मज़दूर वर्ग पर ज़बरदस्ती श्रम संहिताएँ थोपने के बाद बीजेपी के नेतृत्व वाली केंद्र सरकार ने अब ग्रामीण मज़दूर वर्ग को निशाना बनाया है। लम्बे संघर्ष और कड़ी मेहनत से मिले मनरेगा रूपी ‘काम के अधिकार’ को छीनने के लिए विकसित भारत- रोज़गार और आजीविका मिशन (ग्रामीण) बिल 2025 (VB- GRAMG) को संसद में पेश किया है। अगर पास हो गया, तो यह बिल महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोज़गार गारंटी अधिनियम, 2005 को खत्म कर देगा।
जनसंघर्षों की विरासत पर हमला- हिंदुत्व के एजेंडे को आगे बढ़ाना
इस विधेयक का नामकरण ही इसके वास्तविक उद्देश्यों में से एक को उजागर करता है। शुरुआत से ही भाजपा नीत केंद्र सरकार का रूख मनरेगा (MGNREGA) की मूल भावना के खिलाफ रहा है। 2015 में संसद के भीतर प्रधानमंत्री मोदी ने इसे कांग्रेस पार्टी की विफलताओं का ‘जीवित स्मारक’ तक कहा था। फिर भी NDA सरकार ग्रामीण मज़दूरों और ग्रामीण अर्थव्यवस्था के लिए इस योजना के अत्यंत महत्वपूर्ण महत्व को नकार नहीं सकती।
यह अंतर्विरोध लोकतंत्र के प्रति भाजपा के दृष्टिकोण से, और विशेष रूप से मोदी सरकार के आत्ममुग्ध चरित्र से, उत्पन्न होता है। मनरेगा से उन्हें इसलिए चिढ़ है क्योंकि इसे एक पूर्व निर्वाचित सरकार ने लागू किया था, लेकिन इसकी सिद्ध उपयोगिता के कारण वे इसे पूरी तरह समाप्त भी नहीं कर सकते। हम जानते हैं कि मोदी सरकार यह दिखाना चाहती है कि हर अच्छी पहल सिर्फ़ उन्ही के शासन में शुरू हुई है। यहां तक कि ‘महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार अधिनियम’ नाम भी मौजूदा सरकार को स्वीकार्य नहीं है। इस अधिनियम की विरासत, इसके लिए चले लंबे जनसंघर्ष, और इसके निर्माण में वामपंथ की निर्णायक भूमिका, ये सभी तथ्य संघ परिवार के लिए असहनीय हैं। प्रस्तावित कानून का नाम जानबूझकर ‘विकसित भारत- रोज़गार और आजीविका मिशन (ग्रामीण)’ VB- GRamG 2025 (हिंदी में विकसित भारत- जी राम जी) रखना RSS के खतरनाक एजेंडे का साफ़ संकेत देता है।
मांग-आधारित काम की गारंटी से बजट-नियंत्रित योजना की ओर
केंद्र सरकार, पेश किये गए विधेयक को मनरेगा से बेहतर बता रही है, यह उसकी मजबूरी है न कि ग्रामीण भारत में बड़े पैमाने पर व्याप्त बेरोज़गारी, व्यापक गरीबी या ग्रामीण मज़दूर वर्ग की बदहाल जीवन स्थितियों के लिए उसकी ईमानदार चिंता। यह बात इस तथ्य से और अधिक स्पष्ट हो जाती है कि प्रस्तावित विधेयक, मनरेगा की बुनियादी भावना और उसके मूलभूत सिद्धांतों से पूरी तरह अलग है।
