इतिहास क्यों पढ़ें? क्योंकि सत्ता अतीत से वर्तमान गढ़ती है

जब हम ‘इतिहास’ शब्द सुनते हैं, तो अक्सर हमारे मन में भारी-भरकम पुस्तक की छवि उभरती है, जिसमें तिथियों, युद्धों, शासकों और संधियों की शुष्क सूचनाएं भरी होती हैं। हमें सिखाया जाता है कि इतिहास अतीत की घटनाओं को याद रखने का अभ्यास है। स्मृति का संग्रहालय, जहाँ बीते युग की गूंजें बंद पड़ी होती हैं। लेकिन यह सोच, इतिहास की चेतना से हमारा परिचय नहीं कराती।

इतिहास वास्तव में जीवंत संवाद है, विचारों, अनुभवों और संघर्षों का गूढ़ समवेत स्वर, जो न केवल अतीत को समझता है, बल्कि वर्तमान को भी आलोचनात्मक दृष्टि से देखने की क्षमता देता है। यह विषय नहीं, चेतना है; स्मृति नहीं, विवेक है; तथ्य नहीं, दृष्टिकोण है। इतिहास घटनाओं की श्रृंखला या तिथियों की सूची नहीं है। यह बौद्धिक अभ्यास है, चिंतनशील प्रक्रिया है, जो अतीत को साक्ष्यों के आधार पर समझने, विश्लेषित करने और पुनर्निर्मित करने की कोशिश करती है।

सबसे पहले यह समझना ज़रूरी है कि अतीत और इतिहास में फर्क है। अतीत वह सब है जो हो चुका है, चाहे वह किसी किसान का जीवन रहा हो, किसी राजा की हत्या, किसी औरत की चीख, या किसी जंगल का कट जाना। लेकिन इतिहास वह है जो हम उस अतीत के बारे में जानते हैं। यह ज्ञान हमें बची हुई चीज़ों, जैसे अभिलेखों, चित्रों, वस्तुओं, भाषिक दस्तावेजों या लोककथाओं से मिलता है।

इसलिए इतिहास कभी भी अतीत की पूरी तस्वीर नहीं हो सकता। अतीत असीम, अनंत और अब पहुँच से बाहर है; इतिहास उसका सीमित, चयनित और व्याख्यायित प्रतिबिंब है। इतिहासकार उस अतीत को पुनर्निर्मित करता है जो कुछ प्रमाणों में जीवित रह गया है।

इतिहासकार का काम केवल जानकारी इकट्ठा करना नहीं है। वह खोजी होता है, जो अतीत के संकेतों को खोजता है; किसी पुराने पत्र, किसी दरबारी रोजनामचे, किसी स्मारक शिलालेख, या किसी ताम्रपत्र में। वह इन स्रोतों को केवल पढ़ता नहीं, बल्कि उनकी प्रामाणिकता, पक्षपात और संदर्भ की आलोचना करता है। कौन लिख रहा था? क्यों लिख रहा था? किसके लिए लिख रहा था? यह सवाल इतिहासकार के लिए उतने ही महत्वपूर्ण हैं जितने खुद स्रोत।

इसके बाद वह इन स्रोतों को जोड़ता है, उनका विश्लेषण करता है, और संरचित रूप में घटनाओं को प्रस्तुत करता है। लेकिन यह प्रस्तुति भी किसी निष्क्रिय मशीन की तरह नहीं होती, वह स्वयं इतिहासकार के सोचने, समझने और दृष्टिकोण से प्रभावित होती है।

‘1857 की क्रांति हुई’, ‘1947 में भारत स्वतंत्र हुआ’, ‘1939 में विश्वयुद्ध शुरू हुआ’, यह सब तथ्य हैं, इतिहास नहीं। इतिहास तब शुरू होता है जब हम इन तथ्यों से आगे जाकर सवाल पूछते हैं: क्यों हुआ? कैसे हुआ? किन परिस्थितियों में हुआ? क्या इसके प्रभाव थे? किसने भाग लिया और किसे बाहर रखा गया?

