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चांद बाग की मुस्लिम बस्ती, सामने तीन सौ दंगाई और एक भी खाकीधारी नहीं

खजूरी खास/चांद बाग (नई दिल्ली)। कल दोपहर दो बजे जंतर-मंतर स्थित स्वामी अग्निवेश के दफ्तर पर दिल्ली दंगों के हालात, उसके पीड़ितों को सहायता पहुंचाने तथा इलाके में अमनचैन स्थापित करने के लिए जरूरी पहलकदमियों पर विचार करने के मकसद से एक बैठक हुई। इस बैठक में गांधीवादी हिमांशु कुमार समेत तमाम संगठनों से जुड़े सामाजिक कार्यकर्ता, पत्रकार और अमनपसंद नागरिक शामिल थे। बैठक में दंगे के पैदा होने की स्थितियों और उसमें हस्तक्षेप करने को लेकर अभी बात चल ही रही थी कि पता चला गांधीवादियों के नेतृत्व में एक टीम दंगाग्रस्त इलाकों में जा रही है जो वहां सहायता सामग्री का वितरण करेगी।

इस पर बैठक में शामिल हमारे समेत दूसरे लोगों को लगा कि अभी शुरुआत उस टीम के साथ जुड़कर की जा सकती है। जिसमें प्रथमदृष्ट्या जमीनी हालात को न केवल देखने और समझने का मौका मिलेगा बल्कि उसमें हम लोगों की तरफ से क्या कुछ किया जा सकता है उसका भी आकलन करना आसान हो जाएगा। लिहाजा उस बैठक में शामिल हम सभी लोगों ने उसी टीम के साथ जाने का फैसला किया। फिर वहां से हम गांधी शांति प्रतिष्ठान आ गए। जहां संस्थान के अध्यक्ष कुमार प्रशांत, रामचंद्र राही, सौरभ वाजपेयी समेत तमाम लोग मौजूद थे।

चांद बाग में दंगे के दौरान जलाए गए तीन घर।

वहां पहुंचने पर पता चला कि प्रेस कांफ्रेंस के बाद इलाके में जाने की योजना है। फिर प्रेस कांफ्रेंस हुई। जिसमें कुमार प्रशांत का कहना था कि आम तौर पर अब तक दंगे स्थानीय या फिर कुछ छोेटे-मोटे मामलों को लेकर होते रहे हैं। और उनसे स्थानीय स्तर पर प्रशासन निपट लेता था। या फिर जरूरत पड़ती थी तो ऊपर से सेना या फिर दूसरी तरह का हस्तक्षेप होता था। लेकिन यह दंगा बिल्कुल अलग किस्म का है। इसको बाकायदा खाद-पानी देकर खड़ा किया जा रहा है। साथ ही प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से नेताओं की इस पर सरपरस्ती है। लिहाजा अब पूरी जिम्मेदारी जनता को निभानी होगी। क्योंकि न पुलिस अपनी भूमिका में है और न ही देश की सत्ता में बैठा नेतृत्व। लिहाजा जनता को ही आपस में फैसला लेना होगा कि वह खून करने की जगह एक दूसरे की हिफाजत करे।

फिर वहां से तय हुआ कि मेट्रो के जरिये पहले शास्त्री पार्क चला जाए और वहां से आटो या फिर किसी दूसरे साधन से दंगाग्रस्त इलाकों में जाया जाएगा। यहां बताया गया कि सहायता सामग्री सीधे शास्त्री पार्क पहुंच जाएगी। लिहाजा हम लोग आईटीओ मेट्रो स्टेशन से सीधे शास्त्री पार्क के लिए रवाना हो गए। वहां से ई रिक्शा के जरिये खजूरी खास पहुंच गए। तब तक शाम के तकरीबन 5-5.30 बज गए थे। आपको बता दें कि खजूरी खास भी दंगा प्रभावित इलाकों में रहा है। यहां पहुंचने पर कई तरह की आशंकाएं बनी हुई थीं। चौराहे पर कुछ सीआरपीएफ के जवान तैनात दिखे। उनमें से एक से पूछने पर पता चला कि कल वहां कोई अप्रिय घटना नहीं घटी।

