Tuesday, March 5, 2024

ग्राउंड से चुनाव: छत्तीसगढ़ के नारायणपुर में क्या ईसाइयों का वोट सीपीआई को देगा मजबूती?

नारायणपुर। छत्तीसगढ़ का नारायणपुर जिला पिछले साल से ही राष्ट्रीय-अंतर्राष्ट्रीय मीडिया की सुर्खियों में बना हुआ है। अब चुनाव के दौरान भी नारायणपुर विधानसभा सीट खबरों में एक अलग जगह बना रही है। इसका मुख्य कारण है धर्मांतरण के नाम पर लगातार ईसाइयों पर होता अत्याचार।

इसी साल दो जनवरी को विश्व द्वीप्ति स्कूल में धर्मातरण का विरोध करते हुए तोड़-फोड़ की गई थी। इस दौरान तत्कालीन एसपी सदानंद का पत्थर लगने से सर फट गया था। आनन-फानन में उन्हें अस्पताल में भर्ती कराया गया और स्थिति को नियंत्रित किया गया।

चुनावी यात्रा के दौरान ‘जनचौक’ की टीम ने इस स्कूल का दौरा किया। इस स्कूल में जो चीजें तोड़ी गई थीं वो आज भी वैसी ही हैं। इस बारे में स्कूल के प्रिसिंपल से बात करने गए तो पता चला वो काम के लिए शहर से बाहर गए हैं। वाइस प्रिसिंपल का कहना था कि वह एक साल पहले ही नारायणपुर आई हैं। इसलिए उन्हें पिछली चीजों की जानकारी नहीं है।

विश्व द्वीप्ति स्कूल।

ईसाइयों में राजनीतिक पार्टियों को लेकर गुस्सा

ईसाइयों पर हुआ अत्याचार अब विधानसभा चुनाव का मुद्दा बना हुआ है, जिसके कारण नारायणपुर की सीट भी सुर्खियों में है। पिछले एक डेढ़ साल के दौरान जो कुछ ईसाई आदिवासियों के साथ हुआ, उसको लेकर एक समुदाय में गुस्सा तो बना ही हुआ है। जिसके कारण वह किसी दूसरी पार्टी को समर्थन देने का प्लॉन कर रहे हैं।

पिछले एक साल के अंदर बस्तर के अलग-अलग जगहों में ईसाइयों को विभिन्न तरह से प्रताड़ित किया गया है। जिसमें गांव में पीने वाला पानी न लेने देने से लेकर मृत्यु के बाद दफन न करने देना भी शामिल है। इस क्षेत्र में कई ऐसे परिवार हैं जिन्हें चर्च जाने कारण विभिन्न तरह से परेशान किया गया है। 

बेटी की शादी नहीं होने दी गई

बुदरी कुर्राम उनमें से एक हैं जिन्हें पिछले साल चर्च जाने के नाम पर मारा गया था। बुदरी का परिवार रेमावाट गांव में रहता है। पिछले साल की घटना को याद करते हुए वह कहती हैं कि पहले गांव में सभा हुई और उसके बाद चर्च जाने वाले लोगों के साथ मारपीट की गई। मुझे और मेरे पति को मारा गया। मेरे हाथ में चोट लग गई थी। उस वक्त ऐसी स्थिति थी कि बचना ही काफी था।

उन्होंने कहा कि हम लोग कुछ दिनों तक रिलीफ कैंप में रहे उसके बाद गांव चले गए। लेकिन स्थिति तब भी नहीं बदली। लोगों ने जैसा चाहा वैसे परेशान किया।

वह अपनी बेटी की मई में हुई शादी का जिक्र करते हुए उनकी आंखों में आंसू आ गए। वह कहती हैं कि “मैंने कभी नहीं सोचा था कि अपनी बेटी को बिना ब्याह के ही विदा कर दूंगी।”

मई के महीने के दिनों को याद करते हुए बुदरी बताती हैं कि “हमने अपनी बेटी की शादी कोकराझाड़ के ईसाई लड़के से तय की थी। शादी की सारी तैयारियां भी कर ली थी। जिस दिन मेरी बेटी की शादी थी गांव वाले गांव के एंट्री प्वांइट को बंद कर किसी को आऩे जाने नहीं दिया। वो लोग डंडा लेकर खड़े थे। ताकि बाहर का कोई आदमी न आए।

बुदरी कुर्राम।

वह कह रहे थे कि यहां कोई पास्टर नहीं आएगा न ही बारात आएगी। उन लोगों ने हमारे रिश्तेदारों को भी घर नहीं आने दिया। गांव के लोग पहरे लगाकर बैठे थे कि ईसाई रीति-रिवाज से शादी नहीं होने देंगे।

बारात को भी अंदर नहीं आने दिया गया। ऐसी स्थिति में पुलिस ने भी हमारा साथ नहीं दिया। हमने सबके लिए खाना भी बनवाया था। वह पूरा का पूरा बेकार हो गया।

