Sunday, May 22, 2022

आखिर कहां गायब हो गए 19 लाख ईवीएम

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देश में चुनावों में इस्तेमाल होने वाली करीब 19 लाख ईवीएम (इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग मशीन) गायब हैं। यह खुलासा कर्नाटक के वरिष्ठ कांग्रेस नेता और विधायक एच. के. पाटिल ने किया है। उन्होंने कर्नाटक विधानसभा के स्पीकर विश्वेशवर हेगड़े कागेरी से रविवार को मुलाकात कर सुप्रीम कोर्ट के जज से इस मामले की स्वतंत्र जांच की मांग की है। एच. के. पाटिल ने स्पीकर को 2,750 पन्नों का दस्तावेज भी सौंपा है जिसमें आरटीआई के जरिए चुनाव आयोग, ईवीएम बनाने वाली कंपनियों से हासिल किए गए जवाब शामिल हैं। इन दस्तावेज से सामने आया है कि ईवीएम बनाने वाली कंपनियों ने जितनी मशीनें बनाकर चुनाव आयोग को सौंपी थीं उनमें से करीब 19 लाख मशीनों का कोई अता-पता नहीं है। इस मामले में कोर्ट का भी दरवाजा खटखटाया जा चुका है।

स्पीकर से मुलाकात करने के बाद एच. के. पाटिल ने रविवार को ही बेंगलुरु में प्रेस कांफ्रेंस भी की। उन्होंने कहा, “केंद्र सरकार को इस मामले में सुप्रीम कोर्ट के मौजूदा जज से स्वतंत्र और निष्पक्ष जांच करानी चाहिए और चुनाव आयोग को सम्मन जारी होना चाहिए कि वे कर्नाटक विधानसभा के सामने पेश होकर मामले में स्पष्टीकरण दे।”

पाटिल ने सभी दस्तावेज मीडिया को भी रिलीज किए। इन दस्तावेज से पता चलता है कि चुनाव आयोग ने स्वीकार किया है कि बीते 15 साल के दौरान भारत इलेक्ट्रॉनिक्स लिमिटेड (बीईएल) द्वारा राज्यों को भेजी गई 9,64,270 मशीनें वापस नहीं मिली हैं। इसी तरह आयोग ने यह भी माना है कि इलेक्ट्रॉनिक कार्पोरेशन ऑफ इंडिया (ईसीआईएल) द्वारा सप्लाई की गई 9,29,992 ईवीएम भी उसके पास वापस नहीं आई हैं। इसके अलावा बीईएल ने यह भी दावा किया है कि उसने 2014-15 के दौरान 62,183 मशीनें सप्लाई की थीं, उनका भी कोई अता-पता नहीं है।

एच. के. पाटिल ने यह मुद्दा मार्च 2022 में विधानसभा में उठाया था कि बीते वर्षों में 19 लाख ईवीएम गायब हो गई हैं। विधानसभा स्पीकर ने एच. के. पाटिल को आश्वासन दिया है कि वे इस मामले में चुनाव आयोग से स्पष्टीकरण मांगेंगे, लेकिन उन्होंने पाटिल से इन दावों को लेकर दस्तावेज पेश करने को कहा था, जो रविवार को पाटिल ने स्पीकर को सौंप दिए।

विधानसभा में बहस के दौरान पाटिल ने बीईएल द्वारा दिए गए आरटीआई जवाबों का जिक्र किया था कि बीईएल द्वारा निर्मित 9,64,270 मशीनें गायब हैं और वापस नहीं आई हैं। इसी तरह ईसीआईएन ने भी कहा था कि 9,29,992 ईवीएम मशीनें गायब हैं।

एच. के. पाटिल ने प्रेस कांफ्रेंस में कहा, “ईवीएम मशीनों को एक जगह से दूसरी जगह भेजे जाने और पुरानी व बेकार हो चुकी मशीनों को नष्ट करने की प्रक्रिया में काफी खामियां हैं। अविश्वसनीय प्रक्रिया और इस मामले में स्पष्ट जवाबदेही न होने के कारण पूरी चुनावी प्रक्रिया पर सवालिया निशान लगता है।” उन्होंने कहा कि एक ऐसी संस्था जो कि देश में स्वतंत्र और निष्पक्ष चुनाव के लिए जिम्मेदार है उसे यह तय करने में कि 1989-90 बैच की मशीनों का क्या किया जाए इस बारे में एक्सपर्ट कमेटी बनाने की सिफारिश करने में 12 साल का लंबा वक्त लग गया।”

