Tuesday, October 26, 2021

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किस गलती की सज़ा जस्टिस रविशंकर को सुप्रीमकोर्ट कोलेजियम ने दी?

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उच्चतम न्यायालय कोलेजियम द्वारा सुप्रीम कोर्ट जजों के लिए नौ नामों की सिफारिशों ने एक बार फिर इस प्रणाली की सार्थकता पर गम्भीर सवाल खड़ा कर दिया है। इनमें लोकतंत्र का आभाव दिखता है और ऐसा लगता है जैसे आधे जज हमारे आधे तुम्हारे का अनुपालन हुआ है। इस सूची में देश में दूसरे नम्बर के वरिष्ठ जज त्रिपुरा के चीफ जस्टिस अकील कुरैशी का नाम नहीं है क्योंकि उन्होंने गुजरात हाईकोर्ट के जज रहते हुए वर्तमान गृहमंत्री अमित शाह को शोहराबुद्दीन शेख फेक एनकाउंटर में जेल भेज दिया था लेकिन मध्य प्रदेश से जज रवि शंकर झा जो इस समय पंजाब एंड हरियाणा हाईकोर्ट के चीफ जस्टिस हैं को बाहर कर दिया गया और उनसे जूनियर जितेन्द्र माहेश्वरी जो सिक्किम हाईकोर्ट के चीफ जस्टिस हैं के नाम की सिफारिश कर दी गयी। अब इतनी गोपनीयता है कि सिवाय अटकलें लगाने के कोई आधिकारिक स्पष्टीकरण नहीं उपलब्ध है।   

दरअसल कोलेजियम प्रणाली पर इसके पहले इंडियन एक्सप्रेस में प्रकाशित एक रिपोर्ट में कहा गया था कि इसमें सर्वसम्मति से किसी नाम को चयनित किया जाता है। यदि एक भी जज किसी नाम पर सहमत नहीं होता तो उसका नाम कट जाता है। दूसरे शब्दों में कहा जाए तो इसमें भी सरकार के दबाव से इतर व्यक्तिगत आग्रहों दुराग्रहों की बड़ी भूमिका होती है। अब रवि शंकर झा और जस्टिस अकील कुरैशी के नाम पर किनकी असहमति रही यह आधिकारिक रूप से कभी पता नहीं चलेगा।

दरअसल मार्च 2019 से कोलेजियम का हिस्सा रहे जस्टिस नरीमन कोलेजियम की इन सिफारिशों से सहमत नहीं थे। उनका मानना था कि ऑल इंडिया सीनियॉरिटी लिस्ट में दो वरिष्ठतम जजों के नाम की सिफारिश जब तक नहीं होती, कोलेजियम नामों पर एकमत नहीं होगा। कर्नाटक हाई कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश अभय श्रीनिवास ओका भारत के सभी हाई कोर्ट्स में वरिष्ठतम जज हैं। इनके बाद नाम आता है त्रिपुरा हाई कोर्ट के चीफ जस्टिस अकील कुरैशी का। जस्टिस नरीमन के रिटायर होने के बाद हुई कोलेजियम की सिफारिश में जस्टिस ओका का नाम है, लेकिन जस्टिस अकील कुरैशी का नहीं है।

इस सूची में तीनों महिला जज हैं- कर्नाटक हाई कोर्ट से जस्टिस बीवी नागरत्ना, तेलंगाना हाई कोर्ट की मुख्य न्यायाधीश जस्टिस हिमा कोहली और गुजरात हाईकोर्ट से जस्टिस बेला त्रिवेदी, इनमें से जस्टिस बीवी नागरत्ना आगे चलकर 2027 में देश की पहली महिला मुख्य न्यायाधीश हो सकती हैं। इन तीन जजों के अलावा, बाकी के छह नाम ये हैं कर्नाटक हाईकोर्ट के मुख्य न्यायाधीश अभय श्रीनिवास ओका। गुजरात हाईकोर्ट के मुख्य न्यायाधीश विक्रम नाथ। सिक्किम हाईकोर्ट के मुख्य न्यायाधीश जितेंद्र कुमार माहेश्वरी। केरल हाईकोर्ट से जस्टिस सीटी रवि कुमार। केरल हाईकोर्ट से एमएम सुंदरेश। वरिष्ठ वकील और पूर्व एडिशनल सॉलिसीटर जनरल पीएस नरसिम्हा। ये रामजन्मभूमि-बाबरी मस्जिद विवाद में राम लला विराजमान के वकील थे।