इतिहास में महत्वपूर्ण यह नहीं होता कि क्या हुआ, बल्कि यह कि हम उसे कैसे समझते हैं। उदाहरण के लिए, अगर हम यह पूछें कि 1857 की क्रांति को ‘विद्रोह’, ‘क्रांति’, ‘पहला स्वतंत्रता संग्राम’ या ‘सैन्य बगावत’ क्यों कहा गया, तो हम इतिहास के अध्ययन की गहराई में प्रवेश करते हैं।

इतिहासकार अतीत की कल्पना नहीं करता, बल्कि वह जितना संभव हो, प्रमाणों के आधार पर उसका पुनर्निर्माण करता है। यदि किसी घटना का कोई प्रमाण नहीं है, तो इतिहासकार कल्पनाएं नहीं गढ़ता; वह ईमानदारी से स्वीकार करता है कि यह जानकारी उपलब्ध नहीं है। इतिहास की शक्ति इसी ईमानदारी में है। वह सत्य की खोज में अंधविश्वास या आग्रह से काम नहीं लेता।

इतिहास उन स्रोतों पर निर्भर करता है जो बच गए हैं। लेकिन यह स्रोत हमेशा पूर्ण नहीं होते, और न ही वे निष्पक्ष होते हैं। किसी राजा का दरबारी इतिहासकार उसकी वीरता के अतिशयोक्तिपूर्ण वर्णन कर सकता है, तो किसी ज़मींदार की डायरी किसानों की आवाज़ को पूरी तरह अनुपस्थित रख सकती है। ऐसे में इतिहासकार को इन स्रोतों की आलोचना करनी होती है, उन्हें संदर्भ में रखना होता है, उनकी चुप्पियों को भी पढ़ना होता है।

इतिहास इसलिए अक्सर अधूरी तस्वीर होती है। वह उन लोगों की कहानी नहीं कह पाता जिनके पास लिखने की ताकत नहीं थी, या जिनकी संस्कृति मौखिक परंपरा पर आधारित थी। वह कभी-कभी विजेताओं का इतिहास बनकर रह जाता है, क्योंकि पराजितों के दस्तावेज़ जलाए जा चुके होते हैं।

एक बड़ा सवाल यह है कि क्या इतिहास निष्पक्ष होता है? जवाब जटिल है। इतिहासकार निष्पक्ष बनने की कोशिश करता है, लेकिन वह समाज का सदस्य होता है, उसकी भी अपनी भाषा, संस्कृति, वर्ग, लिंग और विचारधारा होती है। इन सबका प्रभाव उसकी व्याख्या पर पड़ता है।

इसलिए इतिहास के कई रूप हो सकते हैं। एक ही घटना को राष्ट्रवादी इतिहास अलग देखेगा, मार्क्सवादी अलग, स्त्रीवादी अलग, और उपनिवेश विरोधी इतिहास अलग। यह इतिहास की कमजोरी नहीं, बल्कि उसकी बौद्धिक विविधता और शक्ति है।

इतिहास कभी पूरा नहीं होता। जैसे-जैसे नए स्रोत मिलते हैं, नई दृष्टिकोण विकसित होते हैं, पुरानी घटनाओं की नई व्याख्याएं सामने आती हैं। उदाहरण के लिए, पहले 1857 को केवल सैन्य विद्रोह माना गया था, लेकिन बाद में उसे व्यापक जनआंदोलन के रूप में भी देखा जाने लगा। इसीलिए इतिहास कोई एक आखिरी सच नहीं है, बल्कि सत्य की खोज की प्रक्रिया है। इतिहास का अध्ययन हमें सिखाता है कि किसी एक संस्करण पर भरोसा न करें, बल्कि साक्ष्यों की जांच करें, सोचें, सवाल पूछें और खुद निष्कर्ष निकालें।

इतिहास केवल अतीत की बात नहीं करता। वह हमें वर्तमान को समझने का औज़ार देता है। हम जब यह समझते हैं कि हमारे समाज की संरचना कैसे बनी, सत्ता के केंद्र कैसे बने, किन संघर्षों ने किन अधिकारों को जन्म दिया, तब हम नागरिक के रूप में अधिक जागरूक और ज़िम्मेदार बनते हैं।

इतिहास यह भी सिखाता है कि कैसे सत्ताएं अतीत का उपयोग अपने पक्ष में करती हैं, मिथक गढ़ती हैं, चुनिंदा घटनाओं को महान बनाती हैं, और अन्य को छिपा देती हैं। एक सजग नागरिक इतिहास को आलोचनात्मक दृष्टि से पढ़ता है, और यह समझता है कि अतीत के नाम पर वर्तमान में क्या खेल खेले जा रहे हैं।

इतिहास क्यों पढ़ें: अतीत की स्मृति या भविष्य की दृष्टि?