मनरेगा एक माँग-आधारित योजना है जो कानूनी तौर पर राज्य को मांग के आधार पर रोज़गार देने के लिए बाध्य करता है। प्रस्तावित विधेयक इस सिद्धांत को पूरी तरह से बदल देगा, जिसमें एक कानूनी अधिकार को एक विवेकाधीन योजना में बदला जा रहा है, और साथ ही वित्तीय और प्रशासनिक बोझ भी राज्य सरकारों पर डाला जा रहा है। मनरेगा का माँग-आधारित चरित्र इस तथ्य में निहित है कि आवश्यक धनराशि उपलब्ध कराने की क़ानूनी ज़िम्मेदारी केंद्रीय सरकार की है। हालांकि केंद्र ने पिछले कुछ सालों में आवंटन में धीरे-धीरे कटौती की है, लेकिन प्रस्तावित विधेयक केंद्र सरकार के फण्ड से इनकार को कानूनी मान्यता देना चाहता है। बिल की धारा 4 (5) केंद्र सरकार को राज्यों के लिए “नॉर्मेटिव एलोकेशन” (मानक आवंटन) तय करने का अधिकार देता है। इसमें कहा गया है कि “केंद्र सरकार प्रत्येक वित्तीय वर्ष के लिए राज्यवार मानक आवंटन निर्धारित करेगी, जो केंद्र सरकार द्वारा तय किए गए वस्तुनिष्ठ मानकों पर आधारित होगा”।
वहीं, विधेयक की धारा 4(6) इस सीमा से अधिक होने वाले किसी भी व्यय की ज़िम्मेदारी राज्य सरकारों पर डालती है। धारा 4(6) के अनुसार: “किसी राज्य द्वारा अपने मानक आवंटन से अधिक किया गया कोई भी खर्च, केंद्रीय सरकार द्वारा निर्धारित तरीके और प्रक्रिया के अनुसार, राज्य सरकार द्वारा वहन किया जाएगा।”
यह सीधे तौर पर केंद्र सरकार को हर राज्य को दिए जाने वाले फंड की रकम मनमाने ढंग से तय करने का अधिकार देता है, जिससे वहां रोज़गार के दिनों की संख्या तय होती है। इस प्रकार यह मनरेगा के मूल सिद्धांत को पूरी तरह उलट देता है, एक ऐसी माँग-आधारित व्यवस्था से, जिसमें माँग के अनुसार फण्ड उपलब्ध कराया जाता है, एक आपूर्ति-आधारित मॉडल की ओर, जिसमें माँग को पहले से तय बजट की सीमा में समेटने के लिए मजबूर किया जाता है।
साल भर रोज़गार पर रोक- काम के अधिकार को सीमित करने की चाल
मनरेगा मजदूरों को पूरे साल जब भी वे काम मांगते हैं, काम की गारंटी देता है। किंतु विधेयक की धारा 6, खेती के पीक सीज़न के दौरान खेत मज़दूरों की पर्याप्त उपलब्धता सुनिश्चित करने के बहाने, एक अत्यंत प्रतिगामी प्रावधान प्रस्तावित करती है। प्रस्तावित विधेयक की धारा 6(2) में कहा गया है कि “राज्य सरकारें एक वित्तीय वर्ष में साठ दिनों की कुल अवधि, पहले से अधिसूचित करेंगी, जिसमें बुवाई और कटाई के खेती के पीक सीज़न शामिल होंगे, जिसके दौरान इस अधिनियम के तहत काम नहीं किया जाएगा।”
यह प्रावधान निर्धारित करता है कि संबंधित उप-धारा के अंतर्गत अधिसूचित किए गए खेती के पीक सीज़न के दौरान इस अधिनियम के तहत कोई भी कार्य न तो प्रारंभ किया जाएगा और न ही निष्पादित किया जाएगा। ऐसे समय-काल और क्षेत्रों को अधिसूचित करने का अधिकार राज्य सरकारों को दिया गया है। विधेयक आगे यह भी प्रावधान करता है कि वित्तीय वर्ष में कुल मिलाकर अधिकतम साठ दिनों की अवधि तक, जिसमें बुवाई और कटाई के पीक सीज़न शामिल हैं, इस अधिनियम के अंतर्गत कोई कार्य नहीं किया जाएगा।
