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आखिर किस बात की पर्देदारी है योगी जी?

आखिर किस बात की पर्देदारी है योगी जी? पूरे हाथरस को पुलिस छावनी में तब्दील कर दिया गया है। पीड़िता का घर किला बन गया है। माहौल ऐसा बना दिया गया है कि जैसे पीड़िता और उसके परिजन ही आरोपी हों। आरोपी हैं कि उनके हौसले बुलंद हैं और उन्हें सरकार की हर हरकत से अपने और सुरक्षित होते जाने का संदेश मिल रहा है। घटना के 20 दिन बीत जाने के बाद आपने इलाके के एसपी, सीओ और दो इंस्पेक्टरों का निलंबन कर दिया। और पीड़िता के ताऊ के सीने पर लात मारने वाले डीएम तथा देश की सर्वोच्च लोकतांत्रिक संस्था के प्रतिनिधि को जमीन पर पटकने वाले प्रशिक्षु आईएएस मीणा अभी भी आपके वहां तैनात अफसरों में सबसे लाडले अफसर बने हुए हैं।

पीड़िता के परिजनों को लात मरवाकर आखिर आप क्या संदेश देना चाहते हैं? उनके मोबाइल आपने छीन लिए। उनको किसी से बात करने की इजाजत नहीं है। मीडिया जब गांव में घुसने की कोशिश कर रही है तो उसके लोगों के साथ अपराधियों सरीखा व्यवहार किया जा रहा है। आखिर ये कैसा लोकतंत्र है और कैसी व्यवस्था है जिसमें मीडियाकर्मी पीड़ितों से नहीं मिल सकते और पीड़ित खुलकर अपना पक्ष नहीं रख सकता है?

योगी जी इस देश में अंग्रेजों के खिलाफ लड़ाई में कुछ मिला हो न या मिला हो लेकिन एक चीज देश ने ज़रूर हासिल की है वह है लोकतंत्र। देश में एक नागरिक के तौर पर एक इंसान को जिंदगी जीने का हक। लेकिन आप ने कल उसको भी कलंकित कर दिया। वैसे तो नागरिकता के पैमाने पर आपने हर किसी को दो कौड़ी का बना दिया है। लेकिन कल जो टीएमसी नेता डेरेक ओ ब्रायन के साथ हुआ है वह देश के लोकतंत्र के माथे पर कलंक की तरह चस्पा हो गया है। ब्रायन कोई सामान्य शख्स नहीं हैं। वे देश की संसद के प्रतिनिधि हैं। वह प्रतिनिधि जो संसद के भीतर कुछ भी करे तो उसके खिलाफ सुप्रीम कोर्ट तक कुछ नहीं कर सकता। उसकी सुनवाई संसद के भीतर स्पीकर ही करेगा।

संसद के बाहर भी उसे विशेषाधिकार हासिल है। क्योंकि वह जनता का प्रतिनिधि है। और वैसे भी लोकतंत्र में जनता सर्वोपरि होती है। आप शायद नहीं जानते कि संसद के बाहर इस प्रतिनिधि को क्या दर्जा हासिल है। जेल के मैनुअल में लिखा गया है कि अगर कोई सांसद जेल के भीतर आएगा तो वह छोटे दरवाजे से नहीं बल्कि उसके बड़े दरवाजे से प्रवेश करेगा और बाहर निकलने पर भी उसी दरवाजे का इस्तेमाल किया जाएगा। जानते हैं ऐसा क्यों किया गया है? यह उसके सम्मान के लिए होता है। छोटे दरवाजे से इसलिए नहीं निकाला जाता क्योंकि उससे निकलने पर उसे अपना सिर झुकाना पड़ेगा। और यह किसी भी जनप्रतिनिधि के सम्मान के खिलाफ होगा। यहां आपकी जानकारी के लिए बता दें कि जेलों में दो दरवाजे होते हैं एक बड़ा और फाटक के एक हिस्से को काट कर उसमें छोटा दरवाजा बना दिया जाता है।

यह आम कैदियों और मुलाकातियों के आने जाने के लिए होता है। अब अगर इस प्रतिनिधि की आपने यही इज्जत समझी है कि उसे अधिकारियों से जमीन पर पटक-पटक कर मरवाया जा सकता है तो समझा जा सकता है कि आपकी निगाह में देश के लोकतंत्र की क्या इज्जत है। और अगर एक जनप्रतिनिधि की यह हैसियत हो जाएगी तो फिर लोकतंत्र की सबसे अहम और छोटी कड़ी नागरिक का क्या होगा? उसका मान-सम्मान और उसकी हैसियत क्या होगी?

