सावरकर की हिंदुत्व विचारधारा 1925 में नागपुर (महाराष्ट्र) में डॉ. केशव बलिराम हेडगेवार के पास पहुंची, तो उन्होंने ‘हिंदुत्व’ को प्रेरणादायक पाया। कुछ समय बाद वह रत्नागिरी (महाराष्ट्र) में सावरकर से जाकर मिले और उनके साथ ‘हिंदू राष्ट्र’ के निर्माण के तरीकों पर चर्चा की। फिर सावरकर और अपने मार्गदर्शक डॉ. बीएस मुंजे के सुझाव पर हेडगेवार ने ‘मिशन हिंदूराष्ट्र’ के लिए छः चितपावन मराठी ब्राह्मणों के साथ मिलकर नागपुर में 29 सितंबर, 1925 को दशहरे के दिन राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस, “राष्ट्रीय स्वयंसेवक समाज”) की स्थापना की। बाद में आज़ादी की लड़ाई से खुद को अलग रख, ब्रिटिश भारत सरकार से सहयोग करते हुए, यह संगठन तेज़ी से विकसित हो देश में सबसे बड़ा हिंदू राष्ट्रवादी संगठन बन गया।
आज़ादी के बाद ‘हिंदुत्व’ की विचारधारा के फैलाव और ‘मिशन हिंदू- राष्ट्र’ के लिए राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ ने 1951 में अपने लिए एक राजनीतिक दल- भारतीय जनसंघ की स्थापना की, जिसे 1980 में नया नाम -भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) दे दिया गया। अपने परम लक्ष्य (हिंदूराष्ट्र की स्थापना) के लिए संघ ने विश्व हिंदू परिषद और कई अन्य अनुषांगिक संगठनों को खड़ा किया, जो हिंदुत्व की विचारधारा में अटूट विश्वास रखते हैं।
वे सब संघ की देखरेख में, उसके एजेंडे को आगे बढ़ाने के लिए, स्वतंत्र रूप में काम करते हैं। उन्हें संघ परिवार कहा जाता है। लेकिन उनकी किसी कार्रवाई से संघ के लिए अगर कभी कोई मुश्किल खड़ी हो जाती है, तो वह फौरन ख़ुद को उससे अलग कर अपना पल्ला झाड़ लेता है। महात्मा गांधी की हत्या के बाद नाथूराम गोडसे के मामले में उसने ऐसा ही किया था।
भारत की विशिष्टतायें या राष्ट्रीय खासियतें, जो उसके इतिहास, आर्थिक, सामाजिक और राजनीतिक चरित्र में मौजूद हैं, वह कॉरपोरेट वित्त पूंजी के साथ घुलमिल कर हिंदुत्व फासीवाद के विकास के लिए खाद-पानी का काम करती हैं। उन्हें समझे बिना भगवा फासीवाद के विशिष्ट चरित्र को समझना, उसका प्रतिरोध करना और उसे परास्त करना संभव नहीं है।
भारतीय फासीवाद का विशिष्ट चरित्र, जो आर.एस.एस की विचारधारा में समाविष्ट है, एक आक्रामक ‘हिंदू राष्ट्रवाद’ या ‘हिंदुत्व’ है , जिसका लक्ष्य हिंदू धार्मिक राजसत्ता या हिंदूराष्ट्र की स्थापना करना है। लेकिन, जैसा की स्पष्ट है इस राष्ट्रवाद की अंतर्वस्तु उस क्लासिकल फासीवाद से अलग है, जिसने बुर्जुआ राष्ट्रीय पूंजीवादी हितों की रक्षा करने के लिए हमलावर युद्ध छेड़ा था। एशिया, अफ्रीका और दक्षिण अमेरिका के देशों में, जहां औपनिवेशिक और नव-औपनिवेशिक अत्याचारों का एक लंबा दौर रहा है, वहां राष्ट्रवाद या देश प्रेम को, बिना शक, उपनिवेशवाद-विरोधी और साम्राज्यवाद-विरोधी संघर्षों से जुड़ा होना चाहिए, इसलिए इन देशों में साम्राज्यवाद का विरोध राष्ट्रवाद का एक जरूरी अंग होता है।
