ग्राउंड रिपोर्ट: आदिवासियों के गढ़ से दूर होता पानी, चंदौली के नौगढ़ में चुआड़ के भरोसे जिंदगानी

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नौगढ़, चंदौली। पानी की क्या कीमत होती है, यह जानना हो तो ट्राइबल बेल्ट नौगढ़ के जमसोती के नागरिकों से मिलें। यहां 1904 के बाद दूसरी बार बड़े पैमाने पर फरवरी महीने से ही पेयजल की समस्या ने विकराल रूप ले लिया है। गांवों में गर्मी बढ़ने के साथ ही कुआं और तालाब लगभग सूख गए हैं। जलस्तर तेजी से खिसकने के चलते हैंडपंपों ने भी हथियार डाल दिए हैं। आज से नहीं बल्कि कई दशकों से गर्मी के दिनों में यहां की स्थिति ऐसी ही हो जाती है। जो आज तक नहीं बदल सकी।

चंदौली के ट्राइबल बेल्ट के रूप में विख्यात नौगढ़ क्षेत्र के अधिकांश गांव आज भी मूलभूत सुविधाओं से मरहूम हासिये पर पड़े हैं। जबकि, देश आजादी की 75 वर्षगांठ धूमधाम से मना चुका है। तिसपर आजादी के अमृत महोत्सव काल में लोगों को हो रहे पेयजल संकट, सिस्टम और सरकार के लिए एक बड़ा सवाल है कि आखिर हजारों लोग कब तक चुआड़ के भरोसे जिंदगी का गला तर करते रहेंगे?

चारों तरफ से पहाड़ों से घिरा तकरीबन आदिवासी बाहुल्य आबादी वाला यह इलाका नौगढ़ विकास खंड में पड़ता है। चारों तरफ जंगल, पहाड़ और पत्थर होने की वजह से यहां गर्मियों में पानी के लिए सबसे अधिक परेशानी रहती है। पेयजल के लिए लोग पानी दे रहे एकाध हैंडपंप और पहाड़ में फूटे दर्रे (चुआड़) पर ही निर्भर हैं। यहां पहाड़ से रिस कर आने वाले पानी के सोते होते हैं। ग्रामीण इन्हीं सोतों पर निर्भर रहते हैं। दिन-रात पानी के लिए महिलाएं यहां बाल्टी और प्लास्टिक के डब्बे के साथ लाइन लगा कर घंटों अपनी बारी का इंतजार करती हैं।

गांव से बाहर जंगल में चुआड़ पर पानी लेने जाती आदिवासी महिला।

दोपहर का वक्त। तापमान 42 डिग्री सेल्सियस से अधिक। गर्म हो चुकी पहाड़ी और साफ आसमान से बरसती सूरज की तीखी किरणें। वातावरण में लू सरीखी चल रही हवा और गर्मी से बचने के लिए लोग पेड़ के नीचे, घरों में, ओसारे आदि में जहां-तहां पनाह लेकर दोपहरी को काटने में लगे हैं। आदिवासी गंगेश्वरी अपने घर से तकरीबन आधा किलोमीटर दूर से अपनी लड़की और पड़ोसी के साथ सिर पर पानी की बाल्टी लेकर लौट रहीं हैं।

रास्ता पथरीला और जगह-जगह उबड़-खाबड़ होने की वजह से कई ग्रामीण गिरते-गिरते बचते हैं। गंगेश्वरी ने बताया कि “जनवरी महीने के अंतिम दिनों में मेरे घर के पास लगा सरकारी हैंडपंप पानी देना छोड़ दिया है, जिसे कुछ ही दिनों पहले बनवाया गया था। पहले से ही समस्याएं क्या कम थीं, जो अब पानी के लिए इतना दूर और कई घंटे नष्ट कर जाना पड़ता है।”

वो कहतीं हैं कि “घर-गृहस्थी का इतना सारा काम पड़ा हुआ है। अब दिन में कम से कम तीन बार पानी लेने के लिए परेशान होना पड़ता है। बहुत सारा पानी तो रास्ते में ही छलक जाता है। इतनी धूप में सिर पर पानी लेकर चलना किसी मुसीबत से कम नहीं है, लेकिन मजबूरी है।”