यह प्रावधान सीधे काम के अधिकार के खिलाफ है। कृषि में मशीनीकरण के बढ़ते उपयोग के कारण काम के दिन लगातार घट रहे हैं और बुवाई व कटाई जैसे चरम मौसमों में भी रोज़गार के अवसर कम हो रहे हैं। अनुभव बताता है कि मनरेगा ने मज़दूरी दरों में गिरावट को रोकने में मदद की है; यह न्यूनतम मज़दूरी की गारंटी देता है और कृषि कार्यों में बेहतर मज़दूरी सुनिश्चित करने के लिए सामूहिक सौदेबाज़ी का एक ज़रिया बन गया है। इस प्रावधान के जरिये यह विधेयक ज़मींदारों और अमीर किसानों को खेतिहर मज़दूरों का शोषण करने की खुली छूट देगा। यह पीक सीज़न के दौरान सस्ती मज़दूरी की उपलब्धता सुनिश्चित करके ज़मींदारों और पूंजीपति किसानों के वर्गीय हितों को पूरा करता है। इस प्रकार, सार्वजनिक धन से चलने वाला एक कल्याणकारी और विकासात्मक कार्यक्रम, निजी मुनाफ़े के हितों की रक्षा के लिए जानबूझकर निलंबित किया जा रहा है।
मज़दूरी दरों का वर्गीय सवाल
प्रस्तावित विधेयक की धारा 10 के तहत मज़दूरी दरें केंद्रीय सरकार द्वारा तय की जाएँगी, लेकिन इसमें एक गंभीर कमी है। मनरेगा अधिनियम की धारा 6(2) में साफ तौर पर कहा गया है कि मज़दूरी, न्यूनतम मज़दूरी अधिनियम, 1948 के तहत तय खेत मज़दूरों की न्यूनतम मज़दूरी के अनुरूप होनी चाहिए। हालाँकि यूपीए-I सरकार से वाम मोर्चे के समर्थन वापस लेने के तुरंत बाद, जनवरी 2009 में मनरेगा की मज़दूरी को न्यूनतम मज़दूरी के प्रावधान से अलग कर दिया गया था, फिर भी अधिनियम में यह स्पष्ट और प्रगतिशील क़ानूनी प्रावधान आज भी मौजूद है। इसी आधार पर मज़दूर संगठनों ने लगातार यह माँग उठाई है कि मनरेगा की मज़दूरी को क़ानूनी रूप से न्यूनतम मज़दूरी से जोड़ा जाए। हालांकि अधिकांश राज्यों में वर्तमान मनरेगा मज़दूरी, खेत मज़दूरों की न्यूनतम मज़दूरी से कम है, लेकिन प्रस्तावित विधेयक इस पहलू को पूरी तरह समाप्त कर देता है।
इसके अलावा, 22 मई 2025 को प्रस्तुत अपनी आठवीं रिपोर्ट में संसदीय समिति ने मनरेगा की मज़दूरी को बढ़ाकर न्यूनतम ₹400 प्रति दिन करने की सिफ़ारिश की है और कहा था कि मौजूदा दरें मज़दूरों के जीवन-यापन के बुनियादी दैनिक ख़र्चों को पूरा करने के लिए अपर्याप्त हैं। इसी वर्ष मार्च में संसद को सौंपी गई एक रिपोर्ट में समिति ने ग्रामीण परिवारों पर महँगाई के वास्तविक प्रभाव के आधार पर मज़दूरी दरों में संशोधन करने की माँग की थी। वर्तमान में मनरेगा की मज़दूरी, खेत मज़दूरों के लिए उपभोक्ता मूल्य सूचकांक (CPI-AL) के आधार पर तय की जाती है, जिसमें 2009 को आधार वर्ष माना गया है।
समिति ने इस पुरानी पद्धति की कड़ी आलोचना करते हुए इसे अप्रासंगिक बताया और कहा कि यह वर्तमान महँगाई और जीवन-यापन की लागत को दर्शाने में पूरी तरह अक्षम है। महेंद्र देव समिति (2013) ने पहले ही यह सुझाव दिया था कि मनरेगा की मज़दूरी को न्यूनतम मज़दूरी अधिनियम के तहत राज्यों द्वारा निर्धारित अकुशल कृषि मज़दूरों की तत्कालीन (2014) न्यूनतम मज़दूरी दर या ‘वर्तमान मनरेगा मज़दूरी दर, जो भी अधिक हो, के बराबर किया जाए, और महँगाई से मज़दूरी की रक्षा के लिए CPI (ग्रामीण) को सूचकांक के रूप में अपनाया जाए। अनूप सतपथी समिति ने भी न्यूनतम दैनिक मज़दूरी ₹375 निर्धारित करने की सिफ़ारिश की थी। लेकिन केंद्र सरकार ने इन सभी सिफ़ारिशों को नज़रअंदाज़ किया है।