दूसरी तरफ, भारत में न तो औपनिवेशिक काल में और न ही द्वितीय महायुद्ध के बाद के काल में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ ने स्वतंत्र राष्ट्रीय पूंजीवादी विकास के लिए कभी कोई सच्ची कोशिश की। इसके विपरीत, इसकी स्थापना से लेकर अब तक का इसका पूरा इतिहास सच्चे राष्ट्रवाद के साथ विश्वासघात करने का रहा है। आज भी इसकी घोर दक्षिणपंथी आर्थिक दिशा यानि नव-उदारवाद और कॉरपोरेटीकरण के प्रति इसका झुकाव साफ तौर पर नव- औपनिवेशिक वैश्विक व्यवस्था के नेता अमेरिकी साम्राज्यवाद के प्रति इसकी निष्ठा को दर्शाता है।
मतलब, इसका ‘सांस्कृतिक राष्ट्रवाद’ वास्तव में अंतर्राष्ट्रीय वित्त पूंजी की सेवा करने के लिए केवल एक मुखौटा भर है। इसे आरएसएस के युद्ध-प्रिय और छद्म राष्ट्रवाद और जनता की प्रगतिशील जनवादी राष्ट्रीय भावना के बीच फर्क करके देखा जा सकता है। जनवादी राष्ट्रवाद साम्राज्यवाद का विरोधी होता है, जबकि छद्म राष्ट्रवाद अंध-राष्ट्रवादी, युद्ध-प्रिय, फूट-परस्त, अलगाववादी और प्रतिक्रियावादी होता है, जो हर हाल में फासीवाद की ओर ले जाता है। वर्तमान ऐतिहासिक संदर्भ में जनवादी राष्ट्रवाद का स्वरूप साम्राज्यवाद विरोधी है और इसलिए वह प्रगतिशील, धर्मनिरपेक्ष, लोकतांत्रिक और समावेशी है; जो मजदूरों, किसानों, महिलाओं, दलितों, आदिवासियों, अल्पसंख्यकों और सभी उत्पीड़ितों में संघर्षशील एकता कायम करता है।
भारतीय फासीवाद का ब्राह्मणवादी हिंदू श्रेष्ठता की ओर पूर्ण वैचारिक झुकाव इसका एक खास चरित्र है, जो इसे बहुत अधिक जहरीला बना देता है। इस विचारधारा के मुताबिक भारत की जनता का विशाल बहुमत, जिसके अंतर्गत निम्न और उत्पीड़ित जातियां आती हैं, मनुष्य से कमतर, किसी नागरिक या जनवादी अधिकार का हकदार नहीं हैं। इसी सोच के चलते मोदी सरकार के कार्यकाल में एक तरफ दलितों, आदिवासियों, अल्पसंख्यकों एवं अन्य उत्पीड़ित जातियों पर बिना रुके अत्याचार बढ़ते रहे हैं। वह लिंचिंग (भीड़ बनाकर हत्या करना), सामूहिक बलात्कार, ऑनर किलिंग (सम्मान के नाम पर हत्या) और उच्च शिक्षा और शोध संस्थानों में ‘संस्थागत हत्या’ के रूप में सामने आते रहे हैं।
दूसरी तरफ आरएसएस उत्पीड़ित जातियों को हिंदुत्व के दायरे में छल, बल द्वारा शामिल करने की प्रक्रिया चलाने के साथ-साथ, घोर अवसरवादी ढंग से, चतुराई से आज पहचान की राजनीति का इस्तेमाल कर अपने लिए जाति-आधारित वोट बैंक भी तैयार कर रहा है। इसके साथ ही वह भगवाकरण की ‘फूट डालो, राज करो’ की हमलावर नीति पर चलते हुए विभिन्न जाति-आधारित दलों को तोड़ने-फोड़ने में भी सफल हो रहा है, जिससे वह उन्हें बहुसंख्यकवादी भगवा झंडे के नीचे लाकर अपने अंतिम लक्ष्य, मनुस्मृति आधारित, हिंदूराष्ट्र की स्थापना कर सके।
भारत में हिंदुत्व फासीवाद के जन्म और विकास का इतिहास तीन हजार साल लम्बा है। यह देश के ज्यादातर हिस्सों में केवल मध्यम वर्ग में ही नहीं, दलितों सहित निचले वर्गों और जातियों में फैला हुआ है। हिंदुत्व हमारी ब्राह्मणवादी/पारंपरिक जीवन शैली का चरम राजनीतिक चेहरा मात्र है, जो हमारे सांस्कृतिक अस्तित्व और पारिवारिक जीवन के अधिकांश पहलुओं में व्याप्त है। भारतीय घरों में रीति-रिवाजों और परंपराओं का निभाया जाना हमारे राजनीतिक रुझान में हिंदुत्वी फासीवाद के निरंतर बने रहने का मुख्य आधार है।