सुप्रीम कोर्ट में 34 जज हो सकते हैं। लेकिन पूर्व मुख्य न्यायाधीश रंजन गोगोई के नवंबर 2019 में रिटायर होने के बाद से सुप्रीम कोर्ट को कोई नया जज नहीं मिला है। 12 अगस्त को जस्टिस रोहिंटन फाली नरीमन रिटायर हुए। बुधवार 18 अगस्त को जस्टिस नवीन सिन्हा भी रिटायर हो गए। अब सुप्रीम कोर्ट में सिर्फ 24 जज सुनवाई के लिए मौजूद होंगे। अगर कोलेजियम की ये सिफारिशें मान ली जाती हैं, तो सुप्रीम कोर्ट में 33 जज हो जाएंगे।

फिलहाल कोलेजियम में सुप्रीम कोर्ट के पांच वरिष्ठतम जज हैं, चीफ जस्टिस एनवी रमना, जस्टिस यूयू ललित, जस्टिस एएम खानविलकर, जस्टिस डीवाई चंद्रचूड़ तथा जस्टिस एल नागेश्वर राव।

देशभर के समाचार संस्थानों ने सूत्रों के हवाले से खबर चलाई। कहा गया कि भारत के मुख्य न्यायाधीश जस्टिस एनवी रमना की अध्यक्षता वाले सुप्रीम कोर्ट के कोलेजियम ने 9 जजों के नाम की सिफारिश की है। हालांकि सीजेआई एनवी रमना ने इसे ‘अटकलबाजी’ करार देकर नाराजगी जाहिर की है। उन्होंने कहा है कि कोलेजियम के जरिये जजों की नियुक्ति की प्रक्रिया लंबित है, लेकिन मीडिया ने पहले ही कह दिया कि कोलेजियम ने 9 नामों को मंजूरी दे दी है। हालांकि अब सुप्रीम कोर्ट ने उन्हीं 9 जजों की सूची जारी की है, जिन्हें लेकर मीडिया में रिपोर्टें आई थीं।

इन सारी खबरों के सामने आने और चर्चा छिड़ने के बाद मुख्य न्यायाधीश एनवी रमना ने कहा कि कोलेजियम के नामों को अंतिम स्वीकृति मिलने से पहले हुए कयासबाज़ी से उन्हें पीड़ा पहुंची है। उनका कहना है कि इसका उलटा असर हो सकता है। जजों के करियर पर असर पड़ सकता है।

इसके पहले 9 अगस्त को सुप्रीम कोर्ट ने इस बात पर नाराज़गी जताई थी कि सरकार कोलेजियम की सिफारिशों पर महीनों और सालों तक फैसला नहीं लेती। और इसके चलते गंभीर मामलों की सुनावाई में विलंब होता है। जस्टिस किशन कौल और जस्टिस ऋषिकेश रॉय की पीठ ने दिल्ली उच्च न्यायालय का उदाहरण देते हुए कहा था कि दिल्ली हाई कोर्ट में स्वीकृत क्षमता के आधे से भी कम जज बचे हैं – माने 60 में से 29। सरकार कोलेजियम की सिफारिशों पर अमल करने में समय का ध्यान नहीं रख रही है।

मार्च 2021 में भी इसी तरह की खबरें आई थीं जब सुप्रीम कोर्ट को सरकार से कोलेजियम की 55 सिफारिशों पर फैसला लेने को कहना पड़ा था। अप्रैल 2021 में सुप्रीम कोर्ट ने कलकत्ता, जम्मू-कश्मीर और दिल्ली उच्च न्यायालों से संबंधित 10 सिफारिशों के संबंध में सवाल किया, तो अटॉर्नी जनरल केके वेणुगोपाल ने कहा कि सरकार को इनके लिए 3 महीने का वक्त चाहिए होगा। ये सिफारिशें तब 6 महीने से लंबित थीं। तब अदालत ने कहा था कि सुप्रीम कोर्ट और हाईकोर्ट द्वारा की गई सिफारिशों पर अमल के लिए सरकार को एक टाइमलाइन बना लेनी चाहिए।

अब ये देर होती कैसे है, इसे समझें। जब हाईकोर्ट का कोलेजियम अपनी सिफारिश भेजता है, तो केंद्रीय कानून मंत्रालय, खुफिया विभाग और दूसरी एजेंसियों के मार्फत एक बैकग्राउंड चेक करते हैं। इसके बाद ये नाम सुप्रीम कोर्ट के पास जाते हैं। सुप्रीम कोर्ट इन नामों को केंद्र के पास भेजता है, जो इन पर मुहर लगाता है। सुप्रीम कोर्ट के मामले में कोलेजियम की सिफारिशों के बाद भी इसी तरह की प्रक्रिया का पालन किया जाता है।