अंत में जब कुछ नहीं करने दिया गया तो हमने अपनी बेटी का हाथ लड़के के हाथ में रखकर उसे विदा कर दिया। इस तरह हमारी बेटी बिना शादी के ही चली गई। उसकी कोई भी अधिकारिक शादी नहीं हुई है।”

मैंने पूछा कि क्या आप लोगों ने आदिवासी रीति-रिवाज का पालन किया था। तो बुदरी ने बताया कि “हमें कोई भी कार्यक्रम करने नहीं दिया जाता है। यहां तक कि हमारे संस्कृतिक काम भी नहीं।

हमारे साथ ऐसी स्थिति थी लेकिन इस दौरान किसी पार्टी के लोगों ने साथ नहीं दिया। हमें परेशान किया जा रहा था। लेकिन राजनीतिक पार्टियों को इससे कोई लेना देना नहीं था।”

सीपीआई को समर्थन

बुदरी कुर्राम ने कहा कि “फूलसिंह कचलाम ने हमारा साथ दिया। हमलोग तब उन्हें सिर्फ सामाजिक कार्यकर्ता के तौर पर जानते थे। आज वह चुनाव लड़ रहे हैं तो मेरा समर्थन तो उनको ही है।”

पहले चरण के लिए नामांकन के दिन सीपीआई के उम्मीदवार के साथ कई युवा भी थे। इसमें ज्यादातर ईसाई धर्म को अपना चुके हैं। इसमें से कुछ लोग ऐसे थे जिनकी दूसरी और तीसरी पीढ़ी चर्च जा रही है।

नारायणपुर के ज्यादातर गांव में आदिवासियों के बीच एक अंतर साफ नजर आता है। जहां आदिवासी ही आदिवासियों के खिलाफ हैं।

ईसाइयों पर पिछले कुछ समय से हो रहे प्रहार पर नारायणपुर के पास्टर जिनके चर्च के लोगों को मनरेगा में काम करने से रोका गया, इस विधानसभा चुनाव पर कावाराम मंडावी का कहना है कि “हमें पता नहीं चला आखिर हुआ क्या, अगस्त के महीने से छोटी-मोटी घटनाएं सुनने में आने लगीं। उसके बाद सितंबर के बाद तो स्थिति ऐसी हो गई कि लोगों को नारायणपुर के इनडोर स्टेडियम में रखा गया। यहां ईसाइयों के घरों को तोड़ दिया गया।”

ईसाइयों की स्थिति को बयां करते हुए वह कहते हैं कि “एक घर में शादी नहीं होने दी गई है, लेकिन सबसे बड़ी परेशानी लोगों को दफन नहीं करने देने की है। पूरे बस्तर में लोगों को ऐसे परेशान किया जा रहा है।”

ईसाइयों पर लगातार हो रहे अत्याचार पर उनका कहना है कि “कारण तो किसी को पता नहीं चल पाया लेकिन वोट के दौरान ईसाइयों के वोट में अंतर जरूर नजर आएगा क्योंकि जिस वक्त ईसाइयों को राजनीतिक पार्टियों को जरूरत थी किसी ने साथ नहीं दिया।

तीन बार भाजपा, एक बार कांग्रेस

नारायणपुर की सीट पर साल 2003 और 2013 में भाजपा की जीत हुई थी। छत्तीसगढ़ के पहले विधानसभा चुनाव के दौरान विक्रम उसेंडी और दूसरी बार केदार कश्यप ने जीत हासिल की। साल 2018 की कांग्रेस लहर के बीच 2300 वोटों के अंतर से चंदन कश्यप ने केदार कश्यप को हराया था। केदार कश्यप छत्तीसगढ़ के कद्दावर नेता बलिराम कश्यप के बेटे हैं।

ईसाई वोट से कोई जीत तो कोई हार सकता है

नारायणपुर सीट और धर्मातरण के मुद्दे पर राजनीतिक विश्लेषक सुरेश महापात्रा ने ‘जनचौक’ से बात करते हुए इसके पीछे के इतिहास के बारे कहा कि यह पूर्व कांग्रेसी नेता अरविंद नेताम द्वारा शुरू किया गया था। धीरे-धीरे यह मामला बढ़ता गया और बाद में भाजपा ने अपना मुख्य मुद्दा बना लिया। सर्व आदिवासी समाज द्वारा आदिवासियों को एकजुट करने की कोशिश की गई थी। जिसमें न हिंदू न ईसाई सिर्फ आदिवासी लोग थे।

नारायणपुर सीट में ईसाइयों के बीच एक रोष तो जरूर है। जिस तरह पिछले कई सालों से उन्हें प्रताड़ित किया गया और कफन दफन तक में दिक्कत की गई, उसका सीधा असर वोट में देखने को जरूर मिलेगा।