जब कोई छात्र यह पूछता है कि ‘इतिहास पढ़कर क्या होगा?’, तो अक्सर उसे यही उत्तर मिलता है कि ‘इतिहास से हमें अतीत की जानकारी मिलती है।’ लेकिन यह उत्तर अधूरा है। इतिहास पढ़ना केवल पुरानी घटनाओं की जानकारी प्राप्त करना नहीं है, बल्कि यह एक दृष्टिकोण, विवेक और चेतना का विकास है, जो वर्तमान को समझने और भविष्य को दिशा देने के लिए अनिवार्य है। इतिहास पढ़ना न तो केवल परीक्षा पास करने के लिए है, और न ही किसी गौरवगाथा को आत्मसात करने के लिए। यह पढ़ाई मानव सभ्यता के अनुभवों से संवाद है, ऐसा संवाद जो हमें यह बताता है कि मनुष्य ने समय के साथ क्या-क्या सीखा, क्या खोया, किन संघर्षों से गुज़रा और कैसे-कैसे मिथक रचे।

बहुतों को यह भ्रम होता है कि इतिहास का मतलब केवल बीते समय की घटनाओं को जानना है। पर यह अधूरी समझ है। इतिहास न तो अतीत में बंद रहता है, न वर्तमान से कट जाता है। बल्कि इतिहास एक पुल है, अतीत और वर्तमान के बीच, जिसकी मदद से हम यह समझ पाते हैं कि हम आज जो कुछ हैं, वह कैसे और क्यों बने। जैसे कोई पौधा अपने बीज से विकसित होता है, वैसे ही समाज और सभ्यताएं अपने अतीत से आकार ग्रहण करती हैं। इसलिए इतिहास पढ़ना, अपने अस्तित्व को समझने की प्रक्रिया है।

आज की सामाजिक, राजनीतिक और आर्थिक संरचनाएं ऐसे ही नहीं बन गईं। जातिवाद, राष्ट्रवाद, पूंजीवाद, उपनिवेशवाद, ये सब इतिहास की उपज हैं। यदि हमें यह समझना है कि जाति व्यवस्था ने भारतीय समाज को कैसे प्रभावित किया, या उपनिवेशवाद ने विकास की गति को कैसे मोड़ा, तो उसका उत्तर इतिहास ही दे सकता है। इतिहास हमें यह भी बताता है कि कोई सामाजिक आंदोलन क्यों उठा, किसी कानून का विरोध क्यों हुआ, कोई विचारधारा कब और क्यों फैली। इतिहास वर्तमान की परतों को खोलता है और दिखाता है कि जिन समस्याओं को हम आज अकेली घटनाएं समझते हैं, वे दीर्घकालिक प्रक्रियाओं का हिस्सा हैं।

इतिहास निष्क्रिय स्मृति नहीं है। यह सक्रिय सोच की प्रक्रिया है। जब हम इतिहास पढ़ते हैं, तो हमें तथ्यों की खोज, स्रोतों की आलोचना, दृष्टिकोण की पहचान, और निष्कर्ष निकालने की कला सीखनी होती है। ये सभी गुण केवल इतिहास के लिए नहीं, किसी भी जिम्मेदार नागरिक के लिए अनिवार्य हैं। इतिहास हमें सिखाता है कि कोई भी घटना एक आयामी नहीं होती। जैसे, 1857 का विद्रोह क्या था? सैन्य बगावत? स्वतंत्रता संग्राम? धार्मिक प्रतिक्रिया? सामाजिक विद्रोह? 

इतिहास इन सभी संभावनाओं को परखने की प्रक्रिया है। यह संदेह और विवेक का प्रशिक्षण है। हम कौन हैं? हम कहाँ से आए हैं? हमारा समाज कैसे बना? ये प्रश्न केवल आत्मिक जिज्ञासा नहीं हैं, बल्कि सांस्कृतिक और राजनैतिक पहचान के मूल प्रश्न हैं। इतिहास इनका उत्तर देता है। लेकिन यह पहचान स्थिर नहीं होती। वह बहस, संवाद और पुनर्व्याख्या से बनती है। इतिहास हमें यह अवसर देता है कि हम अपनी पहचान पर पुनर्विचार करें, हम उसे सत्ता द्वारा थोपे गए रूप में न लेकर, साक्ष्यों और संघर्षों के आधार पर समझें।