प्रस्तावित विधेयक इस सिद्धांत को पूरी तरह त्याग देता है। यह मज़दूरी को किसी भी क़ानूनी रूप से बाध्यकारी अधिनियम से नहीं जोड़ता, महँगाई के अनुसार सूचकांक-आधारित संशोधन को अनिवार्य नहीं करता, और न ही राष्ट्रीय न्यूनतम मज़दूरी के अनुरूप मज़दूरी की कोई गारंटी देता है। इससे केंद्र सरकार को मज़दूरी दरें मनमाने ढंग से बहुत निम्न स्तर पर तय करने की असीमित शक्ति मिल जाती है, और समय-समय पर उन्हें संशोधित करने की कोई क़ानूनी बाध्यता नहीं रहेगी। अगर मज़दूरी को महंगाई, न्यूनतम मज़दूरी मानकों और असल जीवन यापन की लागत से जोड़ा जाता है, तभी रोज़गार गारंटी योजनाएं ग्रामीण बदलाव के लिए एक शक्तिशाली साधन बन सकती हैं।
राज्यों पर वित्तीय बोझ
प्रस्तावित योजना को खास तौर पर केंद्र प्रायोजित योजना के तौर पर डिज़ाइन किया गया है, जिसके तहत राज्य सरकारों को कुल वित्तीय बोझ का 40 प्रतिशत वहन करना होगा। इसके विपरीत, मनरेगा के तहत श्रम मज़दूरी का 100 प्रतिशत और सामग्री लागत का 75 प्रतिशत केंद्र सरकार वहन करती है। व्यवहार में इसका अर्थ केंद्र और राज्यों के बीच 90:10 के लागत-विभाजन से है। G-RAM-G विधेयक की धारा 22(2) में प्रावधान है कि “केंद्रीय सरकार और राज्य सरकारों के बीच फंड शेयरिंग (निधि-साझेदारी) का अनुपात उत्तर-पूर्वी राज्यों, हिमालयी राज्यों और केंद्र शासित क्षेत्रों (उत्तराखंड, हिमाचल प्रदेश और जम्मू-कश्मीर) के लिए 90:10 तथा विधायिका वाले अन्य सभी राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों के लिए 60:40 होगा।” इसके अतिरिक्त, धारा 11 के तहत यदि पंद्रह दिनों के भीतर काम उपलब्ध नहीं कराया जाता है तो बेरोज़गारी भत्ता देय होगा, और धारा 22(8) इस तरह के भत्ते की ज़िम्मेदारी राज्य सरकारों पर डालती है।
जीएसटी के बाद की व्यवस्था में, राज्यों को टैक्स लगाने की आज़ादी कम होने और केंद्र से फण्ड स्थानांतरण में बार-बार होने वाली देरी के कारण राज्य पहले से ही गंभीर वित्तीय दबाव का सामना कर रहे हैं। ऐसे में राज्यों पर अतिरिक्त वित्तीय बोझ डालना इस योजना के क्रियान्वयन को गंभीर रूप से कमज़ोर करेगा और साथ ही अन्य कल्याणकारी कार्यक्रमों के लिए धन उपलब्ध कराने की राज्यों की क्षमता को भी सीमित करेगा। इसका सबसे अधिक प्रतिकूल प्रभाव गरीब राज्यों और उच्च स्तर के बाह्य प्रवासन वाले राज्यों पर पड़ेगा, जहाँ ग्रामीण रोज़गार की आवश्यकता सबसे अधिक है। बढ़ता हुआ वित्तीय बोझ राज्यों को वित्तीय रूढ़िवादिता अपनाने और मज़दूरों की काम की माँग को पंजीकृत न करने की ओर धकेलेगा। यह बदलाव राष्ट्रीय रोज़गार गारंटी की मूल अवधारणा को ही कमजोर कर देता है।
ग्राम सभाओं को हाशिये पर डालना- सत्ता का केंद्रीकरण
