‘शोले’ के 50 साल: ‘जो डर गया वह मर गया’

हाल ही के दिनों में अशोक पांडे का उपन्यास ‘लपूझन्ना’ पढ़ा। इसका नायक लफत्तू का प्रिय फिकरा, जो एक तरह से उसका तकिया कलाम सा है: ‘जो डर गया समझो वह मर गया’। लफत्तू बड़ों के बीच बच्चा है और बच्चों के बीच वह बड़ा बनने के लिए बड़ी ठसक के साथ बोलता है: ‘जो डल गया बेटा, समझो मल गया’। इस उपन्यास का कालखंड शोले फिल्म के समय का है। लफत्तू अपने किस्म का बना हुआ है। उसके पिता, भाई उसे ‘रास्ते’ पर लाने के लिए पीट पीटकर अधमरा कर देते हैं। लेकिन, लफत्तू है कि टस से मस होने का नाम नहीं लेता। वह हर बार मार खाने के बाद दोहराता है, जो डर गया वह मर गया।

लफत्तू अपराधी नहीं है, उसका दिल पूरी साफगोई से भरा हुआ है। लेकिन, दोस्ती निभाने में उसे अपने घर से कीमती सामान, पैसा चुरा लेने में दिक्कत नहीं होती। वह हमउम्र दोस्तों के साथ जीना चाहता है और प्यार की गहराई में उतर जाने को व्याकुल है। वह अपने पहले प्यार की विफलता में गहरे अवसाद से भर जाता है, लेकिन दोस्तों के बीच रहते हुए खुद को उबारता है और उन्हें अपने अवसाद से अलग रखता है।

जावेद अख्तर इंडियन एक्सप्रेस की अल्का साहनी के साथ हुए साक्षात्कार में बताते हैं: ‘‘ऐसा नहीं है कि गब्बर का बचपन खराब था। ऐसा है नहीं (कोई बीती कहानी नहीं है)। इसीलिए वह विशुद्ध, खरा खलनायक है।’’

अशोक पांडे ‘लपूझन्ना’ में 1970 के दशक में भारत समाज के चौतरफा संकट के बीच लफत्तू को गढ़ रहे थे। जावेद अख्तर खरा खलनायक गब्बर गढ़ रहे थे। दोनों एक ही बात कह रहे हैं: जो डर गया वह समझो मर गया। उपन्यास के अंत में लफत्तू स्कूल के मैदान में एक बच्चे की साइकिल चलाना सीखाते हुए दिखता है। फिल्म में यह खरा खलनायक मारा जाता है। इस फिल्म में खलनायक गब्बर तो मर जाता है, जो ‘प्योर एविल’ है आने वाली फिल्मों में नायकों की आत्मा में प्रवेश करता है। फिल्म ‘एनीमल’ में बाकायदा वह फासिज्म पर भाषण भी देता है। यह फिल्म जावेद अख्तर को काफी नागवार गुजरी थी।

शोले फिल्म में गब्बर सिंह की भाषा अवधी है। इस खलनायक की भाषा का चुनाव जावेद अख्तर का था। अवध क्षेत्र में कोई पहाड़ नहीं है। इलाहाबाद के शंकरगढ़ की भाषा पर ज़रूर अवधी का प्रभाव है। लेकिन, कहानी का क्षेत्र यह है नहीं। बाकी पात्र ठेठ खड़ी हिंदी बोलने वाले हैं। क्या अवध की गरीबी गब्बर सिंह जैसे डकैतों को पैदा कर रही थी?

शोले फिल्म के धूम मचाने के एक दशक बीत जाने के बाद इस्माइल मर्चेंट की फिल्म ‘हीट एण्ड डस्ट’ आई। यह फिल्म ब्रिटिश औपिनिवेशिक दौर की ओर ले जाती है। इसमें एक नवाब अंग्रेजों के कब्जा और वसूली से तंग है। लेकिन, वह अइयाशियां छोड़ने के लिए तैयार नहीं है। वह अंग्रेजों द्वारा खाली किये जा रहे कोष को भरने के लिए डकैतों को तैयार करता है। ये डकैत गांव वालों को लूटते हैं और इस लूट का हिस्सा नवाब को पहुंचाते हैं। गांव वाले दिन में नवाब के टैक्स भरते हैं और रात में डकैतों की लूट के शिकार होते हैं। बाकी का काम अंग्रेज अलग से कर ही रहे थे। इस्माइल मर्चेंट भारत में डकैतों के उस उद्भव के बारे में बता रहे थे जिसे नवाबों और जमींदारों ने पैदा किया। 1970 के दशक में नक्सलबाड़ी के समय में नक्सली संगठनों ने बिहार में इस तरह के डकैतों का बड़े पैमाने पर सफाया किया।