इतिहास केवल प्रेरणा नहीं देता, वह चेतावनी भी देता है। वह बताता है कि जब समाजों ने असहिष्णुता को अपनाया, जब विचारों पर प्रतिबंध लगाए गए, जब व्यक्तियों को भीड़ में गुम कर दिया गया, तब विनाश आया। इतिहास में हिटलर है, स्टालिन है, नरसंहार हैं, साम्राज्य हैं, और ये सब घटनाएं बताती हैं कि सत्ता जब अनियंत्रित होती है, तो समाज किस गर्त में गिर सकता है। इसलिए इतिहास पढ़ना, केवल किसी समय के गौरव की कहानी जानना नहीं है; यह राजनीतिक जागरूकता है, जो यह समझाती है कि सत्ता का स्वभाव, जनता की भूमिका और विचारों की स्वतंत्रता कैसे समाज को दिशा देते हैं।

आज की दुनिया में ‘इतिहास’ का नाम लेकर कई बार झूठ फैलाया जाता है। ‘हमारे पूर्वज महान थे’, ‘हमने कभी गलती नहीं की’, ‘हमारी संस्कृति सर्वोत्तम है’; ये बातें यदि इतिहास की कसौटी पर न कसी जाएं, तो वे मिथक बन जाती हैं, और फिर समाज अंधभक्ति और कट्टरता की ओर बढ़ता है। वास्तविक इतिहास इन दावों की तथ्यों के आधार पर परीक्षा करता है। वह दिखाता है कि समाज ने कैसे गलतियाँ कीं, कैसे वह बदला, और कैसे सुधार हुआ। इतिहास हमें अंध-गौरव से मुक्त करके विवेकपूर्ण आत्मसम्मान की ओर ले जाता है।

इतिहास का सामाजिक उपयोग भी है। वह हमें अन्याय को समझने की दृष्टि देता है। यदि हम आज किसी समुदाय को वंचित, पीड़ित या हाशिए पर देखें, तो हमें समझना होगा कि वह स्थिति एक दिन में नहीं बनी, वह शोषण, भेदभाव और अन्याय के इतिहास की उपज है। इतिहास यह भी बताता है कि कैसे लोगों ने इन अन्यायों के खिलाफ आवाज़ उठाई; आंदोलनों, क्रांतियों, विद्रोहों और लेखन के माध्यम से। इतिहास हमें बताता है कि संघर्ष कैसे जन्म लेते हैं, और कैसे वे परिवर्तन लाते हैं।

एक सशक्त लोकतंत्र वही होता है जिसमें नागरिक जागरूक, विवेकशील और इतिहास-प्रेमी होते हैं। ऐसे नागरिक सवाल पूछते हैं, सत्ता से जवाब मांगते हैं, और प्रचार को झूठ के आधार पर नहीं स्वीकारते। इतिहास पढ़ना लोकतंत्र की आत्मा है, क्योंकि यह हमें याद दिलाता है कि स्वतंत्रता हमेशा संघर्ष से मिलती है, और उसका संरक्षण केवल सजगता से होता है।

आज जब शिक्षा को केवल ‘रोज़गार’ के नजरिए से देखा जा रहा है, तब इतिहास को ‘ग़ैर-उपयोगी’ विषय मान लिया जाता है। लेकिन यह एक खतरनाक प्रवृत्ति है। इतिहास न केवल समाज को समझने का साधन है, बल्कि वह नैतिकता, विवेक और मानवीय चेतना का विकास करता है। यह केवल नौकरी नहीं, समाज को समझने और उसमें भूमिका निभाने का प्रशिक्षण है।

इतिहास पढ़ना अतीत को जानने भर के लिए नहीं है, बल्कि यह वर्तमान को समझने और भविष्य को गढ़ने के लिए अनिवार्य है। यह केवल जानकारी नहीं, चेतना है। यह केवल स्मृति नहीं, विवेक है। यह केवल गौरव नहीं, आलोचना है। जब कोई समाज इतिहास पढ़ना बंद कर देता है, तो वह झूठ, मिथक और प्रचार का शिकार हो जाता है। लेकिन जब वह अपने अतीत को सच्चाई, तर्क और संवेदना के साथ पढ़ता है, तो वह बेहतर समाज बनने की ओर बढ़ता है। इसलिए इतिहास पढ़ना केवल एक विषय नहीं है, यह मनुष्य बनने की प्रक्रिया है।