दूर से पानी लेकर लौटी गंगेश्वरी (काली साड़ी में) और बाल्टी लिए मुन्नी।

आदिवासियों की आबादी 2.14 फ़ीसदी

साल 2011 की जनगणना के अनुसार चंदौली ज़िले की आबादी 19, 52,756 थी, जिसमें 10,17,905 पुरुष और 9,34,851 महिलाएं शामिल थीं। 2001 में चंदौली ज़िले की जनसंख्या 16 लाख से अधिक थी। चंदौली में शहरी आबादी सिर्फ़ 12.42 फ़ीसदी है। 2541 वर्ग किलोमीटर है फैले चंदौली ज़िले में अनुसूचित वर्ग की आबादी 22.88 फ़ीसदी और जन-जाति की 2.14 फ़ीसदी है।

खेती के अलावा कोई दूसरा रोज़गार नहीं है। चंद्रप्रभा वन्य जीव अभयारण्य का एक बड़ा हिस्सा नौगढ़ में है, जहां यूपी के खूबसूरत झरने, राजदरी और देवदरी चंद्रप्रभा के जंगलों में हैं। इन झरनों को देखने के लिए वर्ष भर पर्यटकों की भारी भीड़ जुटती है। कर्मनाशा और चंद्रप्रभा नदियां इसी अभयारण्य से होकर बहती हैं।

स्कूल के हैंडपंप का सहारा

बसंती कोल, अपने कक्षा तीन में पढ़ने वाले बच्चे (पीयूष और प्रीतम) को लेकर पानी भरने आगनबाड़ी केंद्र पर आई हैं। गांव से लगभग आधा किमी दूर जमसोती का आंगनबाड़ी और प्राथमिक विद्यालय सटा हुआ है। सरकारी स्कूल में लगा हुआ हैंडपंप हर समय पानी देता है, लेकिन अध्यापक मिड-डे-मील बांटने के समय ग्रामीणों को पानी लेने से रोक देते हैं। वहीं, आगनबाड़ी परिसर में लगा टुल्लू पंप से दस-पंद्रह मिनट ही पानी आ पाता है।

टुल्लू पंप के पानी छोड़ देने से खाली रह गई बसंती कोल के बेटे प्रीतम की बाल्टी।

शाम को फिर आना पड़ेगा

बसंती कहती हैं “मैं सुबह भी नहाने और खाना बनाने के लिए पानी लेने आई थी। अब दोपहर और शाम में होने वाले पानी के खर्च की व्यवस्था के लिए बच्चों को लेकर आई हूं। पानी की बाल्टी ढोने में तबियत थक जाती है। परिवार बड़ा है। एक-दो बाल्टी से काम नहीं चलता है।

बच्चे सगड़ी (रिक्शा) को जैसे-तैसे चला लेते हैं। दोपहर में एक घंटे से टुल्लू पंप से पानी भरने में जुटी हूं। पांच-छह बाल्टी-कनस्तर में से किसी को भी पूरा नहीं भर पाई हूं। टुल्लू ने पानी ही छोड़ दिया है। इतनी धूप है, हैंडपंप को कौन चलाएगा? मैं घर जा रही हूं। शाम को फिर आना पड़ेगा।”

क्या ये लोग इंसान नहीं है?

आखिर इन लोगों के साथ नाइंसाफी क्यों? यह कहते हुए बसंती अपने बच्चों को लेकर आगे बढ़ने लगी। पास में खड़ी शिक्षा मित्र माधुरी के लिए यह सब देखना आम बात है। वह ग्रामीण महिलाओं को रोज पानी जुटाने के लिए आपाधापी करती हुई देखती हैं। बिजली रहने और टिल्लू से पानी आने पर आंगनबाड़ी परिसर में लगे टुल्लू पंप की पाइप को ग्रामीण महिलाओं को पानी भरने के लिए दे देती हैं।