परसों इसी तरह की हरकत विपक्ष के नेता और कांग्रेस के पूर्व अध्यक्ष राहुल गांधी के साथ हुई जब एक अदने से पुलिसकर्मी ने उनका गिरेबान पकड़ने की कोशिश की। अब सोचने की बारी आपकी नहीं जनता की है। उसे समझना होगा कि अगर देश में सांसद और विपक्ष के नेता राहुल गांधी के गिरेबान तक पुलिस का हाथ जा सकता है आम नागरिक के साथ वह क्या कर सकती है।

बहरहाल सरकार मामले की लीपापोती में जुट गयी है। महज एसआईटी गठित करने से मामले की जांच निष्पक्ष नहीं हो जाती है। जिस तरह से पीड़ित परिवारों को सामने आने नहीं दिया रहा है उससे यह बात किसी के लिए समझनी मुश्किल नहीं है कि एसआईटी कुछ और नहीं बल्कि लीपा-पोती का ही एक कार्यक्रम है। वरना कोई बताएगा कि क्या एसआईटी का कोई अधिकारी सूबे के एडीजी के खिलाफ जा सकता है जो चिल्ला-चिल्ला कर पोस्टमार्टम और एफएसएल की रिपोर्ट दिखा रहा है। और बता रहा है कि पीड़िता के साथ बलात्कार नहीं हुआ है। उसकी जीभ नहीं काटी गयी है।

इन्होंने लोगों को सिर्फ अपना भक्त बनाना सीखा है और सोचते हैं कि वह जो कहेंगे सभी लोग उसको मान लेंगे। लेकिन योगी जी अभी देश और समाज उस गति को प्राप्त नहीं हुआ है। दिमाग रखने वाले लोग भी समाज में मौजूद हैं। और कुछ लोगों के लिए भले ही यह बात सत्य हो लेकिन सभी को एक साथ मूर्ख नहीं बनाया जा सकता है। आठ दिन बाद तो पीड़िता की एफआईआर दर्ज की गयी है। और फिर उसके बाद उसके मेडिकल परीक्षण के लिए स्वैब या फिर दूसरे सैंपल लिए गए होंगे। ऐसे में इतने दिनों बाद किसी परीक्षण में बलात्कार का साबित हो पाना क्या आसान है? और वैसे भी देश में निर्भया के बाद बने नये कानून में बलात्कार की परिभाषा बदल दी गयी है। जिसमें किसी पेनिट्रेशन या फिर इंटरकोर्स की जरूरत नहीं है बल्कि नाकाम कोशिश भी बलात्कार माना जाएगा।

और वैसे भी पीड़िता मौत से पहले तमाम मीडिया चैनलों को अपने साथ बलात्कार की बात बता चुकी है और उसके कई वीडियो वायरल भी हो चुके हैं। ऐसे में पीड़िता के डाइंग डिक्लेरेशन को झुठलाकर अपनी और प्रशासन की तैयार रिपोर्ट के जरिये सरकार आखिर क्या कहना चाहती है। उसके बाद भी अगर कोई आपकी मंशा पर सवाल उठा रहा है तो आप उसे कठघरे में खड़ा कर दे रहे हैं। जबकि इन तमाम चीजों को लेकर कठघरे में खुद आप और आपका पूरा प्रशासन है।

दरअसल सूबे में योगी का सामाजिक आधार लगातार खिसकता जा रहा है। आखिर में उनके पक्ष में सवर्ण जमात की जो गोलबंदी थी कानपुर के दुबे एनकाउंटर और उसी तरह की 35 से ज्यादा ब्राह्मणों की हत्याओं ने उसमें भी सेंध लगा दी। अंत में उनके पास अब ठाकुर समाज ही एक ऐसा हिस्सा बचा है जो मज़बूती के साथ खड़ा है। हाथरस मामले में सभी आरोपी ठाकुर हैं। और अगर उसे योगी नहीं बचाए या फिर बचाते हुए नहीं दिखे तो फिर उनकी मुट्ठी से इस समाज के खिसकने की शुरुआत हो जाएगी। लिहाजा योगी की पूरी कवायद किसी भी तरीके से इन आरोपियों को बचाने की है। उसके लिए पीड़िता के परिजनों की किसी भी कीमत पर मुंह बंद करवाना चाहते हैं। वह पैसे से हो या फिर प्रशासन के दबाव से। वह डरा कर हो या कि पुचकार कर। वह हर हथकंडा अपनाया जा रहा है जिससे इस लक्ष्य को हासिल किया जा सके।

