जातिगणना पर हायतौबा क्यों?

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जातिगणना की मांग जोर पकड़ने लगी है। पक्ष और विपक्ष में दावे अपनी जगह हैं और जनगणना जैसी जरूरी और वैज्ञानिक प्रक्रिया से समाजिक संदर्भों का अध्ययन, अपनी जगह है। ब्रिटिश औपनिवेशिक सत्ता द्वारा संग्रहीत गजेटियर आज भी भारत को समझने के मूल दस्तावेज हैं और शोधार्थियों के काम आते हैं। उन गजेटियरों के संग्रह में जनगणना का महत्वपूर्ण योगदान है जिनमें जातिगणना शामिल है। यूरोपीय ज्ञान-विज्ञान से लैश औपनिवेशिक सत्ता द्वारा भारतीय भू-भाग पर कुछ जरूरी काम किए गए। भले ही उनका तत्कालीन उद्देश्य, अपनी सत्ता को मजबूत करना रहा।

सत्ता को जन पक्षधर बनाने में जनगणनाएं सहायक रही हैं, यह दुनिया का प्रमाणित तथ्य है। इसलिए 1865 से 1872 के बीच अंग्रेजों ने भारत में पहली जनगणना कराई और तत्कालीन समय की जनसंख्या, विभिन्न धर्मों और मतावलम्बियों आदि के बारे में आंकड़े इकट्ठा किए। तब से लेकर 1941 तक, ब्रिटिश औपनिवेशिक सत्ता ने जनगणना का कार्य प्रति दस वर्ष पर जारी रखा। 1931 की जनगणना में पहली बार जाति संबंधी सूचना का समावेश किया गया। 1941 की जनगणना में भी जातिगणना को शामिल किया गया मगर दूसरे विश्वयुद्ध के कारण आंकड़े संकलित नहीं हो पाए और न जातियों के आंकड़े प्रकाशित हुए। देश आजाद होने के बाद, 1951 में जब जनगणना हुई तब जातिगणना को स्थगित कर, सरकार ने जातिगत आंकड़ों से खुद को वंचित कर लिया। यही प्रक्रिया 2011 तक जारी रही यद्यपि अनुसूचित जाति-जनजाति के आंकड़े इकट्ठे किए जाते रहे। इस बीच सरकार ने दूसरे कई ऐसे निर्णय लिए, जिनके लिए जातिगणना सहायक सिद्ध होती। जैसे कि 1953 में काका कालेकर आयोग को काम सौंपा कि ‘वह कौन सा परीक्षण होगा जिसके द्वारा किसी वर्ग या समूह को पिछड़ा (ओबीसी) कहा जाए। उनकी दिक्कतें और स्थिति सुधारने के उपाय बताएं।’ जातिगत आंकड़ों के अभाव में 1955 में काका कालेलकर रिपोर्ट को अस्पष्ट और अव्यवहारिक बताकर खारिज कर दिया गया।
 

जनता पार्टी सरकार ने 1979 में मंडल आयोग का गठन किया। जातिगत आंकड़ों के अभाव में मंडल आयोग ने 1931 की जनगणना के आंकड़ों का उपयोग किया और 1980 में रिपोर्ट दी। उसने जातियों के आधार पर कुल आबादी का 52 प्रतिशत, पिछड़े वर्ग की पहचान की।
सन 2010 में तत्कालीन यूपीए सरकार ने वादा करने के बाद भी जनगणना-2011 में जातियों की गणना नहीं की। जनगणना हो जाने के बाद ग्रामीण विकास मंत्रालय के मातहत एक सामाजिक आर्थिक सर्वे कराया गया, जिससे ओबीसी की संख्या का अंदाजा लगाया जा सके पर उस सर्वे के आंकड़े भी प्रकाशित नहीं किए गए।