स्कूल टाइम में पानी की किल्लत से परेशान शिक्षामित्र माधुरी।

माधुरी बताती हैं कि “जाने कितनी बार शिकायत की जा चुकी है। हम लोगों को पेयजल की समस्या होती है। इस बार तो दो महीने पहले से स्थिति बिगड़ने लगी है। महिलाएं अपने बच्चों-बच्चियों को लेकर धूप में, रात में और बारिश में पानी भरने के लिए सुबह से लेकर शाम तक रास्ता नापते देखी जा सकती हैं।”

वो आगे कहती हैं कि “वृद्ध महिलाओं को पानी लेकर जाने में बहुत दिक्कत होती है। कई बार तो बूढ़ी महिलाएं बेचारी फिसल कर घायल हो जाती हैं। सरकार इतना कुछ कर रही है, आखिर इन लोगों के साथ नाइंसाफी क्यों? क्या ये लोग नागरिक नहीं है? वोट नहीं देते हैं? टैक्स नहीं देते हैं? सबसे बड़ा सवाल यह है कि क्या ये लोग इंसान नहीं है? इनके मौलिक और मूलभूत अधिकार नहीं हैं?    

पानी संकट के चलते पढ़ाई का नुकसान

कक्षा सात की छात्रा मुन्नी ने बताया कि “मेरे घर में पांच सदस्य हैं, जिनके लिए खाना बनाना और पीने के लिए पानी का इंतजाम मुझे करना पड़ता है। पानी जुटाने के लिए सुबह सरकारी स्कूल तक और दोपहर या इसके बाद मुझे गांव के बाहर चुआड़ तक जाना पड़ता है। एक बार पानी लेने जाने में एक घंटे से अधिक समय लगता है। दिन भर में तीन घंटे से अधिक समय पानी में ही खर्च हो जाता है।”

बाल्टी लिए मुन्नी।

मुन्नी आगे कहती है कि “इस वजह से मेरी पढ़ाई को भी नुकसान हो रहा है। मेरे साथ गांव की अन्य लड़कियां भी जाती हैं। गांव में हैंडपंप गड़े हैं, उनमें से कई पानी भी देते हैं, लेकिन फरवरी-मार्च आते ही सभी हैंडपंप पानी देना छोड़ देते हैं। मेरी सरकार से मांग है कि गांव में पेयजल के लिए स्थाई प्रबंध किया जाये।” 

जंगल में लगा है भ्रष्टाचार का दीमक

पत्रकार राजीव सिंह कहते हैं कि “कहने को तो यूपी में डबल इंजन की सरकार है, लेकिन चंदौली जनपद के गांवों के सर्वांगीण विकास में खासकर पहाड़ी गांवों को समस्याओं से खींचकर बाहर निकालने में डबल इंजन लगभग हांफ रहा है।”

वो कहते हैं कि “बेरोजगारी, गरीबी, जलसंकट, आवास, फर्जी मुकदमें, वन्य जीवों के हमले की आशंका, प्राथमिक के बाद पढ़ाई को भटकना, भ्रष्टाचार, स्वास्थ्य सुविधाओं का अभाव, कृषि के लिए सिंचाई की दिक्कत, स्वस्थ्य और मनोरंजन के साधनों का अभाव समेत कई परेशानियों से घिरे जमसोती और कुल्हड़ियाडीह गांव तो महज एक उदाहरण हैं।

एक हैंडपंप पर पानी लेने के लिए अपने बारी का इंतजार करती महिलाएं और बच्चियां।

बेशक योगी सरकार ने नौगढ़ की तरक़्क़ी और इस इलाक़े के लोगों की प्यास बुझाने के लिए बातें तो बहुत कीं, लेकिन नौकरशाही की लाल फीताशाही, जनप्रतिनिधियों की कमजोर इच्छाशक्ति और जंगल में भ्रष्टाचार के दीमक ने उनके मंसूबे को हकीकत का अमलीजामा पहनाने में बड़े बाधक बने हुए हैं।”