कल इसीलिए पूरे मामले को पलटने की कोशिश शुरू हो गयी। एडीजी लॉ एंड आर्डर को लखनऊ में पोस्टमार्टम और एफएसएल की रिपोर्ट को देकर लगा दिया गया। जो सारे चैनलों पर बलात्कार को फर्जी बताने लगे। उसी के साथ डीएम को पीड़िता के घर में बैठा दिया गया। जो परिजनों से यह कहते हुए पाए गए कि आज मीडिया है कल यहां नहीं रहेगा। और अंत में जब उसके बाद भी बात नहीं माने पीड़िता के परिजन तो डीएम ने लात तक मारा। इसके साथ ही शुरू हो गया था मीडिया मैनेजमेंट का खेल। सूचना विभाग को अवनीश अवस्थी से लेकर तत्काल नवनीत सहगल को दे दिया गया। जिन्हें मीडिया मैनेजमेंट का सूबे में गुरू माना जाता है और अपने इसी ‘कौशल’ के चलते वह हर सरकार के लिए अपरिहार्य हो जाते हैं।

अभी तक योगी सरकार उन्हें दरकिनार किए हुए थी। लेकिन अब खाईं से निकलने का कोई रास्ता सूझता न देख नवनीत सहगल को रस्सी बनाया गया है। आते ही उन्होंने अपना हुनर दिखाया और पता चला कि इंडिया टुडे की वह वायरल क्लिप उसके ट्विटर हैंडल से गायब हो गयी जिसमें उसने मौत से पहले पीड़िता के उस बयान को रिकार्ड किया था जिसमें उसने अपने साथ हुए गैंगरेप की बात को स्वीकारी थी। और शाम तक सत्ता प्रतिष्ठान की तरफ से इस तरह की खबरें आने लगीं थीं कि जिसने भी इस जातीय भेदभाव और वैमनस्य को बढ़ाने की कोशिश की है उसके खिलाफ सख्त से सख्त कार्रवाई होगी।

दरअसल योगी और कमोबेश मोदी शासन का यही मोडस आपरेंडी रहा है। वह लखनऊ के पुराने इलाके में हुई हिंसा रही हो या फिर मेरठ से लेकर बिजनौर तक जगह-जगह होने वाले सीएए विरोधी आंदोलन। सभी में पीड़ितों को ही आरोपी बनाकर पेश कर दिया गया और उनसे वसूली की गयी। इसी तरह से देश के पैमाने पर दिल्ली दंगा हो या फिर भीमा कोरेगांव का मामला पीड़ितों और उनके समर्थकों को ही आरोपी बनाकर पेश किया जा रहा है। एक बार फिर यहां इसी तरह की कोशिश हो रही है। अब देखने की बात होगी की योगी सरकार उसमें कितनी सफल होती है और उसको नाकाम करने में जनमत का दबाव कितना काम कर पाता है।

बहरहाल हाथरस मामले में मीडिया का बिल्कुल नया रूप सामने आया है। इसको लेकर तमाम लोग अचरज में हैं। यह कितना प्रायोजित है और कितना स्वाभाविक किसी की समझ में नहीं आ रहा है। किसी केंचुए में अचानक रीढ़ निकल आएगी इस पर कोई मूर्ख ही भरोसा कर सकता है। कल तक जो हुकुम का गुलाम था आज वह एकाएक आंख दिखाने लगेगा क्या यह बात संभव है? ऐसी स्थिति में जबकि शीर्ष निजाम से लेकर जमीन तक अभी कोई अहम बदलाव नहीं आया है। ऐसे में कुछ लोग इसे केंद्र और राज्य के बीच अंतरविरोध का नतीजा भी मान रहे हैं। लेकिन मीडिया की पहल कितनी सच है और कितनी प्रायोजित यह सरकार से जुड़े किसी दूसरे मुद्दे पर लिए गए उसके रुख से पता चल जाएगा। 

(महेंद्र मिश्र जनचौक के संपादक हैं।)

This post was last modified on October 3, 2020 11:37 am

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