इतनी सी बातः सांसों की भी सुनो

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दुनिया तो बसते-बसते बसी है। कोई हजारों या लाखों साल में बनी है दुनिया। पेड़, पहाड़, जंगल, नदियां, पशु, पक्षी और तितलियां। तरह-तरह के फल-फूल और पौधे। असंख्य प्रकार के जीव-जंतु।

इस दुनिया को अचानक हमारी हवस ने खतरे में डाल दिया है। ग्लोबल वार्मिंग और पर्यावरण संकट के कारण धरती पर जीवन ख़त्म होने की आशंका है।

एक रिपोर्ट बताती है कि प्रदूषण के कारण उत्तर भारत के लगभग 50 करोड़ लोगों का जीवन औसतन सात साल कम हो जाएगा। ऐसे में झारखंड के संस्कृतिकर्मी मेघनाथ और उनकी अखरा टीम का चर्चित गीत याद आता है, “हम गांव छोड़ब नाहीं, हम जंगल छोड़ब नाहीं।”

इस गीत में आदिवासी पूछ रहे हैं,

पुरखे थे क्या मूरख जो वे जंगल को बचाए

धरती रखी हरी भरी, नदी मधु बहाए

तेरी हवस में जल गई धरती, लुट गई हरियाली

मछली मर गई, पंछी उड़ गए, जाने किस दिशाएं

इन चार पंक्तियों में पर्यावरण संरक्षण का पूरा दर्शन दिख जाता है। पहले कभी प्रदूषण नियंत्रण विभागों की जरूरत नहीं पड़ी। आज इतने अफसर, इतने कानून हैं, फिर भी पर्यावरण पर खतरा बढ़ता जा रहा है। वायु गुणवत्ता की जांच में देश के अत्यधिक प्रदूषित दस शहरों में आठ यूपी के और दो हरियाणा के हैं। प्रदूषण से घुटती अपनी जिंदगी से अंजान यूपी, बिहार, हरियाणा, पंजाब के लोगों को अपने वृद्ध पिता की खांसी नहीं दिखती। वे तो केजरीवाल की खांसी का मजाक उड़ाकर खुश रह लेते हैं। अपना क्या होगा, होश नहीं।

पर्यावरण बचाने के लिए हमें आगे आना ही होगा। यह आठवीं कक्षा की निबंध प्रतियोगिता और मानव श्रृंखला तक सीमित नहीं। प्रकृति से रिश्ता बढ़ाना होगा। विनाशकारी तरीकों पर रोक जरूरी है। संयमित जीवन शैली का कोई विकल्प नहीं। ऑड-इवेन कोई समाधान नहीं, बल्कि इस दिशा में एक सांकेतिक कदम है। पटाखों और पराली पर रोक भी जरूरी है। औद्योगिक प्रदूषण, नदियों में कचरा डालने, डीजल जेनरेटर और एसी के कारण प्रदूषण जैसी चीजों पर कड़ाई से रोक के लिए भी दृढ़ संकल्प की जरूरत है।

मीडिया और राजनेताओं को दिल्ली के प्रदूषण की ज्यादा चिंता है, क्योंकि वहां देश का शासक तबका रहता है, लेकिन देश के तमाम लोगों की जिंदगी का क्या होगा, यह सोचा होता तो शायद संकट इतना ज्यादा न होता। इसके लिए संसद और सरकारों पर निर्भरता हमें बर्बादी की ओर ही ले जाएगी। खबर है कि पर्यावरण पर संसदीय समिति की बैठक में अधिकांश सांसद शामिल नहीं हुए। गौतम गंभीर को भी बैठक में जाना जरूरी नहीं लगा, जबकि दिल्ली का प्रदूषण तो सबकी चिंता का विषय है।

हमारे पूर्वजों ने कैसे इस धरती को लाखों साल तक बचाकर हमें यह धरोहर सौंपी, इस पर सोचना होगा। हम अपने बच्चों को क्या देकर जाएंगे, यह भी सोच लें।

(विष्णु राजगढ़िया वरिष्ठ पत्रकार हैं और आजकल भोपाल स्थित माखन लाल चतुर्वेदी विश्वविद्यालय में प्रोफेसर के तौर पर अध्यापन का काम कर रहे हैं।)

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