2023 में बने 1904 के हालात

गमछे से माथे का पसीना पोछते हुए स्थानीय रामजी कहते हैं कि “पिछले साल भी पानी का भयंकर संकट खड़ा हो गया था, जो जून में हुआ। लेकिन इस बार तो रिकॉर्ड ही टूट गया है। फरवरी से हम लोग बहू-बेटियों को चुआड़ और सरकारी स्कूल में चल रहे एकमात्र हैंडपंप पर भागते देख रहे हैं।

इसे गर्मी की सनक कहा जाए या कुछ और? गत वर्ष पानी की आपूर्ति के लिए जिला प्रशासन ने टैंकर लगाया था। इस बार अभी तक पानी का टैंकर नहीं आया है, जिसे प्रशासन जल्द से जल्द भेजवाये, नहीं तो हम लोगों के लिए मुसीबत और बढ़ने वाली है।”

ग्रामीण रामजी।

वो आगे कहते हैं कि “साल 2016 में सोलर आधारित नल गांव में लगाए गए थे। इस नल से वर्ष 2019 तक पानी आया, इसके बाद यह नल और सोलर की पूरी योजना ही बंद पड़ी है, जिसका हाल लेने वाला कोई नहीं है। गांव में तकरीबन एक दर्जन हैंडपंप भी लगे हैं, जो किसी काम के नहीं हैं। सन् 1904 वाली स्थिति साल 2023 में दिखने लगी है। कहीं ऐसा न हो कि पानी की तलाश में हम लोगों को गांव से पलायन करना पड़े।”

आंकड़ों में पेयजल की व्यवस्था 

चंदौली जिले में नागरिकों तक शुद्ध पेयजल पहुंचाने के लिए जलनिगम\प्रशासन की ओर से दो दर्जन से अधिक पेयजल योजनाएं चलाई जा रहीं हैं। वहीं ग्रामीण व शहरी इलाकों में मिलाकर करीब 30 हजार हैंडपंप लगाए गए हैं। जिले के करीब 16 लाख लोगों के लिए प्रति 150 की आबादी पर इंडिया मार्का हैंडपंप लगाया गया है। इनमें कई हैंडपंपों ने गर्मी की शुरुआत में ही जवाब देना शुरू कर दिया है।

कई हैंडपंप खराब पड़े हैं तो कई रिबोर की बाट जोह रहे हैं। हैंडपंपों की मरम्मत व उन्हें रिबोर कराने का जिम्मा ग्राम पंचायत पर है। ग्राम पंचायत की लापरवाही के कारण लोगों को पानी के लिए भटकना पड़ रहा है। पानी की किल्लत के लिए गाम पंचायत पर दोष मढ़ना कितना उचित है?

सूख चुके हैंडपंप के पास बच्चे।

जबकि, जिले के मैदानी, पठारी और पहाड़ी इलाकों में पेयजल की समस्या से लाखों की आबादी प्रभावित है। इनमें से सैकड़ों गांव या पुरवे चकिया और नौगढ़ विकास खंड में हैं। यहां पानी की बहुत किल्लत है। क्या विकासखंड, तहसील, उपजिलाधिकारी और जिलाधिकारी स्तर से प्रयास की कोई जवाबदेही नहीं बनती है?

दशकों से गांव की यही स्थिति

बाबूलाल आदिवासी की उम्र पैंसठ साल को पार कर चली है। आजादी के कई दशक गुजर जाने के बाद भी वे यह मानाने को तैयार नहीं कि उनके गांव में पानी की समस्या कभी ख़त्म हो जाएगी। वे कहते हैं कि “बचपन से लेकर अबतक हम लोगों को जीवन को आगे बढ़ाने के लिए जंगली जानवरों से इंच-इंच का संघर्ष करना पड़ता है।”

वो आगे कहते हैं कि “सरकार पेयजल की व्यवस्था के लिए पानी की तरह पैसा बहाती है, लेकिन कुछ वर्षों बाद ये योजनाएं दम तोड़ देती हैं। पहाड़ों के ऊपर हम लोगों का गांव है। बहुत विपरीत परिस्थितियों में हजारों ग्रामीणों को अपने जीवन को सींचना पड़ता है। इसमें पानी की बहुत अहमियत है, लेकिन पानी ही पहाड़ों से दूर होता जा रहा है।” 