आस्था के लिए घर के कोने में एक छोटी-सी मूर्ति का रखना, माता-पिता की भावनाओं की खातिर कुछ धार्मिक अनुष्ठानों/ समारोहों का आयोजन करना, विवाह संबंध और सामाजिक मेलजोल अपनी जाति/ समुदाय तक सीमित रखना, खान-पान की परंपरागत आदतों से चिपके रहना, पत्नियों/महिलाओं को पारंपरिक भूमिका में रखना, ज्योतिष/वास्तुशास्त्र जैसी कुछ अवधारणाओं को वैज्ञानिक समझ देने की कोशिश करना, इत्यादि कई छोटी-छोटी ऐसी व्यवहारिक धाराएं हैं, जो इकट्ठी होकर सांस्कृतिक रूप से ब्राह्मणवाद को मज़बूत करती हैं और आमतौर पर राजनीतिक रूप में हिंदुत्वी फासीवाद की शक्ल अख्तियार करती हैं।
संक्षेप में, हिंदुत्व और कुछ नहीं, सिर्फ ब्राह्मणवाद का चरम रूप है। यही कारण है कि हिन्दुत्व के झंडाबरदार यानि राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ का नेतृत्व, एकाध अपवाद को छोड़कर, हमेशा से चितपावन मराठी ब्राह्मणों के हाथ में रहा है, जिनका अन्तिम लक्ष्य भारत को एक हिन्दू राष्ट्र में बदलना रहा है।
भारत के अधिकांश भाग में, हिंदुत्व न केवल मध्यम वर्ग, बल्कि दलितों सहित निम्न वर्गों/जातियों के रक्त प्रवाह में भी शामिल हो गया है। वामपंथी विचार तो दूर, अंबेडकर के लोकतांत्रिक विचार भी अब हाशिए पर नजर आ रहे हैं। जो भी पार्टी सत्ता में है, यहां तक कि राज्य स्तर पर भी, वह लोकतांत्रिक विचारों के साथ इसका मुकाबला करने के बजाय नरम हिंदुत्व के साथ उस भावना को खुश करने में अधिक शामिल लगती है, जिसका भारत में 3000 से अधिक वर्षों का लंबा इतिहास है – चार्वाक (7 वें) से शताब्दी ईसा पूर्व, बुद्ध के तर्कवादी विचारों तक; गैर-ब्राह्मण भक्ति परंपरा तक, आधुनिक विचारकों और सामाजिक कार्यकर्ताओं अंबेडकर, फुले और पेरियार के विचारों तक और पारिवारिक जीवन के अधिकांश पहलुओं में व्याप्त है।
हमारे घरों में रीति-रिवाजों और परंपराओं को न तोड़ना हमारे राजनीतिक रुझान में हिंदुत्व फासीवाद के लिए प्रजनन स्थल बन जाता है। चाहे वह हमारे घरों के कोने में एक छोटी सी मूर्ति रखना हो (राक्षसों को प्रसन्न करने के लिए), या हमारे माता-पिता की भावनाओं को ठेस न पहुँचाने के नाम पर कुछ समारोह आयोजित करना, या सामाजिक मेलजोल को अपनी ही जाति तक सीमित रखना, या हमारे पिछले भोजन को बनाए रखना।
आदतें (मांस, शाकाहार आदि न खाना), या अपनी पत्नियों को पारंपरिक भूमिकाएँ निभाने देना, या कुछ पारंपरिक पोशाक कोड अपनाना, या यहाँ तक कि वास्तु शास्त्र जैसी कुछ अवधारणाओं को स्वीकार करना (और इसे एक वैज्ञानिक समझ देने की कोशिश करना); आदि आदि वे सभी बूंदें हैं जो सांस्कृतिक रूप से ब्राह्मणवाद का घड़ा भर देती हैं और अक्सर (हमेशा नहीं) राजनीतिक रूप से हिंदुत्व फासीवादी रूप धारण कर लेती हैं। यहां तक कि नए युग के गुरुओं का प्रसार भी विभिन्न वैज्ञानिक आड़ में हिंदुत्व संस्कृति को जोड़ता है। ऐसे में यह कोई आश्चर्य की बात नहीं है कि बीजेपी अपने धनबल के दम पर चुनाव में बढ़त हासिल कर लेती है।
(अवतार सिंह जसवाल वामपंथी लेखक और कार्यकर्ता हैं।)