मनरेगा की एक प्रमुख विशेषता यह है कि इसके तहत किए जाने वाले कार्यों की योजना स्थानीय आवश्यकताओं के आधार पर ग्राम सभाओं के माध्यम से तैयार की जाती है। असल में यह 73वें संविधान संशोधन के अनुरूप है। लेकिन प्रस्तावित विधेयक में इस मूल भावना को पलट दिया गया है, क्योंकि योजना-निर्माण की प्रक्रिया को स्थानीय स्तर से हटाकर एक पूर्व-निर्धारित केंद्रीकृत प्राथमिकता प्रणाली ‘विकसित भारत-राष्ट्रीय ग्रामीण अवसंरचना स्टैक’ (नेशनल रूरल इंफ्रास्ट्रक्चर स्टैक) के अधीन कर दिया गया है।
प्रस्तावित विधेयक की अनुसूची–1, खंड 6(4) में कहा गया है कि “विकसित भारत राष्ट्रीय ग्रामीण अवसंरचना स्टैक राज्यों, ज़िलों और पंचायती राज संस्थाओं को प्राथमिक अवसंरचना अंतराल की पहचान करने, कार्य-डिज़ाइनों का मानकीकरण करने और यह सुनिश्चित करने के लिए मार्गदर्शन करेगा कि सार्वजनिक निवेश ग्राम पंचायत, ब्लॉक और ज़िला स्तर पर संतृप्ति परिणामों में मापनीय योगदान दें।”
मनरेगा के तहत ग्राम सभाओं को योजना के अंतर्गत कार्यों की पहचान करने और उन्हें मंज़ूरी देने का अधिकार है। गाँव में रहने वाले हर व्यक्ति को ग्राम सभा में भाग लेने का अधिकार है और उसकी चर्चाओं में हिस्सा लेने का भी बराबर अधिकार है। किंतु प्रस्तावित विधेयक के तहत कार्यों की पहचान ऊपर से नीचे (टॉप-डाउन) की प्रक्रिया के माध्यम से की जाएगी, जहाँ परियोजनाओं को ‘विकसित भारत’ एजेंडा और पीएम गति शक्ति जैसी केंद्रीय प्राथमिकताओं के अनुरूप होना अनिवार्य होगा।
रोजगार गारंटी की सार्वभौमिकता को कमजोर करना
निर्णय-प्रक्रिया में एक बड़ा बदलाव, जनता और स्थानीय लोकतांत्रिक संस्थाओं से हटकर एक अत्यंत केंद्रीकृत नौकरशाही की ओर जाना है। जनआंदोलनों से उपजे और सहभागी रोज़गार-सह-विकास कार्यक्रम के रूप में परिकल्पित मनरेगा को अब एक केंद्रीय नियंत्रण वाली कल्याण योजना से बदला जा रहा है। इस केंद्रीकरण की चरम अवस्था यह है कि केंद्र सरकार यह भी तय करेगी कि अधिनियम कब और किन क्षेत्रों में लागू होगा। यह एक अस्पष्ट और ख़तरनाक प्रावधान है।
प्रस्तावित विधेयक की धारा 5(1) में कहा गया है कि “राज्य सरकार, केंद्र सरकार द्वारा अधिसूचित किए गए राज्य के ऐसे ग्रामीण क्षेत्रों में, प्रत्येक उस परिवार को, जिसके वयस्क सदस्य अकुशल शारीरिक श्रम करने के लिए स्वेच्छा से आगे आते हैं, कम से कम 125 दिनों का गारंटीकृत रोज़गार प्रदान करेगी।” यह स्पष्ट नहीं है कि जिन ग्रामीण क्षेत्रों को केंद्र सरकार द्वारा अधिसूचित नहीं किया जाएगा, वहाँ के लोगों को काम का अधिकार मिलेगा या नहीं। यह लोकतांत्रिक विकेंद्रीकरण को पूरी तरह कमज़ोर करता है।