जब हम इतिहास पढ़ते हैं, तो प्रायः यह भूल जाते हैं कि इसके पीछे एक व्यक्ति होता है, इतिहासकार। वह कोई स्वचालित मशीन नहीं होता जो तथ्यों को इकट्ठा करके उन्हें पंक्तिबद्ध कर दे। वह विचारशील मन होता है, जो अतीत के चिह्नों को खोजता है, उन्हें परखता है, उनके बीच संबंध स्थापित करता है, और फिर उन्हें एक रूप में प्रस्तुत करता है जिसे हम ‘इतिहास’ कहते हैं। इतिहासकार का कार्य वस्तुतः विज्ञान और कला के बीच की जटिल प्रक्रिया है। यह साक्ष्य पर आधारित होता है, लेकिन उसकी व्याख्या और प्रस्तुति में इतिहासकार का विवेक, दृष्टिकोण और संवेदना काम करती है। 

यह मान लेना कि इतिहासकार केवल अतीत की घटनाओं को एकत्र करता है और उन्हें क्रमानुसार रख देता है, सरल और गलत धारणा है। यदि ऐसा होता, तो इतिहास कभी बदलता नहीं, एक बार लिखा गया इतिहास हमेशा वैसा ही रहता। लेकिन हम देखते हैं कि समय-समय पर इतिहास की व्याख्याएं बदलती हैं, नई दृष्टिकोण आते हैं, पुराने निष्कर्षों को चुनौती दी जाती है। इसका कारण यह है कि इतिहास निर्माण चयनात्मक और व्याख्यात्मक प्रक्रिया है। इतिहासकार को यह तय करना होता है कि किन स्रोतों को उपयोग में लाया जाए, किन तथ्यों को महत्त्व दिया जाए, और उन्हें किस रूप में प्रस्तुत किया जाए।

हर इतिहासकार की यात्रा शुरू होती है प्रमाणों की खोज से, यानी उन स्रोतों से जो अतीत के बारे में कुछ बताते हैं। ये स्रोत हो सकते हैं: अभिलेख (inscriptions); दस्तावेज़ (documents); पत्र, डायरी, रिपोर्टें; कला, चित्र, स्थापत्य; वंशावलियां, परंपराएं, लोककथाएं; जनश्रुतियां और मौखिक इतिहास। लेकिन स्रोत मिल जाना ही पर्याप्त नहीं होता। हर स्रोत को संदेह और विवेक की दृष्टि से जांचा जाता है। कौन बोल रहा है? वह किस संदर्भ में बोल रहा है? उसकी मंशा क्या थी? क्या वह पक्षपाती है? क्या वह पूरे समाज का प्रतिनिधित्व करता है या किसी खास वर्ग/सत्ता का? इतिहासकार का पहला कार्य यह होता है कि वह स्रोतों की विश्वसनीयता तय करे और उनके संभावित पक्षपात को पहचाने।

इतिहासकार कोई कंप्यूटर नहीं होता, जो डेटा को इनपुट करके निष्कर्ष निकाल ले। प्रमाणों की व्याख्या में उसकी संवेदनशीलता, समझ और तर्कशक्ति सक्रिय रहती है। उदाहरण के लिए, यदि एक राजा के दरबारी ने किसी युद्ध में ‘शानदार जीत’ की कहानी लिखी है, तो इतिहासकार यह पूछेगा: क्या यह विवरण निष्पक्ष है? क्या शत्रु पक्ष के भी कोई विवरण मौजूद हैं? क्या उस युद्ध के सामाजिक या आर्थिक प्रभावों की कोई जानकारी है? यहां इतिहासकार का कार्य तथ्यों को जाँचना नहीं, बल्कि उन्हें संदर्भों के साथ जोड़कर समझना है।

इतिहासकार अतीत की संपूर्ण तस्वीर नहीं दे सकता, क्योंकि न तो सारे स्रोत उपलब्ध हैं, और न ही सारे तथ्यों का समान महत्व होता है। इसलिए उसे चयन करना होता है: किस घटना को कितना महत्व दिया जाए? किन विवरणों को मुख्य कथानक में शामिल किया जाए?किन बातों को पादटिप्पणियों में रखा जाए या पूरी तरह छोड़ दिया जाए? यह चयन कोई तटस्थ काम नहीं है। इसमें इतिहासकार का दृष्टिकोण, उसकी वैचारिक स्थिति, उसका कालबोध सब कुछ शामिल होता है।