बीच जंगल में चुआड़ पर प्यास बुझाते ग्रामीण (लुंगी में बाबूलाल आदिवासी)।

पानी की तलाश में भटक रहे वन्य जीव

मई की चिलचिलाती गर्मी ने जहां आम जन को बेहाल कर दिया है, वहीं जंगलों में वन्य जीव भी इसकी जद में आ गए हैं। तालाबों में पानी न होने से वन्य जीवों को पानी की तलाश में इधर-उधर भटकना पड़ रहा है। अलसुबह से ही चिलचिलाती धूप और गर्म हवा के थपेड़ों से राह चलना दूभर हो गया है।

चकिया, नौगढ़ और मझगाई रेंज के जंगलों में गाय-भैंस, मवेशी, वन्य जीव लंगूर, नीलगाय, हिरन, भालू, बारहसिंघा, तेंदुआ, शाही, चीतल, खरगोश, बंदर आदि जीवों को पीने के पानी की समस्या हो गई है। वन्य जीवों को पानी की तलाश में मीलों भटकना पड़ता है। पानी न मिलने से उनकी प्यास नहीं बुझ पा रही है। पिछले हफ्ते पानी न मिलने से एक बारहसिंघे की मौत हो गई थी। 

जंगल में प्यास से भटक रहे मवेशी।

क्या कहता है प्रशासन?

नौगढ़ तहसील क्षेत्र में पेयजल की किल्लत और जल संकट पर उपजिलाधिकारी आलोक कुमार ने ‘जनचौक’ से बताया कि “ग्राम पंचायत में प्रधान-सचिव और विकासखंड स्तर पर अधिकारियों को निर्देश दिया गया है कि वे क्षेत्र में जहां भी पेयजल की किल्लत हो रही है, फ़ौरन टैंकर और हैंडपंपों की मरम्मत कर पेयजल की आपूर्ति सुनिश्चित करें।

स्थानीय विधायक से भी पेयजल की व्यवस्था के लिए सहयोग लिया जा रहा है। नौगढ़ पहाड़ी पर बसे होने के चलते और खिसकते जल स्तर से हैंडपंप, नल, सोलर पम्प की व्यवस्था कई जगहों पर फेल हो गई है। इनके रिबोर और मरम्मत के लिए युद्धस्तर पर प्रयास जारी हैं।”

दिन में ठीक, रात में कौन आएगा?

महिलाओं-बच्चियों को चुआड़ तक जाना खतरे से खाली नहीं है। पानी की समस्या पर ग्राम जमसोती की पूर्व प्रधान आरती देवी का कहना है कि “यहां पूरे साल पानी, खासकर पीने वाले पानी की मारा-मारी रहती है। गर्मी के दिनों में तो गांव के सभी हैंपपंप सूख जाते हैं। एक या दो हैंडपंप चलते भी हैं तो वो गांव से बहुत दूर हैं। यहां से औरतों और बच्चियों को पानी लेने के लिए बहुत परेशान होना पड़ता है। आसपास के दर्जनों गांवों में पेयजल और मवेशियों के लिए पर्याप्त पेयजल के संसाधन नहीं है।

चुआड़ के पत्थर पर बैठी महिलाएं। पेयजल से जुड़ी परेशानी बताती जमसोती की पूर्व प्रधान आरती।

पानी लेने के लिए कई बार लड़ाई तक हो जाती है। पानी की समस्या विकराल होने पर चुआड़ पर पानी के लिए लाइन लगानी पड़ती है। दिन में हम लोग कैसे भी चुआड़ तक पानी लेने आ जाते हैं, लेकिन रात या शाम के समय जंगल से चुआड़ तक आना खतरे से खाली नहीं है। गांव के घर-घर पानी पहुंचे ऐसी व्यवस्था सरकार को करनी चाहिए, ताकि औरतों और बच्चियों को पानी के लिए भटकना नहीं पड़े।” 

 (चंदौली के नौगढ़ से पवन कुमार मौर्य की ग्राउंड रिपोर्ट)

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