2015 में वित्त मंत्री अरुण जेटली ने कहा था कि हम चाहते हैं कि जाति आधारित जनगणना के आंकड़े जल्द सार्वजनिक हों मगर ऐसा नहीं हुआ। सामाजिक संगठनों की मांगों को देखते हुए 2018 के उत्तरार्ध में भाजपा सरकार ने वादा किया कि आरक्षण और अन्य योजनाओं के मद्देनजर, 2021 की जनगणना में ओबीसी की गिनती कराई जायेगी लेकिन ओबीसी में हर जाति के लोगों की गिनती अलग-अलग नहीं होगी।
नीतीश कुमार की अगुवाई वाली एनडीए सरकार ने बिहार विधानसभा में फरवरी 2019 और फरवरी 2020 में जातिगणना का प्रस्ताव पारित कर केन्द्र को भेजा। महाराष्ट्र सरकार ने विधान सभा का विशेष अधिवेशन बुलाकर इस मांग का समर्थन किया। इस प्रकार 2021 की जनगणना में जातियों की गणना का जबरदस्त दबाव देखा जा रहा है। उधर बीजेपी का कहना है कि गणना करनी है तो गरीबों की हो। भाजपा विधायक हरिभूषण ठाकुर बचैल ने कहा कि जातिगत जनगणना से समाज में वैमनस्य फैलेगा।
स्वतंत्र भारत में जातिगणना का सिर्फ एक उदाहरण मिलता है। केरल में 1968 में ई.एम.एस. नंबूदिरीपाद की कम्युनिस्ट सरकार के द्वारा विभिन्न निचली जातियों के सामाजिक और आर्थिक पिछड़ेपन के आकलन के लिए जातिगणना की गयी थी। उस गणना को आधार बना कर आज केरल ने अनेक सामाजिक, आर्थिक सुधारों द्वारा राज्य को बेहतर किया है।

जातिगणना के पीछे ठोस तर्क यह है कि सुप्रीम कोर्ट कई बार कह चुका है कि आरक्षण के बारे में कोई भी फैसला आंकड़ों के बिना संभव नहीं। राज्यों को ओबीसी विकास के लिए दिया जाने वाला पैसा, ओबीसी आंकड़ों के अभाव में उस राज्य की कुल जनसंख्या के आधार पर दिया जाता है। संभव है कुछ पिछड़ी जातियां अगड़ी जातियों में शामिल होने योग्य हो चुकी हों या कुछ नई जातियों की स्थिति और खराब हो चुकी हो या कुछ सामान्य जातियां, पिछड़ी में शामिल हो चुकी हों। जातियों की गिनती न होने से हम यह पता नहीं कर पाते कि देश में विभिन्न जातियों के कितने लोग हैं और उनकी शैक्षणिक-आर्थिक स्थित कैसी है। उनके बीच संसाधनों का बंटवारा किस तरह का है और उनके लिए किस तरह की नीतियों की आवश्यकता है।

जातिगणना के समर्थकों का कहना है कि जाति गणना का प्रश्न समाजिक सन्दर्भों के अध्ययन और सामाजिक उन्नयन के लिए नीतियों के निर्धारण, दोनों के लिए बहुत जरूरी है। जो लोग जाति जनगणना के विरोध में झंडा बुलंद किए हैं, तर्क यह दे रहे कि इससे जातिवाद बढ़ेगा, यह मजाक के सिवा कुछ नहीं। गोया समाज में जातिवाद हो ही न? या वे जातिवाद के विरोधी हैं? जिस समाज में जातिदंश के यथार्थ के कारण ही फुले और अम्बेडकर ने सामाजिक आंदोलन शुरू किया, जहां जाति के आधार पर हैसियत, सम्पत्ति, ज्ञान और शक्ति का निर्धारण हुआ, वहां आप जाति गणना से परहेज करें, यह समझ से परे लगता है।

जातिदंश और जातिमुक्ति के लिए जरूरी है कि सभी जातियों को समानता का अधिकार मिले, संविधान की मूल आत्मा यही है। जातिगणना के बिना जाति असमानता का पता नहीं लगाया जा सकता। ऐसे में जाति समानता का प्रश्न अधूरा रह जायेगा। इसलिए कहा जा सकता है कि जातिगणना के विरोधी, जाति असमानता के पक्षधर हैं।
 समदर्शी समाज के लिए अगर हम जातियों को खत्म कर पाए तो जातिगणना का प्रश्न स्वतः खत्म हो जायेगा। वह दिन भारत की खुशहाली का होगा। तब तक जातिगणना का प्रश्न विवादरहित होना चाहिए।  

(सुभाष चन्द्र कुशवाहा इतिहासकार और साहित्यकार हैं। और आजकल लखनऊ में रहते हैं।)

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