कोई भी इतिहासकार पूर्णत: निष्पक्ष नहीं होता, और न ही उसे ऐसा होना चाहिए। प्रत्येक व्यक्ति किसी सामाजिक, सांस्कृतिक, राजनीतिक संरचना में जन्म लेता है, उसके विचार, मूल्य, और पूर्वाग्रह वहीं से आते हैं। एक इतिहासकार जब अतीत को देखता है, तो उसकी दृष्टि उसके वर्तमान और उसके सामाजिक स्थान से प्रभावित होती है। यही कारण है कि एक ही घटना को एक स्त्रीवादी इतिहासकार, एक मार्क्सवादी इतिहासकार, और एक राष्ट्रवादी इतिहासकार अलग-अलग तरीके से देख सकते हैं। यह विविधता इतिहास की कमजोरी नहीं, बल्कि उसकी बौद्धिक समृद्धि है।

जब इतिहासकार प्रमाणों को एक कथा में गूंथता है, तो वह केवल जानकारी नहीं दे रहा होता, वह एक नैरेटिव बना रहा होता है, एक ऐसी कथा जिसमें अतीत को समझने की कोशिश है। यह कथा कल्पना नहीं होती, लेकिन यह निर्जीव तथ्यात्मक रिपोर्ट भी नहीं होती। यहाँ इतिहासकार को भाषा, शैली, संतुलन और संरचना का भी ध्यान रखना होता है। इतिहास लेखन एक प्रकार से तर्क और कला का सम्मिलन होता है।

इतिहासकार केवल अकादमिक दुनिया का व्यक्ति नहीं होता। उसका कार्य समाज की स्मृति को संरचित करना भी है। वह यह तय करता है कि समाज क्या याद रखे, और कैसे याद रखे। इसलिए इतिहासकार का दायित्व भारी है। अगर वह सच को तोड़े, या सत्ता के दबाव में आए, या अंध श्रद्धा को पोषण दे, तो उसका काम सत्य की खोज नहीं, प्रचार का औजार बन जाता है। लेकिन जब इतिहासकार ईमानदारी, प्रमाण, और आलोचनात्मक विवेक के साथ काम करता है, तो वह समाज को यथार्थ का आईना दिखाता है, और यही उसकी सबसे बड़ी भूमिका है।

इतिहास समाज की स्मृति है, और इतिहासकार उसका संरक्षक। वह अतीत के बिखरे हुए टुकड़ों को एकत्र करता है, उन्हें जांचता है, परखता है, और फिर ऐसी समझ देता है जो हमें न केवल अतीत जानने में मदद करती है, बल्कि वर्तमान की जटिलताओं को समझने और भविष्य की दिशा तय करने में भी मार्गदर्शन देती है। एक सजग और स्वतंत्र इतिहासकार लोकतंत्र की आत्मा है। वह सत्ता से सवाल करता है, अंधविश्वास का पर्दाफाश करता है, और सामाजिक न्याय की दिशा में सोचने की प्रेरणा देता है। इसलिए, इतिहास को समझने के लिए इतिहास को पढ़ना पर्याप्त नहीं, इतिहासकार को भी समझना ज़रूरी है।

इतिहास न तो बीते समय की राख है, न ही स्वर्णिम स्मृतियों की धूप। वह उन पदचापों की अनुगूंज है जो समय की मिट्टी में दब तो गईं, पर अब भी कान लगाकर सुनी जा सकती हैं। वह उन आहों की दस्तावेज़ी कहानी है जिन्हें कभी किसी दरबारी लेखनी ने जगह नहीं दी। वह उन संघर्षों की ज्वाला है जो कभी बुझी नहीं, बस किताबों के कोनों में मंद पड़ गई। इतिहास पुल है, धुंध भरे अतीत से होता हुआ एक संभावनाशील भविष्य की ओर जाता हुआ; जहाँ हर पढ़ने वाला यात्री, उस पर से गुजरते हुए, अपने भीतर एक नया संसार खोजता है। इतिहास केवल बीते कल का बहीखाता नहीं, बल्कि आज की चेतना का प्रतिबिंब और आने वाले कल की भूमिका है।

(मनोज अभिज्ञान पेशे से एडवोकेट हैं। और तमाम विषयों पर स्वतंत्र रूप से लिखते रहते हैं।)

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