कभी कभी सरकार सुप्रीम कोर्ट की सिफारिशों को लौटा भी देती है। जैसे इसी अगस्त के महीने में सरकार ने जम्मू कश्मीर की वरिष्ठ वकील मोक्षा खजूरिया काज़मी का नाम पुनर्विचार के लिए वापस भेजा। लेकिन इसके लिए कोई कारण नहीं दिया। सुप्रीम कोर्ट ने इनका नाम जम्मू कश्मीर उच्च न्यायालय के लिए भेजा था। इस खबर ने सुर्खियां बनाई थी क्योंकि 2 सालों में ये चौथी बार था, जब सरकार ने जम्मू कश्मीर के लिए भेजे किसी नाम को अस्वीकार किया था। काज़मी का नाम अक्टूबर 2019 में चीफ जस्टिस रंजन गोगोई की अध्यक्षता वाले कोलेजियम ने भेजा था। काज़मी के बाद भेजे तीन दूसरे नामों की नियुक्ति हाई कोर्ट में हो चुकी है।

कोलेजियम में जस्टिस अकील कुरैशी और जस्टिस ओका की सुप्रीम कोर्ट में नियुक्ति को लेकर सहमति काफी पहले नहीं बन पा रही है। हालांकि, यह पहली बार नहीं है कि जब कुरैशी के नाम को लेकर बात तय होने में मुश्किलें आ रहीं हैं। गुजरात हाईकोर्ट के जज रहे जस्टिस कुरैशी की त्रिपुरा के मुख्य न्यायाधीश के तौर पर नियुक्ति के दौरान भी सुप्रीम कोर्ट कोलेजियम के लिए विवाद की स्थिति बनी थी, पहले उन्हें मध्य प्रदेश हाईकोर्ट के लिए मुख्य न्यायाधीश बनाया गया था लेकिन सरकार की आपत्तियों के बाद उन्हें त्रिपुरा भेजा गया। तब कोलेजियम का नेतृत्व पूर्व सीजेआई रंजन गोगोई कर रहे थे।जस्टिस बोबडे के कार्यकाल में भी इस पर सहमति नहीं बनी।

उच्चतम न्यायालय के वरिष्ठ अधिवक्ता दुष्यंत दवे ने आउटलुक से बातचीत में कहा था कि इसमें अब शक की गुंजाइश भी नहीं बची कि कॉलेजियम सिस्टम कोलैप्स कर गया है। सरकार जिस भी जज को चाहती है, कॉलेजियम पर दबाव डालकर फौरन उसका नाम रेकमेंड करवा लेती है और अगले ही दिन राष्ट्रपति की मंजूरी मिल जाती है। राजस्थान हाइकोर्ट के मुख्य न्यायाधीश प्रदीप नंद्राजोग और दिल्ली हाइकोर्ट के मुख्य न्यायाधीश राजेंद्र मेनन बेहद ईमानदार और निष्पक्ष जज थे । दोनों का नाम जब कॉलेजियम से रेकमेंड हुआ तो मेरे ख्याल से जानबूझकर फाइल उस दिन नहीं भेजी गई। जब तक न्यायाधीश मदन बी लोकुर रिटायर नहीं हुए, उसे दबाकर रखा गया। उसके बाद लीक होने और नई सूचनाओं के बहाने उनके नाम वापस ले लिए गए। ऐसी बात है तो दो अहम हाइकोर्ट में उन्हें चीफ जस्टिस क्यों बनाए रखा गया था। लेकिन कॉलेजियम जानता है कि कोई सबूत नहीं था। राजनैतिक दबाव में कॉलेजियम व्यवस्था ध्वस्त हो गई है। कॉलेजियम और स्वतंत्र जजों पर पहला हमला जस्टिस जयंत पटेल का कर्नाटक से ट्रांसफर था। दूसरा हमला जस्टिस अकील कुरैशी को गुजरात से बॉम्बे ट्रांसफर करना था। तीसरा हमला दो जजों के नामों की दुर्भाग्यपूर्ण वापसी थी। इसके लिए चीफ जस्टिस और कॉलेजियम के सभी जज जिम्मेदार हैं। उन्हें देश को जवाब देना चाहिए।

(वरिष्ठ पत्रकार जेपी सिंह की रिपोर्ट।)

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