धरना स्थल।

हालांकि शास्त्री चौराहे से लेकर खजूरी खास के इसे चौराहे के बीच पुस्ता रोड पर ज्यादा नहीं तो कुछ ट्रैफिक लगातार बनी हुई थी। लोग अपने दफ्तरों से घरों की ओर लौट रहे थे। तथा कुछ गाड़ियां भी आ-जा रही थीं। वैसे चौराहे पर मौजूद सुरक्षा बलों के जवान लोगों को समूह में एकत्रित होने से मना कर रहे थे। लिहाजा वहां से स्थानीय कोआर्डिनेटर सुप्रीम कोर्ट के वकील मुजाहिद और एक अन्य साथी आरिश के साथ बातचीत में फैसला लिया गया कि हम लोग सीधे मोहल्ले में जाएंगे और फिर वहीं सहायता सामग्री का वितरण किया जाएगा।

उसके बाद हम लोग खजूरी खास से भजनपुरा को जाने वाली मेन रोड के किनारे-किनारे कतारबद्ध होकर चलना शुरू किए। चौराहे से अभी 100 मीटर ही आगे बढ़े होंगे कि दंगों के निशान दिखने शुरू हो गए। शुरू में बांयीं तरफ एक दुकान जली दिखी। कुछ दूर आगे बढ़े तो कतार से तीन घर जला दिए गए थे। और बाकी के शटर बंद थे। फिर वह चर्चित मजार दिखी जिसको उपद्रवियों ने आग के हवाले कर दिया था। दिलचस्प बात यह है कि उसी के ठीक दरवाजे के सामने पुलिस चौकी स्थित है। बावजूद इसके मजार सुरक्षित नहीं रह सकी। यह अकेली तस्वीर ही दंगे की पूरी कहानी समझने के लिए काफी है।

दरअसल सड़क के एक तरफ खजूरी खास का मुस्लिम मोहल्ला है। दूसरी तरफ हिंदू आबादी रहती है। लोगों ने बताया कि उस मुख्य सड़क पर दंगाइयों का पूरा कब्जा था। और उन्हें पूरी तरह से पुलिस का संरक्षण मिला हुआ था। इस बीच हम सभी कतारबद्ध होकर चल रहे थे। लेकिन साथ ही लोगों की जेहन में आशंकाएं भी कम नहीं थीं। क्योंकि कोई घटना न होने के बावजूद भय और आतंक का माहौल उसी रूप में मौजूद था।

उसके बाद हम आगे बढ़े तो चांद बाग का वह इलाका आ गया जो इस दंगे में सबसे ज्यादा चर्चित हुआ था। उसके प्रवेश द्वार पर बांस और तिरपाल बिल्कुल उजड़े पड़े थे। और वहां पूरी वीरानगी छायी हुई थी। पूछने पर पता चला कि यह वह स्थान है जहां पिछले एक महीने से सीएए के खिलाफ महिलाओं का धरना चल रहा था। लेकिन उसे दो बार उजाड़ा जा चुका था। और दंगे की शुरुआत होते ही सोमवार को उपद्रवियों का सबसे पहला निशाना वही बना। दिलचस्प बात यह है कि खजूरी खास चौराहे की बात छोड़ दें तो वहां से लेकर चांदबाग के इस एक किमी की दूरी के बीच एक भी सुरक्षाकर्मी नहीं दिखा। पुलिस चौकी जरूर थी लेकिन पुलिस नदारद थी।

