपया लिया गया है उसमें लगभग 53 हजार करोड़ तो किसी भी आपात काम के लिये आरक्षित कोष में से लिया गया है, लेकिन इसके साथ रिजर्व बैंक के मुनाफे का जो 1 लाख 23 हजार करोड़ लिया गया है, वह सबसे अधिक चौंकाने वाला है । रिजर्व बैंक 2009 से 2018 तक अपनी आमदनी से औसत सिर्फ 37290 करोड़ रुपया सरकार को दे पाया था, वह अचानक एक साल में बढ़ कर 1.23 लाख करोड़ रुपये कैसे हो गई, यह किसी के लिये भी रहस्यजनक हो सकता है । लेकिन इसके मूल में भी वही है, आम जीवन में और अर्थ-व्यवस्था में स्थिरता के साथ किया गया सौदा । 

रिजर्व बैंक अपने मुनाफे का एक अंश अपने आरक्षित कोष में रखता था ताकि किसी भी प्रकार की आर्थिक अस्थिरता, यहां तक कि किसी बैंक की डांवाडोल स्थिति में वह सामने आ कर उस स्थिति को संभाल सके । इस मामले में रिजर्व बैंक को ‘बैंक आफ लास्ट रिसोर्ट’ कहते हैं । जब रुपये की कीमत को स्थिर रखने के लिये, वित्त बाजार को संतुलित रखने के लिये कहीं से कोई मदद नहीं मिलती है, तब रिजर्व बैंक इसका इस्तेमाल करती है ।

अतीत में कई बार इसका उपयोग किया जा चुका है । रिजर्व बैंक अपने पास सोने-चांदी का भंडार भी इसी के बल पर बनाये रखती है ताकि आपात काल में अन्तरराष्ट्रीय बाजार में उसका इस्तेमाल किया जा सके । जालान कमेटी ने मुनाफे से निकाल कर रखी जाने वाली इस राशि के अनुपात को कम करके सिर्फ 5.5 प्रतिशत से 6.5 प्रतिशत तक रखने की सिफारिश की । मोदी जी के पिट्ठू गवर्नर ने एक कदम आगे बढ़ कर जालान कमेटी की सिफारिश के न्यूनतम 5.5 प्रतिशत को ही इसमें रखने का निर्णय लिया और सरकार को एक साथ 1.23 लाख करोड़ सौंप दिया ।   

इसीलिये, हमारा यह मानना है कि राजनीति आज के भारत की अर्थ-व्यवस्था की सबसे बड़ी समस्या है । इसके कारण ही हर सरकारी नीति कभी भी अपने सही लक्ष्य तक नहीं पहुंच पाती है। वह भले नोटबंदी का मसला हो या जीएसटी का । यहां तक कि स्वच्छता अभियान आदि भी कोरे दिखावे की चीज बन कर रह गये हैं क्योंकि यही इस सरकार की राजनीति है। कश्मीर के मसले को ही ले लीजिए । धारा 370 और राज्य के बटवारे को लेकर जो कुछ किया गया है, उन सबका विवेकसंगत कारण आज तक सामने नहीं आया है और इस समस्या से निकलने का इनके पास रास्ता क्या है, उसके भी कोई संकेत नहीं मिल रहे हैं ।

यह सब एक सर्वाधिकारवादी राजनीति के हित में किया जा रहा है और इस राजनीति की जो अर्थनीतिक कीमत है, उसे चुकाने के लिये हमारा देश अभिशप्त है । जब तक इस राजनीति को पराजित नहीं किया जाता है, अर्थनीति के वर्तमान संकट से निकलने का कोई रास्ता बन ही नहीं सकता है । अर्थव्यवस्था के संकेतकों के सही रूप को अगर जानना हो तो उसे अंतिम आकार देने में मध्यस्थता करने वाले राजनीति के संकेतों को आपको जरूर पढ़ना होगा।

(अरुण माहेश्वरी वरिष्ठ लेखक और स्तंभकार हैं आप आजकल कोलकाता में रहते हैं।)                  

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