काम के दिनों की संख्या बढ़ाने की लफ्फाजी: इस विधेयक को लेकर जो एकमात्र प्रचार किया जा रहा है, वह यह दावा है कि गारंटीकृत काम के दिनों की संख्या बढ़ाकर 125 कर दी गई है। यह दावा महज़ बयानबाज़ी प्रतीत होता है। जब वर्ष भर काम की अनुमति थी, तब भी अधिकांश राज्यों में औसत कार्यदिवस 50 से कम रहते हैं और बहुत ही नगण्य संख्या में परिवारों को 100 दिनों का काम मिलता है। बिल के मौजूदा पाबंदियों वाले प्रावधानों को देखते हुए, ज़मीनी स्तर पर असल काम के दिनों की संख्या बढ़ाना लगभग नामुमकिन लगता है। सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि पर्याप्त फंड के बिना काम के दिनों में बढ़ौतरी मात्र कपोल कल्पना है जो केवल प्रचार के लिए है।
तकनीक के नाम पर बहिष्करण
इस विधेयक के माध्यम से सरकार ने एक झटके में रोज़गार गारंटी के क्रियान्वयन में प्रयुक्त सभी विवादास्पद और बहिष्करणकारी तकनीकी तंत्रों को वैध और संस्थागत बना दिया है। इनमें मज़दूरों और अन्य कर्मचारियों का बायोमेट्रिक प्रमाणीकरण प्रणाली, लेन-देन का डिजिटलीकरण, भू-स्थानिक तकनीक आधारित योजना-निर्माण, और मोबाइल ऐप और डैशबोर्ड आधारित निगरानी प्रणालियाँ शामिल हैं।
मज़दूर संगठनों ने बार-बार यह रेखांकित किया है कि मनरेगा में डिजिटल उपस्थिति प्रणाली (NMMS) और आधार-आधारित भुगतान प्रणाली (ABPS) जैसी अपारदर्शी और मनमानी तकनीकों के कारण बड़े पैमाने पर मज़दूरों को बाहर किया गया है। पिछले कुछ वर्षों में इस तकनीक के बेजा उपयोग से करोड़ों मज़दूरों के जॉब कार्ड रद्द किये गए हैं। तकनीक के इस रूप में उपयोग से मज़दूर और अधिकारी दोनों काम शुरू करने के लिए हतोत्साहित होते हैं।
इस विधेयक को लाने की प्रक्रिया स्थापित लोकतांत्रिक मानदंडों और परंपराओं के खिलाफ है। नरेगा के गठन के समय मज़दूरों, उनके संगठनों और अन्य हितधारकों के साथ व्यापक परामर्श किया गया था तथा संसद के भीतर भी गहन और विस्तृत चर्चा हुई थी। इसके विपरीत, यह विधेयक मज़दूरों और मज़दूर संगठनों से किसी भी प्रकार के परामर्श के बिना पेश किया जा रहा है।
यह विधेयक एक ऐसे अधिकार-आधारित क़ानून से एक बजट-सीमित योजना की ओर बुनियादी बदलाव को दर्शाता है, जिसमें केंद्र सरकार की कोई जवाबदेही नहीं है। ग्रामीण धनी वर्ग और ज़मींदार हमेशा से मनरेगा के विरोधी रहे हैं, और भाजपा-नेतृत्व वाली एनडीए सरकार उनके लिए हितकारी इस विधेयक के माध्यम से अपने वर्गीय चरित्र को उजागर कर रही है।
नरेंद्र मोदी सरकार काम के अधिकार के खिलाफ काम करने के लिए जानी जाती है और बजट में कटौती, वेतन भुगतान में देरी, प्रशासनिक बाधाओं और अब इस प्रस्तावित कानून के ज़रिए, इसने व्यवस्थित तरीके से काम के अधिकार को कमजोर करने और आखिरकार खत्म करने की कोशिश की है। खेतिहर मज़दूर, ग्रामीण मज़दूर और ग्रामीण गरीब अपने लोकतांत्रिक और आर्थिक अधिकारों पर इस हमलेको स्वीकार नहीं करेंगे। वे सड़कों पर एकजुट होकर इस मज़दूर-विरोधी, ज़मींदार और कॉर्पोरेट समर्थक कानून का विरोध करेंगे, और मनरेगा और कामगार वर्ग के प्रति राज्य की ज़िम्मेदारी के संवैधानिक सिद्धांत की रक्षा करेंगे।
(विक्रम सिंह अखिल भारतीय ग्रामीण मजदूर यूनियन के संयुक्त सचिव हैं।)