उनका कहना है कि हालांकि ईसाइयों की संख्या इतनी ज्यादा नहीं है कि वह किसी एक पार्टी को अकेले जीत दिला सकें। लेकिन इतना है कि अगर वोट किसी तीसरी पार्टी में शिफ्ट हो जाता है तो यह कांग्रेस को सीधा नुकसान होगा।

सीपीआई के मुद्दे पर बात करते हुए वो कहते हैं कि “पार्टी लगातार आदिवासियों के मुद्दे पर मुखर रही है। पेसा एक्ट और पांचवी सूची के लिए लगातार संघर्ष कर रही है। लेकिन जहां तक सीपीआई के वोट बैंक की बात है, वह इतना पर्याप्त नहीं है कि जीत हासिल की जा सके। लेकिन इसके वोट से कांग्रेस और भाजपा में से किसी एक को फायदा और एक को नुकसान होगा।

ईसाई युवा सबसे ज्यादा नाराज

धर्मातरण के मामले में प्रताड़ित किए गए ईसाई वोट करते वक्त इन बातों को ध्यान में रखने वाले हैं। कविता वढे इस बात को बहुत ही वजनदार आवाज के साथ कहती हैं।

कविता कोरेनड़ा गांव की रहने वाली हैं। उसे प्रताड़ित करने की तारीखें याद हैं। वह बताती हैं कि “23 अक्टूबर को रविवार था। प्रार्थना खत्म होने के बाद ही गांव के लोगों ने चर्च जाने वाले लोगों को पीटना शुरू कर दिया। मेरे घरवालों को भी मारा। मेरा पिता ने मुझे फोन करके इसकी जानकारी दी। इस दौरान किसी का पैर टूटा तो किसी का हाथ। आनन-फानन में मैंने एंबुलेंस बुलाई और घरवालों को अस्पताल लेकर गई।”

कराई गई घर वापसी

कविता कहती हैं कि “प्रताड़ित करने का सिलसिला अगले कुछ महीनों तक चला। लेकिन जनवरी की घटना के बाद प्रताड़ना कम हुई लेकिन बंद नहीं हुई। आज भी हमें परेशान किया जाता है।

उन्होंने कहा कि “इसी बीच गांव से यह फरमान निकाला गया कि जितने लोग चर्च जाएंगे उनको गांव से बाहर निकाल दिया जाएगा। ऐसा आदेश जारी कर लोगों की घर वापसी कराई गई। गांव के ही प्रतिष्ठित लोगों द्वारा चर्च जाने वाले लगभग 18 लोगों में से 15 लोगों की घर वापसी करा दी गी। अब सिर्फ मैं पापा और मेरी बहन ही प्रार्थना के लिए जाते हैं।”

वह कहती हैं कि “मेरा वोट इस बार सीपीआई को जाएगा।” मैंने पूछा कांग्रेस को क्यों नहीं? इसका सीधा सा जवाब था “जब हमें इनकी जरूरत थी तो कोई नहीं आया। ईसाइयों को मारा पीटा जा रहा था। हमारी सुध लेने के लिए नेताओं के पास टाइम नहीं था। ऐसे में हम लोग सिर्फ वोट देने के लिए तो नहीं हैं।”

कविता की तरह ही कई ईसाई इस बात को जहन में रखकर वोट करेंगे कि पिछले साल उनके साथ क्या हुआ था।

पिछले दिनों सीपीआई की जितनी भी रैलियां हुईं उसमें ज्यादातर ईसाई युवकों को देखा गया है।

कट रहा है कांग्रेस का वोट

नारायणपुर में त्रिकोणीय मुकाबले पर वरिष्ठ पत्रकार और राजनीतिक विश्लेषक शशांक तिवारी का कहना है कि “सीपीआई के फूलसिंह कचलाम के खड़े होने से कांग्रेस थोड़ा परेशान है क्योंकि ईसाइयों का वोट कांग्रेस को जाता रहा है। लेकिन इस बार फूलसिंह कचलाम के खड़े होने से वोट शिफ्ट हो रहा है। इसलिए कांग्रेस ने कई ईसाई मिशनरियों को नारायणपुर में प्रचार के लिए बुलाया है। 

यहां धुर्वीकरण ईसाई और हिंदूओं के लेकर है। इस कारण ईसाईयों का वोट दो से तीन जगह में शिफ्ट होने की उम्मीद है।

नारायणपुर में 1,76,030 मतदाता हैं, जिसमें से 90,604 महिला और 85,425 पुरुष हैं। वहीं 2011 की जनगणना के अनुसार पूरे छत्तीसगढ़ में 1.92% ईसाई हैं। वहीं बस्तर में ईसाइयों की संख्या है 1.98% है। पिछले कुछ सालों में चर्च जाने वाले लोगों की संख्या भी बढ़ी है।

(पूनम मसीह की ग्राउंड रिपोर्ट।)

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