चांद बाग के स्थानीय लोग।

यह तब की स्थिति थी जब हम लोगों को बताया गया कि चांदबाग के भीतर जाने वाली सड़क के ठीक सामने स्थित पेट्रोल पंप पर उससे कुछ देर पहले सैकड़ों उपद्रवियों की भीड़ जमा थी। यानी माहौल पूरा गरम था। और किसी अनहोनी की आशंका से इनकार नहीं किया जा सकता था। यह स्थित तब है जब दिल्ली पुलिस के पास 84 हजार कर्मी हैं। पूरा केंद्रीय पुलिस बल का लश्कर है। और इलाका सीधे गृहमंत्रालय के तहत आता है। जिसमें किसी दूसरे की इजाजत लेने की जरूरत नहीं है। बावजूद इसके अगर पर्याप्त पुलिसकर्मियों की तैनाती नहीं की गयी है तो उसके पीछे दूसरी वजह क्या हो सकती है कि जनता को उसके रहमोकरम पर छोड़ दिया गया। वैसे भी जो पुलिसकर्मी तैनात थे और उनको लेकर जो-जो कहानियां सामने आ रही हैं उसको सुनकर कोई यही कह सकता है कि उससे अच्छा है कि सुरक्षा बल लगाया ही न जाए।

बहरहाल उसके बाद हम लोग चांदबाग का रुख किए। अभी गेट पर पहुंचे ही थे कि हम लोगों का सामना कुछ अधेड़ उम्र के लोगों और कुछ जवानों से हुआ। यह जानने पर कि हम लोग सहायता सामग्री वितरित करने और शांति मिशन पर आए हैं। उन्होंने तहेदिल से हमारा स्वागत किया और उन्हीं में से एक अधेड़ उम्र के शख्स ने तकरीबन ऐलानिया अंदाज में लोगों को बोला कि ये अपने लोग हैं और अपनों की मदद करने आए हैं लिहाजा इनका पूरा सहयोग करिए।

फिर उसके बाद जो लोगों से बातचीत शुरू हुई तो हर शख्स के पास बताने के लिए बहुत कुछ था। और वह सब कुछ बता देना चाहता था। एक अधेड़ शख्स ने बताया कि किस तरह से यहां दंगे संचालित किए गए हैं। उन्होंने बताया कि सामने मोहन नर्सिंग होम नाम का एक अस्पताल है। वह दंगाइयों के अड्डे के तौर पर काम कर रहा था। उनका कहना था कि नर्सिंग होम के पहले वाले मालिक जिनकी अब मौत हो चुकी है, अच्छे थे। लेकिन अब वह पूरी तरह से जीवन देने नहीं बल्कि जान लेने वाला केंद्र बन गया है।

वहां से शांति और खुशी नहीं बल्कि नफरत और घृणा फैलायी जाती है। एक शख्स ने बताया कि सामने से राइफलों से गोलियां चलायी जा रही थीं। उन्होंने अंधेरे में ही सही उन निशानों को दिखाने की कोशिश की जो अभी भी घरों की दीवारों पर चस्पा थे। उनका कहना था कि यह किसी तमंचे से संभव नहीं है। और न ही सामान्य रिवाल्वर से इतनी दूरी से मार किया जा सकता है। लिहाजा निश्चित तौर पर यह राइफल या फिर किसी दूरभेदी शस्त्र के इस्तेमाल से ही संभव है।

एक पढ़ा-लिखा नौजवान हालात पर बेहद गुस्सा था। उसने कहा कि भारत भूटान में तब्दील हो गया है। यहां लोकतंत्र नहीं अपराधतंत्र कायम है। क्योंकि पुलिस अपराधियों के साथ मिलकर घटनाओं को अंजाम दे रही है। इलाके में 8-9 लोगों की मौत की बात बतायी गयी। दुकानों और घरों समेत संपत्ति का बड़े स्तर पर नुकसान हुआ है। ज्यादातर वो दुकानें और घर शिकार बने हैं जो मुख्य सड़क पर थे जहां पूरी तरह से दंगाइयों का कब्जा था। लोगों ने बताया कि इस मुस्लिम बहुल बस्ती में हिंदुओं के भी घर हैं। उनके कई मंदिर हैं। लेकिन उनको तिनका भर भी नुकसान नहीं पहुंचा। सभी लोग बेहद सुरक्षित हैं।

इस मिशन में ऊपर आए नामों के अलावा चेतना से रविंद्र पटवाल, मीडियाकर्मी और पैनलिस्ट प्रमोद पाहवा, वर्कर्स यूनिटी पोर्टल से खालिद, श्यामवीर, उदय चे, गिरी और आदित्य सिंह आदि लोग शामिल थे।

This post was last modified on February 28, 2020 1:22 pm

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