शोले फिल्म के 24 साल बाद ‘बैंडिट क्वीन’ और लगभग 40 साल बाद ‘पान सिंह तोमर’ आती है। ये दोनों ही फिल्म जमीन, इज्जत और जीवन जीने के हक को केंद्रीय कथा बनाते हैं। शोले के बाद आई इन तीनों फिल्मों में से अंतिम दो में खलनायक गब्बर सिंह की तरह बार-बार सामने नहीं आता है। इसके नायक एक पूरी व्यवस्था के साथ जद्दोजहद कर रहे होते हैं और अपने सवालों का जवाब ढूंढ रहे हैं। जबकि ‘हीट एण्ड डस्ट’ का खलनायक लगातार खुद को नवाब होने को बचाये रखने में खत्म होता जाता है और पीछे तबाही की लकीरें छोड़ता जाता है।

तब यह सवाल उठता है कि शोले फिल्म का डकैत, गब्बर सिंह क्यों इतना लोकप्रिय हुआ? फिल्म के कथानक में गांव की गरीब जनता वह जमीन है जिस पर ठाकुर, गब्बर सिंह और जेल से आये दो पात्रों का खेल चलता है। ठाकुर जमींदार है और गब्बर सिंह ने उनके परिवार के लोगों का मारा है और खुद ठाकुर के हाथ भी काट दिये हैं। ठाकुर पुलिस में अधिकारी है लेकिन यह व्यवस्था ठाकुर को ‘न्याय’ नहीं दिला पाती है। इसी पुलिस व्यवस्था के दो अपराधी युवा हैं जिनका सहारे ठाकुर गब्बर सिंह को खत्म करना चाहता है। गब्बर सिंह जावेद अख्तर के शब्दों में ‘प्यारे एविल’ हैं।

तर्क यही है कि जो शुद्ध खलनायक नहीं है, उसमें नायक होने की संभावना है। फिल्म के अंत में दोनों अपराधी युवा विवाह कर सामाजिक जीवन में वापसी करते हैं। सारी कहानी व्यवस्था से बाहर ग्रामीणों की पीठ पर रची जाती है और वे हमेशा नेपथ्य में रहते हैं। गब्बर सिंह की लूट के बाद जमींदार की लूट बंद हुई, यह कथानक का मुख्य चिंता है ही नहीं।

फिल्म के हॉल में शोले के डायलॉग से गुजरते हुए संगीत की सनसनी में पहाड़ियों पर गब्बर की बूट की ठनक, ठाकुर की बेबसी और दो युवाओं का इस डकैत से भिड़ना जब संवादों के बीच से गुजरता है तब वह अभिभूत हुए बिना नहीं रह सकता। लेकिन, यथार्थ की भूमि अधिक कड़वी होती है और इसमें सनसनी नहीं होती। 1975 में शोले अगस्त के महीने में हॉल में प्रदर्शित होती है। जून, 1975 में आपातकाल लग चुका होता है। जमीन मुक्ति का संघर्ष अमार बाड़ी, तोमार बाड़ी/नक्सलबाड़ी-नक्सलबाड़ी के नारे के साथ जमींदारों के खिलाफ देश भर में फैलता जा रहा था। दरअसल, गरीब किसान जमींदारों के खिलाफ गोल बंद हुआ था। और, बिहार में वह डकैतों और जमींदारों दोनों के ही खिलाफ गोलबंद हुआ।

यही वह समय था जब गांव से युवाओं का रोजगार की तलाश में शहरों की ओर पलायन हुआ। शहर के मजदूरों ने शानदार गोलबंदी किया और हड़ताल हरेक जुबान पर नारे में बदल गया। इस दौर में इंदिरा गांधी के नेतृत्व में तानाशाही के रास्ते देश के संकट को हल करने का दावा किया जा रहा था। जेपी के नेतृत्व में ‘संपूर्ण क्रांति’ का नारा देकर चल रही व्यवस्था में आमूल बदलाव का नारा दिया जा रहा था। किसान जमींदारी उन्मूलन के कार्यक्रम को खुद के नेतृत्व में हल करने की ओर बढ़ रहे थे। इस त्रिकोण में तय था: जो डर गया, समझो वह मर गया।

शोले के बाद आई उपरोक्त तीन फिल्म डकैतों के उस गहरे रहस्य को खोलते हैं जिसके बिना भारत में डकैतों की कहानी अधूरी रहेगी। शोले को देखते समय इन तीन फिल्मों को ज़रूर देखना चाहिए। शोले फिल्म के बाद जावेद अख्तर की फिल्मी दुनिया के सफर में गब्बर सिंह कभी नहीं मरा। न उनका ठाकुर मरा और न ही उनके दो नायक। वे उनके लेखन का हिस्सा बने रहे। सच यही है कि यह जो त्रिकोण था, आने वाले समय में यह भारत के शासक वर्ग में समाहित हो गया। गांव का गरीब जो नेपथ्य में था, वह वहीं बना रहा। उसका कोई लेखक नहीं बना। शोले फिल्म की यही सबसे बड़ी त्रासदी है।

(अंजनी कुमार लेखक और टिप्पणीकार हैं।)

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