पाटिल ने दावा किया कि आरटीआई का जवाब देने के लिए नियमों को अपनी मर्जी से तोड़-मरोड़ कर सामने रखा गया है कि बेकार और पुरानी हो चुकी मशीनों को नष्ट कर दिया गया होगा। ईवीएम बनाने वाली कंपनियों ने चुनाव आयोग को साफ दिशा-निर्देश दिए हुए हैं कि मशीने 15 साल तक चल सकती हैं और इसके बाद इन मशीनों का इस्तेमाल चुनावों में न किया जाए और उन्हें नष्ट कर दिया जाए।

एक तरफ तो चुनाव आयोग ने एक्सपर्ट पैनल की सिफारिशों पर अमल नहीं किया, लेकिन अचानक जुलाई 2018 में इस बारे में नियम बना दिए गए। इसका खुलासा भी आरटीआई के जवाबों से हुआ है। चुनाव आयोग कहता है कि उसने 1989 बैच की मशीनों को नष्ट करने की प्रक्रिया शुरु कर दी है। पाटिल ने इसी पर सवाल पूछा कि, “ऐसे में सवाल है कि 1989 में क्या नियम थे और 2006 से पहले तक क्या नियम अपनाए जा रहे थे क्योंकि नए नियम तो 2018 में बने हैं।”

इससे भी ज्यादा हैरानी की बात यह है कि 2021 में प्रकाशित आयोग के मैन्युअल में इस विषय पर कोई चैप्टर ही नहीं है कि ईवीएम को नष्ट करने की क्या प्रक्रिया अपनाई जा रही है। इसके बजाए मैन्युअल में ‘लॉस्ट एंड फाउंड’ यानी खोया-पाया नाम से एक अध्याय जोड़ा गया है जिससे साफ होता है कि ईवीएम गायब हुई हैं।

गौरतलब है कि चुनाव हो गए, मोदी सरकार बन गई और मंत्रियों ने पदभार भी संभाल लिया है, लेकिन ईवीएम में हुई गड़बड़ियों की ख़बरें बेहद चिंताजनक हैं। अंग्रेज़ी वेबसाइट ‘द क्विंट’ ने ख़बर दी है कि ईवीएम में जितने वोट पाए गए, वे कुल मतदाताओं की संख्या से मेल नहीं खाते। ईवीएम में जितने वोट पाए गए, उसी बूथ पर उससे कम मतदाता थे। ऐसा एक नहीं 373 सीटों पर हुआ। यहाँ मतदान पहले के चार चरणों में हुए थे। दिलचस्प बात यह है कि ये दोनों ही आँकड़े चुनाव आयोग की वेबसाइट पर डाले गए थे, हालाँकि बाद में आयोग ने ये आँकड़े हटा भी लिए।

-‘द क्विंट’ की ख़बर के मुताबिक़, तमिलनाडु के कांचीपुरम संसदीय सीट पर 12,14,086 वोट डाले गए, लेकिन ईवीएम के अनुसार 12,32,417 वोटोंं की गिनती की गई। यानी, 18,331 अतिरिक्त वोट गिने गए। यह कैसे हुआ, इसका कोई जवाब चुनाव आयोग के पास नहीं है।

-इसी राज्य की धर्मपुरी सीट पर 11,94,440 वोट डाले गए, लेकिन गिनने पर वहाँ 12,12,311 वोट पाए गए, यानी 17,871 वोट अधिक थे।

-तमिलनाडु के ही श्री पेरेम्बुदुर सीट पर 13,88,666 वोट डाले गए थे, लेकिन ईवीएम से 14,03,178 वोटों की गिनती हुई।

-इसी तरह उत्तर प्रदेश के मथुरा में 10,88,206 वोट डाले गए थे, जबकि 10,98,112 वोट गिने गए, यानी 9,906 अतिरिक्त वोट गिने गए।

(वरिष्ठ पत्रकार जेपी सिंह की रिपोर्ट।)

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