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जब सरदार पटेल को हुआ था प्लेग

सरदार वल्लभभाई पटेल को यूं ही नहीं लौह पुरुष कहा जाता। आज जब पूरी दुनिया कोरोना महामारी की चपेट में है तो उनके जीवन के दो प्रसंग आंखों के सामने कौंध जाते हैं जब उन्होंने प्लेग जैसी महामारी का सामना किया था। एक बार तो उन्हें स्वयं प्लेग हुआ था और वे उससे लड़ते हुए ठीक हो गए थे और दोबारा जब उनके इलाके में महामारी फैली तो वे अपनी सेहत की चिंता किए बिना बहादुरी से लोगों की खोज खबर लेने के लिए बीमारी वाले इलाके में टहलते रहे।

वल्लभभाई ने गोधरा में नई-नई प्रैक्टिस शुरू की थी और नौ साल के विवाह के बाद पहली बार झावेरबा उनके साथ रहने गई थीं। उस समय वल्लभभाई 25 साल के और झावेरबा 20 साल की थीं। गोधरा में बसने के कुछ ही महीने के बाद वहां प्लेग फैल गया। वल्लभभाई ने इस बारे में अपने बड़े भाई नरसीभाई को 16 मार्च 1901 को पत्र लिखा, “आदरणीय नरसीभाई, यहां प्लेग तेजी से फैल रहा है। हर दिन दस मरीज निकल रहे हैं और बड़ी तादाद में चूहे मर रहे हैं। अदालत में काम बंद हो गया है और अगले दो तीन महीने तक शुरू होने की कोई उम्मीद नहीं है।

इस समय जो कुछ घर में है मैं उसी पर गुजारा कर रहा हूं। लेकिन उसके लिए आप परेशान न हों। रात दिन मैं सोचता रहता हूं कि आपकी मदद कैसे करूं। पर मैं लाचार हूं। लेकिन स्थिति जैसे ही सुधरती है आप मुझ पर भरोसा कर सकते हैं। अगर प्लेग ज्यादा फैलता है तो मैं काशीभाई (छोटे भाई) को करमसाड भेज दूंगा। वहां से अच्छी खबरें भेजते रहिए। पूज्य पिता की याद आती है। अगर मेरे लायक कोई सेवा हो तो बताएं। आपका आज्ञाकारी- वल्लभभाई।’’ (पटेल अ लाइफः—राजमोहन गांधी, पृष्ठ, 15-16)।

जैसी आशंका थी प्लेग बढ़ गया। वल्लभभाई के एक मित्र रामजीभाई उसके शिकार हो गए। रामजीभाई अविवाहित थे। वल्लभभाई उनके घर में रह कर उनकी सेवा करने लगे। लेकिन कोई फायदा नहीं हुआ। रामजीभाई चल बसे। वल्लभभाई जब उनका अंतिम संस्कार करके लौटे तो देखा कि उन्हें भी प्लेग के लक्षण आ गए। कल्पना की जा सकती है कि उस समय उनके मन में कितने डरावने विचार आए होंगे लेकिन उन्होंने धैर्य और साहस का परिचय दिया। व्यवहारिक तरीका अपनाया। उन्होंने पहला काम तो यह किया कि अपनी पत्नी झावेरबा को करमसाड भेज दिया। शायद काशीभाई के साथ भेजा था। झावेरबा जाना नहीं चाहती थीं। स्वाभाविक है कोई पत्नी पति को छोड़ कर कैसे जाना चाहेगी लेकिन वल्लभभाई ने उन्हें समझा बुझा कर भेज दिया।

इसके बाद वल्लभभाई गोधरा से नादियाड चले गए। प्रकृति की कृपा और अपने साहस से वे ठीक हो गए। कुछ लोगों का कहना है कि नादियाड में वे एक खंडहर हो चुके मंदिर में अकेले रहे। जब प्लेग उतर गया और वे ठीक हो गए तो फिर गोधरा लौटे। वहां फिर उनके साथ झावेरबा आईं। इस शहर में उन्होंने फौजदारी की जमकर वकालत की और खूब तरक्की की।

पटेल ने प्लेग से दूसरा मुकाबला सन् 1917 में किया। तब गांधी से उनकी मुलाकात हो चुकी थी और उन पर गांधी का जादू छाने लगा था। साल का अंत होने वाला था कि अहमदाबाद में प्लेग का प्रकोप हो गया। अदालतें और स्कूल बंद हो गए थे। बहुत लोगों ने शहर छोड़ दिया था। लेकिन वल्लभभाई ने भद्रा स्थित अपना आवास नहीं छोड़ा था। उन्होंने कहा कि अपनी सुरक्षा के लिए वे यह जगह छोड़कर नहीं जाएंगे। सरदार के साहस का वर्णन मावलंकर ने किया हैः—

जब शहर में प्लेग फैला हो तो उसकी गलियों में पूरी निर्भीकता के साथ वल्लभभाई को घूमते हुए देखा जा सकता था। वे सीवर की सफाई और इलाके को संक्रमण रहित करने के लिए दवाओं के छिड़काव पर जोर दे रहे थे। जब दोस्तों ने उन्हें टोका तो उन्होंने उनकी ओर सिर्फ खामोशी से निहारा। उनका निहारना शब्दों से कहीं ज्यादा भारी था। लगता था कि वे कह रहे हैं—जब मैंने नगर की सफाई समिति के अध्यक्ष की जिम्मेदारी ली है तो मैं निजी सुरक्षा की चिंता कैसे कर सकता हूं। अगर मैं अपनी जिम्मेदारी से मुंह मोड़ूंगा तो जनता से विश्वासघात करूंगा। इसके अलावा कैसे मैं रखरखाव विभाग के कर्मचारियों को प्लेग के सहारे छोड़कर अपनी सुरक्षा करने लगूं।

इस बीच, अकाल भी पड़ा था और प्रथम विश्वयुद्ध के कारण महंगाई बढ़ गई थी। मिट्टी के तेल, कपड़े, लोहे के सामान और नमक सभी की कीमतें तेज हो चली थीं। वल्लभभाई हिम्मत हारने वाले नहीं थे बल्कि साथियों को हिम्मत बंधाने वाले थे और उनके संघर्ष में खड़े होने वाले थे। किसान लगान कम करने की मांग कर रहे थे लेकिन सरकार तैयार नहीं हुई।

अहमदाबाद में 1917-18 में प्लेग से 18,067 मौतें हो चुकी थीं। बीमारी से बचने के लिए खेड़ा के तमाम किसानों ने जाड़े की रातें अपने घरों से बाहर खेतों में झोपड़ियां बनाकर बिताईं। इसी प्रक्रिया में सरदार उनके साथ होते गए और बाद में खेड़ा सत्याग्रह की शुरुआत की। जिसने उन्हें सरदार का ओहदा दिलाया।

आज जब कोरोना महामारी ने हमें ही नहीं पूरी दुनिया को जकड़ लिया है तो देखने लायक है कि सरदार के आदर्शों की बात करने वाले कितने राजनेता अपने जीवन की बाजी लगाकर जनता के साथ खड़े हैं। इस संकट के समय इतिहास की उस घड़ी से बहुत सारी हिम्मत निकलती है और ढेर सारे सवाल भी निकलते हैं जो अपने रहनुमाओं से पूछे जाने चाहिए।

(अरुण कुमार त्रिपाठी वरिष्ठ पत्रकार हैं और आजकल दिल्ली में रहते हैं।)

This post was last modified on April 26, 2020 8:36 pm

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